क्या होगी महाराष्ट्र की अगली चाल?
भारतीय तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी की राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चैधरी से हुई मुलाकात ने अमरोहा से लेकर लखनऊ तक सियासी अटकलों को हवा दे दी है। जयंत चौधरी ने खुद मुलाकात की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की जिसके बाद सवाल उठने लगे कि जयंत और शमी की मुलाकात महज शिष्टाचार थी या चुनावी बातचीत की शुरुआत? शमी खुद मैदान में उतरेंगे या परिवार का कोई सदस्य? क्या ‘अमरोहा एक्सप्रेस’ अब चुनावी पारी शुरू करने की तैयारी में हैं? शमी के अमरोहा से चुनाव लड़ने की चर्चा इसलिए भी अहम है क्योंकि यह उनका गृह क्षेत्र है। हालांकि शमी या रालोद की ओर से अभी तक चुनाव लड़ने अथवा पार्टी में शामिल होने की कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है लेकिन सियासी हलकों में कयास लगाए जा रहे हैं कि शमी अमरोहा से रालोद के टिकट पर सम्भावित उम्मीदवार हो सकते हैं। सियासी जानकारों का कहना है कि इस मुलाकात को चुनावी घोषणा मानना जल्दबाजी होगी लेकिन पश्चिमी यूपी में रालोद के सामाजिक और राजनीतिक आधार को देखते हुए किसी लोकप्रिय स्थानीय चेहरे को साथ जोड़ने की कोशिश के तौर पर इसे जरूर देखा जा सकता है। अमरोहा सीट पर शमी परिवार की सक्रियता सपा, भाजपा और रालोद के स्थानीय समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। फिलहाल क्रिकेट की पिच पर अपनी रफ्तार से बल्लेबाजों को चौंकाने वाले शमी अब सियासत की पिच पर उतरते हैं या नहीं इसका जवाब आने वाले दिनों में मिलने के आसार हैं।
मतदाता सूची के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ को लेकर सियासी घमासान तेज होने के आसार हैं। कांग्रेस ने मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और सत्यापन के लिए नोटिस जारी किए जाने को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इसे मताधिकार से जुड़ा गम्भीर मुद्दा बताते हुए सरकार और चुनाव आयोग पर निशाना साधा है। ये कांग्रेस के राजनीतिक आरोप हैं जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना और अपात्र, मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट नामों को हटाना है। आयोग ने दावों-आपत्तियों और अपील की प्रक्रिया को भी इसका हिस्सा बताया है। सवाल हैं कि क्या चुनाव आयोग पारदर्शिता से जुड़े सवालों पर और विस्तृत जानकारी देगा? क्या मतदाता सूची विपक्ष का राजनीतिक हथियार बनेगी? दिल्ली में एसआईआर को लेकर मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। अदालत 33 लाख से अधिक मतदाताओं को जारी नोटिस और उसमें इस्तेमाल किए गए ‘लाॅजिकल डिस्क्रेपेन्सिएस’ जैसे आधारों से जुड़ी याचिका पर सुनवाई में कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। कोर्ट ने पूछा कि इन नोटिसों में आपत्ति के स्पष्ट कारण क्यों नहीं बताए गए और इतने मामलों के निपटारे के लिए कितने बीएलओ लगाए गए हैं। कोर्ट ने सुझाव दिया कि अलग-अलग आपत्तियों के लिए मानक जवाब और स्पष्ट दिशा-निर्देश उपलब्ध कराए जाएं। कोर्ट ने बीएलओ को वार्ड कार्यालयों में उपलब्ध रखने और सहायता कैम्प लगाने का भी सुझाव दिया है। गौरतलब है कि दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से करीब 47.7 लाख नाम हटाए जाने को लेकर भी सवाल उठे हैं। चुनावी मामलों के जानकारों के मुताबिक एसआईआर अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है बल्कि चुनावी राजनीति का मुद्दा बन चुका है। अदालत में पारदर्शिता, नोटिस और नामों की बहाली जैसे सवालों पर जो दिशा तय होगी उसका राजनीतिक असर भी पड़ सकता है। अंतिम तस्वीर आधिकारिक प्रक्रिया और न्यायिक फैसलों से ही स्पष्ट होगी।
यूपी की सियासी बिसात पर अभी गठबंधन के पत्ते पूरी तरह खुले भी नहीं हैं और असदुद्दीन ओवैसी ने ऐसा दांव चल दिया है जिसने विपक्षी खेमे की बेचैनी बढ़ा दी है। एआईएमआईएम प्रमुख ने भाजपा को रोकने के लिए समान विचार वाले दलों के साथ जाने का संकेत देकर सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ओवैसी का हाथ किसके साथ मिलेगा और इसका असर किसके सियासी गणित पर पड़ेगा? पार्टी 2 अक्टूबर तक अपने गठबंधन को लेकर फैसला कर सकती है। यही तारीख अब राजनीतिक गलियारों में खास चर्चा का विषय बन गई है। ओवैसी का यह रुख ऐसे समय आया है जब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस यूपी में अपने-अपने सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटी हैं। एआईएमआईएम के मैदान में सक्रिय होने से खासकर मुस्लिम बहुल सीटों पर विपक्षी दलों की रणनीति को नए सिरे से सोचना पड़ सकता है। सवाल यह भी है कि यदि ओवैसी किसी गठबंधन में शामिल होते हैं तो सीटों के बंटवारे को लेकर किस तरह का फार्मूला सामने आएगा? दूसरी तरफ अगर एआईएमआईएम अकेले मैदान में उतरती है तो क्या वह कुछ सीटों पर विपक्षी वोटों के बंटवारे की स्थिति पैदा कर सकती है? यही आशंका सियासी चर्चा को और हवा दे रही है। हालांकि इसका वास्तविक असर चुनाव के दौरान सीट-दर-सीट परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। अब निगाहें ओवैसी के अगले कदम पर हैं। सपा का हाथ, कांग्रेस का साथ या अपनी अलग राह? 2 अक्टूबर तक खुलने वाले पत्ते यूपी के विपक्षी समीकरणों में नई हलचल जरूर पैदा कर सकते हैं। सियासी जानकारों की मानें तो ओवैसी का गठबंधन को लेकर संकेत यूपी के विपक्षी समीकरणों के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि एआईएमआईएम किन सीटों पर चुनाव लड़ती है और किस दल के साथ समझौता करती है। जानकार मानते हैं कि मुस्लिम बहुल सीटों पर एआईएमआईएम की सक्रियता सपा और कांग्रेस दोनों के लिए रणनीतिक चुनौती बन सकती है। यदि गठबंधन होता है तो सीटों के बंटवारे और नेतृत्व को लेकर बातचीत आसान नहीं होगी। वहीं अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में एआईएमआईएम का प्रभाव कुछ खास इलाकों और सीटों तक सीमित रह सकता है। अब ओवैसी का अंतिम फैसला सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि उनका कदम किसी बड़े विपक्षी गठबंधन की जमीन तैयार करता है या यूपी की सियासत में एक और अलग मोर्चे को जन्म देता है।
