युद्ध की कीमत चुका रही दुनिया

दि संडे पोस्ट डेस्क

 

ईरान ने सात दिन के युद्धविराम, हाॅर्मुज जलडमरूमध्य खोलने और परमाणु वार्ता शुरू करने का प्रस्ताव दिया लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे ठुकरा दिया। इसके बाद तेल की कीमतों में फिर तेजी आई है। हाॅर्मुज में जारी संकट अब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध तक सीमित नहीं है बल्कि दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार, महंगाई और भारत की अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ रहा है

पश्चिम एशिया में करीब सात महीने से जारी अमेरिका-ईरान युद्ध को खत्म करने की कूटनीतिक कोशिश एक बार फिर मुश्किल में पड़ गई है। ईरान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान अमेरिका के सामने सात दिन की ऐसी योजना रखी थी, जिसके तहत लड़ाई रोकने, अमेरिकी सैन्य दबाव और नाकाबंदी में राहत देने तथा सातवें दिन हाॅर्मुज जलडमरूमध्य को फिर खोलने का प्रस्ताव था। इसके बाद दोनों देशों के बीच ईरान के परमाणु कार्यक्रम सहित व्यापक मुद्दों पर बातचीत शुरू होनी थी। ईरान की ओर से यह संकेत दिया गया कि वह युद्ध को आगे बढ़ाने के बजाय कूटनीतिक समाधान का रास्ता खोलना चाहता है लेकिन अमेरिका ने फिलहाल इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है।

ईरान की योजना के तहत अमेरिका को ईरानी तेल पर प्रतिबंधों में राहत, करीब 12 अरब डाॅलर की जमी हुई ईरानी सम्पत्तियों को जारी करने और नौसैनिक नाकाबंदी हटाने जैसे कदम उठाने थे। इसके बदले ईरान सातवें दिन हाॅर्मुज खोलने और परमाणु मुद्दे पर व्यापक वार्ता शुरू करने को तैयार था लेकिन ट्रम्प ने इस सात दिन की योजना को खारिज कर दिया। हालांकि इसके बावजूद बातचीत की सम्भावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और आने वाले दिनों में दोनों पक्षों के बीच संपर्क की गुंजाइश बनी हुई है।

इस पूरे संकट का केंद्र हाॅर्मुज जलडमरूमध्य है। ईरान और ओमान के बीच स्थित यह संकरा समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। पश्चिम एशिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों से निकलने वाले कच्चे तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से दुनिया के
बाजारों तक पहुंचता है। इसलिए हाॅर्मुज में किसी भी लम्बे व्यवधान का असर सिर्फ पश्चिम एशिया पर नहीं बल्कि पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार पर पड़ता है।

ट्रम्प द्वारा ईरानी प्रस्ताव ठुकराए जाने के बाद तेल बाजार में चिंता बढ़ गई। बीते 28 सितम्बर को ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत करीब 106 डाॅलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई भी ऊंचे स्तर पर कारोबार करता रहा। बाजार की मुख्य चिंता यह है कि यदि बातचीत विफल होती है और हाॅर्मुज से तेल की आवाजाही फिर गम्भीर रूप से प्रभावित होती है तो वैश्विक आपूर्ति संकट और गहरा सकता है। पहले से युद्ध और आपूर्ति सम्बंधी अनिश्चितताओं से जूझ रहे बाजार के लिए यह एक बड़ा जोखिम है। हाॅर्मुज का संकट केवल तेल तक सीमित नहीं है। समुद्री मार्ग में अस्थिरता बढ़ने से जहाजों के बीमा और परिवहन की लागत बढ़ती है। यमन में हूती गतिविधियों के कारण बाब-अल-मंदेब जैसे दूसरे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को लेकर भी चिंता बनी हुई है। ऐसे में पश्चिम एशिया का संघर्ष यदि और फैलता है तो ऊर्जा के साथ-साथ वैश्विक व्यापार की लागत भी बढ़ सकती है। फ्रांस ने हाॅर्मुज में वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही सुरक्षित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव की दिशा में काम शुरू किया है।

भारत के लिए यह संकट विशेष चिंता का विषय है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। पश्चिम एशिया भारत के प्रमुख ऊर्जा स्रोतों में है और हाॅर्मुज के रास्ते से आने वाली ऊर्जा आपूर्ति में किसी भी बड़े व्यवधान का असर भारतीय आयात बिल पर पड़ सकता है। महंगा कच्चा तेल भारत के व्यापार घाटे और विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ा सकता है और यदि कीमतें लम्बे समय तक ऊंची रहती हैं तो इसका असर परिवहन लागत और महंगाई पर भी पड़ सकता है।

भारत ने पिछले वर्षों में तेल आयात के स्रोतों को विविध बनाने की कोशिश की है। रूस सहित दूसरे देशों से आयात बढ़ने के कारण भारत के पास कुछ वैकल्पिक स्रोत मौजूद हैं लेकिन हाॅर्मुज संकट को पूरी तरह नजरअंदाज करना सम्भव नहीं है। पश्चिम एशिया से आने वाले कच्चे तेल, एलएनजी और एलपीजी की बड़ी मात्रा इस समुद्री मार्ग से जुड़ी है। इसलिए लम्बे समय तक चलने वाला व्यवधान भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है।

अमेरिका और ईरान के बीच विवाद का एक बड़ा केंद्र ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी है। अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने को अपनी प्रमुख शर्त बता रहा है जबकि तेहरान प्रतिबंधों और सैन्य दबाव में राहत चाहता है। यही वजह है कि हाॅर्मुज को खोलने का सवाल अब परमाणु वार्ता, आर्थिक प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा के बड़े सवाल से जुड़ गया है। दोनों पक्षों के बीच अविश्वास इतना गहरा है कि कोई भी अपनी महत्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त पहले छोड़ना नहीं चाहता।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हाॅर्मुज शांति की राह खोलेगा या संघर्ष का अगला मोर्चा बनेगा। यदि अमेरिका और ईरान किसी समझौते पर पहुंचते हैं और समुद्री मार्ग सामान्य होता है तो तेल बाजार को राहत मिल सकती है लेकिन बातचीत विफल होने पर तेल, गैस, शिपिंग और बीमा की कीमतों में और दबाव आने की आशंका बनी रहेगी। यही वजह है कि पश्चिम एशिया का यह युद्ध अब केवल दो देशों का युद्ध नहीं रह गया है। हाॅर्मुज में उठने वाली हर लहर का असर दुनिया के बाजारों तक पहुंच रहा है और फिलहाल युद्ध की कीमत पूरी दुनिया चुका रही है।

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