कभी फिल्म देखने के लिए हम सिनेमाघर तक जाते थे, आज फिल्म हमारे मोबाइल तक चली आई है। तकनीक ने सिनेमा को हमारे बेहद करीब कर दिया लेकिन क्या इस सफर में हम सिनेमा के उतने ही करीब रह गए हैं? पर्दे पर बदलते नायक, बदलती कहानियां और बदलते माध्यम दरअसल हमारे अपने बदलते समाज की कहानी भी कहते हैं
एक समय था जब फिल्म देखना सिर्फ मनोरंजन नहीं, अपने आप में एक सामाजिक अनुभव हुआ करता था। फिल्म देखने के लिए घर से निकलना पड़ता था, टिकट के लिए कतार में लगना पड़ता था और फिर परिवार या दोस्तों के साथ सिनेमाघर पहुंचना किसी छोटे उत्सव जैसा होता था। सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों का अपना संसार था। पर्दे पर कोई संवाद आता तो पूरा हॉल तालियों और सीटियों से गूंज उठता, किसी दृश्य पर लोग भावुक होते और इंटरवल में बाहर निकलते ही फिल्म पर बहस शुरू हो जाती। फिल्म खत्म होने के बाद भी उसकी कहानी खत्म नहीं होती थी। घर लौटते हुए उसके किरदार और संवाद साथ चलते थे और अगले दिन दफ्तर, स्कूल या चाय की दुकान पर बातचीत का विषय वही फिल्म होती थी। आज हमारे पास फिल्मों की संख्या पहले से कहीं अधिक है। दुनिया भर का सिनेमा मोबाइल की एक स्क्रीन पर उपलब्ध है लेकिन शायद फिल्मों के साथ हमारा रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा।
सिनेमा ने अपने समय को दर्ज किया
सिनेमा को केवल मनोरंजन की दृष्टि से देखना उसके महत्व को बहुत छोटा कर देना है। फिल्में अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बेचैनियों को अपने भीतर दर्ज करती हैं। पर्दे पर बदलता हुआ नायक केवल एक अभिनेता का किरदार नहीं होता, वह अक्सर उस समय के समाज की आकांक्षा, नाराजगी या सपने का प्रतिनिधि बन जाता है। इसीलिए भारतीय सिनेमा की यात्रा को देखें तो वह अपने साथ बदलते भारत की एक लम्बी कहानी भी लेकर चलती है।
‘मदर इंडिया’ को याद कीजिए। यह केवल एक मां की कहानी नहीं थी। उसके भीतर ग्रामीण भारत की गरीबी, जमीन, परिवार, संघर्ष और नैतिकता के सवाल मौजूद थे। ‘मुगल-ए-आजम’ में प्रेम और सत्ता का टकराव था जबकि ‘गाइड’ का राजू एक ऐसा किरदार था जो न पूरी तरह अच्छा था और न पूरी तरह बुरा। वह गलतियां करता था, भटकता था और खुद को तलाशता था। इन फिल्मों में कहानी के साथ इंसान की जटिलता भी थी। दर्शक को सिर्फ यह नहीं बताया जाता था कि कौन सही है और कौन गलत, उसे अपने निष्कर्ष तक पहुंचने का अवसर भी दिया जाता था।
जब पर्दे पर आया गुस्से वाला आदमी
फिर सत्तर का दशक आया और भारतीय सिनेमा के पर्दे पर एक नया चेहरा उभरा, गुस्से से भरा हुआ युवा। ‘जंजीर’, ‘दीवार’ और ‘शोले’ जैसी फिल्मों ने अमिताभ बच्चन को जिस तरह के नायक के रूप में स्थापित किया, उसके पीछे केवल उनकी अभिनय प्रतिभा नहीं थी। उस दौर के भारत में असंतोष और बेचैनी थी। बेरोजगारी, व्यवस्था से मोहभंग और सामाजिक असमानता जैसे सवाल आम आदमी की जिंदगी का हिस्सा थे। ऐसे समय में ‘एंग्री यंग मैन’ का जन्म हुआ। अमिताभ का नायक उस व्यवस्था से लड़ रहा था, जिससे दर्शक खुद परेशान था। इसीलिए वह नायक सिर्फ लोकप्रिय नहीं हुआ, वह एक दौर की सामूहिक मनःस्थिति का प्रतिनिधि बन गया। कई बार सिनेमा वही बोल देता है जिसे समाज सीधे शब्दों में कहने से बचता है।
सपनों का भारत और राज-सिमरन की कहानी
नब्बे का दशक आते-आते भारत की तस्वीर फिर बदलने लगी। आर्थिक उदारीकरण के बाद बाजार खुल रहे थे, भारतीय मध्यम वर्ग के सपने फैल रहे थे और विदेश अब किसी बहुत दूर की दुनिया का नाम नहीं रह गया था। इसी समय ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ जैसी फिल्म सामने आती है। राज और सिमरन की प्रेम कहानी को सिर्फ रोमांस की कहानी मानना इस फिल्म के सामाजिक संदर्भ को नजरअंदाज करना होगा। राज विदेश में रहने वाला आधुनिक युवा है लेकिन परिवार और परम्परा से पूरी तरह अलग नहीं होना चाहता। वह प्रेम करता है लेकिन परिवार को तोड़कर नहीं, परिवार को साथ लेकर। यह उस भारतीय समाज की तस्वीर थी जो आधुनिकता को स्वीकार करना चाहता था लेकिन अपनी पारिवारिक जड़ों को भी बचाए रखना चाहता था। इसी दौर में ‘हम आपके हैं कौन..!’ जैसी फिल्मों ने परिवार और रिश्तों को एक बड़े उत्सव में बदल दिया। सिनेमा बदल रहा था क्योंकि भारत के सपने बदल रहे थे।
जब फिल्मों ने सवाल पूछने शुरू किए
भारतीय सिनेमा की एक दूसरी धारा भी लगातार मजबूत होती गई, वह धारा जो दर्शक को सपनों की दुनिया से निकालकर वास्तविकता के सामने खड़ा करती थी। ‘सत्या’ ने मुम्बई के अंडरवल्र्ड को ग्लैमर के बजाय कठोर वास्तविकता की तरह दिखाया। ‘माचिस’ ने पंजाब के आतंकवाद के दौर को राजनीतिक घटना भर नहीं रहने दिया बल्कि उसे मानवीय त्रासदी के रूप में देखा। ‘रंग दे बसंती’ ने युवाओं के सामने देशभक्ति और नागरिक जिम्मेदारी का सवाल रखा। ‘पीपली लाइव’ ने किसान आत्महत्या जैसे गम्भीर विषय को व्यंग्य के माध्यम से समाज और मीडिया दोनों के सामने रखा। ‘न्यूटन’ ने एक छोटे से चुनाव अधिकारी के जरिए लोकतंत्र की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े किए और ‘आर्टिकल 15’ ने जाति की उस सच्चाई को सामने रखा, जिसे आधुनिक भारत अक्सर नजरअंदाज करना चाहता है। इन फिल्मों में मनोरंजन था लेकिन मनोरंजन के पीछे एक बेचैनी भी थी। सिनेमा अब केवल यह नहीं कह रहा था कि जिंदगी खूबसूरत है, वह पूछ रहा था कि जिंदगी इतनी असमान क्यों है।
सिनेमाघर से मोबाइल स्क्रीन तक
फिर तकनीक ने फिल्म देखने का तरीका ही बदल दिया। पहले सिनेमाघर से टेलीविजन तक यात्रा हुई, फिर केबल, वीडियो, सीडी और डीवीडी आए और अंततः ओटीटी ने कहानी को हमारी जेब में पहुंचा दिया। अब कहानी तीन घंटे की फिल्म तक सीमित नहीं रही। वह कई एपिसोड में कही जा सकती है और दर्शक अपनी सुविधा के अनुसार उसे देख सकता है। ‘स्कैम 1992’ जैसी सीरीज ने लम्बी कहानी को दर्शकों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बनाया, ‘पंचायत’ ने साबित किया कि बिना बड़े सितारों और भारी-भरकम एक्शन के भी एक साधारण कहानी लाखों दर्शकों को अपने साथ जोड़ सकती है और ‘पाताल लोक’ जैसी सीरीज ने समाज के उन अंधेरे हिस्सों की तरफ देखने की कोशिश की जिन्हें मुख्यधारा अक्सर नजरअंदाज कर देती है।
हमारे पास फिल्में ज्यादा हैं, धैर्य कम
यह बदलाव सुविधाजनक जरूर है लेकिन इसके साथ एक विडम्बना भी पैदा हुई है। सिनेमा हमारे जितना करीब कभी नहीं था, शायद उतना ही हमारा ध्यान उससे दूर होता गया। पहले फिल्म देखने के लिए हम दो-ढाई घंटे निकालते थे। अब दस मिनट बाद मोबाइल पर आया कोई नोटिफिकेशन हमारा ध्यान दूसरी तरफ खींच सकता है। पहले फिल्म देखने के बाद राय बनती थी, अब कई बार फिल्म देखने से पहले ही राय बन जाती है। ट्रेलर, रिव्यू, सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाएं और रेटिंग देखकर हम तय कर लेते हैं कि फिल्म देखने लायक है या नहीं। हमारे पास पहले से कहीं ज्यादा विकल्प हैं लेकिन शायद किसी एक कहानी के साथ बैठने का धैर्य पहले से कम हो गया है। फिर भी यह कहना गलत होगा कि आज का सिनेमा पहले से कमजोर है। आज कहानी कहने के माध्यम कहीं अधिक खुले हैं। विषयों की विविधता बढ़ी है, छोटे शहरों और हाशिए के किरदारों को जगह मिली है और ऐसे प्रयोग सम्भव हुए हैं जिनकी कल्पना कुछ दशक पहले कठिन थी। फर्क शायद सिनेमा की गुणवत्ता से ज्यादा हमारे देखने के तरीके में आया है। सत्तर के दशक का दर्शक जिस बेचैनी के साथ फिल्म देखता था, वह बेचैनी अलग थी। नब्बे के दशक का दर्शक जिन सपनों के साथ सिनेमाघर जाता था, वे सपने अलग थे। आज का दर्शक एक साथ कई दुनियाओं में जी रहा है। उसके पास समय कम है, ध्यान बंटा हुआ है और विकल्प लगभग अनंत हैं।
फिल्में बदलती हैं तो हम भी बदलते हैं
इसलिए शायद असली सवाल यह नहीं है कि फिल्में बदल गईं या हम बदल गए। सच यह है कि दोनों साथ-साथ बदले हैं। समाज बदला तो सिनेमा बदला और कई बार सिनेमा ने समाज को बदलने की कोशिश भी की। ‘मदर इंडिया’ से ‘दीवार’ तक, ‘डीडीएलजे’ से ‘रंग दे बसंती’ तक, ‘पीपली लाइव’ से ‘न्यूटन’ तक और सिनेमाघर से मोबाइल स्क्रीन तक, यह केवल फिल्मों की यात्रा नहीं है। यह हमारे अपने बदलने की कहानी भी है। सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत शायद यही है कि वह हमें दूसरों की कहानी में अपना चेहरा दिखा देता है। कोई किरदार हमारे बीते हुए समय की याद दिलाता है, कोई संवाद उस भावना को शब्द दे देता है जिसे हम खुद कह नहीं पाते और कोई फिल्म हमें कुछ देर के लिए अपने जीवन को बाहर से देखने का अवसर देती है। इसलिए अच्छी फिल्म की पहचान केवल यह नहीं कि वह कितने दर्शक जुटाती है या कितने करोड़ कमाती है। अच्छी फिल्म भी है जो पर्दा गिरने के बाद हमारे भीतर चलती रहती है, जिसका सवाल फिल्म खत्म होने के बाद भी खत्म नहीं होता।
पर्दा छोटा हुआ है, कहानी नहीं
आखिर में सिनेमा पर्दे पर पड़ने वाली रोशनी भर नहीं है। वह एक ऐसा आईना है जिसमें हम कभी अपने समाज को देखते हैं, कभी अपने समय को और कभी अनजाने में खुद को। स्क्रीन बदलती रहेगी, तकनीक बदलती रहेगी, दर्शक बदलते रहेंगे और कहानियां भी बदलती रहेंगी लेकिन जब तक किसी कहानी को देखकर हमारे भीतर यह कहने की क्षमता बची रहेगी कि ‘यह तो मेरी कहानी है’, तब तक सिनेमा खत्म नहीं होगा। शायद सिनेमा इसलिए जिंदा है क्योंकि इंसान आज भी अपनी कहानी किसी और की कहानी में तलाशता है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले हम उस कहानी तक पहुंचने के लिए सिनेमाघर जाते थे, अब कहानी हमारे हाथ में मौजूद एक छोटी-सी स्क्रीन पर चली आती है। पर्दा छोटा हो गया है लेकिन इंसान के भीतर कहानी देखने की जगह अभी भी उतनी ही बड़ी है।