एक एक्टिविस्ट करोड़ों की जमीन और कई सवाल

कृष्ण कुमार

उत्तराखण्ड में जमीनों की बढ़ती कीमतों के साथ भू-फर्जीवाड़े और जमीन कब्जाने के विवाद भी लगातार बढ़ रहे हैं। देहरादून के पुरकुल गांव (राजपुर रोड) की करोड़ों की जमीन का विवाद अब पुलिस से लेकर हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। एक ओर हैं वकील विकेश नेगी जो रजिस्टर्ड वसीयत और पावर आॅफ अटाॅर्नी के आधार पर जमीन पर अपना अधिकार बता रहे हैं, वहीं दूसरा पक्ष जय प्रकाश तिवारी का है जो पुराने सेल एग्रीमेंट को आधार बना रहा है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर गम्भीर आरोप लगा रहे हैं। जय प्रकाश तिवारी ने तो देहरादून पुलिस पर भी मिलीभगत का आरोप लगाते हुए कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। इस पूरे प्रकरण में एक गम्भीर बात बार काउंसिल आॅफ इंडिया द्वारा वकीलों के आचरण को लेकर बनाए गए दिशा-निर्देशों के उल्लंघन की भी है। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार हर वकील से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने क्लाइंट के साथ कारोबारी रिश्ता नहीं रखेगा जबकि इस मामले में विकेश नेगी एक पक्ष के वकील के साथ ही खुद विवादित जमीन की खरीद-फरोख्त में शामिल भी हैं

उत्तराखण्ड की अस्थायी राजधानी देहरादून पिछले कुछ वर्षों से केवल तेजी से बढ़ती रियल एस्टेट कीमतों के लिए ही चर्चा में नहीं रही बल्कि भूमि विवादों, फर्जी रजिस्ट्रियों, जाली दस्तावेजों और कथित भूमि माफियाओं के बढ़ते नेटवर्क के कारण भी लगातार सुर्खियों में रही है।

राजपुर रोड से लेकर सहस्रधारा, डोईवाला, रायपुर और बाहरी इलाकों तक कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें करोड़ों रुपए मूल्य की जमीनों पर फर्जी दस्तावेज तैयार करने, दोहरी बिक्री, फर्जी पावर आॅफ अटाॅर्नी, वसीयतों में हेरफेर और कब्जे के आरोप लगे हैं। पुलिस और प्रशासन समय-समय पर ऐसे मामलों में कार्रवाई भी करते रहे हैं लेकिन लगातार सामने आ रहे विवाद यह संकेत देते हैं कि भूमि कारोबार में संगठित तरीके से काम करने वाले नेटवर्क अब भी सक्रिय हैं।

इसी कड़ी में अब देहरादून की राजपुर रोड स्थित एक बहुमूल्य सम्पत्ति का विवाद नए मोड़ पर पहुंच गया है। यह मामला केवल दो पक्षों के बीच चल रहे दीवानी मुकदमे तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि अब इसमें कई एफआईआर, हाईकोर्ट में दाखिल याचिका, जाली वसीयत के आरोप, पावर आॅफ अटाॅर्नी के कथित दुरुपयोग और हाल ही में सामने आए एक महत्वपूर्ण ईमेल ने पूरे घटनाक्रम को नई दिशा दे दी है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरे विवाद में जिस महिला उपासना मेहता के नाम पर सम्पत्ति का दावा किया जा रहा था, उसी उपासना मेहता ने कुछ समय पूर्व देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को भेजे ईमेल में आरोप लगा डाला कि उनके नाम पर तैयार की गई पावर आॅफ अटाॅर्नी उनके वकील और आरटीआई एक्टिविस्ट विकेश नेगी द्वारा धोखे और गलत प्रस्तुतीकरण के आधार पर हासिल की गई तथा उसका उपयोग उनकी जानकारी और सहमति के बिना सम्पत्ति के सौदों में किया गया। उन्होंने सम्बंधित पावर आॅफ अटाॅर्नी निरस्त करने, उसके आधार पर हुई सभी रजिस्ट्रियों और बिक्री की जांच कराने तथा आगे किसी भी प्रकार के लेन- देन पर रोक लगाने की मांग की। इस ईमेल ने पूरे मामले का केंद्र बदल दिया क्योंकि आरोप सीधे उस व्यक्ति पर लगाए गए हैं जो अब तक स्वयं इस पूरे विवाद में सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। हालांकि बाद में इस ईमेल को ही फर्जी करार उन्होंने दे दिया। इस पूरे विवाद को समझने के लिए केवल हालिया घटनाओं को देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसकी जड़ें लगभग ढाई दशक पुरानी हैं, जब सम्पत्ति का स्वामित्व और उत्तराधिकार पहली बार विवाद का विषय बना। आज जो आरोप और प्रत्यारोप सामने आ रहे हैं, उन्हें समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि आखिर इस सम्पत्ति की मूल मालिक कौन थीं, वसीयतें कब बनीं, किसके पक्ष में बनीं और किस प्रकार वर्षों पुराना दीवानी विवाद अब कथित आपराधिक षड्यंत्र और भूमि फ्राॅड के आरोपों तक पहुंच गया। यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे कम चर्चित हिस्सा है।

राजकुमारी पदमकुमारी, चंदर बहादुर सिंह और तरुण पंवार, यहीं से शुरू हुआ असली विवाद
राजपुर रोड की जिस सम्पत्ति को लेकर आज कई एफआईआर, हाईकोर्ट की याचिका, पावर आॅफ अटाॅर्नी, कथित फर्जी वसीयत और करोड़ों रुपए के भूमि फ्राॅड के आरोपों की चर्चा हो रही है, उसकी कहानी लगभग पच्चीस वर्ष पहले शुरू होती है। इस पूरे मामले के केंद्र में स्वर्गीय चंदर बहादुर सिंह (सी.बी. सिंह) और उनकी बहन राजकुमारी पदमकुमारी की सम्पत्ति है। ‘दि संडे पोस्ट’ के पास मौजूद दस्तावेजों के अनुसार 21 अगस्त 2001 को सी.बी. सिंह ने अपनी पहली वसीयत तैयार की थी, जिसमें सम्पत्ति के एक हिस्से का उत्तराधिकार अलग प्रकार से निर्धारित किया गया था लेकिन बाद में, अपने जीवनकाल में ही उन्होंने एक दूसरी वसीयत बनाई जिसमें अपनी सम्पत्ति अपनी बहनों, जिनमें राजकुमारी पदमकुमारी भी शामिल थीं, के नाम कर दी। इसके कुछ ही समय बाद 9 सितम्बर 2001 को सी.बी. सिंह का निधन हो गया।

यही दूसरी और अंतिम वसीयत बाद में प्रभावी मानी गई और उसी के आधार पर राजकुमारी पदमकुमारी को सम्पत्ति के अधिकार प्राप्त हुए। वर्ष 2015 में राजकुमारी पदमकुमारी के निधन से पहले उन्होंने भी अपनी वसीयत तैयार की, जिसमें यह सम्पत्ति कुमुद वैद्य के नाम कर दी गई। इसी वसीयत के आधार पर कुमुद वैद्य स्वयं को इस सम्पत्ति का वैध उत्तराधिकारी मानती हैं लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। राजकुमारी पदमकुमारी के जीवनकाल में ही इस सम्पत्ति को लेकर एक दीवानी विवाद शुरू हो चुका था। यह विवाद राजकुमारी पदमकुमारी और तरुण पंवार के बीच था। राजकुमारी पदमकुमारी ने पंवार को यह सम्पत्ति किराए पर दी थी। दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2014 में राजकुमारी पदमकुमारी ने तरुण पंवार के खिलाफ ओरिजिनल सूट संख्या 460/2014 दायर किया था। इस मुकदमे में सम्पत्ति पर कब्जा वापस दिलाने और बेदखली की राहत मांगी गई थी। यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि वर्तमान विवाद की जड़ उपासना मेहता या विकेश नेगी नहीं बल्कि राजकुमारी पदमकुमारी और तरुण पंवार के बीच चल रहा दीवानी मुकदमा था।

बाद में राजकुमारी पदमकुमारी के निधन के पश्चात उनकी वसीयत के आधार पर कुमुद वैद्य इस मुकदमे में आगे आईं। दूसरी ओर, स्वास्थ्य सम्बंधी कारणों से तरुण पंवार ने अपने विश्वस्त सहयोगी जय प्रकाश तिवारी को पावर आॅफ अटाॅर्नी देकर मुकदमे की पैरवी का अधिकार सौंप दिया। हाईकोर्ट में दाखिल याचिका के अनुसार तरुण पंवार पिछले लगभग तीस वर्षों से सम्बंधित सम्पत्ति पर कब्जे में रहे हैं और यही तथ्य दीवानी न्यायालय के रिकॉर्ड में भी स्वीकार किया गया है। याचिका में दावा किया गया है कि सम्पत्ति का वास्तविक कब्जा कभी भी उन लोगों के पास नहीं रहा जिन्होंने बाद में बिक्री और स्वामित्व का दावा किया।

वर्तमान विवाद का दूसरा अध्याय इस याचिका के चलते शुरू होता है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि वर्षों से चल रहे इस दीवानी मुकदमे के बीच अचानक उपासना मेहता नाम की एक नई दावेदार सामने आती हैं। उनका दावा था कि उन्हें वर्ष 2001 की पहली वसीयत के आधार पर अधिकार प्राप्त हैं। दूसरी ओर कुमुद वैद्य का कहना है कि पहली वसीयत बाद में स्वयं सी.बी. सिंह द्वारा बदल दी गई थी और अंतिम वसीयत ही कानूनी रूप से प्रभावी थी। इस प्रकार एक ही सम्पत्ति पर दो अलग-अलग वसीयतों के आधार पर अधिकार का दावा सामने आ गया। मामला अब केवल उत्तराधिकार विवाद नहीं रहा बल्कि कथित फर्जी वसीयत, पावर आॅफ अटाॅर्नी और भूमि हड़पने के आरोपों तक पहुंच गया। हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में आरोप है कि सम्पत्ति की बढ़ती बाजार कीमतों को देखते हुए वर्षों पुराने विवाद में नए दावेदारों की एंट्री हुई और इसी के बाद घटनाक्रम ने तेजी से नया मोड़ लिया।

उपासना मेहता की एंट्री, विकेश नेगी की भूमिका और कैसे बदल गया पूरे मामले का स्वरूप
करीब एक दशक तक यह मामला मुख्य रूप से राजकुमारी पदमकुमारी, बाद में कुमुद वैद्य और दूसरी ओर तरुण पंवार के बीच चल रहे दीवानी मुकदमे तक सीमित रहा लेकिन स्थिति उस समय पूरी तरह बदल गई जब उपासना मेहता ने इस सम्पत्ति पर अपना दावा पेश किया।
उपासना मेहता का दावा अचानक उस समय सामने आया जब इस सम्पत्ति की बाजार कीमत कई गुना बढ़ चुकी थी। आरोप है कि इसी बढ़ी हुई कीमत का लाभ उठाने के लिए कथित रूप से एक नया दावा खड़ा किया गया और पूरे विवाद को नई दिशा दी गई।

हाईकोर्ट में दाखिल दस्तावेजों के अनुसार उपासना मेहता की ओर से विकेश सिंह नेगी के पक्ष में पावर आॅफ अटाॅर्नी बनाई गई। इसी पावर आॅफ अटाॅर्नी के आधार पर आगे की कानूनी कार्यवाही शुरू हुई और बाद में 24 जून 2025 को सम्पत्ति का एक बिक्री विलेख Sale Deed) भी निष्पादित किया गया। याचिका में आरोप है कि यह बिक्री उस समय की गई जब सम्पत्ति को लेकर दीवानी मुकदमा पहले से लम्बित था। इतना ही नहीं, याचिका में यह भी कहा गया है कि बिक्री विलेख में विक्रेताओं को कब्जाधारी दर्शाया गया जबकि वास्तविकता में वे कभी भी सम्पत्ति के कब्जे में नहीं रहे। याचिकाकर्ता का दावा है कि वास्तविक कब्जा लगातार तरुण पंवार के पास रहा, जिसका उल्लेख दीवानी न्यायालय के रिकाॅर्ड में भी है। याचिका में एक और महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख किया गया है। उसमें कहा गया है कि जिस पावर आॅफ अटाॅर्नी के आधार पर विकेश नेगी को अधिकार दिए गए और जिस बिक्री विलेख के आधार पर सम्पत्ति का हस्तांतरण किया गया, दोनों दस्तावेजों में एक ही गवाहों के हस्ताक्षर हैं। याचिकाकर्ता ने इसे संदेहास्पद बताते हुए न्यायालय के समक्ष दोनों दस्तावेजों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया है और दावा किया है कि यह पूरे घटनाक्रम की कड़ी को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण तथ्य है।

मामला यहीं तक सीमित रहता तो इसे सामान्य दीवानी विवाद माना जा सकता था लेकिन अब घटनाक्रम ने बिल्कुल नया मोड़ ले लिया है। इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा बदलाव उस समय आया जब यह दावा सामने आया कि स्वयं उपासना मेहता ने देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को ईमेल भेजकर कहा है कि विकेश सिंह नेगी ने उन्हें झूठी जानकारी देकर और विश्वास का दुरुपयोग करते हुए पावर आॅफ अटाॅर्नी हासिल की। इस कथित ईमेल में उन्होंने आरोप लगाया कि उसी पावर आॅफ अटाॅर्नी का उपयोग उनकी जानकारी और सहमति के बिना सम्पत्ति के सौदे करने के लिए किया गया। उन्होंने मांग की कि विकेश नेगी के पक्ष में बनाई गई पावर आॅफ अटाॅर्नी तत्काल निरस्त की जाए, उसके आधार पर हुई बिक्री, रजिस्ट्री और अन्य लेन-देन की जांच कराई जाए तथा भविष्य में उनकी लिखित सहमति के बिना किसी भी प्रकार का सम्पत्ति सम्बंधी लेन-देन रोका जाए। हालांकि विकेश न ेगी इस ईमेल को नकली मानते हैं। उनका दावा है कि उपासना मेहता ने इस ईमेल की बाबत बकायदा एक वीडियो बनाया है जिसमें उपासना ने विकेश नेगी को ही अपना पावर आॅफ अटाॅर्नी होल्डर बताया है।

हाईकोर्ट में दायर याचिका में आगे आरोप लगाया गया है कि विकेश नेगी केवल एक अधिवक्ता के रूप में कार्य नहीं कर रहे बल्कि सम्पत्ति सम्बंधी लेन-देन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। याचिका में उन्हें प्रभावशाली व्यक्ति बताते हुए आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अपने पेशे और सम्पर्कों का उपयोग कर कई सम्पत्ति विवादों में हस्तक्षेप किया तथा इस मामले में भी पूरी रणनीति तैयार की। इन्हीं आरोपों के समर्थन में याचिका में उनके विरुद्ध पूर्व में दर्ज कई आपराधिक मुकदमों का भी उल्लेख किया गया है।

विकेश नेगी के खिलाफ कई मुकदमों का दावा
राजपुर रोड की इस बहुचर्चित सम्पत्ति विवाद में सबसे गम्भीर पहलू केवल वसीयत, पावर आॅफ अटाॅर्नी या कथित फर्जी बिक्री तक सीमित नहीं है। हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में याचिकाकर्ता ने विकेश सिंह नेगी की भूमिका पर भी गम्भीर सवाल उठाए हैं और दावा किया है कि वह केवल अधिवक्ता की भूमिका तक सीमित नहीं रहे बल्कि लम्बे समय से सम्पत्ति सम्बंधी विवादों में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करते रहे हैं। याचिका में यहां तक आरोप लगाया गया है कि वह अपने पेशे और प्रभाव का इस्तेमाल कर सम्पत्ति सम्बंधी मामलों में ‘कानूनी जाल’ (Legal Cobweb) खड़ा करने के आदी हैं। याचिका में कहा गया है कि विकेश नेगी के खिलाफ पहले से कई एफआईआर दर्ज हैं और उनके विरुद्ध बार काउंसिल आॅफ उत्तराखण्ड में भी शिकायतें की गई हैं। इन्हीं तथ्यों को आधार बनाते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के समक्ष उनके खिलाफ दर्ज विभिन्न मुकदमों का ब्यौरा भी प्रस्तुत किया है। उल्लेखनीय है कि इन मामलों का उल्लेख याचिका में आरोपों के समर्थन में किया गया है और इनका अंतिम निर्णय सम्बंधित न्यायालयों में होना शेष है।

याचिका के अनुसार वर्ष 2022 में थाना नेहरू कॉलोनी में केस क्राइम नम्बर 18/2022 दर्ज हुआ, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 447, 353, 186, 504 और 506 लगाई गईं। इन धाराओं में आपराधिक, अतिक्रमण, सरकारी कर्मचारी को उसके कर्तव्य पालन से रोकना, लोक सेवक के कार्य में बाधा डालना, जान बूझकर अपमान कर शांति भंग करने के लिए उकसाना तथा धमकी जैसे आरोप शामिल हैं। इसी वर्ष थाना नेहरू कॉलोनी में ही केस क्राइम नम्बर 173/2022 भी दर्ज होने का उल्लेख याचिका में किया गया है। इसमें धारा 147, 427, 504 और 506 लगाई गई हैं। इन धाराओं का सम्बंध दंगा करने, सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने, जान बूझकर अपमान करने और आपराधिक धमकी देने जैसे आरोपों से है। इसके अलावा केस क्राइम नम्बर 211/2022 का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें धारा 447, 427, 504 और 506 के तहत मामला दर्ज होने का दावा किया गया है। यानी आपराधिक अतिक्रमण, सम्पत्ति को नुकसान, अपमान और धमकी से जुड़े आरोप भी याचिका में गिनाए गए हैं।

याचिका में वर्ष 2023 के थाना रानीपोखरी के केस क्राइम नम्बर 19/2023 का भी उल्लेख है, जिसमें धारा 147, 504 और 506 के तहत मुकदमा दर्ज होने का दावा किया गया है। इसके बाद वर्ष 2024 में थाना डोईवाला के केस क्राइम नम्बर 78/2024 का हवाला दिया गया है, जिसमें धारा 420, 406 और 120-बी आईपीसी के तहत मुकदमा दर्ज होने का उल्लेख है। ये धाराएं धोखाधड़ी, आपराधिक न्यासभंग (क्रिमिनल ब्रीच आॅफ ट्रस्ट) और आपराधिक षड्यंत्र जैसे गम्भीर अपराधों से सम्बंधित हैं। सबसे गम्भीर आरोप वर्ष 2024 के थाना रायपुर में दर्ज केस क्राइम नम्बर 139/2024 को लेकर लगाए गए हैं। याचिका के अनुसार इस मामले में धारा 420, 467, 468, 471, 120-बी, 504 और 506 आईपीसी लगाई गई हैं। इनमें धारा 467 मूल्यवान दस्तावेज, वसीयत या रजिस्ट्री जैसे महत्वपूर्ण अभिलेखों की जालसाजी से सम्बंधित है और इसे भारतीय दंड संहिता की सबसे गम्भीर फर्जीवाड़ा धाराओं में माना जाता रहा है। धारा 468 धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी तथा धारा 471 जाली दस्तावेज को असली बताकर उपयोग करने से सम्बंधित है।

याचिका में थाना नेहरू काॅलोनी के केस क्राइम नम्बर 235/2024 का भी उल्लेख किया गया है। इसमें धारा 420, 467, 468, 471, 323, 504 और 506 के तहत मुकदमा दर्ज होने का दावा किया गया है। इसमें धोखाधड़ी, जालसाजी, जाली दस्तावेज का उपयोग, मारपीट, अपमान और धमकी जैसे आरोप शामिल बताए गए हैं। इन मुकदमों का उल्लेख करने के बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से कहा है कि इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक सामान्य दीवानी विवाद के रूप में नहीं देखा जा सकता। याचिका में दावा किया गया है कि सम्पत्ति की बढ़ती कीमतों को देखते हुए एक सुनियोजित तरीके से पुराने विवाद में नए दावेदार खड़े किए गए, पावर आॅफ अटाॅर्नी का इस्तेमाल किया गया, बिक्री विलेख निष्पादित किए गए और बाद में विरोध करने वालों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज कराए गए। याचिकाकर्ता का यह भी आरोप है कि उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर इसी रणनीति का हिस्सा है, ताकि उन्हें दीवानी मुकदमे की पैरवी से रोका जा सके और सम्पत्ति पर दावा छोड़ने के लिए दबाव बनाया जा सके।

इस पूरे घटनाक्रम में यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि विकेश सिंह नेगी सार्वजनिक जीवन में लम्बे समय से एक आरटीआई कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी जाने जाते रहे हैं। उन्होंने समय- समय पर राज्य सरकार, विशेष रूप से पुष्कर सिंह धामी सरकार के खिलाफ कई मामलों में दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं। अंकिता भंडारी हत्याकांड, बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति से जुड़े कथित वित्तीय मामलों और अन्य कई प्रशासनिक मुद्दों पर उनकी सक्रियता चर्चा का विषय रही है। ऐसे में अब उनके खिलाफ हाईकोर्ट में लगाए गए ये आरोप और उपासना मेहता द्वारा भेजा गया ईमेल इस पूरे विवाद को और अधिक संवेदनशील बना देते हैं। दूसरी ओर, इन सभी आरोपों पर सम्बंधित पक्ष का पक्ष और न्यायालयों तथा जांच एजेंसियों के अंतिम निष्कर्ष अभी आना बाकी हैं।

कई एफआईआर, उपासना मेहता का पलटा रुख और अब हाईकोर्ट के सामने खड़े सबसे बड़े सवाल
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार पहला बड़ा घटनाक्रम 1 फरवरी 2026 को हुआ। कुमुद वैद्य का आरोप है कि उस दिन दोपहर के समय 10 से 15 लोग उनकी राजपुर रोड स्थित सम्पत्ति में जबरन घुस आए। शिकायत में कहा गया कि उस समय सम्पत्ति की सुरक्षा में तैनात गार्डों को धमकाया गया, उनके साथ मारपीट की गई, हथियार दिखाए गए, गेट और ताले तोड़े गए, परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरे क्षतिग्रस्त किए गए तथा रिकाॅर्डिंग अपने साथ ले जाई गई। शिकायत में यह भी कहा गया कि परिसर में लगे बोर्ड हटाकर नए बोर्ड लगा दिए गए और बाद में लगभग 25 से 30 अन्य लोग भी मौके पर पहुंच गए। कुमुद वैद्य ने इस घटना को सम्पत्ति पर कब्जा करने का सुनियोजित प्रयास बताया और कोतवाली देहरादून में एफआईआर संख्या 75/2026 दर्ज कराई। इस एफआईआर में उपासना मेहता, विकेश सिंह नेगी, विपिन कुमार, कमल प्रसाद, अनुज कुमार गुप्ता, रामवीर सिंह, आशीष तोमर सहित अन्य के नाम दर्ज हैं। सम्पत्ति पर जबरन कब्जा करने वाले वे लोग हैं जिन्हें यह जमीन विकेश नेगी ने उपासना मेहता द्वारा दी गई पावर आॅफ अटाॅर्नी के आधार पर बेच दी है।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि इस एफआईआर के बावजूद पुलिस ने अपेक्षित कार्रवाई नहीं की। इसके विपरीत, कुछ समय बाद एक दूसरी एफआईआर संख्या 168/2026 दर्ज हुई, जिसमें जय प्रकाश तिवारी और उनके साथियों पर धमकी देने, डराने और अन्य आपराधिक आरोप लगाए गए। हाईकोर्ट में दायर याचिका में इस दूसरी एफआईआर को स्पष्ट रूप से ‘काउंटर ब्लास्ट एफआईआर’ बताया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि पहली एफआईआर का प्रभाव निष्प्रभावी करने और दबाव बनाने के उद्देश्य से दूसरी एफआईआर दर्ज कराई गई।

याचिका का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जय प्रकाश तिवारी ने अदालत को बताया है कि जिस 2 फरवरी 2026 की घटना का हवाला देकर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया, उस समय वह भारत में थे ही नहीं। उन्होंने दावा किया है कि 21 जनवरी से 10 फरवरी 2026 तक वह दुबई में थे और इसके समर्थन में पासपोर्ट, इमिग्रेशन रिकाॅर्ड, हवाई यात्रा के दस्तावेज तथा मोबाइल रोमिंग का विवरण अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। यदि जांच में यह दावा सही पाया जाता है तो दूसरी एफआईआर की विश्वसनीयता पर गम्भीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं। हालांकि इसका अंतिम परीक्षण जांच एजेंसियों और न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा।

अब इस विवाद में कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब केवल न्यायिक प्रक्रिया और निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है। यदि सी.बी. सिंह की अंतिम वसीयत प्रभावी थी तो फिर वर्ष 2001 की पहली वसीयत के आधार पर नया दावा कैसे खड़ा हुआ? यदि सम्पत्ति पर वर्षों से दीवानी मुकदमे लम्बित थे तो फिर बिक्री विलेख कैसे निष्पादित हुए? यदि वास्तविक कब्जा तरुण पंवार के पास था, जैसा कि याचिका में दावा किया गया है तो बिक्री के समय कब्जे का दावा किस आधार पर किया गया? यदि उपासना मेहता का ईमेल सही है तो पावर आॅफ अटाॅर्नी के आधार पर हुई समस्त कार्रवाई की वैधता क्या होगी? यदि जय प्रकाश तिवारी का दुबई में होने का दावा सही साबित होता है तो दूसरी एफआईआर का भविष्य क्या होगा? इतना ही नहीं बकौल विकेश नेगी क्लाइंट उपासना मेहता ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को ईमेल भेजकर स्पष्ट कर दिया है कि नेगी ही उनके द्वारा नामित पावर आॅफ अटाॅर्नी होल्डर हैं। यानी पहली ईमेल को उन्होंने गलत बता दिया है। यहां पर एक वकील द्वारा जमीन के क्रय-विक्रय में शामिल होने और अपने खाते में जमीन की खरीद-फरोख्त का पैसा लेने के चलते एक बड़ा सवाल बार काउंसिल आॅफ इंडिया द्वारा वकीलों के व्यवसायिक आचरण को लेकर बनी नियमावली (Standards of Professional Conduct and etiquette) से जुड़ जाता है। इस नियमावली के अनुसार वकीलों पर कुछ प्रकार के व्यापार या व्यवसायिक गतिविधियों में शामिल होने पर प्रतिबंध है।

इन सभी प्रश्नों का उत्तर फिलहाल किसी के पास नहीं हैं लेकिन इतना निश्चित है कि राजपुर रोड की करोड़ों रुपए मूल्य की यह सम्पत्ति अब केवल एक जमीन का टुकड़ा नहीं रह गई है। यह मामला उत्तराधिकार, वसीयत, पावर आॅफ अटाॅर्नी, कथित फर्जी दस्तावेज, कब्जे के दावे, आपराधिक मुकदमों और न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता जैसे अनेक गम्भीर प्रश्नों का केंद्र बन चुका है। अब सबकी निगाहें उत्तराखण्ड हाईकोर्ट की कार्यवाही, पुलिस जांच और उन दस्तावेजों की न्यायिक जांच पर टिकी हैं, जिनके आधार पर इस बहुचर्चित भूमि विवाद का सच सामने आएगा। साथ ही, यह मामला उन एजेंसियों के लिए भी एक कसौटी बन गया है जिन पर यह जिम्मेदारी है कि करोड़ों की सम्पत्तियों से जुड़े विवादों में तथ्यों, दस्तावेजों और कानून के आधार पर निष्पक्ष निर्णय तक पहुंचा जाए।

‘बेवजह मुझे परेशान किया जा रहा है’
ये तरुण पंवार है कौन? और ये जय प्रकाश तिवारी कौन है? आपको पहले इनके बारे में जानकारी होनी चाहिए। प्राॅपर्टी तो उपासना मेहता की है और तरुण पंवार कुमुद वैद्य से मुकदमा लड़ रहा है। तरुण पंवार सिर्फ 50 रुपए का एक एग्रीमेंट दिखाकर कब्जा करके बैठा हुआ है। यह तिवारी वह है, जिसके खिलाफ विपिन ने मुकदमा लिखवाया है। यह तिवारी हाईकोर्ट गया और वहां कोर्ट में 50 रुपए का मुजफ्फरनगर में बनाया हुआ एक एग्रीमेंट दिखाया है जो पदमाकुमारी के साथ किया हुआ है जबकि पदमाकुमारी की कोई जमीन ही नहीं है। उस 50 रुपए के एग्रीमेंट पर इसे तरुण पंवार ने पावर आॅफ अटाॅर्नी दी हुई है। जमीन चंद्र बहादुर की है, जिन्होंने उपासना मेहता को वसीयत के आधार पर दी है। करोड़ों की सम्पत्ति को ये लोग 50 रुपए के एग्रीमेंट पर हड़पना चाहते हैं।

मेरे ऊपर आरोप लगा रहे हैं! उपासना मेहता को चंद्र बहादुर ने जमीन रजिस्टर्ड वसीयत में दी और उपासना मेहता ने मुझे जमीन के मामलों में रजिस्टर्ड पावर आॅफ अटाॅर्नी दी हुई है, जिसके आधार पर मैं जमीन से जुड़े मामलों को देख रहा हूं। उपासना मेहता ने ईमेल की है, जिसमें उन्होंने कहा है कि उनके द्वारा ऐसी कोई ईमेल नहीं की गई है और न ही पावर आॅफ अटाॅर्नी कैंसिल की है। यह सब जय प्रकाश तिवारी द्वारा किया गया है। उनके द्वारा व्हाट्सऐप पर भी स्पष्टीकरण दिया जा चुका है, जिसमें उन्होंने वीडियो भी भेजा है, जिसमें सारी बातें कही गई हैं। हमें इस पूरी प्रॉपर्टी की पावर आॅफ अटाॅर्नी मिली हुई है। हमारे द्वारा समस्त जानकारी और प्रमाण पुलिस को उपलब्ध करवा दिए गए हैं। तभी तो कुमुद और अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ।

रही बात मुझ पर दर्ज मुकदमों की तो मुझे बेवजह परेशान किया जा रहा है। प्राॅपर्टी किसी ने किसी को रजिस्टर्ड वसीयत से दी, जिसको प्राॅपर्टी मिली, उसने मुझे प्राॅपर्टी से जुड़े मामलों के लिए पावर आॅफ अटाॅर्नी दी तो इसमें बाहर के लोग कहां से आ गए? वो सारे मुकदमे तो खत्म हो गए हैं। इन्हें तो यही नहीं पता कि सिविल के मुकदमे हमने कैंसिलेशन में डाले हैं। जिसने हमारे पैसे देने हैं, उसके खिलाफ हमने रिकवरी के किए हैं। हमारे साथ किसी ने फ्रॉड किया, उसके खिलाफ हमने केस डाला हुआ है। जिन दो मुकदमों की यह बात कर रहे हैं, उन सभी में एफआर लग चुकी है। केवल तीन मुकदमे पेंडिंग हैं, बस। ये सब इन्होंने कोर्ट में बताया है। पहले तथ्यों की जानकारी तो ले लेनी चाहिए थी। देखिए, मैं वकील हूं और मेरा कारोबार है। मैं अपने पैसे लेकर जमीन खरीद रहा हूं। उपासना मेहता से हमने प्रॉपर्टी बेचने के लिए एग्रीमेंट कर रखा है। हमने उसको पैसे दिए हैं, इसीलिए उसने हमें पावर आॅफ अटाॅर्नी दी हुई है।
विकेश नेगी, आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता

‘मेरे ऊपर फर्जी मुकदमा दर्ज करवाया गया’
मैंने जो मेरे ऊपर इन लोगों ने फर्जी एफआईआर करवाई है, उसे निरस्त करने के लिए हाईकोर्ट में क्वैशिंग की याचिका डाली थी। इन लोगों ने मेरे ऊपर जान से मारने की धमकी देने का मुकदमा दर्ज करवाया है। यह एफआईआर पूरी तरह से फर्जी है क्योंकि जिस समय की यह घटना बताई गई है, उस समय मैं देश से बाहर दुबई में था। इसके मेरे पास पूरे प्रमाण हैं, मेरा पासपोर्ट और फोन की लोकेशन में सभी प्रमाण हैं। बावजूद इसके मेरे ऊपर फर्जी तरीके से मुकदमा दर्ज करवाया गया है। पुलिस की मिलीभगत से मेरे ऊपर एफआईआर दर्ज की गई है।

पूरे मामले में एक नहीं, कई अनियमितताएं हैं। पहली बड़ी अनियमितता तो यह है कि 2 फरवरी 2026 को विकेश नेगी, विपिन कुमार, उपासना मेहता की तरफ से कई अज्ञात बंदूकधारियों के साथ हमारी प्राॅपर्टी में घुस जाते हैं और वहां तोड़-फोड़ करके कब्जा करने का प्रयास करते हैं। चार कर्मचारियों को बंधक बनाकर बंगले के भीतर घुसे और फोटो आदि बनाई गई। तरुण पंवार जी को जब इसका पता चला तो उन्होंने मुझे इस मामले में पुलिस को फोन करने को कहा। मैंने पुलिस हेल्पलाइन नम्बर पर फोन करके पूरी जानकारी दी। पुलिस आई और उन लोगों को जो कब्जा करके बैठे थे, कोतवाली लेकर चली जाती है लेकिन थाने ले जाने के बाद पुलिस ने न तो उन लोगों का कोई रिकॉर्ड अपने पास रखा और न ही उनके हथियारों का लाइसेंस पता किया। न तो उन लोगों को गिरफ्तार किया गया और न ही उनके खिलाफ कार्रवाई की गई। उन सभी को छोड़ दिया गया। दूसरी अनियमितता यह है कि इन लोगों ने जो रजिस्ट्री करवाई है, उसमें गवाह भी वही लोग हैं जो उपासना मेहता द्वारा विकेश नेगी को पावर आॅफ अटाॅर्नी पर गवाह हैं। दो व्यक्ति दोनों ही जगह गवाह बने हुए हैं। इससे यह पता चलता है कि विकेश नेगी और उपासना मेहता इस प्राॅपर्टी को हथियाने के लिए फर्जीवाड़ा कर रहे हैं, जिसमें पुलिस-प्रशासन उनका साथ दे रहा है। सौ करोड़ की प्राॅपर्टी को 23 करोड़ में बेचने का ढोंग किया गया। रजिस्ट्री में सिर्फ चेक मेंशन किए गए हैं, उनको भुगतान नहीं हुआ है।

मुझे इसलिए लगता है कि पुलिस हेल्पलाइन का पूरा रिकॉर्ड मिनट दर सेकंड तक का सुरक्षित रहता है और वॉइस रिकॉर्ड भी सुरक्षित रहता है। जब मैंने आरटीआई में इसकी जानकारी ली तो उसमें साफ रिकॉर्ड में है। यहां तक तो सब सही है। 25 फरवरी को कुमुद वैद्य ने इन लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था लेकिन पुलिस ने कुमुद वैद्य द्वारा दर्ज एफआईआर में किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की और न ही उनको थाने बुलाया और इसमें एफआर लगा दी गई लेकिन करीब तीन महीने बाद 11 मई 2026 को विपिन कुमार द्वारा मेरे और कुमुद वैद्य तथा अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी गई। यह सेल एग्रीमेंट है। रानी पदमावती ने जितनी भी रजिस्ट्रियां की हैं, वह कैश में की हैं। आप पूरा रिकॉर्ड ले सकते हैं। तरुण पंवार और रानी पदमावती आपस में रिश्तेदार हैं। 2014 में रानी पदमावती और तरुण पंवार के बीच इस प्रॉपर्टी का सौदा हुआ, जिसमें तरुण पंवार द्वारा 47 लाख रुपए दिए गए थे। इस सौदे का सेल एग्रीमेंट किया गया लेकिन रजिस्ट्री किसी कारण से नहीं हो पाई। अगर हमने कोई गलत काम किया होता तो रानी पदमावती ने हमारे खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज क्यों नहीं करवाया। हमारे कोर्ट में बयान भी दर्ज हैं।

विकेश नेगी हमारे एग्रीमेंट को फर्जी कह रहे हैं लेकिन वे किस हैसियत से इस प्राॅपर्टी को उपासना मेहता की बता रहे हैं। चंद्र बहादुर जी के वारिस रानी पदमावती, कमल प्रसाद व पुष्पा प्रसाद हैं और अब कुमुद वैद्य हैं जबकि उपासना मेहता कोई रिश्तेदार नहीं हैं। कौन ऐसा व्यक्ति होगा जो अपने रिश्तेदार को छोड़कर बाहरी व्यक्ति को अपनी सम्पत्ति वसीयत में देगा। हम अपने हक के लिए कोर्ट गए हैं। कोर्ट में हमने सभी दस्तावेज लगाए हुए हैं। हमें पूरा न्याय मिलेगा। मामला कुमुद वैद्य और हमारे बीच का है जो हम आपस में सुलझा लेंगे लेकिन बाहर का व्यक्ति आकर हमें हमारे हक से हटाने का प्रयास करेगा तो हमारे पास न्यायालय का ही एकमात्र सहारा है, जिस पर हमें भरोसा है।

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