वो फिल्में जो समाज का सच दिखा गईं
कुछ फिल्में हमें हमारी पसंदीदा दुनिया में ले जाती हैं लेकिन कुछ ऐसी होती हैं जो पर्दा उठाकर उसी दुनिया का वह चेहरा दिखाती हैं, जिससे हम आंखें चुराना चाहते हैं। ‘अंकुर’, ‘निशांत’, ‘अर्धसत्य’, ‘जाने भी दो यारो’, ‘आक्रोश’, ‘मिर्च मसाला’ से लेकर ‘कोर्ट’ और ‘आर्टिकल 15’ तक, भारतीय सिनेमा की एक पूरी परम्परा ऐसी रही है जिसने मनोरंजन से आगे जाकर समाज की सत्ता, शोषण, भ्रष्टाचार, जाति, हिंसा और हमारे अपने अंतर्विरोधों को आईना दिखाया। सवाल यह है कि आज जब हमारे पास देखने के लिए पहले से कहीं ज्यादा सिनेमा है तो क्या वह आईना उतनी ही बेबाकी से हमारे सामने रखा जा रहा है?
हम फिल्मों में अक्सर सपने देखने जाते हैं। प्रेम का सपना, सफलता का सपना, एक खूबसूरत जिंदगी का सपना और कभी-कभी उस दुनिया का सपना भी जिसमें हमारी तमाम परेशानियां दो-ढाई घंटे के लिए गायब हो जाती हैं। सिनेमा की यह भूमिका भी जरूरी है। आखिर जिंदगी हमेशा इतनी आसान नहीं होती कि उसमें मनोरंजन की जरूरत न पड़े लेकिन भारतीय सिनेमा की एक दूसरी परम्परा भी रही है, जिसने दर्शकों को सपनों की दुनिया में ले जाने के बजाय उसकी अपनी दुनिया के सामने खड़ा किया। इन फिल्मों ने कहा, जरा पर्दे के उस पार भी देखिए। जिस समाज में आप रहते हैं, उसमें कौन दबा हुआ है, कौन ताकतवर है, किसके साथ अन्याय हो रहा है और हम सब उस व्यवस्था का हिस्सा किस तरह बने हुए हैं।
जब गांव की तस्वीर बदल गई
हिंदी फिल्मों में गांव लम्बे समय तक एक खूबसूरत पृष्ठभूमि रहा, खेत, खलिहान, पेड़, तालाब, प्रेमी जोड़े और दूर से आती बांसुरी की आवाज लेकिन समानांतर सिनेमा ने गांव की इस चमकदार तस्वीर को उलट दिया। श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ को देखिए। यहां गांव कोई मासूम और शांत दुनिया नहीं है। यहां जमीन के साथ सत्ता जुड़ी है, जाति के साथ सम्बंध जुड़े हैं और आर्थिक ताकत के साथ इंसान की हैसियत तय होती है। एक सामंती व्यवस्था के भीतर पनपता शोषण फिल्म को केवल दो व्यक्तियों की कहानी नहीं रहने देता, वह पूरे सामाजिक ढांचे पर सवाल बन जाता है। इसके बाद ‘निशांत’ आती है। सामंती ताकत, गांव की सत्ता और स्त्री के प्रति हिंसा को जिस बेचैनी के साथ फिल्म सामने रखती है, वह दर्शक को आराम से बैठने नहीं देती। फिल्म में अत्याचार किसी एक खलनायक की व्यक्तिगत बुराई नहीं है। असली सवाल उस पूरे तंत्र का है जिसमें ताकतवर व्यक्ति इसलिए ताकतवर बना रहता है क्योंकि उसके सामने खड़े होने का साहस और व्यवस्था दोनों कमजोर पड़ जाते हैं। यही वजह है कि ‘निशांत’ देखते हुए हमें सिर्फ एक गांव दिखाई नहीं देता, हमें सत्ता का वह चेहरा दिखाई देता है जो कानून से ऊपर खुद को समझने लगता है।
‘आक्रोश’ ने खामोशी का अर्थ समझाया
गोविंद निहलानी की ‘आक्रोश’ तो जैसे भारतीय समाज की उस खामोशी को पर्दे पर ले आती है, जिसके पीछे बहुत कुछ दबा हुआ है। आदिवासी जीवन, शोषण और न्याय व्यवस्था के बीच फंसे एक व्यक्ति की कहानी में सबसे भयावह चीज सिर्फ अपराध नहीं है बल्कि वह व्यवस्था है जिसमें पीड़ित की आवाज ही सुनाई नहीं देती। फिल्म सवाल करती है कि अगर किसी व्यक्ति के पास अपनी बात कहने का साधन नहीं है, अगर उसके आस-पास की पूरी व्यवस्था ताकतवर लोगों के पक्ष में खड़ी है तो उसके लिए न्याय का अर्थ आखिर क्या रह जाता है? इसी क्रम में ‘सद्गति’ को भी याद करना जरूरी है। प्रेमचंद की कहानी पर बनी सत्यजीत रे की यह फिल्म जाति व्यवस्था के उस अमानवीय चेहरे को सामने रखती है जिसे देखने के लिए किसी बड़े भाषण की जरूरत नहीं पड़ती। एक इंसान के साथ किया गया व्यवहार ही पूरे समाज की मानसिकता का परिचय बन जाता है। फिल्म खत्म होती है लेकिन उसके भीतर की असहजता बहुत देर तक बनी रहती है।
‘अर्धसत्य’ में व्यवस्था के भीतर फंसा आदमी
अगर ‘अंकुर’ और ‘निशांत’ ने सामाजिक सत्ता का चेहरा दिखाया तो ‘अर्धसत्य’ ने व्यवस्था के भीतर फंसे व्यक्ति की त्रासदी सामने रखी। एक पुलिस अधिकारी अपने कर्तव्य, अपने गुस्से, राजनीतिक दबाव, अपराध और निजी जीवन के बीच लगातार झूलता रहता है। वह व्यवस्था का हिस्सा है लेकिन वही व्यवस्था उसे भीतर से तोड़ती भी है। ‘अर्धसत्य’ की खूबी यह है कि वह पुलिस को केवल नायक और अपराधी को केवल खलनायक बनाकर मामला खत्म नहीं करती। वह उस आदमी के भीतर उतरती है जो ईमानदार रहना चाहता है लेकिन जिस व्यवस्था में वह काम करता है, वहां ईमानदारी भी लगातार परीक्षा में है। यह फिल्म पूछती है कि क्या केवल व्यक्ति को बदल देने से व्यवस्था बदल जाती है या व्यवस्था व्यक्ति को भी अपने जैसा बनाने की कोशिश करती है? और यही वजह है कि ‘अर्धसत्य’ आज भी सिर्फ एक पुरानी फिल्म नहीं लगती। व्यवस्था और व्यक्ति के बीच का संघर्ष कभी पुराना नहीं होता।
‘जाने भी दो यारो’ ने हंसते-हंसते व्यवस्था की पोल खोल दी
समाज को आईना दिखाने के लिए हर फिल्म को गम्भीर और बोझिल होना जरूरी नहीं। ‘जाने भी दो यारो’ इसका सबसे शानदार उदाहरण है। शायद भारतीय सिनेमा में भ्रष्टाचार, सत्ता, ठेकेदारी, मीडिया और संस्थागत मिलीभगत पर इससे ज्यादा तीखा व्यंग्य बहुत कम फिल्मों ने किया होगा।
कमाल यह है कि फिल्म हमें हंसाती है और उसी हंसी के बीच हमारी व्यवस्था की ऐसी तस्वीर सामने रख देती है कि हंसी धीरे-धीरे असहजता में बदलने लगती है। सत्ता और पैसे का गठजोड़, भ्रष्टाचार और उसके बीच अपना काम बचाने की कोशिश करते सामान्य लोग, सब कुछ हास्य के भीतर लिपटा हुआ है। आज इतने वर्षों बाद भी ‘जाने भी दो यारो’ देखते हुए कई प्रसंग हमें पुराने नहीं लगते। यही किसी व्यंग्य की सबसे बड़ी सफलता और शायद सबसे बड़ी विडम्बना भी है। जिस व्यवस्था पर फिल्म ने व्यंग्य किया था, अगर वह आज भी हमें परिचित लगती है तो सवाल फिल्म का नहीं, हमारे समाज का है।
‘मिर्च मसाला’ में एक स्त्री का प्रतिरोध
केतन मेहता की ‘मिर्च मसाला’ भी इसी परम्परा की महत्वपूर्ण फिल्म है। सत्ता और स्त्री के बीच का सम्बंध, पुरुष वर्चस्व और उसके सामने खड़ी होती स्त्री की सामूहिक ताकत, फिल्म इन सवालों को ऐसे समय में सामने रखती है जब आज की भाषा में इन मुद्दों पर चर्चा भी इतनी आम नहीं थी। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात सिर्फ यह नहीं कि एक स्त्री अत्याचार का विरोध करती है। असली बात यह है कि उसके प्रतिरोध का असर अकेले उस पर नहीं पड़ता। धीरे-धीरे दूसरी स्त्रियां भी उस प्रतिरोध का हिस्सा बनती हैं। यानी फिल्म व्यक्तिगत साहस से आगे जाकर सामूहिक प्रतिरोध की सम्भावना तलाशती है।
जब शहर भी सपनों का नहीं, संघर्ष का चेहरा बना
भारतीय सिनेमा में आईना सिर्फ गांव और व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा। शहर भी इस आईने में आया। ‘सत्या’ ने मुम्बई की चमकदार छवि के पीछे मौजूद अपराध की दुनिया दिखाई। यहां अपराधी कोई दूर का राक्षस नहीं है बल्कि उसी शहर का हिस्सा है जहां लाखों लोग अपने सपनों के साथ आते हैं। अपराध, पैसा, सत्ता और महत्वाकांक्षा के बीच आदमी धीरे-धीरे किस तरह बदलता है, फिल्म इसी अंधेरे रास्ते पर ले जाती है।
फिर ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’ जैसी फिल्में आईं, जिन्होंने बेरोजगारी, अपराध और सामाजिक हाशिए पर खड़े मुस्लिम युवा की दुनिया को देखने की कोशिश की। ‘धारावी’ ने महानगर के उस हिस्से को सामने रखा जो चमकते शहर की तस्वीर में अक्सर दिखाई ही नहीं देता। इन फिल्मों ने बताया कि शहर केवल बड़े सपनों और ऊंची इमारतों का नाम नहीं है। उसके भीतर वे लोग भी रहते हैं जिनके सपने उसी शहर की व्यवस्था में कहीं दब जाते हैं।
‘न्यूटन’ से ‘कोर्ट’ तक सवाल बदलते नहीं
इसके बाद ‘न्यूटन’ आती है, जहां लोकतंत्र और उसकी जमीनी वास्तविकता का अंतर दिखाई देता है। कागज पर चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है लेकिन दूरदराज के इलाके में उसे वास्तविकता में बदलना कितना कठिन हो सकता है, फिल्म यह दिखाती है। वहीं ‘कोर्ट’ न्याय व्यवस्था और आम आदमी के बीच की दूरी को बेहद शांत तरीके से सामने रखती है। कोई बड़े संवाद नहीं, कोई नाटकीयता नहीं, बस व्यवस्था अपनी गति से चलती रहती है और इंसान उसमें कहीं छोटा पड़ता जाता है। ‘मसान’ भी अपने तरीके से समाज का आईना है। छोटे शहर की जिंदगी, जाति, प्रेम, मृत्यु, अपराधबोध और सामाजिक प्रतिष्ठा, फिल्म इन सबको एक साथ रखती है। फिर
‘आर्टिकल 15’ आती है और जाति के सवाल को एक बार फिर मुख्यधारा की बातचीत के बीच ला खड़ा करती है। तकनीक में आगे बढ़ता हुआ भारत और सामाजिक भेदभाव की पुरानी मानसिकता, दोनों एक ही फ्रेम में दिखाई देते हैं।
‘आर्टिकल 15’ आती है और जाति के सवाल को एक बार फिर मुख्यधारा की बातचीत के बीच ला खड़ा करती है। तकनीक में आगे बढ़ता हुआ भारत और सामाजिक भेदभाव की पुरानी मानसिकता, दोनों एक ही फ्रेम में दिखाई देते हैं।
मीडिया भी आईने के सामने खड़ा हुआ
‘जाने भी दो यारो’ और ‘पीपली लाइव’ के बीच एक महत्वपूर्ण रिश्ता है। दोनों अपने-अपने समय में मीडिया को आईना दिखाती हैं। ‘पीपली लाइव’ में किसान की त्रासदी खबर बनती है, फिर राजनीतिक मुद्दा बनती है और देखते-देखते तमाशे में बदल जाती है। यहां सवाल सिर्फ किसान का नहीं है। सवाल यह भी है कि मीडिया किसी पीड़ा को किस नजर से देखता है और दर्शक उसे किस नजर से देखता है। आज जब हर व्यक्ति अपने हाथ में कैमरा लेकर घूम रहा है और खबर कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है, यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है। क्या हम किसी घटना को समझना चाहते हैं या सिर्फ उसे देखना चाहते हैं? क्या पीड़ा हमारे लिए संवेदना है या सामग्री?
आईना दिखाने वाला सिनेमा आखिर जरूरी क्यों है?
सवाल यह है कि आखिर हमें ऐसी फिल्में चाहिए ही क्यों जो हमें असहज करें? क्या सिनेमा का काम हमें दो घंटे के लिए हमारी परेशानियों से दूर ले जाना नहीं है? बिल्कुल है। मनोरंजन सिनेमा की ताकत है और उसकी जरूरत भी लेकिन अगर सिनेमा केवल हमारी पसंद की दुनिया दिखाता रहे तो वह समाज का पूरा प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। समाज में सुंदरता है तो कुरूपता भी है, प्रेम है तो हिंसा भी है, सफलता है तो असफलता भी है, सपने हैं तो उनके नीचे दबे हुए लोग भी हैं। आईना कभी-कभी अच्छा नहीं लगता लेकिन उसका काम सुंदर दिखना नहीं, सच दिखाना है।
भारतीय सिनेमा की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों ने यही किया। उन्होंने दर्शकों को यह सुविधा नहीं दी कि फिल्म खत्म होते ही समस्या भी खत्म हो जाए। ‘अंकुर’ के बाद सामंती व्यवस्था का सवाल बचा रहा, ‘अर्धसत्य’ के बाद व्यवस्था और व्यक्ति का संघर्ष बचा रहा, ‘जाने भी दो यारो’ के बाद भ्रष्टाचार पर हंसी के भीतर छिपी कड़वाहट बची रही, ‘मिर्च मसाला’ के बाद स्त्री के प्रतिरोध का सवाल बचा रहा और ‘आर्टिकल 15’ के बाद बराबरी के संवैधानिक वादे और सामाजिक वास्तविकता के बीच की दूरी का सवाल बचा रहा। शायद यही किसी महान फिल्म की पहचान है कि वह पर्दे पर खत्म होती है लेकिन दर्शक के भीतर खत्म नहीं होती।
आज हमारे पास पहले से कहीं ज्यादा फिल्में हैं। एक क्लिक पर मनोरंजन है, रोमांस है, हास्य है, एक्शन है, अपराध है और दुनिया भर की कहानियां हैं लेकिन इस शोर के बीच आईना दिखाने वाले सिनेमा की जरूरत कम नहीं हुई है। बल्कि शायद बढ़ी है क्योंकि सूचना के इस दौर में हम बहुत कुछ देख रहे हैं लेकिन जरूरी नहीं कि उतना ही समझ भी रहे हों। अच्छा सिनेमा कभी-कभी हमारे सामने कोई समाधान नहीं रखता। वह सिर्फ सवाल रखता है। शायद सवाल ही बदलाव की पहली सीढ़ी होते हैं। इसलिए ‘अंकुर’ से ‘जाने भी दो यारो’ तक, ‘अर्धसत्य’ से ‘मिर्च मसाला’ तक और ‘कोर्ट’ से ‘आर्टिकल 15’ तक इन फिल्मों को सिर्फ पुरानी या गम्भीर फिल्में मानकर किनारे कर देना ठीक नहीं होगा। ये हमारे समाज की ऐसी तस्वीरें हैं जिनमें समय बदल जाने के बावजूद कई चेहरे आज भी पहचाने जा सकते हैं और शायद सिनेमा की असली ताकत यहीं छिपी है। कुछ फिल्में हमें हमारी जिंदगी से दूर ले जाती हैं और हमें सपने दिखाती हैं लेकिन कुछ फिल्में हमें वापस उसी जिंदगी में लाकर खड़ा कर देती हैं, जिससे हम थोड़ी देर के लिए भागना चाहते थे।
सपना देखने के बाद हम खुश होकर घर लौट सकते हैं लेकिन आईना देखने के बाद अगर हम थोड़ी देर रुककर खुद से पूछें कि ‘‘क्या इस तस्वीर में मेरा भी कोई हिस्सा है?’’ तो शायद वहीं से सिनेमा अपनी सबसे बड़ी भूमिका निभाना शुरू करता है क्योंकि अंततः सिनेमा सिर्फ वह नहीं है जो पर्दे पर दिखाई देता है। सिनेमा वह भी है जो पर्दा गिरने के बाद हमारे भीतर दिखाई देता रहता है। शायद इसलिए कुछ फिल्में दशकों बाद भी पुरानी नहीं होती, क्योंकि उनका समय बीत जाता है लेकिन जिस समाज का आईना उन्होंने दिखाया था, वह पूरी तरह नहीं बदलता।
