दि संडे पोस्ट डेस्क
अमेरिका और चीन ने व्यापार युद्ध को तत्काल बढ़ने से रोकने के लिए शुल्क संघर्ष पर विराम जनवरी 2027 तक बढ़ा दिया है। करीब 30 अरब डाॅलर के सामान पर पारस्परिक शुल्क कटौती, कृषि व्यापार बढ़ाने और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर संवाद शुरू करने की सहमति बनी है लेकिन तकनीक, दुर्लभ खनिज, ताइवान और वैश्विक प्रभाव को लेकर दोनों देशों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा अभी खत्म नहीं हुई है
अमेरिका और चीन के बीच लम्बे समय से चल रहे व्यापार और तकनीकी संघर्ष में फिलहाल एक और विराम आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और चीनी राष्ट्रपति शी जिनजिंग की पिछले सप्ताह वाशिंगटन में हुई मुलाकात के बाद दोनों देशों ने व्यापार युद्धविराम को 10 जनवरी 2027 तक बढ़ाने पर सहमति बनाई है। दोनों पक्षों ने करीब 30 अरब डाॅलर के सामान पर पारस्परिक शुल्क कम करने की दिशा में आगे बढ़ने, कृषि व्यापार के लिए अलग कार्य समूह बनाने और आर्थिक मामलों पर नियमित बातचीत जारी रखने का फैसला लिया है। इसके साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े जोखिमों और आपात स्थितियों पर संवाद के लिए भी एक अलग संपर्क व्यवस्था बनाने पर सहमति बनी है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है कि युद्धविराम का विस्तार दोनों देशों को आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर आगे बातचीत के लिए अपेक्षाकृत स्थिर और अनुमान लगाने योग्य वातावरण देगा।
ट्रम्प और शी की मुलाकात को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच पिछले कुछ वर्षों में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ी है। अमेरिका ने चीनी वस्तुओं पर भारी शुल्क लगाए तो चीन ने भी अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी शुल्क लगाए। इसके साथ ही सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, दुर्लभ खनिज और अत्याधुनिक तकनीक को लेकर दोनों देशों के बीच प्रतिबंधों और नियंत्रण का दौर शुरू हुआ। अब दोनों देश व्यापार युद्ध को तत्काल और ज्यादा बढ़ाने से बच रहे हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गई है। इस समय दोनों पक्षों ने मूल विवादों को हल करने के बजाय बातचीत के लिए समय और गुंजाइश पैदा की है।
नई व्यवस्था के तहत करीब 30 अरब डॉलर के उत्पादों पर शुल्क में कटौती की दिशा में बातचीत होगी। इसमें दोनों देशों से होने वाले ऐसे व्यापार को शामिल किया गया है जिसे फिलहाल अपेक्षाकृत कम संवेदनशील माना जा रहा है। इसके साथ कृषि व्यापार पर भी नया कार्य समूह बनाया जाएगा, जिसकी पहली बैठक इस साल के अंत से पहले होने की सम्भावना है। अमेरिका चीन से अपने कृषि उत्पादों के लिए अधिक बाजार पहुंच चाहता है जबकि चीन भी अमेरिकी बाजार में अपनी वस्तुओं के लिए बेहतर परिस्थितियां चाहता है। दोनों देशों के बीच कोयले के व्यापार को लेकर भी समझ बनी है, जिसके तहत चीन 2027 और 2028 में अमेरिका से कोयला आयात करेगा।
इस समझौते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ा है। अमेरिका और चीन दोनों जानते हैं कि आने वाले वर्षों में एआई केवल तकनीकी उद्योग का विषय नहीं रहेगा बल्कि अर्थव्यवस्था, रक्षा, वित्त, संचार और राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगा। दोनों देशों ने एआई से जुड़ी घटनाओं के लिए एक सम्पर्क माध्यम बनाने और नवम्बर के अंत तक आगे की बातचीत करने पर सहमति जताई है। हालांकि दोनों देशों के बीच एआई तकनीक को लेकर प्रतिस्पर्धा बनी हुई है। अमेरिका अत्याधुनिक चिप और तकनीक पर चीन की पहुंच सीमित करना चाहता है जबकि चीन अपनी घरेलू तकनीकी क्षमता को तेजी से बढ़ा रहा है।
दुर्लभ खनिज भी अमेरिका-चीन सम्बंधों में बड़ा मुद्दा बने हुए हैं। आधुनिक इलेक्ट्राॅनिक्स, बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा उपकरण और कई अत्याधुनिक तकनीकों के लिए दुर्लभ खनिज महत्वपूर्ण हैं। चीन इनके खनन और विशेष रूप से प्रसंस्करण में दुनिया के प्रमुख देशों में है। व्यापार तनाव के दौरान इन खनिजों का इस्तेमाल दोनों देशों की रणनीतिक सौदेबाजी में दिखाई दिया है। अमेरिका चीन पर अपनी तकनीकी निर्भरता कम करना चाहता है जबकि चीन इन खनिजों और अपने विशाल विनिर्माण आधार को अपनी आर्थिक शक्ति के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। इसलिए व्यापार युद्धविराम के बावजूद दुर्लभ खनिजों और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला की प्रतिस्पर्धा जारी रहने की सम्भावना है।
अमेरिका और चीन के बीच तनाव का एक दूसरा आयाम
ताइवान है। ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन के रणनीतिक हित एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। चीन ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है जबकि अमेरिका ताइवान की सुरक्षा को लेकर लम्बे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। व्यापार वार्ता के दौरान ताइवान का मुद्दा सीधे शुल्क और व्यापार समझौते का हिस्सा न हो लेकिन दोनों देशों के व्यापक सम्बंधों में यह सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक बना हुआ है। यही कारण है कि आर्थिक सम्बंधों में सुधार के बावजूद दोनों देशों के बीच सामरिक अविश्वास बना हुआ है।
अमेरिका-चीन व्यापार सम्बंधों का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है क्योंकि दोनों देश वैश्विक उत्पादन और उपभोग के सबसे बड़े केंद्रों में शामिल हैं। जब दोनों देशों के बीच शुल्क बढ़ते हैं तो कम्पनियों की लागत बढ़ती है, आपूर्ति श्ृंखलाएं प्रभावित होती हैं और दुनिया के दूसरे देशों में भी वस्तुओं की कीमतों पर असर पड़ सकता है। इसके विपरीत यदि व्यापारिक तनाव कम होता है तो कम्पनियों को अपने निवेश और उत्पादन की योजना बनाने में कुछ राहत मिलती है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने भी कहा है कि युद्धविराम का विस्तार कम्पनियों के लिए अधिक स्थिर वातावरण तैयार करेगा।
भारत के लिए अमेरिका-चीन सम्बंधों में यह बदलाव कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी और पश्चिमी कम्पनियों ने चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए दूसरे देशों में उत्पादन बढ़ाने की रणनीति अपनाई है। भारत को इसका लाभ इलेक्ट्राॅनिक्स, मोबाइल फोन, विनिर्माण और आपूर्ति श्ृंखला के क्षेत्रों में मिला है लेकिन यदि अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक सम्बंध स्थिर होते हैं तो वैश्विक कम्पनियों के लिए चीन से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखलाओं को बनाए रखना फिर अधिक आकर्षक हो सकता है। दूसरी तरफ लम्बे समय तक चलने वाली अमेरिका- चीन प्रतिस्पर्धा भारत के लिए वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र के रूप में अपनी भूमिका बढ़ाने का अवसर भी देती है।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका और चीन के सम्बंधों में आने वाला कोई भी बदलाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर तकनीक, निवेश, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, दुर्लभ खनिज, सेमीकंडक्टर और एशिया-प्रशांत की सामरिक राजनीति पर भी पड़ेगा। भारत अमेरिका, जापान और आॅस्ट्रेलिया के साथ क्वाड जैसे मंचों में सक्रिय है, वहीं चीन के साथ उसका अपना बड़ा व्यापारिक सम्बंध भी है। इसलिए नई दिल्ली के लिए अमेरिका और चीन दोनों के साथ अपने आर्थिक और सामरिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण रहेगा।
फिलहाल ट्रम्प-शी मुलाकात से दोनों देशों ने टकराव को आगे बढ़ाने के बजाय बातचीत को जारी रखने का रास्ता चुना है लेकिन जनवरी 2027 तक का विस्तार यह भी बताता है कि स्थायी व्यापार समझौता अभी दूर है। शुल्क, तकनीकी प्रतिबंध, दुर्लभ खनिज, कृषि व्यापार और एआई जैसे मुद्दों पर आने वाले महीनों में बातचीत जारी रहेगी। यदि दोनों पक्ष इन मुद्दों पर व्यापक सहमति बना पाते हैं तो वैश्विक व्यापार को राहत मिल सकती है लेकिन यदि किसी मुद्दे पर फिर टकराव बढ़ा तो शुल्क युद्ध दोबारा तेज हो सकता है। इसलिए फिलहाल अमेरिका और चीन के बीच जो दिखाई दे रहा है वह स्थायी शांति से ज्यादा एक ऐसा विराम है जिसमें दोनों महाशक्तियां अगली बातचीत और अगली रणनीति के लिए समय हासिल कर रही हैं।