हरिद्वार स्थित 120 वर्ष पुरानी कमल दास की कुटिया फिर विवादों में है। महंत और किरायेदारों के बीच विवाद के बाद पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है। किरायेदारी, कथित 30 साल के बकाये, परिसर में पुलिसकर्मियों के रहने और राजनीतिक संरक्षण के आरोपों ने मामले को गम्भीर बना दिया है। अब विवाद की निष्पक्ष और दस्तावेज आधारित जांच की जरूरत है
धर्मनगरी हरिद्वार की करीब 120 वर्ष पुरानी बताई जाने वाली कमल दास की कुटिया एक बार फिर विवादों के घेरे में है। कभी साधु-संतों की तपस्थली और धार्मिक आस्था का केंद्र रही यह कुटिया अब किरायेदारी, कथित कब्जे, बकाया किराए, पुलिस की भूमिका और राजनीतिक संरक्षण से जुड़े आरोपों के कारण चर्चा में है। मौजूदा विवाद महंत ओमप्रकाश शास्त्री और कुटिया परिसर में रह रहे किरायेदारों के बीच सामने आया है। एक किरायेदार की तहरीर पर नगर कोतवाली हरिद्वार पुलिस ने महंत ओमप्रकाश शास्त्री सहित अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।
कमल दास की कुटिया से जुड़ा विवाद नया नहीं है। करीब दो दशक पहले भी कुटिया पर कथित कब्जे को लेकर विवाद सामने आया था। उस समय एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और एक बड़े संत का नाम भी चर्चा में आने की बात कही जाती है। हालांकि उस पुराने विवाद की वास्तविक स्थिति क्या थी और उसमें प्रशासनिक अथवा कानूनी स्तर पर क्या कार्रवाई हुई, यह स्पष्ट नहीं है लेकिन मौजूदा विवाद ने उन पुराने सवालों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।
वर्तमान विवाद में घनश्याम पांडे और राजीव गिरी को किरायेदार बताया जा रहा है। राजीव गिरी की कुटिया परिसर के बाहर दुकान होने की बात भी सामने आई है। ऐसे में सबसे बुनियादी सवाल किरायेदारी के अधिकारों को लेकर उठता है। किरायेदारी कब शुरू हुई? दुकान या परिसर किसने किराए पर दिया? किराए की शर्तें क्या थीं? कितना किराया तय हुआ था? भुगतान किस माध्यम से किया जाता था? इन सभी सवालों का जवाब भी साफ नहीं हैं। यदि किरायेदारी का वैध अनुबंध मौजूद है तो उसकी शर्तें स्पष्ट होनी चाहिए और यदि किरायेदारी समाप्त हो चुकी है तो उसके बाद परिसर में बने रहने का कानूनी आधार भी सामने आना चाहिए।
कुटिया से जुड़े एक पक्ष की ओर से यह गम्भीर दावा किया जा रहा है कि कुछ परिसरों का किराया लम्बे समय से नहीं दिया गया। यहां तक कहा जा रहा है कि पुलिसकर्मियों से सम्बंधित परिसर के लिए करीब 30 वर्षों से किराया प्राप्त नहीं हुआ। यह भी दावा है कि पुलिस के साथ कभी किराए का समझौता हुआ था और शुरुआती वर्षों में भुगतान किया गया लेकिन बाद में किराया मिलना बंद हो गया। यदि यह दावा दस्तावेजों से सही साबित होता है तो तीन दशक के बकाये का हिसाब, समझौते की शर्तें, उसकी अवधि और उसके बाद की स्थिति की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है, वहीं यदि यह दावा सही नहीं है तो भुगतान सम्बंधी रिकाॅर्ड सामने रखकर स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।
आश्रम के एक हिस्से में पुलिसकर्मियों के रहने की बात इस पूरे विवाद को अलग आयाम देती है। यदि धार्मिक संस्था के किसी हिस्से को पुलिसकर्मियों अथवा किसी सरकारी विभाग को किराए पर दिया गया था तो उसके लिए बाकायदा समझौता, भुगतान का रिकाॅर्ड, अवधि और नवीनीकरण से जुड़े दस्तावेज होने चाहिए। ऐसे रिकाॅर्ड यह स्पष्ट कर सकते हैं कि किरायेदारी वास्तव में किस अवधि तक थी और वर्तमान में परिसर में रहने का आधार क्या है।
इसी वजह से इस मामले में केवल दर्ज मुकदमे की विवेचना ही पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। किरायेदारी के मूल दस्तावेज, भुगतान का हिसाब, सम्पत्ति के स्वामित्व और प्रबंधन से सम्बंधित पुराने रिकाॅर्ड तथा पहले हुए समझौतों की भी जांच जरूरी है। खासकर तब, जब विवाद में कई वर्ष पुराने अधिकारों और कब्जे के आरोपों का उल्लेख किया जा रहा हो।
मामले की एक और परत राजनीतिक संरक्षण से जुड़े आरोपों की है। कुटिया से जुड़े लोगों का आरोप है कि कुछ किरायेदारों को किसी प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्ति का संरक्षण प्राप्त है। बातचीत में एक स्थानीय बड़े नेता का नाम लिए जाने की बात कही जा रही है लेकिन मौजूदा महंत ओमप्रकाश शास्त्री ने सार्वजनिक रूप से किसी नेता का नाम लेने से इनकार किया है। उनका आरोप है कि प्रभावशाली लोग सीधे सामने आने के बजाय पर्दे के पीछे से दबाव बनाते हैं। कुटिया से जुड़े लोगों का दावा है कि अतीत में भी आश्रम पर कब्जे की कोशिशें हुईं और विवाद के दौरान झगड़े भी हुए। वर्तमान मामले में महंत ओमप्रकाश शास्त्री सहित अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।
बताया जाता है कि वर्तमान में कुटिया की देखरेख सुनील जी कर रहे हैं जो कथावाचक हैं और नए उदासीन अखाड़े से जुड़े बताए जाते हैं लेकिन देखरेख की व्यवस्था में बदलाव के बावजूद विवाद खत्म नहीं हुआ है। इससे यह सवाल उठता है कि समस्या केवल वर्तमान प्रबंधन और किरायेदारों के बीच है या इसके पीछे सम्पत्ति और अधिकारों से जुड़ा कोई पुराना विवाद भी है। धार्मिक सम्पत्तियों के मामले में प्रबंधन, उपयोग, किरायेदारी और स्वामित्व के अधिकार अलग-अलग कानूनी प्रश्न हो सकते हैं। इसलिए इन सभी पहलुओं को अलग-अलग देखना जरूरी है।
मामले की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जिस परिसर के एक हिस्से में पुलिसकर्मियों के रहने की बात कही जा रही है, उसी परिसर से जुड़े विवाद में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। इसलिए जांच को लेकर पारदर्शिता और निष्पक्षता का महत्व और बढ़ जाता है। यदि पुलिसकर्मियों की किरायेदारी और परिसर में उनके रहने से सम्बंधित दस्तावेज मौजूद हैं तो उन्हें जांच का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इसी तरह यदि लम्बे समय से किराया बकाया होने का दावा किया जा रहा है तो उसका दस्तावेजी हिसाब भी सामने आना चाहिए। कुल मिलाकर कमल दास की कुटिया का मौजूदा विवाद अब केवल महंत और किरायेदार के बीच दर्ज मुकदमे तक सीमित नहीं रह गया है। इसके साथ पुराने विवाद, कथित कब्जे की कोशिशें, किरायेदारी के अधिकार, पुलिसकर्मियों के परिसर में रहने, कथित लम्बे समय से बकाया किराए और राजनीतिक संरक्षण के आरोप जुड़ गए हैं। इसलिए इस मामले में किसी एक पक्ष के आरोप को अंतिम सत्य मानने के बजाय दस्तावेजों और आधिकारिक रिकाॅर्ड के आधार पर पूरी तस्वीर सामने लाना जरूरी है।
यदि किरायेदारों के पास वैध अधिकार हैं तो वे दस्तावेजों से स्पष्ट होने चाहिए। यदि आश्रम प्रबंधन का दावा सही है तो उसके पास मौजूद स्वामित्व, प्रबंधन और किरायेदारी से सम्बंधित रिकाॅर्ड सामने आने चाहिए। यदि किराया बकाया है तो उसका पूरा हिसाब होना चाहिए। यदि कब्जे की कोशिशों के आरोप सही हैं तो उनकी पुलिस और न्यायिक कार्रवाई का रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। यदि राजनीतिक संरक्षण के आरोप लगाए जा रहे हैं तो उनके समर्थन में प्रमाण भी जांच का हिस्सा बनने चाहिए।
क्योंकि सवाल केवल एक मुकदमे का नहीं है। सवाल उस धार्मिक धरोहर का भी है जिसे करीब 120 वर्षों से हरिद्वार की धार्मिक पहचान से जुड़ा बताया जाता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस की जांच इस मामले को केवल एफआईआर और आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखती है या फिर पुराने दस्तावेजों, किरायेदारी के रिकाॅर्ड, सम्पत्ति के अधिकारों और पूर्व शिकायतों की पड़ताल करते हुए विवाद की पूरी पृष्ठभूमि सामने लाती है। यही जांच तय करेगी कि कमल दास की कुटिया का मौजूदा विवाद वास्तव में किरायेदारी का मामला है या इसके पीछे संपत्ति और नियंत्रण से जुड़ा कोई बड़ा विवाद भी मौजूद है।
बात अपनी-अपनी
आश्रम में कब्जे की बहुत समय से कोशिश की जा रही है। स्थानीय नेता का हाथ है, पुलिस की भी मिलीभगत से काम हो रहा है, जिसने हमला किया वह भी किसी नेता का ही आदमी है, सबको पता है,वह नेता कौन है? मैं अपने मुंह से उसका नाम नहीं लेना चाहता, उसका काम ही आश्रमों मैं कब्जे करवाने का है।
ओम प्रकाश शास्त्री, महामंडलेश्वर, नया उदासीन अखाड़ा
बीजेपी के राज में आश्रमों में कब्जे की बात कोई नई बात नहीं है। पुलिस की मिलीभगत से सब काम हो रहे हैं जबकि आश्रम के बाहर ही पुलिस बैठी है। इसमें जिसका भी हाथ है उस पर सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। इसमें किसी बड़े नेता के होने की बात सामने आई है, पर अभी इस बात की पुष्टि नहीं हुई है।
अमन गर्ग, अध्यक्ष, महानगर कांग्रेस
कुछ लोग अपने निजी फायदे के लिए आश्रमों में कब्जे का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे लोगों की बात करना निंदनीय है। इस विषय में और ज्यादा मैं कुछ नहीं कहूंगा।
शिवानंद जी महाराज, मातृ सदन