समाज को बदलने वाली फिल्में
अमित कुमार
कुछ फिल्में सिर्फ पर्दे पर कहानी नहीं कहतीं, वे अपने समय की सोच को बदल देती हैं। किसी ने गरीबी और किसान की पीड़ा को आवाज दी, किसी ने जाति और भेदभाव पर सवाल खड़े किए, किसी ने स्त्री की स्वतंत्रता को बहस के केंद्र में ला दिया तो किसी ने सत्ता, व्यवस्था और राजनीति के सामने आईना रख दिया। ‘मदर इंडिया’ से ‘आर्टिकल 15’ तक और ‘पाथेर पांचाली’ से ‘जय भीम’ तक इन फिल्मों का असर टिकट खिड़की से कहीं आगे गया। इन फिल्मों ने भारतीय समाज को सिर्फ मनोरंजन नहीं दिया बल्कि सोचने, सवाल करने और कभी-कभी अपनी धारणाएं बदलने के लिए भी मजबूर किया
भारतीय सिनेमा का इतिहास देश के बदलते समाज का इतिहास भी है। करीब एक सदी से फिल्मों ने इस देश के सपनों, संघर्षों, डर, पूर्वाग्रहों और उम्मीदों को पर्दे पर उतारा है लेकिन हजारों फिल्मों के बीच कुछ फिल्में ऐसी हैं जो रिलीज होने के बाद सिर्फ फिल्म नहीं रह गईं। उन्होंने सामाजिक बहस को जन्म दिया, राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया, संस्कृति की भाषा बदली और लोगों को अपने आसपास की दुनिया को नए नजरिए से देखने के लिए मजबूर किया। ‘प्रभावशाली’ होने का मतलब यहां सबसे अच्छी या सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म होना नहीं है। प्रभाव का अर्थ है कि फिल्म अपने समय से आगे निकल गई और समाज में कोई स्थायी सवाल छोड़ गई।
1953 में बिमल राॅय की फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ आई तो भारतीय सिनेमा ने किसान की जिंदगी और जमीन से उसके रिश्ते को बेहद मार्मिक तरीके से सामने रखा। यह सिर्फ एक किसान की कहानी नहीं थी बल्कि उस दौर के भारत में गरीबी, कर्ज और तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था की कहानी थी। इसके कुछ वर्षों बाद ‘मदर इंडिया’ ने भारतीय स्त्री और ग्रामीण भारत की ऐसी छवि बनाई जो दशकों तक भारतीय सामूहिक स्मृति का हिस्सा रही। नरगिस का राधा बनना केवल एक किरदार का अभिनय नहीं था, वह संघर्ष करती भारतीय मां, किसान और स्त्री का प्रतीक बन गया। फिल्म ने गरीबी, कर्ज, नैतिकता और परिवार को लेकर ऐसी बहस पैदा की जो आज भी भारतीय सिनेमा में दिखाई देती है।
सत्यजीत रे की ‘पाथेर पांचाली’ ने भारतीय सिनेमा को दुनिया के सामने एक अलग रूप में पेश किया। इसमें न कोई भव्य सेट था, न पारम्परिक अर्थों में नायक था और न ही मसालेदार कहानी। एक गरीब परिवार के जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को इतनी संवेदनशीलता से फिल्माया गया कि भारतीय सिनेमा के लिए यथार्थवाद की एक नई राह खुली। इसी तरह ‘मुगल-ए-आजम’ ने भारतीय सिनेमा के भव्य स्वरूप को नई ऊंचाई दी। प्रेम, सत्ता, परिवार और इतिहास को जिस पैमाने पर पर्दे पर उतारा गया, उसने आने वाली पीढ़ियों के फिल्मकारों को प्रभावित किया।
फिल्म ‘गाइड’ ने प्रेम, विवाह, नैतिकता और व्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे सवालों को लोकप्रिय सिनेमा में जगह दी। देव आनंद और वहीदा रहमान की कहानी के भीतर एक ऐसा समाज दिखाई देता है जिसमें व्यक्ति सामाजिक अपेक्षाओं और अपनी इच्छाओं के बीच संघर्ष करता है। 1967 की ‘उपकार’ ने किसान और जवान को राष्ट्रीय जीवन के दो महत्वपूर्ण स्तम्भों के रूप में लोकप्रिय संस्कृति में स्थापित किया। यह वह दौर था जब देश युद्ध, खाद्यान्न संकट और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण से गुजर रहा था और सिनेमा ने उस समय की राष्ट्रीय भावना को अपनी भाषा दी।
फिर आया 1970 का दशक, जब भारतीय सिनेमा का स्वर बदलने लगा। ‘शोले’ केवल एक ब्लाॅकबस्टर फिल्म नहीं थी। उसके संवाद, किरदार, संगीत और कहानी कहने का तरीका भारतीय लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गया। गब्बर सिंह, जय और वीरू जैसे किरदार फिल्म से निकलकर मुहावरों में पहुंच गए। इसी दौर में ‘आंधी’ और ‘किस्सा कुर्सी का’ जैसी फिल्मों ने सिनेमा और राजनीति के रिश्ते को सामने ला दिया। ‘आंधी’ को लेकर राजनीतिक समानताओं पर बहस हुई जबकि ‘किस्सा कुर्सी का’ राजनीतिक व्यंग्य और सेंसरशिप के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनी। इन फिल्मों ने यह सवाल उठाया कि क्या सत्ता पर सवाल करने वाली कहानी को पर्दे पर उसी तरह जगह मिल सकती है जैसे मनोरंजन की कहानी को।
श्याम बेनेगल की ‘मंथन’ ने सिनेमा को सामाजिक परिवर्तन के एक अलग माॅडल से जोड़ा। सहकारी आंदोलन और ग्रामीण किसानों की सामूहिक शक्ति पर बनी यह फिल्म इस बात का उदाहरण है कि सिनेमा केवल समस्या दिखाने का माध्यम नहीं बल्कि किसी सामाजिक प्रयोग की कहानी भी बन सकता है। इसके बाद ‘मिर्च मसाला’ ने स्त्री, सत्ता और पितृसत्ता के रिश्ते को बेहद तीखे अंदाज में सामने रखा। स्मिता पाटिल का किरदार उस व्यवस्था के खिलाफ खड़ी स्त्री का प्रतीक बन गया जिसमें पुरुष सत्ता को स्वाभाविक अधिकार मान लिया जाता है।
‘सलाम बाॅम्बे!’ ने महानगर के फुटपाथों और सड़कों पर रहने वाले बच्चों की दुनिया को पर्दे पर उतारा। उस समय मुख्यधारा का सिनेमा अक्सर शहर को सपनों की जगह की तरह दिखाता था लेकिन इस फिल्म ने उसी शहर का दूसरा चेहरा दिखाया। ‘बैंडिट क्वीन’ ने जाति, लैंगिक हिंसा और सामाजिक असमानता जैसे कठिन विषयों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। फिल्म को लेकर विवाद भी हुए लेकिन यही विवाद यह दिखाते हैं कि सिनेमा जब असुविधाजनक सवाल उठाता है तो समाज की स्थापित धारणाएं भी चुनौती के सामने आती हैं।
1998 की ‘सत्या’ ने मुम्बई के अंडरवर्ल्ड को पर्दे पर दिखाने की भाषा बदल दी। अपराधियों को सिर्फ खलनायक की तरह पेश करने के बजाय फिल्म ने अपराध की दुनिया के भीतर मौजूद सामाजिक और मानवीय जटिलताओं को सामने रखा। इसके बाद 2001 में ‘लगान’ आई। औपनिवेशिक भारत की पृष्ठभूमि में क्रिकेट और प्रतिरोध की कहानी ने यह दिखाया कि लोकप्रिय मनोरंजन और ऐतिहासिक संदर्भ को किस तरह एक साथ जोड़ा जा सकता है। फिल्म की सफलता ने भारतीय सिनेमा के अंतरराष्ट्रीय दर्शक वर्ग को भी मजबूत किया।
‘स्वदेस’ ने विकास की बहस को एक अलग भावनात्मक संदर्भ दिया। एक सफल प्रवासी भारतीय का अपने गांव लौटना और वहां की वास्तविकताओं से सामना करना केवल व्यक्तिगत कहानी नहीं थी, यह उस भारत की कहानी थी जो एक ओर वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ रहा था और दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा था। 2006 की ‘रंग दे बसंती’ ने युवाओं और राजनीति के रिश्ते को लोकप्रिय संस्कृति में नई ऊर्जा दी। फिल्म ने इतिहास, भ्रष्टाचार और व्यवस्था के प्रति युवा असंतोष को एक कहानी में जोड़ा और उस समय की युवा पीढ़ी में राजनीतिक भागीदारी को लेकर व्यापक चर्चा पैदा की।
‘तारे जमीन पर’ ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बेहद जरूरी सवाल उठाया, क्या हर बच्चा एक ही तरीके से सीखता है? फिल्म ने डिस्लेक्सिया जैसे विषय को लाखों दर्शकों तक पहुंचाया और बच्चों पर परीक्षा तथा प्रदर्शन के दबाव को अभिभावकों और शिक्षकों की सोच पर असर डाला। इसके दो साल बाद ‘3 इडियट्स’ ने इंजीनियरिंग शिक्षा, करियर की दौड़ और माता-पिता की अपेक्षाओं पर सवाल खड़े किए। फिल्म के संवाद और किरदार लोकप्रिय हुए लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह था कि शिक्षा और सफलता को लेकर घरों में होने वाले संवाद का स्वर बदला।
‘पीपली लाइव’ ने किसान और मीडिया की कहानी को व्यंग्य के माध्यम से सामने रखा। एक किसान की सम्भावित आत्महत्या किस तरह राजनीतिक बयान, मीडिया तमाशे और टीआरपी की कहानी बन सकती है, फिल्म ने इसे बेहद तीखे अंदाज में दिखाया। यह फिल्म उस दौर की मीडिया संस्कृति पर सवाल थी और आज के डिजिटल दौर में भी उसका सवाल कम प्रासंगिक नहीं हुआ है।
2016 में ‘पिंक’ आई और उसने एक बेहद बुनियादी सवाल को लोकप्रिय संस्कृति के केंद्र में ला दिया, सहमति का अर्थ क्या है? फिल्म ने महिलाओं की स्वतंत्रता, सामाजिक पूर्वाग्रह और पुरुषवादी नजरिए पर बहस को बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाया। इसी वर्ष ‘दंगल’ ने बेटियों के खेल, परिवार की अपेक्षाओं और ग्रामीण समाज में लड़कियों के अवसरों को लोकप्रिय सिनेमा की बड़ी कहानी बनाया। दोनों फिल्मों ने अलग-अलग रास्तों से स्त्री की भूमिका को लेकर समाज में चल रही बहस को मजबूत किया।
‘आर्टिकल 15’ ने जाति और सामाजिक भेदभाव जैसे सवालों को शहरी और युवा दर्शकों के बीच नए तरीके से रखा। फिल्म का महत्व इस बात में भी था कि उसने संविधान के एक सिद्धांत को कहानी के केंद्र में रखकर सामाजिक वास्तविकता से उसका टकराव दिखाया। वहीं ‘जय भीम’ ने आदिवासी समुदाय, पुलिस व्यवस्था और न्याय की तलाश को केंद्र में रखा। इस तरह की फिल्मों ने यह याद दिलाया कि संविधान और कानून की भाषा तभी अर्थपूर्ण होती है जब वह समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति तक न्याय पहुंचा सके।
फिर आती है ‘द कश्मीर फाइल्स’ जिसने कश्मीरी पंडितों के विस्थापन और कश्मीर की त्रासदी को लेकर देशव्यापी बहस को नई तीव्रता दी। फिल्म को लेकर उसके चित्रण, प्रस्तुति और राजनीतिक अर्थों पर व्यापक मतभेद भी सामने आए लेकिन प्रभाव के लिहाज से यह फिल्म महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि उसने एक लम्बे समय से चले आ रहे दर्द और स्मृति को मुख्यधारा की लोकप्रिय बहस के केंद्र में ला दिया।
इन 25 फिल्मों को एक साथ देखें तो भारतीय सिनेमा की यात्रा भी दिखाई देती है। शुरुआत में सिनेमा गरीबी, किसान और परिवार की कहानी कहता है। फिर वह राजनीति और सत्ता पर सवाल करता है। उसके बाद जाति, स्त्री, शिक्षा, मीडिया, अपराध, विकास और पहचान जैसे विषय उसके केंद्र में आते हैं। यानी समाज बदलता गया और सिनेमा के सवाल भी बदलते गए। इन फिल्मों की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह नहीं कि उन्होंने कोई तत्काल बदलाव कर दिया। सिनेमा कानून नहीं बनाता, सरकार नहीं चलाता और सामाजिक व्यवस्था को अकेले नहीं बदल सकता। उसकी ताकत कहीं दूसरी जगह है। वह किसी ऐसे सवाल को लाखों लोगों के घर तक पहुंचा देता है जिस पर शायद वे पहले कभी बात नहीं करते थे। वह किसी पीड़ित चेहरे को पहचान देता है, किसी असुविधाजनक सच को लोकप्रिय भाषा देता है और किसी पुरानी धारणा को चुनौती देने का साहस पैदा करता है।
इसलिए भारत की प्रभावशाली फिल्मों की सूची वास्तव में भारतीय समाज के बदलते सवालों की सूची भी है। ‘मदर इंडिया’ का किसान और मां, ‘पाथेर पांचाली’ का गरीब परिवार, ‘मंथन’ का किसान, ‘मिर्च मसाला’ की स्त्री, ‘रंग दे बसंती’ का युवा, ‘तारे जमीन पर’ का बच्चा, ‘पिंक’ की लड़की और ‘जय भीम’ का न्याय मांगता परिवार, ये सभी अपने-अपने समय के भारत के चेहरे हैं। सिनेमा की असली ताकत शायद यही है कि फिल्म खत्म होने के बाद भी कहानी खत्म नहीं होती। पर्दा गिरता है, रोशनी जलती है और दर्शक थिएटर से बाहर निकल जाता है लेकिन अगर कोई दृश्य, कोई संवाद या कोई सवाल उसके साथ घर तक चला जाए तो समझिए फिल्म ने अपना काम कर दिया। यही वजह है कि कुछ फिल्में पुरानी होकर भी पुरानी नहीं होतीं। वे हर नई पीढ़ी के सामने फिर वही सवाल रखती हैं, हम किस तरह का समाज हैं और किस तरह का समाज बनना चाहते हैं।
