फिर लौटेगा कैरेबियाई क्रिकेट का गौरव?

जीवन सिंह टनवाल

दुनिया में क्रिकेट की अर्थव्यवस्था तेजी से फैल रही है लेकिन कैरेबियाई क्रिकेट आर्थिक संकट में घिरा है। खिलाड़ियों की फीस में कटौती, घरेलू टूर्नामेंटों पर कैंची और बढ़ते कर्ज ने संकट गहरा दिया है। छोटे बाजार, महंगी यात्राओं और फ्रेंचाइजी लीग के दबाव के बीच वेस्टइंडीज के सामने वित्तीय पुनर्गठन के साथ खोया गौरव पाने की चुनौती भी है

वेस्टइंडीज क्रिकेट की पुरुष टीम इन दिनों भारत दौरे पर है। इस दौरान उसे तीन एकदिवसीय और पांच टी-20 मैचों की सीरीज खेलनी है। दौरे का आगाज 27 सितम्बर से हुआ। पहला वनडे जीतकर भारत ने 2-0 की बढ़त बना सीरीज अपने नाम कर ली है। इसी बीच क्रिकेट वेस्टइंडीज ने खिलाड़ियों के केंद्रीय अनुबंध की फीस में 25 फीसदी कटौती का फैसला लिया है। घरेलू खिलाड़ियों के सालभर के रिटेनर काॅन्ट्रैक्ट की अवधि घटाकर सात महीने कर दी गई है। इसके साथ ही पुरुषों के सुपर-50 और महिलाओं के टी-20 ब्लेज जैसे घरेलू टूर्नामेंट भी स्थगित कर दिए गए हैं।

बोर्ड के मुताबिक, मौजूदा ढांचा आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं रह गया है और वित्तीय स्थिरता के लिए खर्चों में कटौती जरूरी हो गई है। यह फैसला कैरेबियाई क्रिकेट की उन पुरानी समस्याओं को भी उजागर करता है, जिनमें छोटा बाजार, कई द्वीपों में फैला प्रशासनिक ढांचा, महंगी यात्रा, सीमित व्यावसायिक संसाधन और दुनिया भर में बढ़ती फ्रेंचाइजी टी-20 लीग का दबाव शामिल है। मुख्य कार्यकारी क्रिस डेहरिंग ने स्वीकार किया है कि बोर्ड वित्तीय, विकासात्मक और प्रतिस्पर्धात्मक स्तर पर कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। उनके मुताबिक यह फैसला आदर्श स्थिति नहीं है, लेकिन वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए जरूरी है।
ऐसे में सवाल उठ रहे हैं क्या खर्चों में कटौती के साथ बोर्ड ऐसा व्यावसायिक मॉडल तैयार कर पाएगा जो भविष्य में बाहरी वित्तीय सहायता पर उसकी निर्भरता कम कर सके? जब दूसरे देशों में क्रिकेट की अर्थव्यवस्था लगातार विस्तार कर रही है तब कैरेबियाई क्रिकेट आर्थिक संकट से क्यों जूझ रहा है? क्या यह वेस्टइंडीज क्रिकेट के अर्श से फर्श पर पहुंचने की कहानी है या पुनर्निर्माण की शुरुआत? क्या कैरेबियाई क्रिकेट अपना पुराना गौरव फिर हासिल कर पाएगा? ऐसे तमाम सवाल मीडिया और खेल जगत में चर्चा का विषय बने हुए हैं।
खिलाड़ियों पर दोहरी मार
वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड के फैसले अनुसार अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के 12 महीने के रिटेनर काॅन्ट्रैक्ट जारी रहेंगे लेकिन उनकी फीस में 25 फीसदी की कटौती होगी। दूसरी ओर घरेलू खिलाड़ियों के अनुबंध की अवधि 12 महीने से घटाकर सात महीने कर दी गई है। यानी घरेलू क्रिकेटरों के लिए असर केवल वेतन कम होने तक सीमित नहीं है बल्कि उनके रोजगार की अवधि भी घट गई है।
घरेलू क्रिकेट राष्ट्रीय टीम के लिए खिलाड़ियों की सबसे अहम सीढ़ी है। किसी युवा बल्लेबाज, तेज गेंदबाज या स्पिनर को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के लिए नियमित और प्रतिस्पर्धी क्रिकेट की जरूरत होती है। यदि घरेलू कैलेंडर छोटा होता है और अनुबंध सीमित अवधि के लिए मिलते हैं तो युवा खिलाड़ियों पर दूसरे विकल्प तलाशने का दबाव बढ़ सकता है। दुनिया भर में टी-20 लीग के विस्तार ने खिलाड़ियों के सामने कम समय में अधिक कमाई का रास्ता खोल दिया है। वेस्टइंडीज के क्रिकेटरों के लिए यह चुनौती पहले से मौजूद थी लेकिन केंद्रीय अनुबंध में कटौती के बाद बोर्ड के सामने खिलाड़ियों को राष्ट्रीय क्रिकेट से जोड़े रखने का सवाल और गम्भीर हो गया है।
यात्रा के बोझ ने बढ़ाया आर्थिक संकट
वेस्टइंडीज क्रिकेट की आर्थिक समस्या को समझने के लिए उसके भौगोलिक ढांचे को जानना जरूरी है। क्रिकेट वेस्टइंडीज कोई एक देश नहीं बल्कि कैरेबियन क्षेत्र के कई क्रिकेट खेलने वाले देशों और द्वीपों का साझा संगठन है। घरेलू प्रतियोगिताओं के लिए खिलाड़ियों और टीमों को एक द्वीप से दूसरे द्वीप जाना पड़ता है। हवाई यात्रा, होटल और अन्य लाॅजिस्टिक खर्च बोर्ड के संसाधनों पर लगातार दबाव डालते हैं। वेस्टइंडीज क्रिकेट के अनुसार पिछले 15 वर्षों में घरेलू एयरलाइंस पर करीब 670 करोड़ रुपए खर्च किए गए। बोर्ड का दावा है कि इस खर्च के बदले एयरलाइंस से उसे कोई प्रत्यक्ष प्रायोजन नहीं मिला। जब किसी प्रतियोगिता के आयोजन और टीमों की आवाजाही पर अत्यधिक खर्च हो रहा हो तो बोर्ड के सामने नए राजस्व स्रोत तलाशने या प्रतियोगिताओं का आकार घटाने का विकल्प बचता है। मौजूदा कटौती इसी चुनौती का परिणाम है। हालांकि घरेलू क्रिकेट को सीमित करके आर्थिक संकट का स्थायी समाधान निकाल पाना आसान नहीं होगा।
फ्रेंचाइजी लीग से बढ़ती चुनौती
कैरेबियाई क्रिकेट की सबसे बड़ी ताकत उसके खिलाड़ियों की टी-20 क्षमता रही है लेकिन यही ताकत अब बोर्ड के लिए चुनौती भी बन रही है। भारत की इंडियन प्रीमियर लीग सहित दुनिया की कई फ्रेंचाइजी लीग में वेस्टइंडीज के खिलाड़ियों की मांग है। ऐसे में उनके पास राष्ट्रीय अनुबंध के अलावा आकर्षक व्यावसायिक विकल्प मौजूद हैं।
निकोलस पूरन का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेकर फ्रेंचाइजी क्रिकेट पर ध्यान केंद्रित करना इस बदलते समीकरण का चर्चित उदाहरण है। 2026 टी-20 विश्व कप से पहले वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड ने उनसे वापसी के लिए सम्पर्क किया था लेकिन वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में लौटने को तैयार नहीं हुए। हर खिलाड़ी पूरन की तरह फैसला करेगा, यह जरूरी नहीं है। फिर भी आर्थिक अंतर बढ़ने पर राष्ट्रीय क्रिकेट के प्रति प्रतिबद्धता बनाए रखना बोर्ड के लिए कठिन हो सकता है। खासकर टेस्ट और वनडे क्रिकेट के लिए खिलाड़ियों की उपलब्धता सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है, जब फ्रेंचाइजी लीग अधिक आकर्षक दिखाई दें।
सुपर-50 का स्थगन बड़ा संकेत

पुरुषों के सुपर-50 टूर्नामेंट को स्थगित करना मौजूदा संकट का महत्वपूर्ण संकेत है। यह प्रतियोगिता वेस्टइंडीज के वनडे क्रिकेट के लिए प्रतिभाओं की पहचान और तैयारी का प्रमुख मंच रही है। इस फैसले का समय भी अहम है। वेस्टइंडीज को 2027 वनडे विश्व कप के लिए क्वालिफिकेशन की चुनौती का सामना करना है। 2023 विश्व कप में जगह बनाने में नाकाम रहने के बाद अगले विश्व कप में पहुंचना उसके लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में घरेलू 50 ओवर क्रिकेट को रोककर संसाधनों को राष्ट्रीय टीम की तैयारी में लगाना तत्काल जरूरत पूरी करने की कोशिश हो सकती है लेकिन इससे अल्पकालिक और दीर्घकालिक हितों के बीच टकराव भी पैदा होता है। राष्ट्रीय टीम को मजबूत बनाने के लिए मजबूत घरेलू ढांचा जरूरी है। यदि प्रतियोगिताएं लगातार कम होती गईं तो भविष्य में टीम की बेंच स्ट्रेंथ प्रभावित हो सकती है और आज की गई बचत का असर आने वाले वर्षों में प्रतिभा विकास पर पड़ सकता है।

महिला क्रिकेट भी दबाव में
महिला टी-20 ब्लेज को स्थगित करने का फैसला ऐसे समय आया है जब दुनिया भर में महिला क्रिकेट तेजी से व्यावसायिक रूप ले रहा है। घरेलू प्रतियोगिताएं महिला खिलाड़ियों को मैच अभ्यास देने, प्रतिभा
पहचानने और राष्ट्रीय टीम की अगली पीढ़ी तैयार करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। हालांकि वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड ने महिला क्रिकेट को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया है। महिला सुपर-50 की जगह विकास केंद्रित ‘बेस्ट वर्सेज बेस्ट’ प्रतियोगिता का प्रस्ताव रखा गया है। इसका उद्देश्य कम खर्च में प्रतिस्पर्धी क्रिकेट उपलब्ध कराना है। यह माॅडल तभी सफल हो सकता है जब खर्च कम करने के साथ खेल की गुणवत्ता और खिलाड़ियों के अवसरों में गिरावट न आए।
आईसीसी ने दिया सहारा, स्थायी समाधान नहीं
वित्तीय संकट के बीच वेस्टइंडीज क्रिकेट को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) से 16 मिलियन अमेरिकी डाॅलर यानी करीब 153 करोड़ रुपए की ऋण सुविधा मिली है। यह सहायता अनुदान नहीं बल्कि ऋण है। इसके लिए वेस्टइंडीज क्रिकेट को आईसीसी द्वारा तय ‘क्रिटिकल मेट्रिक्स’ पूरे करने होंगे और राशि निर्धारित शर्तों के आधार पर उपलब्ध होगी। इससे तत्काल नकदी संकट सम्भालने में मदद मिल सकती है लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। ऋण चुकाना होगा, इसलिए बोर्ड को खर्च घटाने के साथ राजस्व बढ़ाने के रास्ते भी तलाशने पड़ेंगे। केवल खिलाड़ियों की फीस कम करने और घरेलू टूर्नामेंट स्थगित करने से वित्तीय स्थिरता हासिल नहीं की जा सकती।
क्रिकेट की अर्थव्यवस्था में क्यों पीछे हुआ वेस्टइंडीज?
वैश्विक क्रिकेट की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। टी-20 लीग, प्रसारण अधिकार, डिजिटल प्लेटफाॅर्म और प्रायोजन ने क्रिकेट को बड़ा व्यावसायिक बाजार बनाया है। इसके बावजूद वेस्टइंडीज क्रिकेट आर्थिक संकट से जूझ रहा है। इसका एक कारण यह है कि क्रिकेट की वैश्विक कमाई समान रूप से वितरित नहीं होती। भारत, इंग्लैंड और आॅस्ट्रेलिया जैसे बड़े बाजारों की तुलना में कैरेबियन का बाजार छोटा है। इसके अलावा कई छोटे देशों और द्वीपों में फैला क्रिकेट प्रशासन अतिरिक्त यात्रा और लाॅजिस्टिक लागत लेकर आता है। वेस्टइंडीज की ताकत उसकी साझा क्रिकेट पहचान है लेकिन यही संरचना आर्थिक रूप से महंगी भी है। एक संयुक्त टीम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलती है जबकि घरेलू स्तर पर अलग-अलग द्वीपों के बीच संसाधनों और प्रतियोगिताओं का संचालन करना पड़ता है। सीमित बाजार और अधिक परिचालन लागत के कारण बोर्ड के लिए बड़े क्रिकेट बाजारों की तरह राजस्व जुटाना आसान नहीं है।
ओलम्पिक से नई राह
सुपर-50 और टी-20 ब्लेज के स्थान पर 2028 लाॅस एंजिल्स ओलम्पिक की क्वालिफिकेशन से जुड़े टूर्नामेंट आयोजित करने का फैसला वेस्टइंडीज की नई रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 2028 ओलम्पिक में पुरुष और महिला, दोनों वर्गों में क्रिकेट टी-20 प्रारूप में खेला जाएगा।
वेस्टइंडीज की स्थिति यहां विशिष्ट है। वह संयुक्त क्रिकेट सदस्य के रूप में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलता है लेकिन ओलम्पिक में राष्ट्रीय ओलम्पिक समितियों के माध्यम से भागीदारी होती है। इसलिए वेस्टइंडीज संयुक्त टीम के रूप में सीधे ओलम्पिक में नहीं उतर सकता। कैरेबियन क्षेत्र के अलग-अलग पात्र देश क्वालिफिकेशन प्रक्रिया में हिस्सा लेंगे। बोर्ड का प्रयास है कि ऐसे आयोजनों का वित्तीय बोझ केवल उसी पर न रहे। राष्ट्रीय क्रिकेट बोर्ड, ओलम्पिक संस्थाएं, सरकारें और निजी क्षेत्र भी इसमें भागीदार बनें। इससे सीमित संसाधनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर की गतिविधियां संचालित करने में मदद मिल सकती है।
कटौती से ज्यादा जरूरी पुनर्गठन
खेल विश्लेषकों का कहना है कि कभी विश्व क्रिकेट पर एकछत्र राज करने वाला वेस्टइंडीज क्रिकेट आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां मैदान पर प्रदर्शन से ज्यादा चिंता अपने क्रिकेट ढांचे को आर्थिक रूप से बचाए रखने की है। मौजूदा संकट को केवल पैसे की कमी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ खिलाड़ी विकास, घरेलू प्रतियोगिताओं की निरंतरता और प्रशासनिक ढांचे की समस्याएं भी जुड़ी हैं। जमैका आॅब्जर्वर ने छोटे संसाधन आधार, महंगी यात्रा और सुविधाओं की कमी को वेस्टइंडीज क्रिकेट के सामने मौजूद बड़ी चुनौतियों में माना है। हालांकि घरेलू 50 ओवर क्रिकेट को रोकने का फैसला चिंताजनक है क्योंकि टीम को अगले विश्व कप के लिए क्वालिफिकेशन की चुनौती का सामना करना है।
खिलाड़ियों और बोर्ड के बीच संवाद भी महत्वपूर्ण होगा। वेस्टइंडीज प्लेयर्स एसोसिएशन खिलाड़ियों का प्रतिनिधित्व करता है। मौजूदा परिस्थितियों में बोर्ड और एसोसिएशन के बीच सहयोग यह तय करने में अहम हो सकता है कि वित्तीय बोझ खिलाड़ियों पर कितना और किस तरह डाला जाए। वेस्टइंडीज के सामने असली चुनौती यह नहीं है कि 25 फीसदी वेतन कटौती से कितनी रकम बचेगी बल्कि यह है कि बचाई गई रकम का इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा। यदि खर्च घटाने के बाद बोर्ड नए राजस्व स्रोत नहीं तलाशता तो मौजूदा संकट कुछ समय बाद फिर लौट सकता है। इसके लिए प्रसारण अधिकार, डिजिटल कंटेंट, क्षेत्रीय प्रायोजन, स्टेडियमों का व्यावसायिक इस्तेमाल, घरेलू लीग में लागत-साझेदारी, पर्यटन उद्योग के साथ साझेदारी और कैरेबियन सरकारों की भागीदारी जैसे विकल्पों पर काम करना होगा। घरेलू क्रिकेट के लिए भी ऐसा माॅडल जरूरी है, जिसमें खर्च नियंत्रित रहे लेकिन खिलाड़ियों को पर्याप्त मैच और विकास के अवसर मिलते रहें। बहरहाल, वेस्टइंडीज क्रिकेट की मौजूदा स्थिति उसके गौरवशाली अतीत और कठिन वर्तमान के बीच का अंतर दिखाती है। जिस क्रिकेट ने कभी दुनिया को महान तेज गेंदबाज, आक्रामक बल्लेबाज और कई पीढ़ियों की प्रतिभाएं दीं, वही आज खिलाड़ियों के वेतन में कटौती, घरेलू प्रतियोगिताओं के स्थगन और आईसीसी से ऋण लेने की स्थिति में है। अब असली परीक्षा इस बात की है कि बोर्ड इस संकट को पुनर्गठन में कैसे बदलता है।

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