स्कूलों में बुर्का पर रोक इटली की दक्षिणपंथी राजनीति का नया चेहरा
इटली की प्रधानमंत्री जाॅर्जिया मेलोनी ने स्कूलों में बुर्का और नकाब पर रोक, विदेशी विद्यार्थियों की संख्या सीमित करने और कुछ प्रवासी अभिभावकों के लिए इटली भाषा सीखना अनिवार्य करने का प्रस्ताव रखा है। यह फैसला सिर्फ स्कूलों की व्यवस्था का मामला नहीं है। इसके पीछे इटली की राजनीति में मजबूत हो रहे दक्षिणपंथ, प्रवासन और राष्ट्रीय पहचान के सवाल तथा 2027 के चुनाव से पहले दक्षिणपंथ के भीतर ही बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी महत्वपूर्ण है
इटली की प्रधानमंत्री जाॅर्जिया मेलोनी ने स्कूलों में बुर्का और नकाब पर रोक लगाने की घोषणा करके एक बार फिर प्रवासन और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे को राजनीति के केंद्र में ला दिया है। मेलोनी ने कहा है कि स्कूलों में बुर्का और नकाब पहनने की अनुमति नहीं होगी। इसके साथ ही एक कक्षा में विदेशी विद्यार्थियों की संख्या सीमित करने और जिन विदेशी विद्यार्थियों को स्कूल व्यवस्था में घुलने-मिलने में गम्भीर कठिनाई है, उनके माता-पिता के लिए इटली भाषा सीखना अनिवार्य करने की भी बात कही गई है। अभी यह प्रस्ताव है और इसे कानून बनने के लिए आगे सरकार तथा संसद की प्रक्रिया से गुजरना होगा।
मेलोनी का कहना है कि जो लोग इटली में रहकर अपना भविष्य बनाना चाहते हैं, उन्हें इटली भाषा सीखनी होगी, इटली की संस्कृति को समझना होगा और वहां के कानूनों का सम्मान करना होगा। उनका तर्क है कि यदि किसी कक्षा में एक-दो बच्चे इटली भाषा नहीं जानते तो शिक्षक और दूसरे बच्चे उनकी मदद कर सकते हैं लेकिन अगर ऐसे बच्चों की संख्या बहुत अधिक हो जाए तो स्कूल में उनका एकीकरण मुश्किल हो जाता है। इस तर्क के साथ उन्होंने विदेशी विद्यार्थियों की संख्या सीमित करने की बात कही है।
इस घोषणा को केवल शिक्षा नीति के रूप में देखना इटली की मौजूदा राजनीति को समझने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। असल में इटली इस समय यूरोप के उन देशों में है जहां दक्षिणपंथी राजनीति सबसे ज्यादा प्रभावशाली दिखाई दे रही है। जाॅर्जिया मेलोनी की ‘ब्रदर्स ऑफ इटली’ पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार सितम्बर 2026 में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इटली की सबसे लम्बे समय तक लगातार चलने वाली सरकार बन चुकी है। उनकी सरकार में दक्षिणपंथी ‘लीग’ और मध्यम-दक्षिणपंथी ‘फोर्जा इटालिया’ भी शामिल हैं। यानी सरकार के भीतर भी दक्षिणपंथ का मजबूत आधार है।
मेलोनी की खासियत यह रही है कि उन्होंने सत्ता में आने के बाद अपने राजनीतिक तेवरों को कुछ हद तक व्यावहारिक बनाया है। यूरोपीय संघ और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी राजनीति को घरेलू चुनावी राजनीति की तुलना में ज्यादा व्यावहारिक रूप में देखा गया है लेकिन देश के भीतर प्रवासन, सुरक्षा, परिवार, राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक मूल्यों जैसे मुद्दों पर वह अपने दक्षिणपंथी आधार को लगातार सक्रिय रखती रही हैं। अब बुर्का और नकाब का सवाल उसी राजनीति का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि मेलोनी पर दबाव केवल वामपंथ या विपक्ष की तरफ से नहीं है। उनके सामने चुनौती दक्षिणपंथ के भीतर से भी आ रही है। पूर्व सैन्य अधिकारी राॅबर्टो वान्नाची ने 2026 में ‘फुतूरो नाजियोनाले’ नाम से नई राजनीतिक पार्टी बनाई है। यह पार्टी मेलोनी से भी अधिक कठोर राष्ट्रवादी और प्रवासन विरोधी रुख अपनाने की कोशिश कर रही है। पिछले कुछ महीनों में इस पार्टी का समर्थन बढ़ने की खबरें सामने आई हैं। यानी अब मेलोनी के सामने समस्या यह है कि यदि वह बहुत नरम दिखती हैं तो उनसे भी ज्यादा कठोर दक्षिणपंथी नेता उनके मतदाताओं को अपनी तरफ खींच सकते हैं।
यही वजह है कि बुर्का और नकाब का मुद्दा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। मेलोनी के लिए यह केवल धार्मिक पहनावे का सवाल नहीं है। इसके माध्यम से वह अपने समर्थकों को यह संदेश भी दे रही हैं कि उनकी सरकार प्रवासन और सांस्कृतिक पहचान के सवाल पर पीछे हटने वाली नहीं है। दूसरी तरफ, वान्नाची जैसे नेता इससे भी आगे जाने की मांग कर रहे हैं। इसलिए मेलोनी की राजनीति को अब एक तरह से दक्षिणपंथ के भीतर अपनी जगह बनाए रखने की चुनौती का भी सामना करना पड़ रहा है।
इटली में प्रवासन का सवाल नया नहीं है। भूमध्य सागर के रास्ते यूरोप आने वाले प्रवासियों के लिए इटली एक प्रमुख प्रवेश बिंदु है। इसलिए पिछले कई वर्षों से वहां अवैध प्रवासन, शरणार्थियों, मुस्लिम समुदाय, नागरिकता, भाषा और सांस्कृतिक पहचान जैसे सवाल लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। मेलोनी ने इसी मुद्दे को अब स्कूलों से जोड़ दिया है। स्कूल किसी भी समाज में आने वाली पीढ़ी को तैयार करने वाली सबसे महत्वपूर्ण संस्था होते हैं। इसलिए विदेशी बच्चों की संख्या, भाषा और धार्मिक पहनावे पर बहस वास्तव में आने वाले इटली के सामाजिक स्वरूप पर बहस है।
यहां यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि विदेशी विद्यार्थियों को लेकर इटली में पहले से नियम मौजूद हैं। कक्षाओं में विदेशी विद्यार्थियों की संख्या पर सामान्य तौर पर 30 प्रतिशत की सीमा का प्रावधान पहले से है। इसलिए मेलोनी की घोषणा का वास्तविक अर्थ तभी स्पष्ट होगा जब सरकार बताएगी कि वह मौजूदा नियम में क्या बदलाव करने जा रही है। इटली के स्कूलों में विदेशी नागरिकता वाले विद्यार्थी कुल विद्यार्थियों का लगभग 12 प्रतिशत हैं। इसलिए केवल ‘विदेशी विद्यार्थियों की सीमा’ कहना अपने आप में नई व्यवस्था की पूरी तस्वीर नहीं देता।
बुर्का और नकाब को लेकर भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। इटली में पूरे चेहरे को ढकने वाले परिधानों पर कोई ऐसा स्पष्ट राष्ट्रीय प्रतिबंध नहीं है जो हर परिस्थिति में लागू हो। पुराने कानून में पहचान छिपाने वाले कपड़ों को लेकर प्रावधान जरूर हैं। इसलिए मेलोनी सरकार जिस नए कानून की बात कर रही है, उसका महत्व इस बात पर निर्भर करेगा कि वह मौजूदा कानून में वास्तव में क्या बदलाव करती है।
इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक समय भी ध्यान देने लायक है। इटली में अगले वर्ष आम चुनाव होने हैं और प्रवासन पहले से ही चुनावी बहस का बड़ा मुद्दा है। ऐसे में मेलोनी का यह ऐलान अपनी पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं के सामने करना भी अपने आप में राजनीतिक संदेश है। उन्होंने जिस कार्यक्रम में यह घोषणा की, वह उनकी पार्टी के युवा संगठन का कार्यक्रम था और वहां उन्हें जोरदार समर्थन मिला। यानी यह घोषणा केवल प्रशासनिक घोषणा नहीं थी, बल्कि अपने राजनीतिक आधार को सम्बोधित करने वाला भाषण भी था।
इटली में दक्षिणपंथ के मजबूत होने की एक वजह यह भी है कि पारम्परिक वामपंथी विपक्ष अभी तक दक्षिणपंथ के सामने उतना मजबूत राजनीतिक विकल्प नहीं बना पाया है। मेलोनी की सरकार की लम्बी उम्र में विपक्ष की कमजोरियां और मतदाताओं की बड़ी संख्या का राजनीति से दूरी बनाना भी महत्वपूर्ण कारक माने जा रहे हैं। 2022 के आम चुनाव में मतदान लगभग 64 प्रतिशत रहा था और 2024 के यूरोपीय चुनाव में यह 50 प्रतिशत से भी नीचे चला गया। इसका अर्थ यह है कि केवल दक्षिणपंथ का समर्थन बढ़ना ही पूरी कहानी नहीं है, बड़ी संख्या में मतदाता राजनीति से दूरी भी बना रहे हैं।
इसीलिए इटली की मौजूदा राजनीति को केवल ‘दक्षिणपंथ जीत रहा है’ कहकर समझना भी सही नहीं होगा। तस्वीर कुछ ज्यादा जटिल है। एक तरफ मेलोनी की पार्टी सत्ता में मजबूत है, दूसरी ओर दक्षिणपंथ के भीतर ही और अधिक कठोर राजनीति के लिए जगह बनाने की कोशिश हो रही है। तीसरी तरफ विपक्ष में बिखराव और मतदाताओं में राजनीतिक निराशा दिखाई देती है। इस पूरे माहौल में प्रवासन और राष्ट्रीय पहचान ऐसे मुद्दे बन गए हैं जिनके जरिए दक्षिणपंथ अपने समर्थकों को राजनीतिक रूप से जोड़ पा रहा है।
मेलोनी की नई घोषणा इसी बड़े बदलाव का हिस्सा है। बुर्का और नकाब पर रोक, विदेशी विद्यार्थियों की सीमा और प्रवासी परिवारों के लिए भाषा सीखने की अनिवार्यता, इन तीनों मुद्दों को एक साथ रखकर सरकार एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश दे रही है कि इटली में रहने वालों से इटली की भाषा, संस्कृति और सामाजिक नियमों को अपनाने की अपेक्षा की जाएगी। इसे सरकार ‘एकीकरण’ कह रही है जबकि इसका राजनीतिक असर प्रवासन और राष्ट्रीय पहचान की बहस को और तेज करने वाला हो सकता है। आने वाले समय में असली सवाल यह नहीं होगा कि मेलोनी ने क्या घोषणा की बल्कि यह होगा कि वह घोषणा कानून का रूप किस तरह लेती है। संसद में इसका क्या स्वरूप सामने आता है, न्यायिक संस्थाएं इसे किस नजर से देखती हैं और इटली का समाज इस पर कैसी प्रतिक्रिया देता है, ये बातें तय करेंगी कि यह केवल चुनावी राजनीति का मुद्दा है या वास्तव में इटली की सामाजिक नीति में बड़ा बदलाव।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि इटली की राजनीति में दक्षिणपंथ केवल सत्ता में नहीं है बल्कि वह देश की राजनीति के मुख्य मुद्दों को भी तय करने की स्थिति में दिखाई दे रहा है और अब दक्षिणपंथ के सामने भी एक नई चुनौती खड़ी हो गई है, दक्षिणपंथ के भीतर ही कौन अधिक राष्ट्रवादी, अधिक कठोर और प्रवासन के सवाल पर अधिक सख्त दिखाई देगा। मेलोनी का बुर्का-नकाब पर नया प्रस्ताव इसी बदलती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को समझने की एक महत्वपूर्ण खिड़की है।
