उत्तराखण्ड का इतिहास बताता है कि 1815 तक इस क्षेत्र में आम जनता के बीच शराब का प्रचार-प्रसार लगभग न के बराबर था। शौक, जोहारी, जाड़, मार्छा, जौनसारी, थारू और बुक्सा जैसी जनजातियों में शराब परम्परागत रूप से जुड़ी जरूर थी लेकिन अंग्रेजों के आने से पहले व्यापक समाज में शराब का चलन बहुत सीमित था। भोटिया लोग जहां भी रुकते थे, अपनी शराब बनाते थे लेकिन न तो उसे बेचते थे और न ही किसी दूसरे को पीने के लिए प्रोत्साहित करते थे। ब्रिटिश काल में 19वीं सदी के उत्तरार्ध में सरकारी शराब की दुकानों के विस्तार के साथ यहां शराब का प्रचलन बढ़ना शुरू हुआ। पहाड़ों में छावनियों और हिल स्टेशनों की स्थापना के बाद इस प्रक्रिया को गति मिली लेकिन इसके बावजूद उत्तराखण्ड के तीन-चार शहरों और कस्बों को छोड़कर शराब का व्यापक प्रसार लम्बे समय तक नहीं हुआ
वर्ष 1822-23 में कुमाऊं, यानी उस समय के पहाड़ी इलाके, से शराब, दवाओं और अफीम से प्राप्त सम्मिलित राजस्व महज 534 रुपए था। 1837 में यह बढ़कर 1,300 रुपए, 1872 में 18,673 रुपए और 1882 में 29,013 रुपए हो गया। 1882 में जब यह माना जाने लगा कि यहां शराब का प्रचलन बढ़ रहा है, तब तत्कालीन कमिश्नर रामजे ने लिखा था कि ग्रामीण क्षेत्रों में शराब का प्रयोग बिल्कुल नहीं होता है और उन्हें उम्मीद है कि ऐसा कभी होगा नहीं। उन्होंने मुख्य स्टेशनों के अलावा अन्य जगहों पर शराब की दुकानें न खोलने की बात कही थी। इससे पहले 1863-73 की अपनी रिपोर्ट में कुमाऊं में तैनात ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी और बंदोबस्ती ऑफिसर जे.ओ.बी. बैकेट ने भी लिखा था कि कुमाऊं में शराब पीने का प्रचलन नहीं है। यानी उत्तराखण्ड के पहाड़ी समाज में शराब को व्यापक सामाजिक आदत बनाने की प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से नहीं हुई थी बल्कि सरकारी आबकारी व्यवस्था और बाजार के विस्तार के साथ धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ा।
ब्रिटिश काल में शराब का प्रचलन बढ़ने के साथ ही इसे एक आवश्यक बुराई मानकर इसके खिलाफ प्रतिरोध भी होता रहा। उस दौर की बहस में एक बात बेहद महत्वपूर्ण थी, सरकार अपनी आमदनी नहीं छोड़ सकती, दुकानदार अपनी रोजी नहीं छोड़ सकते तो क्या लोग अपनी आदत नहीं छोड़ सकते? जवाब था, छोड़ सकते हैं, छुड़वाए जा सकते हैं लेकिन विडम्बना यह रही कि नैतिकता की उम्मीद पीने वालों से की गई, पिलाने वालों से नहीं। यही सवाल आज भी उत्तराखण्ड के सामने खड़ा है, हालांकि अब उसका पैमाना बहुत बड़ा हो चुका है।
उत्तराखण्ड वर्ष 2000 में जब अलग राज्य बना था, तब उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने सीमित संसाधनों से विकास का रास्ता तैयार करने की थी। वर्ष 2001-02 में सरकार ने आबकारी नीति में बदलाव करते हुए शराब कारोबार की पुरानी ठेकेदारी व्यवस्था को खत्म करने की दिशा में कदम उठाया। आबकारी विभाग खुद अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर दर्ज करता है कि 2001-02 की नई नीति के तहत पुरानी ठेकेदारी व्यवस्था समाप्त की गई थी और इसका उद्देश्य शराब कारोबार में बड़े ठेकेदारों के एकाधिकार को खत्म कर नए उद्यमियों को अवसर देना था।
इसके बाद शराब से मिलने वाला राजस्व धीरे-धीरे राज्य की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनता चला गया। आज करीब ढाई दशक बाद तस्वीर यह है कि उत्तराखण्ड के बजट में शराब यानी राज्य आबकारी राजस्व से हजारों करोड़ रुपए आने लगे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2001-02 में आबकारी से सम्बंधित राजस्व करीब 231.69 करोड़ रुपए था। 2002-03 में यह 246.46 करोड़, 2003-04 में 273 करोड़, 2004-05 में 292 करोड़, 2005-06 में 292 करोड़, 2006-07 में 372 करोड़, 2007-08 में 441 करोड़, 2008-09 में 528 करोड़, 2009-10 में 703 करोड़, 2010-11 में 755 करोड़, 2011-12 में 843 करोड़, 2012-13 में 1,117 करोड़, 2013-14 में 1,268 करोड़, 2014-15 में 1,486 करोड़, 2015-16 में 1,736 करोड़, 2016-17 में 1,905 करोड़, 2017-18 में 2,262 करोड़, 2018-19 में 2,871 करोड़, 2019-20 में 2,729 करोड़, 2020-21 में 3,017 करोड़, 2021-22 में 3,260 करोड़, 2022-23 में 3,500 करोड़, 2023-24 में 4,038 करोड़ और 2024-25 में 4,357 करोड़ रुपए तक पहुंच गया।
2025-26 में राज्य ने आबकारी से 5,060 करोड़ रुपए का लक्ष्य रखा था। उपलब्ध विवरण में उस लक्ष्य के मुकाबले 2,877 करोड़ रुपए की प्राप्ति का उल्लेख है। इन आंकड़ों को वर्ष के किस चरण में दर्ज किया गया था, इसका समय-संदर्भ अलग से देखना जरूरी है लेकिन इतना साफ है कि दो दशक से कुछ अधिक समय में आबकारी राजस्व का आकार कई गुना बढ़ चुका है। दूसरी ओर, वर्तमान आबकारी व्यवस्था में भी सरकार शराब की दुकानों के व्यवस्थापन और आवंटन की प्रक्रिया जारी रखे हुए है। आबकारी विभाग ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए मदिरा दुकानों के व्यवस्थापन की विज्ञप्ति जारी की है और 2026-27 तथा 2027-28 के लिए दुकानों और अन्य अनुज्ञापनों से सम्बंधित सामान्य निर्देश भी जारी किए हैं।
यहीं से शराब की बिक्री का सवाल महज बोतलों और लीटरों का सवाल नहीं रह जाता। 2002 से 2026 तक शराब की बिक्री को केवल बोतलों या लीटर में मापना भी उचित नहीं होगा क्योंकि इस दौरान शराब की कीमतों, आबकारी शुल्क, लाइसेंस फीस और सरकारी नीतियों में बड़े बदलाव हुए हैं लेकिन राजस्व के आंकड़े एक दूसरी तस्वीर जरूर सामने रखते हैं, शराब से सरकार का खजाना लगातार समृद्ध हुआ है।
दिलचस्प बात यह है कि आबकारी नीति में एक तरफ ‘शराब की कम खपत, राजस्व अधिकतम’ जैसे लक्ष्य की बात होती है और दूसरी तरफ सरकार की आय शराब की बिक्री से बढ़ती जाती है। अप्रैल 2018 में त्रिवेंद्र सिंह रावत कैबिनेट ने राज्य की आबकारी नीति में बड़ा संशोधन करते हुए मोहल्लों की परचून दुकानों और डिपार्टमेंटल स्टोर्स पर विदेशी शराब और वाइन बेचने की मंजूरी दी थी। हालांकि भारी विरोध के बाद सरकार को यह निर्णय वापस लेना पड़ा। यह घटना भी बताती है कि शराब की उपलब्धता और उससे जुड़े राजस्व के सवाल पर उत्तराखण्ड में सामाजिक प्रतिरोध कितना गहरा है।
आज शराब की दुकान खोलना केवल एक व्यावसायिक निर्णय नहीं रह गया है। यह लाइसेंस, आबकारी नीति, स्थानीय प्रशासन, ठेकेदारी और राजस्व व्यवस्था से जुड़ा विषय है। शराब कारोबार में प्रभावशाली कारोबारी समूहों या सम्भावित सिंडिकेट के प्रभाव को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं लेकिन ऐसे आरोपों को प्रमाणित तथ्यों के साथ ही देखा जाना चाहिए। इतना जरूर है कि शराब की दुकानों का नेटवर्क जितना व्यापक होगा, बिक्री का बाजार उतना ही विस्तृत होगा और सरकार का राजस्व बढ़ाने की सम्भावना भी उतनी ही बढ़ेगी। उत्तराखण्ड में 2001-02 के बाद आबकारी व्यवस्था में लगातार बदलाव हुए और शराब से प्राप्त सरकारी आय राज्य के राजस्व ढांचे में महत्वपूर्ण बनी रही। स्वयं आबकारी विभाग अपनी नीति में एक ओर नशीले पदार्थों के अनियंत्रित उपयोग पर रोक को प्राथमिकता बताता है और दूसरी तरफ वैध बिक्री से अधिकतम राजस्व प्राप्त करने की बात करता है। यही विरोधाभास उत्तराखण्ड की शराब नीति का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। सरकार शराब को सामाजिक बुराई भी मानती है। नशामुक्त उत्तराखण्ड की बात भी जोर-शोर से कही जाती है और नशे को खत्म करने के लक्ष्य भी तय किए जाते रहे हैं लेकिन शराब से राजस्व का लक्ष्य भी लगातार बढ़ता है। दोनों लक्ष्य सिद्धांत रूप से एक साथ चल सकते हैं, सरकार नियंत्रित बिक्री से राजस्व भी प्राप्त कर सकती है और अनियंत्रित खपत को रोकने की कोशिश भी कर सकती है लेकिन जब राजस्व लक्ष्य लगातार बढ़ता है तो नीति की प्राथमिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
उत्तराखण्ड में शराब अब सिर्फ एक कारोबार नहीं बल्कि राजनीति का अर्थशास्त्र भी बन चुकी है। राज्य बनने के बाद सरकारों के सामने सीमित संसाधनों में विकास की चुनौती थी। खनन और शराब जैसे क्षेत्रों से मिलने वाला राजस्व इसलिए महत्वपूर्ण बना। आज दो दशक से अधिक समय बाद सवाल यह है कि राजस्व बढ़ा लेकिन किस कीमत पर? और इस कीमत को कौन चुका रहा है?
जवाब सीधा है, इसका एक बड़ा हिस्सा जनता चुकाती है
सरकार के लिए शराब एक अपेक्षाकृत आसान कर-स्रोत है। शराब पर कर लगाया जा सकता है, लाइसेंस फीस ली जा सकती है और दुकानों के आवंटन से तत्काल राजस्व प्राप्त किया जा सकता है। यही वजह है कि जब राज्य को सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पहाड़ों में बुनियादी ढांचे के लिए पैसा चाहिए तो आबकारी विभाग के राजस्व लक्ष्य भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। उत्तराखण्ड के आबकारी विभाग की आधिकारिक नीति में भी राजस्व प्राप्ति को विभाग के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल किया गया है लेकिन शराब से मिलने वाले राजस्व को केवल सरकारी खाते की आमदनी के रूप में देखना अधूरा होगा। इसकी सामाजिक लागत का हिसाब भी होना चाहिए। अस्पतालों पर पड़ने वाला बोझ, परिवारों की आय का क्षरण, घरेलू तनाव, महिलाओं पर बढ़ता आर्थिक और सामाजिक दबाव, युवाओं में नशे की प्रवृत्ति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर, इन सबकी कीमत सरकारी आबकारी खाते में दर्ज नहीं होती।
यही अंतर मैदानी और पर्वतीय उत्तराखण्ड के संदर्भ में और महत्वपूर्ण हो जाता है। मैदानों में शराब एक उपभोक्ता वस्तु और राजस्व स्रोत हो सकती है लेकिन पहाड़ों में इसका प्रभाव परिवार, कृषि, पलायन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ जाता है। पर्वतीय गांवों की अर्थव्यवस्था पहले ही कमजोर है। कृषि से आय सीमित है। युवाओं का बड़ा हिस्सा रोजगार के लिए बाहर है। महिलाओं पर खेती, पशुपालन, पानी, ईंधन और परिवार की जिम्मेदारियों का भारी बोझ है। ऐसे में परिवार की सीमित नकद आय का एक हिस्सा शराब पर खर्च होना केवल व्यक्तिगत उपभोग का मामला नहीं रहता बल्कि ग्रामीण परिवार की अर्थव्यवस्था के क्षरण का कारण बन सकता है।
सबसे ज्यादा कीमत कौन चुकाता है? शराब खरीदने वाला व्यक्ति अक्सर परिवार का अकेला आर्थिक नुकसान उठाने वाला नहीं होता। उसके पीछे पत्नी, बच्चे और बुजुर्ग भी होते हैं। यदि घर की आय का बड़ा हिस्सा शराब में चला जाता है तो उसका सीधा प्रभाव बच्चों की पढ़ाई, भोजन, स्वास्थ्य और घर की दूसरी आवश्यकताओं पर पड़ता है। इसीलिए उत्तराखण्ड में शराब के खिलाफ आंदोलन का सबसे मजबूत चेहरा वर्षों से पर्वतीय इलाकों की महिलाएं रही हैं।
उत्तराखण्ड में शराब के खिलाफ संघर्ष कोई आज की घटना नहीं है। आजादी के बाद से ही शराबखोरी के खिलाफ अलग-अलग इलाकों में प्रतिरोध होता रहा। 1960 और 1970 के दशक में शराबबंदी की मांग ने कई क्षेत्रों में आंदोलन का रूप लिया। 1980 के दशक में यह आंदोलन और व्यापक हुआ। इसका सबसे प्रसिद्ध नारा था, ‘नशा नहीं, रोजगार दो।’ यह केवल शराबबंदी की मांग नहीं थी बल्कि पहाड़ी युवाओं को रोजगार न मिलने और उन्हें नशे की ओर धकेलने वाली आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों के खिलाफ भी आवाज थी। 1988 में प्रकाशित शेखर पाठक की रिपोर्ट भी बताती है कि उस समय उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में शराब विरोधी आंदोलन शराब को रोजगार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और व्यापक विकास संकट से जोड़कर देख रहा था।
2 फरवरी 1984 को ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ आंदोलन के सूत्रपात का उल्लेख उत्तराखण्ड के आंदोलन के इतिहास में महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में मिलता है। इस आंदोलन में महिलाओं के साथ युवाओं की भी बड़ी भागीदारी थी। टिंचरी माई के नाम से प्रसिद्ध दीपा नौटियाल जैसी महिलाओं ने शराब के खिलाफ संघर्ष को गांवों तक पहुंचाया और वह आंदोलन की एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गईं। शराब विरोधी आंदोलन की खासियत यह थी कि इसमें महिलाओं का सवाल केवल नैतिकता का सवाल नहीं था, यह परिवार की अर्थव्यवस्था, बच्चों के भविष्य और महिलाओं के श्रम से भी जुड़ा हुआ था।
मैदानी क्षेत्रों की तुलना में पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाओं का शराब विरोधी आंदोलन अधिक मुखर रहा। वजह भी स्पष्ट है। जिस घर की आय शराब में जाती है, उस घर का बजट सबसे पहले महिला को सम्भालना पड़ता है। जिस घर में पुरुष शराब की वजह से काम से दूर होता है, वहां खेती, पशुपालन, पानी, लकड़ी, बच्चों की देखभाल और घर चलाने का अतिरिक्त बोझ महिला के हिस्से आता है। इसलिए शराब विरोधी आंदोलन को केवल नशे के खिलाफ आंदोलन कहना उसके सामाजिक अर्थ को छोटा करना होगा। यह ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक अधिकार और परिवार की बचत की लड़ाई भी रहा है।
उत्तराखण्ड में शराबबंदी के प्रयोग भी हुए लेकिन शराबबंदी स्थायी विकल्प के रूप में इसलिए कठिन साबित हुई क्योंकि कमजोर प्रशासनिक नियंत्रण की स्थिति में अवैध शराब, तस्करी और जहरीली शराब जैसी समस्याएं सामने आने का खतरा बढ़ा। 1980 के दशक के आंदोलन के दस्तावेज बताते हैं कि आंदोलनकारियों की चिंता केवल शराब की दुकानों को बंद कराने तक सीमित नहीं थी बल्कि वे शराब के पीछे मौजूद आर्थिक और राजनीतिक हितों को भी चुनौती दे रहे थे।
यानी उत्तराखण्ड की शराब की कहानी में एक दिलचस्प विरोधाभास शुरू से मौजूद रहा है। एक तरफ समाज का एक हिस्सा शराब को सामाजिक बुराई मानकर उसके खिलाफ खड़ा होता रहा, दूसरी ओर सरकारों के लिए शराब राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत बनती गई। यह विरोधाभास ब्रिटिश काल में भी था और राज्य बनने के बाद भी बना रहा।
उत्तराखण्ड बनने के बाद अनुभवी नेता नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में नए राज्य के सामने राजस्व जुटाने की चुनौती थी। खनन और शराब जैसे क्षेत्र सरकार के लिए आय के महत्वपूर्ण साधन बने। आज भी इन स्रोतों से मिलने वाले राजस्व को राज्य की वित्तीय क्षमता के संदर्भ में देखा जाता है लेकिन दो दशक से ज्यादा समय बाद यह सवाल पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि राजस्व जुटाने और समाज को नशे से बचाने की नीति में संतुलन कहां है।
2025-26 में राज्य के अपने कर राजस्व में आबकारी का बजट अनुमान 5,060 करोड़ रुपए रखा गया था। यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि शराब अब राज्य की वित्तीय व्यवस्था में कितनी महत्वपूर्ण हो चुकी है। सवाल यह नहीं है कि सरकार को राजस्व चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या सरकार शराब से होने वाली आय और शराब की सामाजिक लागत का एक साथ हिसाब कर रही है? क्योंकि शराब से मिलने वाली चार हजार या पांच हजार करोड़ रुपए की आय दिखाई देती है लेकिन उसके कारण परिवारों पर पड़ने वाली आर्थिक मार सरकारी बजट में किसी एक मद में दिखाई नहीं देती। अस्पताल में इलाज का खर्च अलग है, परिवार की बचत का खत्म होना अलग है, बच्चों की शिक्षा पर असर अलग है और महिलाओं पर बढ़ता घरेलू तथा आर्थिक बोझ अलग। इन सबको जोड़कर देखा जाए तो शराब से मिलने वाला वास्तविक सामाजिक लाभ-हानि का हिसाब सरकारी आबकारी खाते के आंकड़े से कहीं बड़ा सवाल बन जाता है।
उत्तराखण्ड की आबकारी नीति के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। विभाग की आधिकारिक नीति में नशीले पदार्थों के अनियंत्रित उपयोग को रोकने की बात भी है और वैध बिक्री से अधिकतम राजस्व हासिल करने की बात भी। इसलिए सवाल यह नहीं कि शराब को एक दिन में पूरी तरह बंद कर देना चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि सरकार शराब की उपलब्धता, बिक्री, दुकानों के विस्तार, राजस्व लक्ष्य और सामाजिक नुकसान के बीच किस तरह का संतुलन बना रही है और शायद सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस उत्तराखण्ड में कभी ग्रामीण क्षेत्रों में शराब का इस्तेमाल लगभग न के बराबर था, उसी उत्तराखण्ड में आज शराब सरकार के खजाने का एक मजबूत सहारा क्यों बन गई है?
शराब से सरकार का खजाना तो समृद्ध होता चला गया लेकिन पहाड़ खाली होते चले गए। पहाड़ों से युवाओं का पलायन, खेती का संकट, रोजगार की कमी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमजोरी पहले से मौजूद समस्याएं हैं। शराब इन समस्याओं का अकेला कारण नहीं है लेकिन यदि परिवार की सीमित आय का एक हिस्सा लगातार शराब में जा रहा है तो वह इन समस्याओं को और गम्भीर जरूर बना सकता है।
इसलिए उत्तराखण्ड की शराब नीति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि सरकार ने कितना कमाया। यह भी देखना होगा कि इस कमाई के बदले समाज ने कितना खर्च उठाया। सरकार के खजाने में शराब से आने वाली रकम का हिसाब हर साल बजट में दिखाई देता है लेकिन उन परिवारों का हिसाब कहीं नहीं है जिनकी आय, बचत, स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर शराब का असर पड़ता है।
उत्तराखण्ड के इतिहास में शराब के खिलाफ आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही था, ‘नशा नहीं, रोजगार दो।’ चार दशक बाद भी यह नारा इसलिए प्रासंगिक दिखाई देता है क्योंकि पहाड़ की समस्या केवल शराब नहीं है। असली सवाल रोजगार, आय, सम्मानजनक जीवन और ऐसी अर्थव्यवस्था का है जिसमें सरकार को विकास के लिए शराब की बिक्री पर बढ़ते राजस्व लक्ष्य का सहारा न लेना पड़े।
राजस्व बढ़ना किसी भी सरकार के लिए उपलब्धि हो सकता है लेकिन उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्य में यह भी देखना होगा कि उस राजस्व की सामाजिक कीमत कितनी है क्योंकि आखिरकार सवाल शराब की बोतलों का नहीं, उन घरों का है जिनके चूल्हे, बच्चों की किताबें, महिलाओं की बचत और पहाड़ की अर्थव्यवस्था उस बोतल की कीमत से प्रभावित होती है।
बात अपनी-अपनी
अविभाजित उत्तर प्रदेश में ही सरकारों द्वारा आबकारी से अधिकाधिक राजस्व जुटाने की कोशिशों से जनता में जो नाराजगी थी, उसी ने उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी को जन आंदोलन करने को प्रेरित किया। 1984 का ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन उत्तराखण्ड के इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ है। तब से यह मांग चली आ रही है और 1994 के राज्य आंदोलन की यह एक प्रमुख मांग थी। अपना राज्य बनने के बाद उम्मीद थी कि जनता के संघर्ष से बने इस प्रदेश में आबकारी नीति व्यावहारिक होगी, मगर सरकार लगातार जनता की भावनाओं को अनदेखा कर शराब की बिक्री बढ़ाने पर तुली है। शराब पीने को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, अलबत्ता सरकार द्वारा उसे प्रोत्साहित करना अपराध है। एक व्यावहारिक तरीका यह है कि शराब की दुकान खोलने, न खोलने का पूरा अधिकार ग्राम सभाओं को हो। ग्राम सभा की पूरी बैठक में तय किया जाए कि किसी स्थान पर शराब की दुकान खोली जाए या नहीं क्योंकि ऐसी बैठक में महिलाओं की संख्या काफी होगी, इसलिए एक सर्व जनहितकारी निर्णय लेना सम्भव होगा। उत्तराखण्ड में 73वें-74वें संविधान संशोधन कानून को पूरी ईमानदारी से समग्रता में लागू करना आबकारी ही नहीं, अन्य समस्याओं के समाधान का रास्ता खोलेगा, मगर हमारी सरकारें ऐसा नहीं कर रही हैं क्योंकि ऐसा करने से उनके पाल्य ठेकेदार-माफिया के हाथ बंध जाते हैं। आबकारी के राजस्व पर निर्भरता को तो खत्म करना ही होगा।
राजीव लोचन शाह, वरिष्ठ पत्रकारनशे के खिलाफ हमने लम्बी लड़ाई लड़ी। हम पिछले 43 वर्षों से लड़ रहे हैं। सिर्फ नशा माफिया नहीं, भूमाफिया, शिक्षा माफिया के खिलाफ हम खड़े रहे। सबकी लड़ाई हमने लड़ी चाहे वह संगठनों के माध्यम से लड़ी हो या अकेले लड़ी लेकिन उसका समग्र विश्लेषण आज तक नहीं हो पाया। आज भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। इनके कई सम्मेलनों में नशामुक्त पहाड़ की बात की गई थी। जब भाजपा शुरुआती दौर में थी तो उस समय यह नशे के खिलाफ खूब बात करते थे। भाजपा के वरिष्ठ नेता शोबन सिंह जीना जी ने भी कई बार नशे के खिलाफ अपनी बात कही थी लेकिन अपने शैशवकाल में नशा मुक्ति की बात करने वाली भाजपा आज जब अपने एक बड़े वृक्ष के रूप में विकसित हो चुकी है तो वह अपने पुराने वादों को भूल गई। हमें इसे सिर्फ एक शराब की बिक्री के रूप में नहीं देखना होगा। इससे पहाड़ की महिलाओं और युवाओं पर पड़ने वाले असर को भी ध्यान में रखकर देखना होगा। जिन चीजों की मांग की जाती है, जैसे स्कूल, अस्पताल, पानी, सड़क उसमें तो सरकार ध्यान नहीं देती है लेकिन जो चीज जनता मांग नहीं रही उसका विस्तार पूरे उत्तराखण्ड में देखने को मिल रहा है। शराब की मांग आज तक किसी ने नहीं की होगी लेकिन बिन मांगे गांव-गांव तक सरकार शराब की दुकान खोल रही है। यह जो शराब संस्कृति उत्तराखण्ड में विकसित हो रही है इसने हमारे युवाओं की सोचने की शक्ति को खत्म किया है और शायद सरकार चाहती भी यही है कि लोगों की सोचने की शक्ति कम हो और उसके खिलाफ प्रतिरोध के स्वर कम से कम गूंजे। मेरा मानना है कि जिस प्रकार उत्तराखण्ड में शराब का विस्तार हो रहा है उसके पीछे हमारे राजनीतिक दल चाहे वह बीजेपी हो या कांग्रेस उनकी भूमिका ज्यादा जिम्मेदार है। 5 साल तक आप जनता की सुध लेते नहीं लेकिन जब चुनाव आते हैं तो आप वोट समेटने के चक्कर में शराब से एक ऐसा माहौल खड़ा करते हैं, जिससे लोग आपकी कमजोरी को भूल जाएं। हर सरकार ऐसा ही करती है लेकिन इसके लिए जनता को जागरूक होना पड़ेगा। एक बड़े सामाजिक आंदोलन की जरूरत इस वक्त महसूस की जा रही है, वरना शराब की अपसंस्कृति उत्तराखण्ड खासकर पर्वतीय क्षेत्रों के लिए भविष्य
में बड़ी चुनौती बनकर उभरेगी।
पी.सी. तिवारी, अध्यक्ष, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी