अधूरी योजनाओं और पुरानी समस्याओं के बीच धर्मपुर

धर्मपुर के विधायक विनोद चमोली के करीब साढ़े नौ साल के कार्यकाल में धर्मपुर में पेयजल, सीवर, सड़क, ड्रेनेज और सम्पर्क से जुड़ी कई योजनाओं पर काम आगे बढ़ा है। राजधानी क्षेत्र की बड़ी और महत्वपूर्ण विधानसभा होने के कारण इसका विकास भी दिखाई देता है। लेकिन दूसरी तरफ जाम, पार्किंग, जलभराव, बाढ़, कूड़ा निस्तारण, मलिन बस्तियों का नियमितीकरण, सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे और लम्बे समय से अधूरी परियोजनाएं विधायक के रिपोर्ट कार्ड को मजबूत होने से रोकती हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि धर्मपुर को सिर्फ योजनाओं की नहीं बल्कि ऐसी योजनाओं की जरूरत है जो उसकी तेजी से बढ़ती आबादी और शहरी दबाव के अनुरूप अगले 10-20 वर्षों की जरूरतों का समाधान कर सकें। विनोद चमोली की राजनीतिक सक्रियता और अनुभव उनकी ताकत हैं लेकिन अब उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो समस्याएं वर्षों से चली आ रही हैं, उनके स्थायी समाधान का रोडमैप क्या है?

उत्तराखण्ड प्रदेश की सबसे अधिक मतदाताओं वाली विधानसभा में धर्मपुर का नाम सबसे ऊपर है। पूर्णतः शहरी क्षेत्र वाली इस विधानसभा में साढ़े तीन लाख से भी ज्यादा जनसंख्या और करीब दो लाख 40 हजार मतदाता हैं। राजनीतिक तौर पर मजबूत मानी जाने वाली इस विधानसभा का राजनीतिक भूगोल पर्वतीय मूल और मुस्लिम मतदाताओं के बीच बनता और बिगड़ता रहा है।

2012 में धर्मपुर विधानसभा का गठन किया गया था जबकि पूर्व में यह क्षेत्र लक्ष्मण चौक और देहराखास विधानसभा का हिस्सा था। 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के दिनेश अग्रवाल ने भाजपा के प्रकाश सुमन ध्यानी को 9380 मतों से पराजित कर चुनाव जीता। 2017 में भाजपा के नगर निगम देहरादून के तत्कालीन मेयर विनोद चमोली ने दिनेश अग्रवाल को 10953 मतों के बड़े अंतर से हराकर चुनाव जीता। इसी तरह 2022 में भी भाजपा के विनोद चमोली ने दिनेश अग्रवाल को 10 हजार से अधिक मतों के अंतर से हराकर अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखा। धर्मपुर विधानसभा का विस्तृत रूप चारों दिशाओं में फैला है। पूर्व में ग्रामीण क्षेत्रों का एक बड़ा हिस्सा अब नगर निगम देहरादून में शामिल होने के चलते पूरी विधानसभा नगरीय विधानसभा में तब्दील हो चुकी है। निकाय प्रशासन वाले क्षेत्रों में क्लेमेंट टाउन कैंटोनमेंट बोर्ड के छह वार्ड तथा नगर निगम देहरादून के 35 वार्ड धर्मपुर विधानसभा में शामिल हैं। गौर करने वाली बात यह है कि धर्मपुर के नाम से इस विधानसभा का नामकरण तो किया गया है लेकिन धर्मपुर जो देहरादून का एक बड़ा और घनी आबादी वाला उपनगर है, इस क्षेत्र का हिस्सा ही नहीं बनाया गया है।
पुरानी योजनाओं के सहारे आगे बढ़ रहा विकास
2012 में विधानसभा के गठन के बाद तत्कालीन विधायक और कैबिनेट मंत्री दिनेश अग्रवाल को क्षेत्र में करोड़ों के निर्माण कार्य और योजनाएं लाने के लिए जाना जाता है लेकिन 2017 से लेकर अब तक क्षेत्र में कोई ऐसी बड़ी विकासपरक योजना बनी हो जो एक अलग पहचान बना सके, ऐसा बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। आज भी कई पुरानी योजनाओं पर काम चल रहा है। इनमें भंडारीबाग रेलवे ओवर ब्रिज, दून मेडिकल काॅलेज, दून विश्वविद्यालय, आईएसबीटी का फ्लाईओवर, बाढ़ नियंत्रण के कार्य और दूधादेवी पुल के साथ-साथ दौड़वाला के लिए आवागमन को बेहतर बनाने के लिए बनाए गए पुल प्रमुख रूप से शामिल हैं। विगत नौ वर्षों में कई काम हुए हैं। हरिद्वार बाईपास, दून-दिल्ली एक्सप्रेसवे के साथ-साथ मेहूंवाला पेयजल ओवरहेड टैंक और पेयजल योजना पर काम हुआ है। सौंदर्यीकरण की योजनाएं भी चली हैं। कुछ हद तक विकास योजनाएं परवान तो चढ़ी हैं लेकिन धर्मपुर की अधिकांश बड़ी समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं।
‘दि संडे पोस्ट’ ने धर्मपुर विधानसभा के कई क्षेत्रों में भ्रमण के दौरान विकास और समस्याओं के साथ-साथ क्षेत्र के प्रमुख मुद्दों पर मतदाताओं और राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों से बातचीत की। प्रदेश की अस्थायी राजधानी के क्षेत्र का हिस्सा होने के बावजूद धर्मपुर विधानसभा के हालात विकास के हर पहलू पर पूरी तरह खरे उतरते नजर नहीं आ रहे हैं।
वर्षों से जलभराव की समस्या से जूझते निवासी
हैरत की बात है कि देहरादून नगर निगम के 41 वार्ड जिस विधानसभा में आते हों, उसी विधानसभा की एक बड़ी आबादी वर्षों से जलभराव की समस्या से जूझती आ रही है। ब्राह्माणवाला, मंडी, बंजारावाला और टर्नर रोड में जलभराव की समस्या है तो मलिन बस्ती क्षेत्र, हरभजनवाला, कारगी और तुन्तुवाला में बाढ़ की समस्या हर बरसात में हजारों लोगों के लिए मुसीबत बन जाती है। हाल ही में हुई बारिश के चलते कारगी में नाले के ऊपर बना एक मकान पूरी तरह ध्वस्त हो गया। हालांकि इसमें किसी की जान नहीं गई। स्थानीय लोगों के अनुसार बरसात के दौरान नालों में आने वाले तेज पानी और कमजोर पुस्तों के कारण इस क्षेत्र में लगातार खतरा बना रहता है।
आईएसबीटी में जलभराव की समस्या पर कुछ हद तक रोक लगाई जा चुकी है लेकिन भारी बरसात के कारण फ्लाईओवर से सटी हुई लिंक रोड पर एक फुट पानी भर जाना आज भी सामान्य बात है। इसी तरह कारगी नाले के सुदृढ़ीकरण से कुछ क्षेत्रों में जलभराव की समस्या से निजात भी मिली है लेकिन बारिश के दौरान कई इलाकों में पानी जमा होने की समस्या अभी भी सामने आती है।
कूड़ा निस्तारण की गम्भीर समस्या
पूरे देहरादून शहर से कूड़े को उठाकर एक स्थान पर ले जाया जाता है और फिर वहां से उसे सहसपुर के शीशमबाड़ा कूड़ा निस्तारण केंद्र में ले जाया जाता है। इसके लिए धर्मपुर विधानसभा के कारगी में करोड़ों की लागत से मैकेनाइज्ड कूड़ा स्थानांतरण केंद्र बनाया गया। इसी केंद्र में नगर से लाया गया कूड़ा एकत्र किया जाता है जहां से बड़े-बड़े ट्रकों में मशीनों के द्वारा भरकर शीशमबाड़ा कूड़ा निस्तारण केंद्र भेज दिया जाता है।
कारगी के कूड़ा स्थानांतरण केंद्र से क्षेत्र के निवासी बुरी तरह प्रभावित हैं। अधिकारियों की नीतियों के चलते मुख्य मार्ग आईएसबीटी- हरिद्वार रोड पर ही केंद्र बनाया गया है। इसके चलते मुख्य मार्ग पर लम्बा जाम लगना और कूड़े को डम्प करने से ऊंचा पहाड़ जैसा ढेर बनना आम बात हो गई है। इससे क्षेत्र में बदबू और प्रदूषण बढ़ने के साथ स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है।
कारोबारी नसीम अहमद का कहना है कि जब शुरू में यह कूड़ा केंद्र बना था तो कूड़ा तुरंत उठाया जाता था, जिससे न तो गंदगी होती थी और न किसी को कोई समस्या थी लेकिन अब इस कूड़ा केंद्र में कूड़ा बहुत ज्यादा आता है, जिससे कूड़े को डंप किया जा रहा है। मेन रोड से सटा होने के कारण गाड़ियों का लम्बा जाम भी हर दिन लगता है। इससे कारोबार को नुकसान हो रहा है और बदबू व बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है।
सरस्वती विहार के निवासी राजेंद्र तड़ियाल कहते हैं कि सरस्वती विकास, गंगोत्री विहार जैसी बड़ी आवासीय काॅलोनियां इसी क्षेत्र में हैं। कारगी क्षेत्र के उत्तरी भाग में भी कई काॅलोनियां हैं। इन काॅलोनियों के निवासियों को कूड़े के ढेर से उठने वाली बदबू के बीच रहने को मजबूर होना पड़ रहा है।
मलिन बस्तियों का नियमितीकरण योजना ठंडे बस्ते में
वर्ष 2016 में हाईकोर्ट के नदी-नालों में कब्जे करके बस्तियां बसाने को लेकर दिए गए एक आदेश के बाद तत्कालीन कांग्रेस की हरीश रावत सरकार ने देहरादून नगर निगम में शामिल मलिन बस्तियों को नियमित करने की घोषणा की थी और इसके लिए तीन वर्ष का समय तय किया गया था। 2017 में सत्ता परिवर्तन हुआ लेकिन मलिन बस्तियों का नियमितीकरण नहीं हो पाया। इसके चलते राज्य सरकार ने तीन वर्ष की समय सीमा बढ़ाई। तब से समय सीमा बढ़ती ही रही लेकिन मलिन बस्तियों का नियमितीकरण नहीं हो पाया। धर्मपुर विधानसभा में दीप नगर, ब्राह्माणवाला, बंजारावाला, कारगी ग्रांट और बिंदाल की मलिन बस्तियों में करीब 40 से 45 हजार की आबादी निवास करती है लेकिन आज भी इन बस्तियों के निवासी नियमितीकरण की राह देख रहे हैं। मलिन बस्तियों का सवाल सिर्फ जमीन के स्वामित्व तक सीमित नहीं है। इन बस्तियों में रहने वाली बड़ी आबादी के लिए मकान, बिजली, पानी, सड़क, सीवर और सुरक्षा जैसे सवाल भी जुड़े हुए हैं।
टिहरी बांध विस्थापितों की नाराजगी
धर्मपुर विधानसभा में टिहरी बांध विस्थापितों को अजबपुर क्षेत्र में टिहरी नगर के नाम से आवासीय कॉलोनी बनाकर बसाया गया था। वर्तमान समय में करीब 25 हजार की आबादी बांध विस्थापितों की हो चुकी है। विस्थापन के समय कई वादे किए गए थे, जिनमें हनुमंत राव कमेटी के निर्णय के अनुसार बांध विस्थापितों को बिजली और पानी निशुल्क दिए जाने का आदेश भी शामिल था। बिजली तो मुफ्त है लेकिन पेयजल का शुल्क लिया जाता रहा। स्थानीय निवासी और टिहरी बांध विस्थापितों के संगठन के पदाधिकारी बीर सिंह पंवार बताते हैं कि बांध विस्थापितों के साथ सरकार और टीएचडीसी ने अपना वादा पूरा नहीं किया। उनके अनुसार दबाव और आंदोलन के बाद बिजली निशुल्क की गई लेकिन पेयजल का बिल आज भी देना पड़ रहा है। इसके लिए आंदोलन किया गया, तब सरकार ने इस पर अपनी सहमति जताई है लेकिन अभी इसका अंतिम निर्णय क्या हुआ, यह स्पष्ट नहीं है।
यही नहीं, टिहरी नगर में ही टिहरी पार्क की घोषणा की गई थी लेकिन उसका निर्माण टिहरी नगर की बजाय मोथरोवाला में टिहरी पार्क के नाम से किया गया। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह पार्क टिहरी नगर में ही बनाए जाने की घोषणा की गई थी, जिसे बाद में दूसरी जगह ले जाया गया। इस मुद्दे को लेकर विस्थापितों के बीच नाराजगी बनी हुई है।
शहीद स्मृति द्वार नौ साल से निर्माण के इंतजार में
2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत एक कार्यक्रम में आए और 2016 में शहीद हुए जीत बहादुर थापा के परिजनों से मिलने उनके घर पहुंचे। उस समय उन्होंने कारगी के बद्री विहार में शहीद जीत बहादुर थापा की स्मृति में एक भव्य द्वार बनाए जाने की घोषणा की थी लेकिन यह घोषणा जमीन पर नहीं उतर पाई है।
सेवानिवृत्त कैप्टन और जीत बहादुर थापा के भाई गुप्त बहादुर थापा कहते हैं कि उनके भाई 2016 में शहीद हुए थे। 2017 में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत उनके घर आए और शहीद द्वार बनाए जाने की घोषणा की। काम शुरू नहीं हुआ तो उन्होंने सेना कार्यालय और सरकारी विभागों के कई चक्कर लगाए। तीन साल बाद निर्माण शुरू हुआ लेकिन हाईटेंशन लाइन के कारण फिर काम रोक दिया गया। उनका कहना है कि अधिकारियों ने स्थान चयन करने में बड़ी लापरवाही की। उनके भाई को देश के लिए शहीद हुए दस साल हो गए हैं और शहीद द्वार की घोषणा को नौ साल लेकिन आज भी यह द्वार नहीं बन पाया है।
भंडारीबाग रेलवे ओवरब्रिज भी वर्षों से अधूरा
भंडारीबाग स्थित निर्माणाधीन रेलवे ओवर ब्रिज आठ वर्षों से निर्माणाधीन है। 30 माह में बनने वाले इस ओवर ब्रिज का काम वर्षों बाद भी पूरा नहीं हो पाया है। लम्बे समय तक इसका निर्माण महज करीब 60 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया। इसके कारण सहारनपुर रोड, लालपुल और कारगी रोड पर वाहनों के जाम से निजात नहीं मिल पा रहा है। 2013 में कांग्रेस की विजय बहुगुणा सरकार ने लालपुल और कारगी को रेसकोर्स से जोड़ने के लिए भंडारीबाग में रेलवे ओवर ब्रिज का खाका तैयार किया था। 2019 में इस पर काम शुरू किया गया और भारत सरकार की ईपीआईएल के साथ एमओयू किया गया। ब्रिज की कुल लागत करीब 43 करोड़ रुपए रखी गई तथा 30 माह के भीतर रेलवे ओवर ब्रिज का निर्माण पूरा करने की शर्त रखी गई थी।
तमाम जद्दोजहद और कोरोना महामारी के चलते कम्पनी को तय समय सीमा में छूट भी दी गई। इसके बावजूद 2024 तक केवल करीब 60 प्रतिशत निर्माण कार्य ही पूरा हो पाया। इसके बाद उत्तराखण्ड शासन ने कम्पनी से काम वापस ले लिया और लोक निर्माण विभाग को इसकी निगरानी की जिम्मेदारी दी गई। लोक निर्माण विभाग ने इसका रिवाइज्ड इस्टीमेट तैयार किया, जिसमें कुल लागत बढ़कर करीब 56 करोड़ रुपए हो गई। इसके बाद अगस्त 2025 में फिर से ओवर ब्रिज पर काम शुरू हुआ लेकिन एक वर्ष बीत जाने के बाद भी भंडारीबाग रेलवे ओवर ब्रिज का काम पूरा नहीं हो पाया है।
विकास के दावों पर आमने-सामने सियासत
पूर्व विधायक और मुख्यमंत्री सेतु आयोग के सलाहकार दिनेश अग्रवाल का कहना है कि जो भी विधायक या जनप्रतिनिधि होता है, उसका एक ही ध्येय होना चाहिए कि वह अपने क्षेत्र के विकास के लिए काम करें। कुछ काम विधायक निधि से आसानी से हो जाते हैं लेकिन विकास की मुख्यधारा के लिए विकास योजनाओं और निर्माण कार्यों को लेकर एक विजन हर विधायक के पास होना चाहिए। दिनेश अग्रवाल अपने कार्यकाल में करीब एक हजार करोड़ रुपए की विकास योजनाएं और निर्माण कार्य करवाने का दावा करते हैं। उनका कहना है कि पुलों का निर्माण हो, आईएसबीटी का फ्लाईओवर हो या बाढ़ राहत और नियंत्रण के लिए किए गए काम, क्षेत्र की जनता आज भी उनके कार्यकाल में हुए कामों को याद करती है। उनका कहना है कि विकास के काम कभी नहीं रुकते और जो विधायक होता है, उसके कार्यकाल में काम आगे बढ़ते हैं। विकास कार्य सिर्फ चुनाव की दृष्टि से नहीं बल्कि जनता को स्थायी और असरदार फायदा देने की दृष्टि से होने चाहिए।
पूर्व निर्दलीय प्रत्याशी बीर सिंह पंवार का आरोप है कि विनोद चमोली लगातार दो बार विधायक हैं और दो बार देहरादून नगर निगम के महापौर भी रह चुके हैं। उनके लिए काम करवाना कठिन नहीं था लेकिन उन्होंने अपने कार्यकाल में कोई एक बड़ा काम करवाया हो तो उसे सामने रखा जाना चाहिए। उनके अनुसार जितने भी बड़े काम हुए हैं, उनमें से कई पूर्व विधायक दिनेश अग्रवाल के कार्यकाल में शुरू हुए थे।
प्रदेश कांग्रेस महामंत्री याकूब सिद्दीकी का कहना है कि बात यह नहीं है कि काम क्यों नहीं हुए। काम तो कोई भी कर सकता है। विनोद चमोली लगातार दो बार से धर्मपुर के विधायक हैं और पहले देहरादून के मेयर रह चुके हैं। इसके बावजूद उनके क्षेत्र की जनता इतने सालों से जलभराव, बाढ़, अवैध कब्जे, सरकारी जमीनों की अवैध खरीद-बिक्री, रोजगार और प्रदूषण से परेशान है तो यह विधायक और सरकार के कामकाज पर सवाल है। नगर निगम में शामिल गांवों की जमीनों को लेकर गम्भीर शिकायतें सामने आ रही हैं लेकिन विधायक इसे नगर निगम का मामला बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं। सवाल है कि डेमोग्राफी चेंज की बात करने वाले चमोली यह भी बताएं कि डेमोग्राफी सिर्फ एक तरफा हुई है या पहाड़ों से भी हजारों लोग क्षेत्र में बसने आए हैं। उनका कहना है कि नदी-नालों और सरकारी जमीनों पर रातों-रात खड़ी बस्तियों के पीछे कौन है, यह सरकार और उसके तंत्र को देखना चाहिए।
प्रदेश महामंत्री उत्तराखण्ड कांग्रेस सुरेंद्र रांगड़ का आरोप है कि विनोद चमोली ने अपने कार्यकाल में कोई बड़ा काम नहीं किया। चमोली की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वे खुद को पहाड़ी बताते हैं और हर चुनाव में इसी पहचान को मुद्दा बनाते हैं। काम के नाम पर सब हो जाएगा कहा जाता है लेकिन कब और कैसे होगा, इसका जवाब नहीं मिलता।
भाजपा नेता और पूर्व पर्यटन सलाहकार प्रकाश सुमन ध्यानी का कहना है कि क्षेत्र की जनता बदलाव चाहती है। उनके अनुसार जहां-जहां वे जाते हैं, वहां लोग कहते हैं कि इस बार धर्मपुर विधानसभा से बाहरी व्यक्ति की बजाय स्थानीय व्यक्ति ही विधायक होना चाहिए।  दस साल का कार्यकाल कोई छोटा कार्यकाल नहीं होता। यदि विधायक के पास विकास का विजन हो और काम करने की सोच हो तो क्षेत्र में कामों की कमी नहीं है। अनेक योजनाएं लटकी पड़ी हैं और चुनाव नजदीक आते ही उनमें काम शुरू हो जाता है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि भाजपा सरकार हर क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए समर्पित और तत्पर रहती है लेकिन धर्मपुर में काम क्यों नहीं हो पा रहे हैं, इसका कारण तलाशना जरूरी है।

धर्मपुर के सामने 2027 का सवाल
धर्मपुर विधानसभा में पिछले नौ वर्षों के दौरान विकास के कई काम हुए हैं। पेयजल, सीवर, सड़क, ड्रेनेज, बाईपास, एक्सप्रेसवे और सौंदर्यीकरण से जुड़े कार्यों ने क्षेत्र की तस्वीर बदलने में भूमिका निभाई है लेकिन दूसरी तरफ जलभराव, बाढ़, कूड़ा निस्तारण, जाम, पार्किंग, मलिन बस्तियों का नियमितीकरण, सरकारी जमीनों पर कब्जे, अवैध बसावट और वर्षों से अधूरी पड़ी योजनाएं विकास की तस्वीर पर सवाल भी खड़े करती हैं।
धर्मपुर की राजनीति में एक तरफ लगातार दो बार चुनाव जीत चुके विधायक विनोद चमोली का दावा है कि उनके कार्यकाल में क्षेत्र के विकास के लिए अनेक योजनाएं आगे बढ़ी हैं, वहीं विपक्ष और उनके राजनीतिक विरोधी सवाल उठा रहे हैं कि आखिर नौ साल के कार्यकाल के बाद भी क्षेत्र की बुनियादी समस्याएं पूरी तरह क्यों नहीं सुलझ पाईं।
शहीद स्मृति द्वार का अधूरा निर्माण, भंडारीबाग रेलवे ओवर ब्रिज की लम्बी देरी, कारगी का कूड़ा केंद्र, जलभराव और बाढ़, पार्किंग की कमी तथा मलिन बस्तियों का नियमितीकरण ऐसे मुद्दे हैं जिनका सीधा असर आम आदमी के जीवन पर पड़ता है।
इसके साथ ही सरकारी जमीनों पर कथित कब्जे और तेजी से बढ़ती नई बसावट धर्मपुर की बदलती सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर को भी प्रभावित कर रही है। यही कारण है कि 2026 की विधानसभा विकास यात्रा में धर्मपुर का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितना काम हुआ बल्कि यह भी है कि जो काम हुए, उनका आम जनता को कितना लाभ मिला और जो समस्याएं वर्षों से बनी हुई हैं, उनके स्थायी समाधान के लिए क्या किया गया।
करीब एक दशक के विधायक कार्यकाल के बाद अब धर्मपुर की जनता के सामने भी यही सवाल है कि विकास की रफ्तार को किस पैमाने से मापा जाए, नई योजनाओं से, पुरानी योजनाओं को पूरा कराने से या उन समस्याओं से जो आज भी हर बरसात, हर जाम और हर रोजमर्रा की परेशानी के साथ जनता के सामने खड़ी हैं।
धर्मपुर की विकास यात्रा इसी विरोधाभास के बीच खड़ी दिखाई देती है, एक तरफ बड़े प्रोजेक्ट और बदलता शहरी स्वरूप, दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं और लम्बे समय से लंबित समस्याओं की वही तस्वीर। 202 के चुनाव में जब राजनीतिक दल फिर जनता के बीच जाएंगे तो इन सवालों से बचना आसान नहीं होगा।
धर्मपुर विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक : विनोद चमोली (अवधि : 4.5 वर्ष)
क्र. क्षेत्र                                                 मुद्दा / जमीनी स्थिति                                 अंक  (10 में)
  • जनसम्पर्क एवं उपलब्धता लम्बे राजनीतिक अनुभव के कारण विनोद चमोली की क्षेत्र में पहचान और सक्रियता बनी हुई है। जनता के बीच उनकी पहुंच है और राजनीतिक मुद्दों पर भी वे सक्रिय रहते हैं। हालांकि स्थानीय समस्याओं के लगातार फॉलोअप और क्षेत्रीय निगरानी को लेकर शिकायतें सामने आती हैं।     5
  • सड़क एवं परिवहन सड़क चैड़ीकरण, आंतरिक सड़कों और सम्पर्क मार्गों पर काम हुआ है। बाईपास और दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का लाभ क्षेत्र को मिला है लेकिन कई आंतरिक सड़कें अभी भी खराब हैं और बढ़ते यातायात के मुकाबले सड़क नेटवर्क पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।            6
  • जलभराव एवं बाढ़ नियंत्रण कारगी नाले के सुदृढ़ीकरण और ड्रेनेज के कुछ कार्यों से कई क्षेत्रों को राहत मिली है। आईएसबीटी में भी पहले की तुलना में स्थिति बेहतर हुई है। इसके बावजूद ब्राह्माणवाला, मंडी, बंजारावाला, टर्नर रोड, कारगी और अन्य क्षेत्रों में बरसात के दौरान जलभराव व बाढ़ की समस्या बनी हुई है।               5
  • पेयजल एवं सीवर मेहूंवाला क्लस्टर में पेयजल संकट दूर करने के लिए बड़ी योजना पर काम हुआ है। एडीबी के माध्यम से सीवर लाइन का काम भी चल रहा है। इन योजनाओं से कई क्षेत्रों को लाभ मिला है लेकिन पूरी विधानसभा की बढ़ती आबादी के अनुरूप व्यवस्था अभी भी मजबूत किए जाने की जरूरत है।             7
  • स्वास्थ्य सुविधाएं दून मेडिकल काॅलेज और इससे जुड़ी स्वास्थ्य सुविधाएं क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल हैं। राजधानी क्षेत्र का हिस्सा होने के कारण स्वास्थ्य सुविधाओं का आधार मजबूत है। हालांकि स्थानीय स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को और विस्तार देने की जरूरत है।                            8
  • शिक्षा एवं रोजगार दून विश्वविद्यालय और दून मेडिकल काॅलेज जैसी संस्थाएं क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं लेकिन स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और कौशल विकास के क्षेत्र में कोई बड़ी विशिष्ट पहल सामने नहीं आती। शिक्षा का आधार मजबूत है, मगर रोजगार के अवसरों का सवाल अभी कायम है।            5
  • मलिन बस्तियां एवं कमजोर वर्ग धर्मपुर में बड़ी संख्या में मलिन बस्तियां हैं और इनके नियमितीकरण का मुद्दा वर्षों से लम्बित है। हाउस टैक्स और समय सीमा बढ़ाने जैसे कदम जरूर हुए हैं लेकिन करीब एक दशक बाद भी स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। हजारों परिवार अब भी नियमितीकरण की प्रतीक्षा में हैं।              4
  • सफाई एवं कूड़ा निस्तारण कारगी का मैकेनाइज्ड कूड़ा स्थानांतरण केंद्र क्षेत्र की बड़ी समस्या बन चुका है। कूड़े के ढेर, बदबू, प्रदूषण और कूड़ा वाहनों की लम्बी कतार से स्थानीय लोग परेशान हैं। केंद्र को स्थानांतरित करने की मांग के बावजूद अभी तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ है।             4
  • बड़ी विकास परियोजनाएं एवं विकास विजन बाईपास, पेयजल, सीवर, ड्रेनेज, सड़क और अन्य योजनाओं पर काम हुआ है लेकिन भंडारीबाग रेलवे ओवर ब्रिज जैसी महत्वपूर्ण परियोजना वर्षों से अधूरी है। धर्मपुर की बढ़ती आबादी और यातायात दबाव को देखते हुए दीर्घकालिक विकास विजन को लेकर अभी सवाल बने हुए हैं।       6
  • समस्याओं के समाधान एवं जवाबदेही विधायक के पास लम्बा राजनीतिक अनुभव है और कई योजनाओं को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका रही है लेकिन जाम, पार्किंग, जलभराव, कूड़ा, मलिन बस्तियोंका नियमितीकरण, सरकारी जमीनों पर कब्जे और अधूरी परियोजनाओं जैसे सवाल लम्बे समय से बने हुए हैं। जनता की अपेक्षा स्थायी समाधान की है, जिस मोर्चे पर अभी और काम की जरूरत दिखाई देती है।                  5

कुल अंक :  5.5/10              फाइनल ग्रेड : पास

 
कैप्शन : निर्माणाधीन भंडारी बाग फ्लाईओवर
अधर में शहीद द्वार कारगी

‘आप एजेंडावादियों से मिलकर मुझसे सवाल पूछने आए हैं’
विनोद चमोली भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में शुमार हैं। वर्ष 1985 से भाजपा से जुड़े चमोली पार्टी के अनेक पदों पर काम कर चुके हैं। वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी रहे विनोद चमोली 2017 में पहली बार धर्मपुर विधानसभा से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और जीतकर विधायक बने। 2022 में फिर भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतकर लगातार दूसरी बार विधायक निर्वाचित हुए। वह पूर्व में देहरादून नगर निगम के अध्यक्ष और दो बार महापौर का चुनाव जीत चुके हैं। अखिल भारतीय महापौर परिषद के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। अपने करीब साढ़े नौ वर्ष के विधायकी कार्यकाल में धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र में विकास कार्यों और योजनाओं को लेकर उन्होंने ‘दि संडे पोस्ट’ से बातचीत की

आपके करीब साढ़े नौ वर्ष के कार्यकाल में आपके द्वारा क्षेत्र के विकास के लिए कौन-कौन सी बड़ी योजनाओं पर काम करवाया गया है?
जब मैं 2017 में विधायक बना तो आपने देखा होगा कि बाईपास अधूरा पड़ा हुआ था। वर्षों से काम रुका हुआ था और न्यायालयों में मामले चल रहे थे। मैंने इस पर गम्भीरता से काम किया और सभी अड़चनों का समाधान किया गया। इसके बाद काम फिर से शुरू करवाया गया। आज आप देख सकते हैं कि बाईपास का निर्माण पूरा हो चुका है। छह वार्डों में एडीबी के माध्यम से सीवर लाइन के निर्माण का काम शुरू करवाया, जिस पर आज भी काम हो रहा है। भंडारीबाग के आरओबी का काम लंबित पड़ा था, उसको आगे बढ़ाया गया और अब कुछ समय के बाद यह पूरा बनकर जनता के लिए खोल दिया जाएगा। मेहूंवाला क्लस्टर में पेयजल का बड़ा संकट था। इसके लिए हमने वल्र्ड बैंक से 72 करोड़ रुपए की लागत से पेयजल योजना बनवाई। सड़कों के काम, आंतरिक सड़कों के काम और सड़क चैड़ीकरण का काम करवाया है। बंजारावाला में एडीबी के माध्यम से काम चल रहा है। जब काम पूरा हो जाएगा तो सड़क के दोनों ओर का काम शुरू हो जाएगा। नदी-नालों पर पुस्तों का निर्माण करवाया है। जलभराव के समाधान के लिए ड्रेनेज के काम करवाए हैं। पहले आईएसबीटी में पूरा जलभराव हो जाता था लेकिन आज जलभराव से काफी हद तक मुक्ति मिल चुकी है।

एक काम जो मैं सबसे बड़ा समझता हूं लेकिन लोग उसको ज्यादा तवज्जो नहीं देते। मेरी विधानसभा में आधा क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्र था। उसका शहरीकरण तो हो चुका था लेकिन तकनीकी रूप से वे ग्रामीण क्षेत्र ही थे। इसके कारण शहरों के जैसे विकास कार्य वहां नहीं हो पा रहे थे। इसलिए इन सभी क्षेत्रों को मैंने नगर निगम देहरादून में शामिल करवाया। आज इन क्षेत्रों में वही विकास योजनाएं चल रही हैं जो शहरी क्षेत्रों के लिए चलती हैं। इस तरह से देखा जाए तो ओवरऑल मैंने अपने कार्यकाल में बहुत से काम करवाए हैं।
मलिन बस्तियों का नियमितीकरण दस साल में भी नहीं हुआ जबकि आपके क्षेत्र में तो सबसे ज्यादा मलिन बस्तियां हैं। इसकी वजह क्या है?
किसी भी बस्ती का नियमितीकरण सरकार का सब्जेक्ट बनता है। मैं जब मेयर था तो मैंने इसके लिए प्रस्ताव भी दिए थे। पहली बार मलिन बस्तियों में हाउस टैक्स लगाने का काम भी मेरे द्वारा ही किया गया था। इससे मलिन बस्तियों के निवासियों के पास एक दस्तावेज आ गया कि इस भूमि पर उनका अधिकार है। इस मामले में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि मलिन बस्तियों की सारी भूमि सरकार की नहीं है। कुछ दरबार साहिब की भूमि है, कुछ फाॅरेस्ट की भूमि है और कुछ बदरीनाथ टेंपल कमेटी की भूमि है। अलग-अलग बस्तियों में अलग-अलग भूमि है।
दूसरी बड़ी बात यह है कि जो नदी बेल्ट की भूमि है, वह जलमग्न भूमि कहलाती है, जिस पर बसावट नहीं हो सकती। इस पर हमने एक कदम उठाया है कि पहले नदियों की चैड़ाई फिक्स की जाए और फिर बची हुई भूमि का श्रेणी परिवर्तन हो सकता है। आपको यह पता होगा कि यह मामला सिर्फ देहरादून का नहीं है बल्कि पूरे प्रदेश की मलिन बस्तियों का मामला है। इसके लिए भाजपा सरकार तीन बार अध्यादेश लाकर इन मलिन बस्तियों को बचा चुकी है। जैसे जरूरत पड़ेगी, हम फिर अध्यादेश लाकर इन्हें बचाएंगे लेकिन मलिन बस्तियों को उजड़ने नहीं देंगे।
धर्मपुर विधानसभा में जलभराव और बाढ़ की समस्या लगातार बनी हुई है। हाल ही में कारगी में एक मकान बरसात के कारण ध्वस्त हो गया। इसका निराकरण क्यों नहीं हो पाया?
कारगी में जो मकान गिरा है, वह जलभराव से नहीं बल्कि बरसात के कारण नाले में ज्यादा पानी आने से गिरा है। पुस्ता दरकने से मकान गिरा। नाले के पुस्ते के ऊपर घर बना दिया गया था, जिससे मकान गिरा है। फौरी तौर पर पुस्ते के निर्माण के आदेश मैंने दे दिए हैं। जहां पहले जलभराव की समस्या होती थी, अब वहां ड्रेनेज की सुविधा होने से जलभराव खत्म हो चुका है। कुछ स्थानों पर समस्या है लेकिन वह सिर्फ बरसात के कारण और कुछ समय के लिए हो रही होगी। इसके समाधान के लिए काम किए जा रहे हैं।
कारगी मैकेनाइज्ड कूड़ा सेंटर में कूड़े का ढेर बढ़ रहा है। बदबू और प्रदूषण के अलावा मुख्य मार्ग पर होने से वाहनों का लम्बा जाम लगना भी समस्या बन चुका है। इससे कब छुटकारा मिलेगा?
इसके लिए आपको थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। एनडी तिवारी जी मुख्यमंत्री थे और मैं मेयर था। साॅलिड वेस्ट मैनेजमेंट के लिए जगह चिन्हित की गई थी। इसमें शीशमबाड़ा, सहसपुर में कूड़ा निस्तारण केंद्र बनाया जाना था और कारगी में कूड़ा एकत्र करने के लिए मैकेनाइज्ड कूड़ा केंद्र बनाया जाना था। योजना यह थी कि शहर का कूड़ा कारगी में एकत्र किया जाएगा और उसी दिन उसे उठाकर शीशमबाड़ा ले जाकर निस्तारण किया जाएगा। जमीन यही थी, जिस कारण कूड़ा ट्रांसफर सेंटर कारगी में ही बनाया जा सकता था। अब इससे समस्या बढ़ने लगी है। मैंने बार-बार इस बात को उठाया भी है और सरकार से मांग की है कि इसके लिए कहीं और जगह दी जाए जिससे यह कूड़ा केंद्र हटाकर दूसरी जगह बनाया जा सके और समस्या खत्म हो। वैसे भी अब एलिवेटेड रोड बनना तय है, तो इस कूड़ा केंद्र को हटना ही है।
टिहरी बांध विस्थापितों से पेयजल शुल्क लिया जा रहा है जबकि पूर्व में इसे निशुल्क करने की घोषणा हुई थी। टिहरी पार्क भी मोथरोवाला में बनाया गया जबकि वह टिहरी नगर के लिए घोषित था। इस पर क्या कहेंगे?
पहली बात तो यह गलत इंफॉर्मेशन है कि छठ पूजा घाट को टिहरी पार्क का नाम दिया गया। जब मैं मेयर था, तब मैंने इसके लिए काम किया था। 80 लाख रुपए स्वीकृत करवाए थे और टिहरी थीम पर टिहरी पार्क बनाया जाना था। टिहरी पार्क के लिए टिहरी बांध विस्थापितों ने भूमि नहीं दी। टिहरी नगर में एक पार्क था, जिसे आजाद मैदान कहा जाता था। हमने वह मांगा लेकिन टिहरी विस्थापितों ने साफ मना कर दिया कि नया पार्क बनाया जाए। पूरे टिहरी नगर में पार्क के लिए जमीन मिली ही नहीं लेकिन पार्क का निर्माण तो करना ही था। इसलिए मोथरोवाला में हमें सरकारी भूमि मिली और उसमें टिहरी पार्क बनाया गया। सिर्फ पार्क ही नहीं, टिहरी की यादों को उस पार्क में समेटा जाना है। टिहरी का पूरा एक मॉडल बनाया जाना है। थीम पार्क का मॉडल तैयार किया जा रहा है। यह टिहरी पार्क ही है, कोई छठ पूजा पार्क नहीं है। यह सब विरोधियों द्वारा झूठा प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है। कुछ खुराफाती लोग हैं, जिनको कुछ करना नहीं है। बस चीजों को खराब करना है। वही इस तरह का नैरेटिव और एजेंडा चला रहे हैं। छठ पार्क तो अभी बना ही नहीं है, उसका तो प्रस्ताव गया हुआ है।
शहीद जीत बहादुर थापा स्मृति द्वार नौ वर्षों से अधूरा है। स्थान का चयन गलत किया गया। कब तक द्वार बनेगा?
शहीद जीत बहादुर थापा की स्मृति में द्वार बनाए जाने की बात उठी तो इसके लिए उपयुक्त स्थान चुनने की बात सामने आई। हमने स्थान चुनने के लिए कहा। कुछ लोगों ने अपनी राजनीति करने के लिए उस स्थान को चुनने का काम किया। जब लोगों ने जगह चुन ली तो मैंने गढ़वाल मंडल विकास निगम को इसके निर्माण के लिए कहा और 21 लाख रुपए का बजट स्वीकृत करवाया। काम शुरू किया गया तो पता चला कि द्वार के ठीक ऊपर हाईटेंशन लाइन गुजर रही है, जिस कारण काम रोक दिया गया। काम विनोद चमोली के द्वारा नहीं रोका गया है। कुछ लोगों की राजनीति के कारण शहीद के नाम को भी राजनीति का सहारा बनाया गया। उस स्थान पर कभी भी स्मृति द्वार बनाया ही नहीं जा सकता है।
मैंने इसके बारे में बात की लेकिन बगैर मेरी जानकारी के कुछ लोगों ने अधूरे द्वार का उद्घाटन तक कर डाला। यह सब भाजपा विरोधियों की राजनीति है। मैं जब मेयर था, तब निगम में प्रस्ताव पास किया जा चुका था कि किसी भी शहीद के नाम पर स्मृति द्वार बनाए जाने की मांग होती है तो नया प्रस्ताव देने की जरूरत नहीं है। नगर निगम अपने बजट से शहीद द्वार का निर्माण करेगा। आज भी शहीद द्वार के लिए दूसरी जमीन मिल जाए तो द्वार का तुरंत निर्माण हो जाएगा।

नगर निगम में शामिल गांवों की ग्राम समाज और सरकारी भूमि की अवैध खरीद-फरोख्त का काम चल रहा है। नदी-नालों पर अवैध कब्जा करके बस्तियां खड़ी की जा रही हैं। आप विधायक हैं, आप इस पर रोक क्यों नहीं लगवा पा रहे हैं?

यह मामला तो नगर निगम का है और नगर निगम को ही इसको देखना चाहिए। मेरे सामने अगर कोई ऐसा मामला आता है तो मैं ऐसे मामलों पर तुरंत कार्रवाई करने के लिए कहता हूं। मैंने हमेशा जमीनों को बचाने का काम किया है। जहां हमें लगता है कि इस तरह के तत्व खड़े हो रहे हैं, तो वहां हमने कोई निर्माण योजना बनाकर ऐसी जमीनों को बचाया है। टिहरी पार्क जहां बना है, वह भी ऐसी ही जमीन थी, जिस पर गुपचुप तरीके से जमीनें बेचे जाने का प्रयास किया जा रहा था। हमने पार्क बनाकर उस पर रोक लगा दी लेकिन यह भी सच है कि आज भी ऐसे कुछ लोग हैं जो इस तरह के कामों को बढ़ावा देकर ऐसा कारोबार कर रहे हैं।
ढाई साल में दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे बन सकता है तो भंडारीबाग रेलवे ओवर ब्रिज आठ साल से क्यों लटका पड़ा है? यह कब पूरा होगा?
इस मामले में रेलवे इन्वॉल्व है। कई समय तक इसके स्ट्रक्चर और डिजाइन के कारण काम प्रभावित रहा। स्थानीय लोगों की बस्ती थी, उनके रास्ते थे, जिन पर विवाद पैदा हो गए थे। फिर कोरोना आ गया। फिर भी अब इसकी सारी अड़चनों का समाधान निकाल लिया गया है और मुझे लगता है कि दो-ढाई महीने में इसका निर्माण पूरा हो जाएगा।
आपके क्षेत्र में आशारोड़ी से लेकर आईएसबीटी और आईएसबीटी से लेकर रिस्पना पुल विधानसभा के साथ-साथ आईएसबीटी से घंटाघर तक जाम की समस्या बनी हुई है। पार्किंग की कोई व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा रही है?
यह समस्या बड़ी है लेकिन स्थान नहीं मिलने से पार्किंग की सुविधा नहीं मिल पा रही है। आईएसबीटी में एक पार्किंग है लेकिन अन्य स्थानों के लिए भी पार्किंग की बात हो रही है। अगर कोई स्थान मिल जाएगा तो पार्किंग का निर्माण हो जाएगा।
आप डेमोग्राफी चेंज की बात करते हैं लेकिन आपकी ही विधानसभा में बाहरी राज्यों के लोगों की बसावट सबसे ज्यादा हो रही है। रोहिंग्याओं के भी बसने की चर्चा है। आपके समर्थकों पर आरोप लगाया जा रहा है कि वे इस तरह के लोगों के वोटर कार्ड और आधार कार्ड बनवाते हैं?
ऐसा कोई आरोप लगा रहा है तो वह पूरी तरह गलत आरोप है। जिस मुद्दे को लेकर मैं विधानसभा में लड़ रहा हूं, क्या मैं ऐसा कोई काम करूंगा जिससे मेरे राज्य की डेमोग्राफी में बदलाव आए? पूरी तरह से निराधार आरोप है। हम यह कहते रहे हैं कि राज्य में डेमोग्राफी चेंज करने का षड्यंत्र चल रहा है। इसे रोकने का प्रयास किया जा रहा है। अभी एसआईआर का काम चल रहा है, इससे इस पर रोक लगेगी। जिनके पास किसी तरह के प्रमाण नहीं होंगे, वे बाहर हो जाएंगे। यह मामला सिर्फ मेरी विधानसभा का नहीं है। पूरे प्रदेश में कई विधानसभाओं का मामला है। हम राज्य में परिवार रजिस्टर बनाने जा रहे हैं। जब यह मेंटेन होगा तो काफी सारी चीजें ठीक हो जाएंगी।
आप पहाड़ के मुद्दों को लेकर मुखर रहते हैं और कई बार पार्टी लाइन से इतर बात कर देते हैं। मूल निवास और भू-कानून को लेकर आपकी क्या राय है? पौड़ी में भू-कानून की हकीकत तो सामने आ चुकी है?
इस पर काम हो रहा है। भू-कानून बन चुका है। आपको पता नहीं है कि जैसे ही पौड़ी का मामला मेरे सामने आया, मैंने तुरंत पौड़ी डीएम को फोन करके इस मामले की जांच करने को कहा। मैंने कहा कि यह कैसे हो सकता है कि कोई आदमी कम्पनी बनाकर जमीन खरीद ले, उसका 143 हो जाए और वह जमीन पर आवास आदि बनाकर बेचने का काम करने लगे। अब जांच शुरू हो गई है लेकिन मुझे लगता है कि भू-कानून और मूल निवास की समीक्षा तो करनी ही पड़ेगी।
आप पर गुटबाजी करने और अपने ही समर्थकों के साथ संवाद करने के आरोप लग रहे हैं। साथ ही आप पर आरोप है कि आपका स्वभाव क्रोधी और असहनशील हो गया है। आप सवाल पूछने पर नाराजगी जताते हैं। क्या यह आरोप सही है?
विनोद चमोली क्रोधी नहीं है, वह सिद्धांतवादी व्यक्ति है। अगर लोग उससे अपेक्षा करते हैं तो वह भी अपने लोगों से अपेक्षा करता है कि लोग ठीक लाइन पर चलें। आपने जितने भी सवाल पूछे हैं, वह सभी एजेंडावादी हैं। आप एजेंडावादियों से मिलकर उनकी बातों को सुनकर मुझसे सवाल पूछने आए हैं। मैं यह आपके लिए व्यक्तिगत नहीं कह रहा हूं लेकिन इस तरह के एजेंडावादी लोग जो मेरे खिलाफ दुष्प्रचार करके कामों में रोड़ा अटकाते हैं, आप और आप जैसे पत्रकारों को उनसे भी तो पूछना चाहिए कि क्षेत्र की समस्याओं के लिए वे क्या काम कर रहे हैं।
जनता भी इस तरह के आरोप नहीं लगाती है। आरोप हमेशा राजनीति से प्रेरित होते हैं। आपने जीत बहादुर थापा वाला सवाल पूछा, वह एजेंडा है। टिहरी पार्क का सवाल भी एजेंडा वाला सवाल है। विनोद चमोली 40 साल से राजनीति कर रहा है और तमाम मीडिया वालों से लगातार सम्पर्क में रहा है लेकिन कभी कोई ऐसी स्थितियां नहीं आईं लेकिन होता है, यह गलत भी नहीं है। आपके सम्पर्क में भी लोग होते हैं, वे आपको बताते हैं और आप हमसे सवाल करते हैं। इसी तरह से तो सवाल खड़े होते हैं।
विपक्ष का काम तो सवाल उठाना और बनाना है। सत्ता में तो आप हैं, सवालों का समाधान तो आपको ही करना है। फिर सवालों को एजेंडा क्यों कहा जा रहा है?
मैंने पहले ही कहा है कि मैं व्यक्तिगत रूप से आपको नहीं कह रहा हूं। मैं तो उन लोगों से कह रहा हूं जो कुछ ऐसे तत्व हैं जो राजनीति में हैं लेकिन विकास योजनाओं और कामों पर अड़ंगा लगाते हैं। मेरी नाराजगी तो उन लोगों से है। जनता मेरे कार्यकाल में किए गए कामों को बेहतर जानती है। वही सबसे बड़ी पावर है। मेरा संवाद जनता से हमेशा रहा है। विरोधी विरोध करेंगे, सवाल उठाएंगे लेकिन समाधान करने वाली सीट पर हम बैठे हैं तो हम समाधान करेंगे और विनोद चमोली समाधान करने का पूरा प्रयास कर रहा है।

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