बढ़ता बजट बढ़ता कर्ज और कराहता उत्तराखण्ड

भूपिंदर सिंह मेहता

 

उत्तराखण्ड की कुल देनदारियां 2020-21 में 71,435 करोड़ रुपए थीं जो 2024-25 में बढ़कर 90,657 करोड़ हो गईं। चार वर्षों में देनदारियों में 19,222 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हुई। इसी अवधि में सरकार पर्यटन, होटल, गेस्ट हाउस और दूसरी सार्वजनिक परिसम्पत्तियों को निजी निवेश के लिए पीपीपी माॅडल पर उपलब्ध कराती रही। कौलागढ़ के प्रीमियम होटल में 60 वर्ष की मूल लीज अवधि और प्रदर्शन के आधार पर 30 वर्ष तक विस्तार का प्रावधान है जबकि होटल अलकनंदा के पुनर्विकास में राजस्व हिस्सेदारी को बोली का आधार बनाया गया। सरकारी जमीन और परिसम्पत्तियों को लगातार निजी भागीदारी के लिए खोलने के बावजूद राज्य की देनदारियां कम होने के बजाय बढ़ती गईं। अब सवाल यह है कि जिन सार्वजनिक सम्पत्तियों को निजी पूंजी के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है, उनसे राज्य को वास्तविक आर्थिक लाभ कितना मिल रहा है और बढ़ते कर्ज के बोझ के बीच इन सम्पत्तियों की भूमिका क्या रह गई है

जब उत्तराखण्ड का गठन हुआ था तब राज्य का पहला बजट करीब 4,506 करोड़ रुपए का था। 2025-26 में राज्य का बजट बढ़कर 1,01,175.33 करोड़ हो गया है। यानी करीब 24 वर्षों में राज्य के बजट का आकार 22 गुना से अधिक बढ़ चुका है। पहली नजर में यह आंकड़ा उत्तराखण्ड की आर्थिक प्रगति और विकास की बड़ी तस्वीर पेश करता है लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू कहीं अधिक गम्भीर है। बजट के साथ राज्य की देनदारियां भी लगातार बढ़ती गईं। 2020-21 में उत्तराखण्ड की कुल देनदारियां 71,435 करोड़ थीं, जो 2024-25 में बढ़कर 90,657 करोड़ हो गईं। चार वर्षों में राज्य की कुल देनदारियों में 19,222 करोड़ की वृद्धि हुई। यानी बजट का आकार बढ़ता गया, सरकारी सम्पत्तियों और जमीन को निजी निवेश के लिए उपलब्ध कराने का सिलसिला चलता रहा लेकिन राज्य का वित्तीय बोझ भी लगातार बढ़ता गया।

बजट एक लाख करोड़ के पार, कर्ज 90 हजार करोड़ के पार
सीएजी के आंकड़ों के अनुसार 2020-21 में उत्तराखण्ड का सार्वजनिक ऋण 54,799 करोड़ और सार्वजनिक खाते की देनदारियां 16,636 करोड़ थीं। दोनों को मिलाकर कुल देनदारियां 71,435 करोड़ थीं। 2021-22 में सार्वजनिक ऋण 55,554 करोड़ और सार्वजनिक खाते की देनदारियां 15,821 करोड़ रहीं तथा कुल देनदारियां 71,375 करोड़ दर्ज हुईं। 2022-23 में सार्वजनिक ऋण 56,510 करोड़ और कुल देनदारियां 72,860 करोड़ हो गईं। 2023-24 में सार्वजनिक ऋण 62,312 करोड़ और कुल देनदारियां 80,266 करोड़ रहीं। 2024-25 में सार्वजनिक ऋण बढ़कर 73,026 करोड़ और सार्वजनिक खाते की देनदारियां 17,631 करोड़ हो गईं। कुल देनदारियां 90,657 करोड़ तक पहुंच गईं। 2024-25 में सार्वजनिक ऋण और अन्य देनदारियों में पिछले वर्ष की तुलना में 10,391 करोड़ यानी 12.94 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यानी उत्तराखण्ड के गठन के बाद बजट का आकार लगातार बढ़ा और राज्य की वित्तीय गतिविधियां भी बढ़ीं लेकिन इसके साथ सरकारी देनदारियों का बोझ भी कम नहीं हुआ। 2023-24 में कुल देनदारियां 80,266 करोड़ थीं और केवल एक वर्ष बाद 2024-25 में यह आंकड़ा 90,657 करोड़ हो गया। राज्य की वित्तीय तस्वीर में यह बढ़ोतरी उस समय सामने आई है जब सरकार सार्वजनिक परिसम्पत्तियों के इस्तेमाल से निजी पूंजी जुटाने की नीति पर भी आगे बढ़ रही है।
सरकारी जमीन और सम्पत्तियां पीपीपी के हवाले
उत्तराखण्ड की पर्यटन नीति में पर्यटन के लिए भूमि बैंक तैयार करने और पर्यटन सम्बंधी भूमि की पहचान तथा पूलिंग की व्यवस्था की गई थी। पर्यटन क्षेत्र में पीपीपी के जरिए निजी निवेश लाने का प्रावधान भी नीति में रखा गया। इसके बाद सरकारी जमीन, होटल और दूसरी पर्यटन परिसम्पत्तियों को निजी भागीदारी के जरिए विकसित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
देहरादून के कौलागढ़, गढ़ी कैंट में प्रीमियम लग्जरी होटल के विकास, संचालन और रखरखाव के लिए पीपीपी परियोजना लाई गई। इसमें 60 वर्ष की मूल लीज अवधि और प्रदर्शन के आधार पर 30 वर्ष तक विस्तार का प्रावधान रखा गया। यानी सरकारी परिसम्पत्ति का निजी इस्तेमाल सम्भावित रूप से 90 वर्ष तक जा सकता है।
हरिद्वार का होटल अलकनंदा भी पीपीपी मॉडल पर विकसित करने की योजना में शामिल रहा। होटल को पांच सितारा स्तर पर विकसित करने के लिए पीपीपी माॅडल पर आरएफपी जारी किया गया। इसमें सफल
बोलीदाता के चयन के लिए उसके द्वारा प्रस्तावित राजस्व हिस्सेदारी को आधार बनाया गया था।
सम्पत्तियां भी गईं, देनदारियां भी बढ़ीं
सरकार के पास विकास के लिए जमीन और दूसरी सार्वजनिक परिसम्पत्तियां हैं। इन्हें निजी निवेश के साथ जोड़कर होटल, पर्यटन और दूसरी परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं लेकिन दूसरी तरफ सरकारी देनदारियों का आंकड़ा भी लगातार ऊपर जा रहा है। 2020-21 में कुल देनदारियां 71,435 करोड़ थीं और 2024-25 में यह आंकड़ा 90,657 करोड़ हो गया।
ऐसे में सरकारी सम्पत्तियों से होने वाली आर्थिक प्राप्ति का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी सरकारी जमीन को पीपीपी में देने के बदले सरकार को कितनी राशि मिली? कितनी जमीन दी गई? उसका मूल्य कितना आंका गया? निजी भागीदार ने कितना निवेश किया? सरकार को कितनी लीज आय मिली? कितनी राजस्व हिस्सेदारी प्राप्त हुई? इन सभी आंकड़ों को एक साथ देखने पर ही यह पता चलेगा कि सरकारी परिसम्पत्तियों को निजी निवेश के लिए उपलब्ध कराने से राज्य के खजाने को कितना आर्थिक लाभ मिला।
निजी निवेश और सरकारी आय अलग-अलग
प्राइवेट पार्टनरशिप परियोजना में निजी कम्पनी द्वारा किया गया निवेश सरकार की आय नहीं होता। यदि किसी परियोजना में निजी भागीदार 500 करोड़ निवेश करता है तो यह उसकी परियोजना में लगाई गई पूंजी है। सरकार को मिलने वाली राशि अलग होती है। यह राशि अपफ्रंट पेमेंट, लीज प्रीमियम, वार्षिक लीज रेंट, काॅन्सेशन फीस अथवा रेवेन्यू शेयर के रूप में हो सकती है। होटल अलकनंदा की परियोजना में राजस्व हिस्सेदारी को बोली का आधार बनाया गया था। ऐसे में सरकार को परियोजना से वास्तविक रूप से कितनी राशि प्राप्त हुई, यह महत्वपूर्ण आंकड़ा है। इसी तरह कौलागढ़ परियोजना में लम्बे लीज पीरियड को देखते हुए सरकार की कुल अनुमानित आर्थिक प्राप्ति का आंकड़ा भी महत्वपूर्ण है।
60 से 90 साल तक सरकारी जमीन का इस्तेमाल
कौलागढ़ होटल परियोजना की 60 वर्ष की मूल लीज अवधि और 30 वर्ष तक सम्भावित विस्तार का प्रावधान सरकारी परिसम्पत्तियों के इस्तेमाल की लम्बी अवधि को सामने रखता है। किसी सरकारी जमीन या भवन को इतनी लम्बी अवधि के लिए पीपीपी में देना केवल वर्तमान सरकार के कार्यकाल तक सीमित फैसला नहीं होता। इसका आर्थिक असर कई दशकों तक रह सकता है। इसलिए ऐसी परियोजनाओं में जमीन की मौजूदा कीमत के साथ कांग्रेस लीज की पूरी अवधि में सरकार को मिलने वाले राजस्व का भी हिसाब महत्वपूर्ण है। आज किसी सरकारी जमीन की कीमत जितनी है, आने वाले दशकों में उसकी कीमत और उससे होने वाली सम्भावित आय अलग हो सकती है।
सरकारी सम्पत्तियों का मूल्यांकन भी सवालों में
सीएजी की 2024-25 की रिपोर्ट में सरकारी परिसम्पत्तियों के लेखांकन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की गई है। रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा सरकारी लेखा प्रणाली में जमीन, भवन आदि परिसम्पत्तियों का मूल्यांकन स्पष्ट रूप से प्रदर्शित नहीं होता। ऐसे में सरकारी सम्पत्तियों को पीपीपी के तहत लम्बे समय के लिए देने के मामलों में उनके स्वतंत्र मूल्यांकन और समझौते की वित्तीय शर्तों का महत्व और बढ़ जाता है।
किसी सरकारी होटल की जमीन का मूल्य कितना है, भवन की कीमत कितनी है, निजी भागीदार को कितने वर्षों की लीज मिला, सरकार को शुरुआत में कितनी राशि मिली और पूरी अवधि में कितनी आय होने का अनुमान है, इन आंकड़ों का सार्वजनिक होना जरूरी है।
नई परियोजनाएं भी पीपीपी की कतार में
सरकारी परिसम्पत्तियों को पीपीपी के जरिए विकसित करने की प्रक्रिया अभी जारी है। हरिद्वार के होटल अलकनंदा के पुनर्विकास के लिए पीपीपी-क्ठथ्व्ज् परियोजना, ऋषिकेश पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस के
पीपीपी-क्ठथ्व्ज् पुनर्विकास और पाटवाडांगर, नैनीताल में प्रीमियम हाॅस्पिटैलिटी परियोजना के लिए भूमि आवंटन जैसी परियोजनाएं इस प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में भी सरकारी जमीन और दूसरी सार्वजनिक परिसम्पत्तियों को निजी निवेश से जोड़ने की प्रक्रिया जारी रहने वाली है। ऐसे में इन परियोजनाओं से सरकार को मिलने वाली आय और राज्य की बढ़ती देनदारियों को साथ-साथ देखना और महत्वपूर्ण हो जाता है।
पहाड़ का बजट बढ़ा लेकिन वित्तीय बोझ भी बढ़ा
उत्तराखण्ड का बजट 2001-02 के करीब 4,506 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में 1,01,175.33 करोड़ हो गया है। यह वृद्धि राज्य के आर्थिक विस्तार, सरकारी योजनाओं और विकास गतिविधियों के बढ़ने को दर्शाती है लेकिन बजट के साथ सरकारी देनदारियां भी बढ़ी हैं। 2020-21 में कुल देनदारियां 71,435 करोड़ थीं और 2024-25 में 90,657 करोड़ हो गईं। राज्य की वित्तीय स्थिति पर कई तरह के खर्चों और राजस्व का प्रभाव पड़ता है। विकास योजनाएं, पूंजीगत निवेश, ब्याज भुगतान और दूसरी वित्तीय जरूरतें देनदारियों को प्रभावित करती हैं लेकिन सरकारी जमीन और परिसम्पत्तियों के पीपीपी इस्तेमाल का सवाल अपनी जगह है। यदि सार्वजनिक सम्पत्तियों को लम्बे लीज पर निजी भागीदारों को दिया जा रहा है तो उनसे सरकार को मिलने वाले आर्थिक लाभ का पूरा आंकड़ा भी सामने आना चाहिए।
सवाल अब सरकारी सम्पत्तियों के पूरे हिसाब का
उत्तराखण्ड के गठन के समय करीब 4,506 करोड़ का बजट आज एक लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच चुका है। दूसरी तरफ राज्य की कुल देनदारियां 90 हजार करोड़ रुपए के पार पहुंच चुकी हैं। इसी दौरान सरकारी जमीन, होटल, गेस्ट हाउस और दूसरी परिसम्पत्तियों को पीपीपी माॅडल के जरिए निजी निवेश के लिए उपलब्ध कराया गया है।
अब सवाल यह है कि बजट का आकार बढ़ने, सरकारी सम्पत्तियों को  पीपीपी के जरिए निजी निवेश के लिए उपलब्ध कराने और लगातार नई परिसम्पत्तियों को इस माॅडल में लाने के बावजूद राज्य की देनदारियां लगातार क्यों बढ़ती गईं। सरकार ने अब तक कितनी सरकारी सम्पत्तियां  पीपीपी मोड के जरिए दीं, उनका कुल मूल्य कितना था, निजी क्षेत्र से कितना निवेश आया, सरकारी खजाने को कितनी राशि मिली और इन परियोजनाओं से आगे कितनी आय होने की उम्मीद है, इन आंकड़ों का पूरा हिसाब सामने आना बाकी है।
उत्तराखण्ड के लिए चुनौती अब केवल बजट को बड़ा करने की नहीं है। चुनौती यह भी है कि सीमित सरकारी जमीन और सार्वजनिक परिसम्पत्तियों का इस्तेमाल किस तरह ऐसा आर्थिक लाभ पैदा करे जिससे राज्य का वित्तीय बोझ कम हो। बजट बढ़ता रहा, सरकारी सम्पत्तियां पीपीपी के हवाले होती रहीं और दूसरी तरफ देनदारियां भी बढ़ती रहीं, यही उत्तराखण्ड की मौजूदा वित्तीय तस्वीर का सबसे बड़ा सवाल है।

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