संकट में सम्राट सरकार नीतीश के फिर से पाला बदलने की आहट
बिहार में सरकार बदले अभी कुछ ही महीने हुए हैं लेकिन नीतीश कुमार को लेकर फिर शुरू हुई सियासी अटकलों ने सत्ता के स्थायित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजद विधायक भाई वीरेंद्र का जदयू को एनडीए छोड़कर महागठबंधन में लौटने का खुला न्योता और उसके बाद तेजस्वी यादव का जदयू के भविष्य को लेकर बयान बताता है कि बिहार में सत्ता का गणित अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। सवाल यह नहीं है कि नीतीश कुमार फिर पलटेंगे या नहीं बल्कि यह है कि बिहार की राजनीति में सत्ता के गठबंधन आखिर इतने अस्थायी क्यों दिखाई देते हैं
बिहार की राजनीति में एक बार फिर वही पुराना सवाल लौट आया है कि क्या सत्ता का गठबंधन वास्तव में स्थिर है या सिर्फ परिस्थितियों के भरोसे चल रहा है? विधानसभा चुनाव के बाद जिस तरह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने भारी बहुमत के साथ सरकार बनाई और सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने, उससे लगा था कि बिहार में लम्बे समय से चली आ रही गठबंधन की उठापटक पर शायद विराम लग गया है लेकिन कुछ ही महीनों बाद राष्ट्रीय जनता दल के विधायक भाई वीरेंद्र ने जनता दल यूनाइटेड और नीतीश कुमार को भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन से अलग होकर महागठबंधन में लौटने और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सरकार बनाने का खुला प्रस्ताव दे दिया। इसके बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अखिलेश प्रसाद सिंह की ओर से भी नीतीश कुमार को महागठबंधन में आने का न्योता दिया गया।
यह प्रस्ताव अपने आप में सरकार बदलने की कोई ठोस प्रक्रिया नहीं है और न ही इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि नीतीश कुमार गठबंधन बदलने जा रहे हैं लेकिन बिहार की राजनीति को समझने के लिए यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण जरूर है क्योंकि सत्ता का मौजूदा समीकरण उस दल पर काफी हद तक टिका है जिसकी राजनीतिक यात्रा पिछले वर्षों में कई गठबंधन परिवर्तनों से गुजर चुकी है। 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 89 और जदयू को 85 सीटें मिली थीं। लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास की 19 सीटों को जोड़ दें तो राजग के पास 202 सीटें थीं जबकि बहुमत के लिए 122 सीटों की जरूरत थी। यानी संख्यात्मक रूप से सरकार के सामने तत्काल कोई संकट दिखाई नहीं देता।
फिर अस्थिरता की चर्चा क्यों?
इसका जवाब केवल विधानसभा की संख्या में नहीं बल्कि बिहार की गठबंधन राजनीति की प्रकृति में छिपा है। नीतीश कुमार पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय में भाजपा और राजद दोनों के साथ सत्ता में रह चुके हैं। 2013 में भाजपा से अलग होना, 2017 में राजद से अलग होकर भाजपा के साथ लौटना और फिर 2022 में भाजपा से सम्बंध तोड़कर राजद-कांग्रेस के साथ सरकार बनाना बिहार की राजनीति में गठबंधन परिवर्तन के बड़े उदाहरण रहे हैं। इसलिए जब भी भाजपा और जदयू के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद सामने आता है, राजनीतिक हलकों में पुराने घटनाक्रमों की याद स्वाभाविक रूप से लौट आती है।
इस बार विवाद का केंद्र समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से एनडीए शासित राज्यों में 2029 तक यूसीसी लागू करने की बात सामने आने के बाद जदयू ने इस मुद्दे पर तत्काल स्पष्ट समर्थन देने के बजाय प्रस्तावित प्रावधानों का अध्ययन करने की बात कही। जदयू के नेताओं की ओर से यह भी कहा गया कि संसद में यूसीसी के समर्थन और बिहार में उसके लागू होने के सवाल को अलग-अलग देखा जाना चाहिए।
यही वह बिंदु है जहां राजद ने राजनीतिक सम्भावना तलाशने की कोशिश की। भाई वीरेंद्र ने जदयू से कहा कि वह भाजपा से अलग हो और महागठबंधन के साथ सरकार बनाने में सहयोग करे। उनका तर्क जदयू की पुरानी समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति से जोड़ा गया लेकिन जदयू की तरफ से इस प्रस्ताव को कोई सार्वजनिक स्वीकार्यता नहीं मिली। इसके उलट जदयू अपने संगठन और विधायकों के साथ सामान्य राजनीतिक गतिविधियां जारी रखे हुए है।
राजद की इस पेशकश को इसलिए भी केवल सत्ता परिवर्तन की तत्काल योजना के रूप में देखना कठिन है क्योंकि विधानसभा का मौजूदा अंकगणित उसके पक्ष में नहीं है। राजद के पास 25 विधायक हैं जबकि कांग्रेस के पास छह और वाम दलों सहित दूसरे विपक्षी दलों की संख्या भी सरकार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरी तरफ जदयू के 85 विधायक हैं। इसलिए अगर कभी कोई नया सत्ता समीकरण बनता है तो उसकी पहली शर्त जदयू का मौजूदा गठबंधन से बाहर आना होगी। उसके बाद भी नए गठबंधन को बहुमत का ठोस गणित तैयार करना पड़ेगा।
यहीं बिहार की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। आज की तारीख में अस्थिरता सरकार गिरने की स्थिति से ज्यादा राजनीतिक सम्भावनाओं की अस्थिरता है। सरकार के पास भारी बहुमत है लेकिन राजनीतिक दलों के बीच भविष्य के रिश्तों को लेकर सवाल बने हुए हैं। राजद जदयू के लिए दरवाजा खुला रखना चाहता है। भाजपा के लिए जदयू सत्ता का महत्वपूर्ण सहयोगी है। जदयू के सामने अपनी राजनीतिक पहचान और सत्ता में अपनी भूमिका दोनों को बनाए रखने की चुनौती है। नीतीश कुमार के बाद जदयू का नेतृत्व किस दिशा में जाएगा, यह भी बिहार की राजनीति में एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
तेजस्वी यादव ने हाल में जदयू के भविष्य को लेकर भाजपा में उसके सम्भावित विलय की बात कही है। यह उनका राजनीतिक दावा है, कोई घोषित राजनीतिक निर्णय नहीं। दूसरी ओर जदयू के नेताओं ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम में दो अलग-अलग राजनीतिक संदेश दिखाई देते हैं। राजद जदयू के भीतर सम्भावित असहजता को राजनीतिक अवसर में बदलना चाहता है जबकि जदयू और भाजपा के सामने यह साबित करने की चुनौती है कि गठबंधन के भीतर मतभेदों के बावजूद सरकार स्थिर है।
बिहार की राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब किसी मुद्दे ने गठबंधन की मजबूती को लेकर सवाल खड़े किए हों। असल समस्या यह है कि राज्य की राजनीति में दलों की वैचारिक सीमाएं पिछले वर्षों में लगातार बदलती रही हैं। जो दल एक चुनाव में सहयोगी होते हैं, अगले चरण में प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं और फिर परिस्थितियां बदलने पर दोबारा साथ आ जाते हैं। इसका सबसे बड़ा असर मतदाता के सामने पैदा होने वाली राजनीतिक स्पष्टता पर पड़ता है। मतदाता किसी दल की नीतियों, कार्यक्रम और नेतृत्व के आधार पर अपना निर्णय करता है, लेकिन जब गठबंधन बार-बार बदलते हैं तो सरकार के गठन के बाद का राजनीतिक समीकरण चुनावी जनादेश से अलग दिखाई देने लगता है।
2025 के चुनाव ने हालांकि राजग को बहुत मजबूत संख्यात्मक आधार दिया था। भाजपा और जदयू दोनों ने बड़ी संख्या में सीटें जीतीं और दोनों दल मिलकर बहुमत से काफी आगे रहे। इसलिए मौजूदा परिस्थितियों में केवल राजद के प्रस्ताव के आधार पर सरकार के अस्थिर होने की बात कहना तथ्यों से आगे जाना होगा। लेकिन राजनीति केवल विधानसभा के आंकड़ों से नहीं चलती। दलों के बीच विश्वास, नेतृत्व की भूमिका, भविष्य की राजनीतिक दिशा और वैचारिक मुद्दे भी गठबंधन की स्थिरता तय करते हैं।
यूसीसी का विवाद इसी व्यापक तस्वीर का एक हिस्सा है। भाजपा इसे लम्बे समय से अपने प्रमुख राजनीतिक मुद्दों में रखती रही है जबकि जदयू का रुख इस विषय पर कई स्तरों पर अलग- अलग संदर्भों में सामने आता रहा है। राजद इसी अंतर को पकड़कर जदयू को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहा है लेकिन फिलहाल जदयू की ओर से महागठबंधन में लौटने की कोई घोषणा नहीं हुई है। इसलिए इस समय बिहार में सरकार बदलने की खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण खबर यह है कि सत्ता के दोनों सम्भावित खेमे जदयू की राजनीतिक दिशा पर नजर रख रहे हैं। शायद यही बिहार की राजनीति की सबसे बड़ी विडम्बना है। चुनाव में जनता ने 243 सदस्यीय विधानसभा के लिए स्पष्ट संख्या दी, राजग को 202 सीटें मिलीं और बहुमत का आंकड़ा बहुत पीछे छूट गया। फिर भी कुछ महीनों बाद राजनीति का केंद्रीय सवाल सरकार के कामकाज से ज्यादा गठबंधन के भविष्य पर आ गया है।
इसलिए बिहार में आज जो दिखाई दे रहा है, उसे तत्काल सत्ता परिवर्तन की घोषणा नहीं कहा जा सकता लेकिन इसे पूरी तरह सामान्य राजनीतिक गतिविधि मानकर नजरअंदाज करना भी मुश्किल है। राजद का निमंत्रण, कांग्रेस की प्रतिक्रिया, यूसीसी पर जदयू की सावधानी और तेजस्वी यादव के लगातार राजनीतिक बयान यह बताते हैं कि बिहार में सत्ता का अंकगणित भले ही फिलहाल स्थिर हो लेकिन सत्ता की राजनीति में सम्भावनाओं के दरवाजे बंद नहीं हुए हैं।
इसलिए बिहार में आज जो दिखाई दे रहा है, उसे तत्काल सत्ता परिवर्तन की घोषणा नहीं कहा जा सकता लेकिन इसे पूरी तरह सामान्य राजनीतिक गतिविधि मानकर नजरअंदाज करना भी मुश्किल है। राजद का निमंत्रण, कांग्रेस की प्रतिक्रिया, यूसीसी पर जदयू की सावधानी और तेजस्वी यादव के लगातार राजनीतिक बयान यह बताते हैं कि बिहार में सत्ता का अंकगणित भले ही फिलहाल स्थिर हो लेकिन सत्ता की राजनीति में सम्भावनाओं के दरवाजे बंद नहीं हुए हैं।
आखिरकार सवाल नीतीश कुमार के फिर पाला बदलने का नहीं बल्कि उस राजनीतिक व्यवस्था का है जिसमें सत्ता के गठबंधन बार-बार बदलते रहे हैं। बिहार को स्थिर सरकार चाहिए या स्थिर राजनीतिक गठबंधन, दोनों एक ही बात नहीं हैं। मौजूदा सरकार के पास संख्या बल है लेकिन आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भाजपा और जदयू अपने रिश्ते को किस राजनीतिक आधार पर आगे बढ़ाते हैं और जदयू अपनी अलग पहचान को किस तरह बनाए रखता है। राजद की पेशकश फिलहाल एक राजनीतिक प्रस्ताव है, उसे सत्ता परिवर्तन की वास्तविक सम्भावना में बदलने के लिए बहुत कुछ होना बाकी है। यही अंतर खबर और अटकल के बीच की सीमा भी तय करता है।
