राज्यसभा जाएंगी स्मृति?
उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को होने वाले मतदान से पहले भाजपा के सम्भावित उम्मीदवारों को लेकर सियासी हलकों में कयासबाजी तेज हो गई है। मौजूदा विधानसभा गणित में भाजपा और उसके सहयोगी दल मजबूत स्थिति में हैं जबकि सपा के खाते में भी सीटें जाने का गणित बन रहा है। भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल पुराने चेहरों को दोहराने या नए चेहरों को मौका देने का है। ऐसे में पार्टी के सामने सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण साधने के साथ 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों को भी ध्यान में रखने की चुनौती है। चर्चा है कि कम से कम चार नए चेहरों को मौका दिया जा सकता है। इसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। संगठन में उन्हें हाल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने के बाद यूपी से राज्यसभा भेजे जाने की अटकलों ने जोर पकड़ा है। यदि ऐसा होता है तो भाजपा उन्हें संसद के उच्च सदन में लाकर राष्ट्रीय राजनीति में फिर सक्रिय भूमिका दे सकती है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि राज्यसभा चुनाव इस बार सिर्फ उच्च सदन की सीटों का गणित नहीं होगा। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले यह भाजपा के सामाजिक समीकरण, संगठन और सहयोगी दलों के साथ तालमेल का भी संकेत है। सपा भी अपनी सीटों को बरकरार रखने की रणनीति पर काम करेगी जबकि बसपा के सामने राज्यसभा में अपना प्रतिनिधित्व बचाए रखने की चुनौती है। मौजूदा गणित में उसके लिए सीट हासिल करना कठिन है। ऐसे में असली सस्पेंस भाजपा की नामांकन सूची को लेकर है कि क्या पार्टी पुराने चेहरों पर भरोसा जताएगी या 2027 की चुनावी बिसात को ध्यान में रखते हुए स्मृति ईरानी समेत नए चेहरों के जरिए बड़ा संदेश देगी।
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के साथ सपा-कांग्रेस गठबंधन के सीट बंटवारे को लेकर सियासी हलचल बढ़ गई है। दोनों दल चुनाव साथ लड़ने की बात कह चुके हैं लेकिन सीटों का फाॅर्मूला अभी तय नहीं हुआ है। कांग्रेस जहां कम से कम 150 सीटों पर दावा जता रही है वहीं सपा सीटों के बंटवारे को जीत की सम्भावना और अपने संगठनात्मक आधार से जोड़ रही है। कांग्रेस की ओर से अक्टूबर मध्य तक सीट बंटवारे को स्पष्ट करने की बात कही गई है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अक्टूबर मध्य तक दोनों दलों के बीच
औपचारिक बातचीत शुरू हो सकती है और शीर्ष नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। हालांकि अभी तक दोनों दलों के बीच सीटों को लेकर कोई औपचारिक बैठक या समन्वय समिति गठित नहीं हुई है। सभी की नजरें अब अक्टूबर महीने पर हैं। सवाल यह है कि क्या दोनों दल शुरुआती दावों से पीछे हटकर जीत की सम्भावना वाली सीटों के आधार पर कोई व्यावहारिक फाॅर्मूला तैयार कर पाएंगे या सीटों की संख्या और पसंदीदा क्षेत्रों को लेकर बातचीत लम्बी खिंचेगी? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असली पेंच सीटों की संख्या से ज्यादा सीटों की गुणवत्ता और दोनों दलों के प्रभाव वाले क्षेत्रों को लेकर है। कांग्रेस 2024 लोकसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन और कुछ परम्परागत प्रभाव वाले क्षेत्रों को आधार बनाकर अधिक सीटें चाहती है जबकि सपा का जोर उन सीटों पर है जहां उसका संगठन और सामाजिक समीकरण गठबंधन को मजबूती दे सकते हैं। दोनों दलों की ओर से सभी 403 सीटों का अलग-अलग आकलन किया जा रहा है। 2024 में दोनों दलों के बीच बना चुनावी तालमेल 2027 के लिए आधार जरूर है लेकिन विधानसभा चुनाव का समीकरण अलग होगा। सपा का पीडीए अभियान और कांग्रेस की संगठनात्मक सक्रियता बताती है कि दोनों दल अपने-अपने आधार को मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में सीटों के बंटवारे पर दबाव की राजनीति भी बातचीत का हिस्सा बन सकती है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि गठबंधन की घोषणा से ज्यादा मुश्किल उसके लिए स्वीकार्य सीट बंटवारा तय करना है।
महाराष्ट्र की राजनीति में ठाकरे परिवार की दो धाराएं उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे 4 अक्टूबर को होने वाले मुम्बई में चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ संयुक्त मार्च में एक बार फिर करीब दिख रही हैं। लम्बे राजनीतिक अंतराल के बाद दोनों का एक मंच पर आना महाराष्ट्र की सियासत में नए समीकरणों की चर्चाओं को हवा दे रहा है। उद्धव और राज की राजनीतिक राहें वर्षों पहले अलग हो गई थीं लेकिन हाल के महीनों में दोनों के बीच बढ़ती नजदीकी ने राजनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है। मराठी अस्मिता के मुद्दे पर दोनों दलों का साथ आना और अब एसआईआर के खिलाफ संयुक्त मोर्चा इस बात का संकेत जरूर है कि दोनों के बीच संवाद और समन्वय की गुंजाइश बढ़ी है। सियासी गलियों में सवाल उठ रहे हैं कि संयुक्त मार्च ठाकरे बंधुओं की नजदीकी केवल मुद्दा आधारित है या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक समझ भी आकार ले रही है? ये नजदीकी एसआईआर विरोध तक सीमित रहेगी या महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव-राज किसी नए अध्याय की शुरुआत करेंगे? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एसआईआर फिलहाल दोनों ठाकरे गुटों के लिए साझा राजनीतिक मुद्दा है। इसके जरिए दोनों दल एक-दूसरे के करीब आने की राजनीतिक जमीन तैयार कर सकते हैं लेकिन असली तस्वीर तभी साफ होगी जब साझा मुद्दों से आगे बढ़कर सीटों, नेतृत्व और संगठनात्मक तालमेल जैसे सवाल सामने आएंगे। राज ठाकरे के लिए यह महाराष्ट्र में मनसे के प्रभाव को मजबूत करने का अवसर है जबकि उद्धव ठाकरे के लिए बिखरे मराठी राजनीतिक आधार को एकजुट करने की सम्भावनाओं से जुड़ा कदम है। बहरहाल दोनों दलों ने किसी औपचारिक चुनावी गठबंधन की घोषणा नहीं की है इसलिए आगे की दिशा पर सभी की नजर रहेगी।
