दिल्ली की सत्ता में यह बेचैनी क्यों?
अपूर्व
अंग्रेजी दैनिक ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ में गत् दिनों चुनाव आयोग से सम्बंधित एक समाचार क्या प्रकाशित हुआ कि पूरा सत्ता तंत्र भारी तनाव में आ गया। एक अंग्रेजी कहावत है “There is more to this than meets the eye”, यानी मामला ऊपर से जितना दिखाई दे रहा है, उसके पीछे उससे कहीं ज्यादा कुछ हो सकता है। यही सवाल आज दिल्ली के सत्ता गलियारों में घूम रहा है। अगर मामला सिर्फ एक अखबार की रिपोर्ट का है तो इतनी बेचैनी क्यों? और अगर रिपोर्ट ने केवल उन सवालों को सामने रखा है जो पहले से इस संस्था के भीतर मौजूद थे तो फिर उन सवालों के जवाब सार्वजनिक रूप से देने में परेशानी क्या है? लोकतंत्र में संस्थाओं की ताकत केवल उनके अधिकारों से नहीं, उनकी पारदर्शिता और विश्वसनीयता से भी तय होती है।
चुनाव आयोग को लेकर हाल के घटनाक्रम ने इसी वजह से राजनीतिक तापमान बढ़ाया है। आयोग के भीतर फैसलों को लेकर मतभेद, लिखित आपत्तियों और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े सवालों की खबरें सामने आने के बाद विपक्ष ने इसे गम्भीर मुद्दा बना डाला है। बैकफुट में आए आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि उसके महत्वपूर्ण फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। दोनों पक्षों के दावों के बीच सबसे जरूरी सवाल यही है कि आखिर वास्तविक दस्तावेज क्या कहते हैं और निर्णय प्रक्रिया वास्तव में किस तरह चली? यह सवाल किसी राजनीतिक दल का नहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखने वाले हर नागरिक का है क्योंकि चुनाव आयोग कोई सामान्य सरकारी विभाग नहीं है। चुनाव आयोग वह संस्था है जिसके हाथ में देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता का एक बड़ा हिस्सा है। मतदाता सूची से लेकर चुनाव कार्यक्रम और चुनावी प्रक्रिया तक उसके फैसलों का सीधा असर करोड़ों मतदाताओं पर पड़ता है। इसलिए जब आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठते हैं तो उनका जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, तथ्यों और दस्तावेजों से दिया जाना चाहिए। यदि सब कुछ पूरी तरह सामान्य है तो सवाल पूछने वालों को दस्तावेजों के साथ जवाब देना चाहिए और यदि कहीं कोई प्रक्रिया सम्बंधी समस्या रही है तो उसे भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
यहीं से दिल्ली की मौजूदा बेचैनी को समझने की कोशिश की जा सकती है। पिछले कुछ समय में सत्ता को एक साथ कई मोर्चों पर राजनीतिक सवालों का सामना करना पड़ा है। कभी चुनावी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष आक्रामक हुआ, कभी नई पीढ़ी के आंदोलनों ने सरकार को असहज किया, कभी संस्थाओं की भूमिका पर बहस हुई और कभी सरकार के अपने नेताओं के व्यवहार ने राजनीतिक विवाद खड़े किए। इन सभी घटनाओं को एक ही सूत्र में बांध देखें तो स्पष्ट नजर आता है कि प्रधानमंत्री मोदी का जादू अब ढलान पर है और इस नए खुलासे के बाद भाजपा भारी दबाव में आ चुकी है।
कुछ समय पहले जेन-जी को लेकर जिस तरह की राजनीतिक बहस हुई, उसने भी एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखी है। युवा पीढ़ी को लेकर यह मान लिया जाता है कि वह केवल सोशल मीडिया, मनोरंजन और तात्कालिक मुद्दों में दिलचस्पी रखती है लेकिन जब वही युवा सड़क पर उतरता है, सवाल करता है और सत्ता को अपनी बात सुनने के लिए मजबूर करता है तो राजनीतिक व्यवस्था को उसकी भाषा समझनी पड़ती है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि वही युवा धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों की ओर आकर्षित हो सकता है। यानी नई पीढ़ी को किसी एक राजनीतिक या वैचारिक खांचे में रखकर समझना शायद सम्भव नहीं है।
साहित्यकार क्षमा शर्मा ने फिल्म ‘हनुमान अंश’ को लेकर अपनी फेसबुक टिप्पणी में इसी बदलते सामाजिक मनोविज्ञान पर सवाल उठाया है। उन्होंने फिल्म में चमत्कारों की प्रधानता और उसके प्रति दर्शकों की प्रतिक्रिया को रेखांकित करते हुए सवाल किया कि क्या हमारा समाज धीरे-धीरे मेहनत, तर्क और संस्थागत व्यवस्था की जगह चमत्कारों पर ज्यादा भरोसा करने लगा है? उनकी टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्होंने थिएटर में बड़ी संख्या में मौजूद जेन-जी के युवाओं को भी इस पूरे अनुभव का हिस्सा देखा। इस टिप्पणी से सहमत होना जरूरी नहीं है लेकिन इससे एक बड़ा सामाजिक सवाल जरूर निकलता है, आखिर आज की युवा पीढ़ी किस तरह की कहानी, किस तरह के नायक और किस तरह की उम्मीदों की तलाश में है?
शायद यही वह बिंदु है जहां राजनीति और समाज एक-दूसरे से जुड़ते हैं। एक युवा सरकार से जवाब भी मांग सकता है और किसी धार्मिक कथा से भावनात्मक रूप से जुड़ भी सकता है। वह विज्ञान और तकनीक का उपयोग करते हुए आध्यात्मिकता में विश्वास कर सकता है। वह सत्ता की आलोचना कर सकता है और परम्परा के प्रति सम्मान भी रख सकता है। इसलिए जेन-जी को किसी एक राजनीतिक पहचान में बांधना उतना ही मुश्किल है जितना यह मान लेना कि उसकी प्राथमिकताएं केवल रोजगार, शिक्षा या मनोरंजन तक सीमित हैं।
दिल्ली की सत्ता के सामने शायद आज सबसे बड़ी चुनौती यही बदलता हुआ सामाजिक मनोविज्ञान है। सत्ता लम्बे समय तक एक ही राजनीतिक कथा के सहारे चल सकती है लेकिन समाज हमेशा एक ही जगह खड़ा नहीं रहता। लोगों के सवाल बदलते हैं, प्राथमिकताएं बदलती हैं और सत्ता को लेकर उनकी अपेक्षाएं भी बदलती हैं। जिस दौर में राजनीतिक संचार का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों से हो रहा है, वहां किसी खबर को दबा देना या किसी सवाल को नजरअंदाज कर देना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन है।
दिल्ली की सत्ता के सामने शायद आज सबसे बड़ी चुनौती यही बदलता हुआ सामाजिक मनोविज्ञान है। सत्ता लम्बे समय तक एक ही राजनीतिक कथा के सहारे चल सकती है लेकिन समाज हमेशा एक ही जगह खड़ा नहीं रहता। लोगों के सवाल बदलते हैं, प्राथमिकताएं बदलती हैं और सत्ता को लेकर उनकी अपेक्षाएं भी बदलती हैं। जिस दौर में राजनीतिक संचार का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों से हो रहा है, वहां किसी खबर को दबा देना या किसी सवाल को नजरअंदाज कर देना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन है।
इसी बीच दिल्ली सरकार के मंत्री प्रवेश वर्मा से जुड़ा विवाद भी सामने आया है। सड़क निरीक्षण के दौरान एक युवक को थप्पड़ मारते प्रवेश वर्मा का वायरल वीडियो सत्तारूढ़ दल भीतर पसर रही बेचैनी का प्रतीक मुझे समझ आता है। घटना की अपनी-अपनी व्याख्या दोनों पक्षों की ओर से की गई लेकिन राजनीति में तस्वीरों का अपना असर होता है। जनता के सामने सत्ता के प्रतिनिधि का व्यवहार भी सत्ता की छवि का हिस्सा बन जाता है। जब राजनीतिक माहौल पहले से तनावपूर्ण हो तो ऐसी घटनाएं सामान्य प्रशासनिक विवाद से कहीं बड़ी राजनीतिक कहानी बन जाती हैं।
यहां एक और बात महत्वपूर्ण है। मजबूत सत्ता के सामने विपक्ष हमेशा कमजोर नहीं रहता। कभी-कभी विपक्ष की ताकत उसके पास मौजूद सीटों से कम और सत्ता के खिलाफ पैदा हो रहे सवालों से ज्यादा तय होती है। यदि अलग-अलग मुद्दे एक-दूसरे से जुड़कर जनता के बीच एक बड़ा नैरेटिव बनाने लगें तो राजनीतिक वातावरण बदल सकता है लेकिन यह कहना कि कोई बड़ा राजनीतिक परिवर्तन निश्चित रूप से आने वाला है, अभी जल्दबाजी होगी। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि सत्ता के आसपास सवालों की संख्या बढ़ी है और विपक्ष उन सवालों को एक बड़े राजनीतिक मुद्दे में बदलने की कोशिश कर रहा है।
सबसे दिलचस्प सवाल यही है कि क्या भाजपा नेतृत्व की वह राजनीतिक चमक जो पिछले एक दशक से भारतीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली तस्वीरों में रही है, अब किसी दबाव का सामना कर रही है? इसका जवाब केवल चुनावी नतीजे नहीं होते। सत्ता की वास्तविक ताकत का आकलन इस बात से भी होता है कि वह असहमति को किस तरह सम्भालती है, संस्थाओं के सवालों का जवाब किस तरह देती है और अपने नेताओं के आचरण को लेकर कितनी संवेदनशील रहती है।
दिल्ली के सत्ता गलियारों में इसलिए आज सिर्फ यह चर्चा नहीं है कि कौन किसके साथ है। चर्चा यह भी है कि सत्ता के भीतर फैसले किस तरह हो रहे हैं, संस्थाओं के भीतर संवाद कैसा है, विपक्ष किन मुद्दों को पकड़ रहा है और जनता किस तरह की राजनीति चाहती है। इन सवालों के बीच सोशल मीडिया अपनी अलग कहानियां गढ़ रहा है और हर कहानी के साथ नई कांस्पीरेसी थ्योरी पैदा हो रही है। इनमें से अधिकांश का कोई प्रमाण नहीं है लेकिन उनका पैदा होना अपने आप में राजनीतिक माहौल का संकेत जरूर है।
आखिर कोई भी सत्ता केवल विपक्ष के कारण असहज नहीं होती। सत्ता तब असहज दिखाई देने लगती है जब उसे लगातार अपने फैसलों, अपनी संस्थाओं और अपने राजनीतिक नैरेटिव को समझाना पड़ने लगे। यह स्थिति स्थायी संकट है या कुछ समय की राजनीतिक हलचल, यह अभी कहना मुश्किल है लेकिन दिल्ली की हवा में बेचैनी जरूर है। सवाल पहले से ज्यादा हैं, विपक्ष पहले से ज्यादा आक्रामक दिखाई दे रहा है और सत्ता को पहले से ज्यादा सफाई देनी पड़ रही है।
शायद इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि लोकतंत्र में सवालों से घबराने के बजाय उनका जवाब देना ही सत्ता की असली ताकत का प्रमाण होता है। अगर सवाल गलत हैं तो तथ्यों के साथ उन्हें गलत साबित किया जा सकता है। अगर आरोप निराधार हैं तो दस्तावेज सामने रखे जा सकते हैं लेकिन अगर सवाल लगातार बढ़ते जाएं और उनके जवाब राजनीतिक बयानबाजी में खो जाएं तो फिर लोगों के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।
दिल्ली में इस समय जो दिखाई दे रहा है, वह सत्ता का अंत नहीं है और न ही किसी राजनीतिक बदलाव की निश्चित घोषणा लेकिन यह जरूर एक ऐसा समय है जब सत्ता के गलियारों में होने वाली हलचल को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। असली कहानी क्या है, यह आने वाले दिनों में सामने आएगी। फिलहाल सवाल सिर्फ इतना है कि दिल्ली की सत्ता इतनी बेचैन क्यों है? मेरी अपनी समझ कहती है कि 2014 में भारी जन अपेक्षाओं के साथ देश की सत्ता में काबिज हुए नरेंद्र मोदी की चमक अब फीकी पड़ने लगी है और ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके द्वारा किए गए अधिकांश वायदे धरातल पर नहीं उतर पाए। जनता भीतर निराशा का भाव तेजी से बढ़ने लगा है और इसे मोदी भी भांप चुके हैं। इसलिए दिल्ली दरबार में इन दिनों चैतरफा बेचैनी का माहौल है। मेरी समझ यह भी इशारा कर रही है कि आने वाले कुछ महीने निश्चित तौर पर केंद्र सरकार और भाजपा के लिए भारी तनाव लेकर आएंगे ही आएंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि बीते 12 बरसों के लेखा-जोखा मोदी सरकार की हर उस कमजोर को सामने लाएगा जिससे यह प्रमाणित होगा कि जो वायदे किए गए थे, सुखों के जाो ख्वाब दिखाए गए थे, वे बस ख्वाब बनकर ही रह गए हैं और अब जनता उनका हिसाब मांगने के लिए बेचैन हो चली है।
