कर्णप्रयाग के बहुगुणानगर में करीब चार साल से भू-धंसाव का दंश झेल रहे 24 परिवारों ने आखिरकार मुआवजा लेकर अपनी जमीन छोड़ने पर सहमति दे दी है। सुरक्षा कार्यों के लिए करीब 50 करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि स्वीकृत है और सिंचाई विभाग ने ड्रिलिंग-पाइलिंग का काम भी शुरू किया था लेकिन पिछले करीब एक माह से काम ठप है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब प्रभावित परिवार अपनी सहमति दे चुके हैं तो मुआवजा कब मिलेगा और वे कब तक दरकते मकानों में रहने को मजबूर रहेंगे?
चमोली जिले के कर्णप्रयाग नगर पालिका क्षेत्र बहुगुणानगर में जमीन सिर्फ धंस नहीं रही बल्कि उसके साथ लोगों का भरोसा भी धीरे-धीरे खिसक रहा है। मकानों की दीवारों और आंगनों में पड़ी दरारें हर दिन परिवारों को यह एहसास करा रही हैं कि उनका अपना घर अब पहले जैसा सुरक्षित नहीं रहा। करीब चार साल से भू-धंसाव की समस्या झेल रहे इन परिवारों के लिए बरसात का मौसम किसी डरावने इंतजार से कम नहीं है। दूसरी ओर प्रभावित परिवारों को दिया जाने वाला मुआवजा अभी सरकारी प्रक्रिया में है। ऐसे में लोग अपने दरके और कमजोर मकानों में रहने को मजबूर हैं।
बहुगुणानगर बदरीनाथ हाईवे और नैनीसैंण सड़क के बीच बसा हुआ है। करीब चार साल से यहां लगातार भू-धंसाव की समस्या बनी हुई है। शुरुआत में कुछ मकानों में दरारें दिखाई दीं लेकिन धीरे-धीरे स्थिति गम्भीर होती गई और कई मकान इसकी चपेट में आ गए। भू-धंसाव बढ़ने के साथ प्रभावित परिवारों की चिंता भी बढ़ती गई। कई लोगों के लिए यह सवाल खड़ा हो गया कि जिस मकान को उन्होंने जीवन भर की कमाई से बनाया, उसमें रहना ही सुरक्षित नहीं रह गया तो आखिर वे जाएं कहां।
बहुगुणानगर में प्रभावित परिवारों की संख्या लगातार चिंता का विषय बनी रही। इनमें से चार परिवारों को एनएचआईडीसीएल की ओर से मुआवजा दिया जा चुका है लेकिन अन्य 24 परिवार लम्बे समय से मुआवजे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बीच में मुआवजे और विस्थापन को लेकर प्रभावित परिवारों के बीच सहमति नहीं बन पाने के कारण मामला आगे नहीं बढ़ पाया। विधायक, जिलाधिकारी और उपजिलाधिकारी के स्तर पर प्रभावित परिवारों के साथ कई दौर की वार्ता हुई। बातचीत के बाद अब 24 प्रभावित परिवार मुआवजा लेकर अपनी जमीन छोड़ने पर सहमत हो गए हैं। यह सहमति निश्चित रूप से प्रभावित परिवारों और प्रशासन के बीच लम्बे समय से चल रही प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है लेकिन प्रभावितों की परेशानी अभी खत्म नहीं हुई है। सहमति बनने के बाद अब उनकी निगाह मुआवजे की राशि पर है। परिवारों का कहना है कि जब उनके मकान लगातार खतरे में हैं और वे अपनी जमीन छोड़ने को तैयार हो चुके हैं तो मुआवजे की प्रक्रिया भी तेजी से पूरी होनी चाहिए, ताकि वे सुरक्षित स्थान पर जाकर अपना जीवन फिर से शुरू कर सकें।
बहुगुणानगर की समस्या को देखते हुए यहां सुरक्षा कार्यों के लिए कई दौर में सर्वे कराया गया। विभागीय स्तर पर सर्वे के साथ आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण से जुड़े विशेषज्ञों और भूगर्भ वैज्ञानिकों ने भी क्षेत्र का अध्ययन किया। जमीन की स्थिति, भू-धंसाव की प्रकृति और प्रभावित क्षेत्र का आकलन करने के बाद यहां सुरक्षा कार्यों की योजना तैयार की गई। इसके लिए सिंचाई विभाग को करीब 50 करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि स्वीकृत हुई।
सुरक्षा योजना के तहत जमीन को स्थिर करने के लिए ड्रिलिंग और पाइलिंग जैसे तकनीकी कार्य किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य प्रभावित क्षेत्र में जमीन की पकड़ मजबूत करना और भू-धंसाव की समस्या को नियंत्रित करना है।
सिंचाई विभाग ने पहले चरण में मंडी समिति परिसर में ड्रिलिंग और पाइलिंग का काम किया भी है। इससे उम्मीद जगी थी कि लम्बे समय से भूधंसाव की समस्या झेल रहे बहुगुणानगर को राहत मिल सकेगी लेकिन सुरक्षा कार्यों की रफ्तार फिलहाल थम गई है। करीब एक माह से यहां काम बंद पड़ा है। अब सुरक्षा कार्य नैनीसैंण सड़क की ओर किए जाने हैं। इसके लिए सड़क पर वाहनों की आवाजाही रोकना जरूरी है ताकि मशीनों और निर्माण कार्य के लिए पर्याप्त जगह मिल सके लेकिन लोगों के विरोध के कारण सड़क बंद करने की अनुमति नहीं मिल पाई। इसका सीधा असर सुरक्षा कार्यों पर पड़ा और काम पिछले करीब एक माह से ठप है।
यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि सुरक्षा कार्य और प्रभावित परिवारों का मुआवजा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक तरफ जिन परिवारों के मकान खतरे में हैं, वे मुआवजे के बाद वहां से हटने की तैयारी में हैं, वहीं दूसरी तरफ भू-धंसाव को रोकने के लिए जरूरी तकनीकी कार्य भी अधूरे पड़े हैं। ऐसे में प्रभावितों को न तो तत्काल आर्थिक राहत मिल पाई है और न ही सुरक्षा कार्य अपनी पूरी गति से आगे बढ़ पा रहे हैं।
कर्णप्रयाग में भू-धंसान का संकट केवल बहुगुणा नगर तक सीमित नहीं है। नगर के कई दूसरे हिस्से भी इस समस्या से प्रभावित हैं। अपर बाजार में रामलीला मैदान और हनुमान मंदिर के आसपास की बस्ती खतरे की जद में है। ईड़ाबधाणी में लगातार भूधंसाव हो रहा है और इसके कारण कई आवासीय मकानों पर खतरा बना हुआ है। सुभाषनगर में भी दस से अधिक परिवार भू-धंसाव से प्रभावित हैं। यहां एक मकान पूरी तरह जमींदोज हो चुका है जबकि आसपास के दूसरे मकानों पर भी खतरा बना हुआ है। जखेड़ और पाडली क्षेत्र में भी भू-धंसाव और भूस्खलन की समस्या सामने आती रही है।
कर्णप्रयाग जैसे पहाड़ी नगर में यह स्थिति केवल कुछ परिवारों के मकानों को नुकसान पहुंचने तक सीमित नहीं है। यह पूरे शहर की सुरक्षा और भविष्य की चिंता से जुड़ा सवाल है। पहाड़ों में लगातार बढ़ते निर्माण, सड़क चैड़ीकरण, जल निकासी की समस्या और प्राकृतिक ढलानों में बदलाव का असर कई स्थानों पर दिखाई दे रहा है। ऐसे में किसी क्षेत्र में भू-धंसाव शुरू होने के बाद केवल क्षतिग्रस्त मकानों को मुआवजा देना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि भू-धंसाव की वास्तविक वजह क्या है और भविष्य में उसे रोकने के लिए स्थायी उपाय क्या किए जा सकते हैं। बहुगुणानगर के प्रभावितों के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चिंता अपने घर और भविष्य को लेकर है। दरारें बढ़ती हैं तो उन्हें डर लगता है कि कहीं मकान अचानक ढह न जाए। बारिश के दौरान यह डर और बढ़ जाता है। इसके बावजूद कई परिवार अपने घरों में रहने को मजबूर हैं क्योंकि उनके पास तत्काल कहीं और जाने की व्यवस्था नहीं है। मुआवजा मिलने के बाद ही वे सुरक्षित स्थान पर जाने की स्थिति में आ पाएंगे।
अब जब 24 परिवारों ने मुआवजे पर सहमति दे दी है तो प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस सहमति को वास्तविक राहत में बदलने की है। प्रभावित परिवारों ने अपनी ओर से फैसला कर लिया है। अब गेंद प्रशासन के पाले में है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि मुआवजे की प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लम्बी न खिंचे और प्रभावित परिवारों को समयबद्ध तरीके से भुगतान मिले। साथ ही सुरक्षा कार्यों को भी जल्द शुरू करना होगा। यदि सुरक्षा कार्य सड़क बंद होने की अनुमति के अभाव में रुके हैं तो प्रशासन को स्थानीय लोगों, विभाग और प्रभावित परिवारों के बीच ऐसा रास्ता निकालना होगा जिससे यातायात और सुरक्षा कार्य दोनों का संतुलन बनाया जा सके। सड़क कुछ समय के लिए बंद करनी पड़े तो उसके लिए वैकल्पिक यातायात व्यवस्था तैयार की जा सकती है लेकिन सुरक्षा कार्यों को अनिश्चितकाल तक रोकना समस्या का समाधान नहीं है।
बहुगुणानगर की कहानी दरअसल उस पहाड़ी संकट की तस्वीर है जिसमें आपदा आने के बाद राहत की प्रक्रिया शुरू होती है, सर्वे होते हैं, रिपोर्ट तैयार होती है, धनराशि स्वीकृत होती है और फिर काम शुरू होने के बाद किसी न किसी स्तर पर नई अड़चन सामने आ जाती है। इस पूरी प्रक्रिया के बीच सबसे अधिक असुरक्षित वही परिवार रहता है जिसका घर पहले ही जमीन के खिसकने से खतरे में आ चुका है।
चार साल से भू-धंसाव झेल रहे इन परिवारों के लिए अब और इंतजार आसान नहीं है। उनके लिए दरारें महज दीवारों पर बनी रेखाएं नहीं हैं बल्कि हर दिन सामने खड़ा खतरा हैं। एक ओर घर छोड़ने की मजबूरी है और दूसरी तरफ मुआवजे का इंतजार। ऐसे में प्रशासन के लिए अब यह महज एक फाइल नहीं रहनी चाहिए। 24 परिवारों की सहमति के बाद उन्हें सुरक्षित भविष्य देने की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी बहुगुणा नगर की जमीन को स्थिर करने की।
कर्णप्रयाग के दूसरे प्रभावित इलाकों को देखते हुए भी इस पूरे मामले से सबक लेने की जरूरत है। बहुगुणानगर में जो स्थिति आज दिखाई दे रही है, वह कल किसी दूसरे मोहल्ले या बस्ती में पैदा न हो, इसके लिए नगर के संवेदनशील क्षेत्रों का वैज्ञानिक सर्वे, जल निकासी की समुचित व्यवस्था और निर्माण गतिविधियों की नियमित निगरानी जरूरी है। केवल संकट आने के बाद राहत देने की व्यवस्था से पहाड़ी नगरों की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
बहुगुणानगर के 24 परिवार फिलहाल अपने घरों की दीवारों पर उभरी दरारों और सरकारी फाइलों में चल रही मुआवजे की प्रक्रिया के बीच खड़े हैं। उन्होंने अपना फैसला सुना दिया है वे मुआवजा लेकर खतरे से बाहर जाना चाहते हैं। अब इंतजार प्रशासन के फैसले का है। दरारें अपनी जगह हैं, जमीन अपनी जगह खिसक रही है और समय भी बीत रहा है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं कि मुआवजा कब मिलेगा बल्कि यह भी है कि प्रभावित परिवारों को सुरक्षित जीवन कब मिलेगा।