संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने की चर्चा ने दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर हलचल बढ़ा दी है। खबरों के मुताबिक केंद्र सरकार अगले महीने विशेष सत्र बुलाने के विकल्प पर विचार कर रही है। सम्भावित सत्र में परिसीमन से जुड़े प्रावधानों और महिला आरक्षण को लागू करने की दिशा में जरूरी विधायी कदम उठाए जाने की चर्चा है। हालांकि सरकार ने अभी तक सत्र की तारीख और अंतिम एजेंडे की औपचारिक घोषणा नहीं की है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सितम्बर के आखिरी दिनों में तस्वीर साफ होगी या सरकार अक्टूबर तक इंतजार करेगी?
गौरतलब है कि परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्ताव सरकार पहले भी संसद में आगे बढ़ाने की कोशिश कर चुकी है। अप्रैल में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा में पेश किया गया था। विधेयक को संविधान संशोधन के लिए जरूरी बहुमत नहीं मिल सका और इसके बाद उससे जुड़े परिसीमन तथा केंद्र शासित प्रदेशों सम्बंधी विधेयक भी आगे नहीं बढ़ पाए। अब एक बार फिर इन प्रस्तावों को आगे बढ़ाने की सम्भावित कोशिश ने सियासी हलचल तेज कर दी है। मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बावजूद उसके बाद से सत्रावसान नहीं हुआ है। इसी तथ्य को विशेष सत्र की सम्भावनाओं से जोड़कर देखा जा रहा है। अगस्त में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने उस समय विशेष सत्र की खबरों को खारिज किया था लेकिन सितम्बर में सरकार के अगले महीने विशेष सत्र बुलाने के विकल्प पर विचार करने की खबरें सामने आई हैं। सूत्रों की मानें तो सरकार ने अपने कुछ सहयोगी दलों के साथ सम्भावित विधायी एजेंडे पर बातचीत शुरू की है। यदि परिसीमन और महिला आरक्षण के प्रस्ताव फिर से संसद में आते हैं तो सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सदनों में आवश्यक समर्थन जुटाने की होगी। अप्रैल का अनुभव बता चुका है कि संविधान संशोधन के लिए जरूरी संख्या जुटाना आसान नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि परिसीमन का सवाल केवल लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण तक सीमित नहीं है। इसके साथ राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का बड़ा प्रश्न जुड़ा हुआ है। खासकर दक्षिणी राज्यों की चिंता यह रही है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को भविष्य के परिसीमन में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से नुकसान नहीं होना चाहिए। तमिलनाडु समेत दक्षिण के कई राजनीतिक दल इस मुद्दे पर अपनी आपत्तियां दर्ज करा चुके हैं। दूसरी ओर सरकार परिसीमन को जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व और संवैधानिक प्रक्रिया से जोड़कर देखती है। अप्रैल में सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया था कि प्रस्तावित व्यवस्था में दक्षिणी राज्यों की सीटों की संख्या बढ़ेगी और लोकसभा में उनका कुल हिस्सा लगभग समान रह सकता है।
महिला आरक्षण का मुद्दा भी इसी बहस से जुड़ा हुआ है। 2023 में पारित 106वें संविधान संशोधन के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया था लेकिन इसका क्रियान्वयन परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ा है। अप्रैल में सरकार ने प्रस्तावित संशोधन के जरिए इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कोशिश की थी। यही वजह है कि यदि विशेष सत्र वास्तव में बुलाया जाता है तो परिसीमन अकेला मुद्दा नहीं रहेगा। महिला आरक्षण के साथ इसके जुड़ने से बहस और संवेदनशील हो सकती है। सरकार के सामने सिर्फ विधेयक पेश करने की चुनौती नहीं होगी बल्कि पर्याप्त संसदीय समर्थन जुटाने और राज्यों की चिंताओं का जवाब देने की भी चुनौती होगी।
विपक्ष के सामने भी राजनीतिक संतुलन साधने की चुनौती होगी। महिला आरक्षण के समर्थन को बनाए रखते हुए परिसीमन की प्रक्रिया और उसके सम्भावित प्रभावों पर सवाल उठाना विपक्ष की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। खासकर दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व का मुद्दा इस बहस के केंद्र में रहने की सम्भावना है। फिलहाल बड़ा सवाल यही है कि क्या सितम्बर के आखिरी दिनों में विशेष सत्र को लेकर तस्वीर साफ होती है या सरकार अक्टूबर तक इंतजार करती है। यदि विशेष सत्र बुलाने का फैसला होता है तो पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा सदन के भीतर संख्या-बल की होगी और दूसरी राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर उठने वाली बहस की। यानी मामला सिर्फ यह नहीं है कि परिसीमन कब होगा। असल सवाल यह भी है कि नए परिसीमन के बाद देश के अलग-अलग राज्यों का राजनीतिक वजन किस तरह बदल सकता है। यही सवाल आने वाले दिनों में संसद से लेकर राज्यों तक सियासत को फिर गरमा सकता है।