अपूर्व
चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियों के खुलासे ने देश की चुनावी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी खबर के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में आयोग के फैसलों और कामकाज को लेकर बार-बार आपत्ति दर्ज की। मामला केवल एसआईआर तक सीमित नहीं है बल्कि नए मतदाताओं के फाॅर्म-6, मतदाता सूची के डाटा तक अधिकारियों की पहुंच, चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम के केंद्रीकरण, पश्चिम बंगाल में लाखों अपीलों और गोवा के 97 पात्र मतदाताओं के नाम तक पहुंचता है। दोनों आयुक्तों ने कई फैसलों और आदेशों पर सवाल उठाते हुए कहा कि वे उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना आगे बढ़ाए गए। दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि महत्वपूर्ण फैसले तीनों आयुक्तों की सहमति से हुए और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। इस रिपोर्ट के बाद राजनीतिक लड़ाई तेज हो गई है। राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी और पद से हटाने की मांग को लेकर देशभर में प्रदर्शन शुरू कर दिया है और अब काॅकरोच जनता पार्टी ने ज्ञानेश कुमार को हटाए जाने की मांग न माने जाने पर देशव्यापी आंदोलन और फिर जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरने की चेतावनी दे डाली है
भारत का चुनाव आयोग दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक चुनावों की निगरानी करने वाली संवैधानिक संस्था है। उसके फैसले करोड़ों मतदाताओं के अधिकार और देश की राजनीतिक व्यवस्था को सीधे प्रभावित करते हैं। इसलिए जब इसी संस्था के तीन में से दो चुनाव आयुक्त लगातार लिखित आपत्तियां दर्ज करें तो मामला केवल अधिकारियों के बीच मतभेद का नहीं रह जाता। ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ की जांच में सामने आया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के भीतर फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। इनमें एक ही दिन चार आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात भी सामने आई है। इन आपत्तियों का दायरा नए मतदाता के पंजीकरण से लेकर मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, एसआईआर से जुड़े फैसलों, चुनाव आयोग की ओर से दायर की गई अपीलों, मतदाता डाटा की सुरक्षा और चुनाव आयोग के आईटी सिस्टम तक फील्ड अधिकारियों की पहुंच तक फैला हुआ है। इन आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दोनों आयुक्तों ने केवल एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाए बल्कि आयोग के नाम से जारी होने वाले संचार और आदेशों की प्रक्रिया पर भी आपत्ति की। उनका कहना था कि कई संचार ऐसे जारी किए गए जिन पर पूरे आयोग की आवश्यक मंजूरी नहीं थी। 16 अप्रैल को सुखबीर सिंह संधू ने आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों को लिखकर कहा कि आयोग के नाम से कई संचार जारी हो रहे हैं लेकिन उन पर आयोग की मंजूरी नहीं है और आगे से इस प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन किया जाना चाहिए। इसके कुछ दिन बाद विवेक जोशी ने भी इसी तरह की आपत्ति दर्ज की। बाद में दोनों आयुक्तों ने चुनाव आयोग के आईटी सिस्टम में काम के बंटवारे और निगरानी की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए। मामला इतना गम्भीर हुआ कि दोनों ने केंद्रीय कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। सवाल उठता है कि जब तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था में दो सदस्य लगातार किसी फैसले पर सवाल उठा रहे थे तो उन आपत्तियों के बाद फैसले किस प्रक्रिया से आगे बढ़े और क्या दोनों सदस्यों की सहमति या असहमति को औपचारिक रूप से दर्ज किया गया।
14 आपत्तियों का असली महत्व
किसी संस्था में असहमति होना अपने आप में असामान्य नहीं है लेकिन चुनाव आयोग में असहमति का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि मतदाता सूची में एक नाम जुड़ने या हटने का सीधा सम्बंध नागरिक के मतदान के अधिकार से है। यदि किसी नागरिक का नाम मतदाता सूची में नहीं है तो वह मतदान नहीं कर सकता और यदि किसी पात्र नागरिक का नाम तकनीकी या प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण सूची से बाहर रह जाता है तो उसका असर चुनावी प्रक्रिया पर पड़ता है।
‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार दोनों आयुक्तों ने नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची के केंद्रीकृत डाटा, स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों की पहुंच, एसआईआर के दौरान नाम हटाने और बहाली तथा न्यायिक अधिकारियों द्वारा बहाल किए गए नामों के खिलाफ चुनाव आयोग की ओर से दायर अपीलों को लेकर सवाल उठाए। इनमें से कई आपत्तियों में यह चिंता सामने आई कि चुनावी प्रक्रिया का अधिकार स्थानीय स्तर पर वैधानिक अधिकारियों के पास है लेकिन डिजिटल सिस्टम और केंद्रीय स्तर की व्यवस्था उस अधिकार को प्रभावित कर सकती है।
यहां सवाल केवल यह नहीं है कि किसी अधिकारी ने किस फाइल पर हस्ताक्षर किए। सवाल यह है कि चुनाव आयोग की संवैधानिक संरचना में निर्णय लेने का अधिकार किसके पास है और क्या तकनीकी व्यवस्था उस अधिकार को बदल रही है।
फाॅर्म-6 में बदलाव ने बढ़ाई बेचैनी
विवाद का एक बड़ा हिस्सा नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फाॅर्म-6 को लेकर है। पहली बार मतदाता बनने वाला नागरिक इसी फाॅर्म के माध्यम से मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराता है। रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई में फाॅर्म-6 पर एसआईआर से जुड़ा एक नया सवाल सामने आया। आवेदक से पूछा जाने लगा कि उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में था या नहीं। इस सवाल का जवाब दिए बिना आवेदन आगे नहीं बढ़ पा रहा था।
यहीं से चुनाव आयोग के भीतर सवाल उठे। विवेक जोशी ने मई में ही इस बदलाव पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि फाॅर्म-6 में इस तरह का बदलाव नियमों में संशोधन के बिना नहीं किया जा सकता। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई। इसके बावजूद बदलाव लागू हुआ और जब मामला सार्वजनिक हुआ तो 13 अगस्त को संधू ने इसे अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए तत्काल हटाने की मांग की।
फाॅर्म-6 का यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार मतदाता बनने वाला युवा पिछली एसआईआर की सूची में स्वयं मौजूद नहीं हो सकता। ऐसे में उसके माता-पिता या दादा-दादी के पुराने मतदाता रिकाॅर्ड से जुड़ी जानकारी को नई पंजीकरण प्रक्रिया से जोड़ने की जरूरत और उसका कानूनी आधार बड़ा सवाल बन गया। चुनाव आयोग की ओर से अब कहा गया है कि फाॅर्म-6 में वैधानिक संशोधन नहीं किया गया था बल्कि एसआईआर से सम्बंधित अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी और सम्बंधित आदेशों को तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त थी।
मतदाता डाटा का केंद्रीकरण
दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का दूसरा बड़ा हिस्सा चुनावी डाटा के डिजिटल ढांचे से जुड़ा है। चुनाव आयोग की अब तक की सबसे महत्वपूर्ण दलीलों में एक यह रही है कि मतदाता सूची की तैयारी और प्रबंधन विकेंद्रीकृत है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करने और उसे नियंत्रित करने की जिम्मेदारी निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी यानी ईआरओ के पास होती है। ईआरओ एक वैधानिक अधिकारी होता है और उसके स्तर पर मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और सुधार की प्रक्रिया चलती है।
रिपोर्ट के मुताबिक विवेक जोशी ने मई में ही मतदाता डाटाबेस के क्रमिक केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई और इस बात का ऑडिट कराने का सुझाव दिया कि मतदाता डेटाबेस में बदलाव करने की अनुमति केवल सम्बंधित वैधानिक अधिकारियों के पास हो। अगस्त में सुखबीर सिंह संधू ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि राज्य स्तर के निर्वाचन अधिकारी ईआरओ नेट तक उचित और पूर्ण पहुंच नहीं होने की शिकायत कर रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग के आईटी महानिदेशक की भूमिका और वैधानिक अधिकारियों की स्वतंत्रता को लेकर भी सवाल उठाया।
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला
गोवा का मामला इसी विवाद को जमीन पर दिखाता है। रिपोर्ट के मुताबिक 97 मतदाताओं के मामलों में स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें पात्र माना लेकिन डिजिटल सिस्टम में उन्हें दोबारा शामिल करने के लिए जरूरी प्रावधान समय पर उपलब्ध नहीं था। परिणाम यह हुआ कि ये नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके। संख्या 97 है लेकिन सवाल 97 का नहीं है। सवाल यह है कि यदि किसी वैधानिक निर्वाचन अधिकारी ने किसी नागरिक को मतदाता सूची में शामिल करने का निर्णय लिया है तो कोई डिजिटल सिस्टम उस निर्णय को लागू होने से कैसे रोक सकता है। चुनाव आयोग की डिजिटल व्यवस्था अधिकारी की सहायता के लिए है या वह धीरे-धीरे निर्णय के परिणाम को प्रभावित करने की स्थिति में पहुंच रही है, यह प्रश्न अब इस पूरे विवाद के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में शामिल हो गया है।
नए घटनाक्रम में गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से इन मामलों को अलग-अलग प्रक्रिया के तहत देखने की जानकारी सामने आई है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने यह भी दावा किया है कि गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने के लिए चुनाव आयोग को सात दिनों में आठ बार पत्र लिखा था। इस पूरे घटनाक्रम ने ईसीआई नेट की भूमिका और स्थानीय अधिकारियों की स्थिति को लेकर बहस और तेज कर दी है।
पश्चिम बंगाल में लाखों अपीलें
एसआईआर का सबसे बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद पश्चिम बंगाल का है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि एसआईआर के बाद बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए और उनमें से 22.21 लाख से अधिक मतदाताओं ने अपने नाम बहाल कराने के लिए अपील की। इसके अलावा ऐसे मामलों में भी अपीलें दाखिल हुईं जिनमें न्यायिक अधिकारियों ने किसी मतदाता का नाम सूची में शामिल करने का फैसला किया था। कुल अपीलों की संख्या लगभग 38 लाख तक पहुंच गई। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने आयोग के अधिकारियों से पूछा कि पश्चिम बंगाल में उन मतदाताओं के खिलाफ चुनाव आयोग की ओर से अपील किसके आदेश पर दायर की गई जिनके नाम न्यायिक अधिकारियों ने शामिल किए थे? उन्होंने यह भी पूछा कि इन अपीलों को दायर करने की अनुमति किसने दी? और वास्तव में इन्हें किसने दायर किया? संधू ने यह दर्ज किया कि उन्हें, विवेक जोशी और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इन अपीलों के आधार और प्रक्रिया की जानकारी नहीं थी।
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां मामला सीधे न्यायिक प्रक्रिया और चुनाव आयोग की भूमिका के बीच आ रहा है। यदि न्यायिक अधिकारी किसी मतदाता को बहाल करते हैं और उसके बाद चुनाव आयोग उस आदेश के खिलाफ अपील करता है तो यह निर्णय आयोग के किस स्तर पर लिया गया, यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है।
चार महीने तक पूर्ण आयोग की बैठक नहीं
इसी बीच रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया। 9 सितम्बर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की पूर्ण बैठक हुई। यह चार महीने में पहली पूर्ण बैठक थी। यानी जिस अवधि में दोनों चुनाव आयुक्त कई मुद्दों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कर रहे थे, उस दौरान तीनों सदस्यों की पूर्ण बैठक लम्बे समय तक नहीं हुई।
9 सितम्बर की बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उससे पहले दोनों आयुक्तों की ओर से कई सवाल उठाए जा चुके थे। दोनों ने आयोग के नाम से जारी संचार, फाॅर्म-6, मतदाता डाटाबेस, आईटी सिस्टम और पश्चिम बंगाल की अपीलों को लेकर आपत्ति की थी। ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण है कि 9 सितम्बर की बैठक में इन सभी मुद्दों पर क्या चर्चा हुई और क्या आपत्तियों का समाधान हुआ।
चुनाव आयोग का विस्तृत जवाब
अब इस पूरे विवाद में चुनाव आयोग ने अपना जवाब और अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखा है। आयोग के अधिकारियों ने कहा है कि एसआईआर के पहले, दूसरे और तीसरे चरण से जुड़े आदेशों में फाॅर्म-6 और फाॅर्म-8 के साथ नागरिकता सम्बंधी घोषणा का प्रावधान तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से मंजूर हुआ था। आयोग का कहना है कि एसआईआर से सम्बंधित फैसलों को इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे दो आयुक्तों को पूरी प्रक्रिया से बाहर रखा गया हो जबकि वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है। ईसीआई नेट के बारे में भी आयोग ने कहा है कि यह कोई पूरी तरह केंद्रीयकृत व्यवस्था नहीं है। आयोग के अनुसार ईसीआईनेट विकेंद्रीकृत डिजिटल मंच है और बूथ लेवल अधिकारी, सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी, निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी, जिला निर्वाचन अधिकारी और मुख्य निर्वाचन अधिकारी अपने-अपने वैधानिक अधिकारों के तहत इसका इस्तेमाल करते हैं। आयोग ने मतदाता डाटा को केंद्रीय स्तर पर मनमाने तरीके से नियंत्रित किए जाने की धारणा को भी खारिज किया है। इस जवाब के बाद विवाद का अगला चरण शुरू हो गया है। अब एक तरफ दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियां हैं, दूसरी ओर आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि महत्वपूर्ण निर्णय सर्वसम्मति से हुए। इसलिए अब बहस का केंद्र उन दस्तावेजों पर है जिनसे यह स्पष्ट हो सके कि आपत्तियों के बाद अंतिम निर्णय किस तरह लिए गए।
1995 का शेषन फैसला फिर क्यों याद आया?
मौजूदा विवाद के बीच 1995 का ‘टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ’ फैसला फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। उस समय मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन और केंद्र सरकार के बीच चुनाव आयोग की संरचना और शक्तियों को लेकर गम्भीर विवाद था। केंद्र ने चुनाव आयोग को बहु-सदस्यीय बनाया और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की गई। मामला सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ तक पहुंचा। 14 जुलाई 1995 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनावों की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार चुनाव आयोग को दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले चुनाव आयोग हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के अध्यक्ष हैं लेकिन अन्य चुनाव आयुक्त भी आयोग के वास्तविक सदस्य हैं और उनकी भूमिका केवल सलाह देने तक सीमित नहीं है।
आज के विवाद में यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तीन सदस्यीय आयोग के दो सदस्यों की ओर से लगातार लिखित आपत्तियां सामने आई हैं। 2023 के कानून में भी आयोग के कामकाज को लेकर व्यवस्था दी गई है कि जहां तक सम्भव हो, आयोग का काम सर्वसम्मति से किया जाए और यदि मतभेद हो तो बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाए। काम के बंटवारे और प्रक्रिया को लेकर भी आयोग के भीतर निर्धारित संस्थागत व्यवस्था का पालन जरूरी है। इसलिए मूल सवाल असहमति का होना नहीं है। मूल सवाल यह है कि असहमति के बाद संस्थागत प्रक्रिया क्या रही।
राहुल गांधी का ‘वोट चोरी’ अभियान
राहुल गांधी लम्बे समय से चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका आरोप है कि चुनावों में मतदाताओं के वोट प्रभावित किए जा रहे हैं और मतदाता सूचियों में हेर-फेर के जरिए कांग्रेस और विपक्ष के खिलाफ चुनावी नुकसान की स्थिति पैदा की जा रही है। वह कई मौकों पर इसे ‘वोट चोरी’ का नाम देते हुए चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ भाजपा के बीच मिलीभगत का आरोप भी लगा चुके हैं। राहुल गांधी का कहना रहा है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और एक ही पते पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम होने जैसी अनियमितताओं की जांच होनी चाहिए और चुनाव आयोग को पूरा डाटा
सार्वजनिक करना चाहिए।
अब चुनाव आयोग के भीतर सामने आई दो चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियों ने राहुल गांधी के पुराने आरोपों को नया राजनीतिक संदर्भ दे दिया है। खासतौर पर मतदाता सूची, एसआईआर, फाॅर्म-6, चुनावी डाटा के केंद्रीकरण और ईसीआईनेट से जुड़े सवालों को राहुल गांधी अपने पहले से उठाए जा रहे मुद्दों से जोड़ रहे हैं। 24 सितम्बर को उन्होंने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए उनसे ‘सरकारी गवाह’ बनने की अपील तक कर दी। राहुल गांधी का कहना है कि यदि चुनाव आयोग के भीतर ही दो आयुक्त महत्वपूर्ण फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं तो उनके पुराने आरोपों को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस तरह ‘वोट चोरी’ का मुद्दा अब केवल चुनावी सभाओं और राजनीतिक भाषणों का विषय नहीं रह गया है। चुनाव आयोग के भीतर की आपत्तियों ने इसे मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया की कार्यप्रणाली से जोड़ दिया है।
कांग्रेस सड़क पर, संसद में भी तैयारी
कांग्रेस ने इस विवाद को अब देशव्यापी आंदोलन में बदलने का फैसला किया है। पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और उनकी गिरफ्तारी की मांग कर रही है। कांग्रेस ने विपक्षी दलों से सम्पर्क कर लोकसभा और राज्यसभा में ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव लाने की तैयारी भी शुरू कर दी है। विपक्षी दल अगले दो सप्ताह के भीतर दोनों सदनों में नोटिस देने की तैयारी कर रहे हैं। इससे विवाद अब सड़क और मीडिया से निकलकर संसद की प्रक्रिया तक पहुंचने वाला है। प्रियंका गांधी ने भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की है। शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मुख्य चुनाव आयुक्त की गिरफ्तारी और नए चुनाव कराने की मांग उठाई है। विपक्ष के अलग-अलग दल अब एसआईआर और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर अलग-अलग राज्यों में आंदोलन तेज कर रहे हैं।
महुआ मोइत्रा की पुलिस शिकायत
विवाद अब पुलिस शिकायत तक भी पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में मतदाता सूची में कथित हेर-फेर और चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए गए हैं। महुआ मोइत्रा ने आयोग के भीतर सामने आई 14 आपत्तियों का हवाला देते हुए मतदाता सूची और चुनावी डाटा से जुड़े पूरे मामले की जांच की मांग की है। उनकी शिकायत के बाद अब इस विवाद का एक नया कानूनी और राजनीतिक आयाम सामने आया है।
सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली एसआईआर
इस पूरे विवाद के समानांतर दिल्ली में एसआईआर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई चल रही है। अदालत ने मतदाताओं को भेजे गए ‘लाॅजिकल डिस्क्रेपेंसी’ नोटिसों को लेकर चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि बड़ी संख्या में नोटिस लगभग यांत्रिक तरीके से जारी किए जाने की स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए। अदालत ने मतदाताओं को अपना पक्ष रखने के लिए अधिक प्रभावी माध्यम उपलब्ध कराने पर भी सवाल उठाए और चुनाव आयोग से इस प्रक्रिया को लेकर तत्काल कदमों की जानकारी मांगी। मामले को दो सप्ताह बाद फिर सुनवाई के लिए रखा गया है। दिल्ली एसआईआर का यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी प्रक्रिया के तहत चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू समेत बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस जारी हुए हैं। संधू का नाम भी ‘सेल्फ नेम मिसमैच’ जैसी श्रेणी में आया था, जिसे बाद में सम्बंधित निर्वाचन अधिकारी ने सत्यापित कर दिया। यह घटनाक्रम उस बहस को और गम्भीर बनाता है जिसमें डिजिटल सिस्टम द्वारा मतदाता रिकॉर्ड में विसंगतियां चिन्हित किए जाने और उसके बाद नोटिस भेजे जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
काॅकरोच जनता पार्टी फिर सड़क पर
इस बीच काॅकरोच जनता पार्टी ने भी चुनाव आयोग विवाद को लेकर अपना आंदोलन तेज करने की घोषणा की है। पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को 48 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए इस्तीफा देने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि निर्धारित समय में इस्तीफा नहीं दिया गया तो देशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। काॅकरोच जनता पार्टी ने इसके बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर फिर उतरने और अनिश्चितकालीन धरना शुरू करने की चेतावनी दी है। पार्टी ने एसआईआर और मतदाता सूची से जुड़े सवालों को लेकर पहले भी प्रदर्शन किया था और अब नए विवाद के बाद आंदोलन को दोबारा बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी की है। पार्टी की ओर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में बदलाव, एसआईआर को लेकर पुनर्विचार और मतदाता सूची की पारदर्शिता से जुड़े सवाल उठाए जा रहे हैं। इस घोषणा के बाद चुनाव आयोग विवाद का राजनीतिक दायरा और बढ़ गया है। कांग्रेस ने 25 सितम्बर से देशभर में प्रदर्शन शुरू कर दिया है, विपक्ष संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है।
भाजपा चुनाव आयोग के भीतर सामने आई असहमति को संस्था के भीतर होने वाली सामान्य लोकतांत्रिक चर्चा का हिस्सा बता रही है। भाजपा की ओर से कहा गया है कि दो चुनाव आयुक्तों द्वारा अलग-अलग राय दर्ज कराना अपने आप में किसी संवैधानिक संकट का प्रमाण नहीं है। पार्टी ने विपक्ष पर चुनाव आयोग के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाने का आरोप लगाया है। भाजपा नेता संबित पात्रा के अनुसार आयोग के भीतर होने वाली चर्चा और असहमति को सार्वजनिक विवाद बनाकर संस्था की विश्वसनीयता पर हमला किया जा रहा है। दूसरी ओर चुनाव आयोग लगातार यह कह रहा है कि महत्वपूर्ण निर्णय तीनों आयुक्तों की सहमति से हुए और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
अब मामला व्यक्ति से आगे संस्था का है
मौजूदा विवाद को केवल ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक सीमित करके देखना इस पूरे घटनाक्रम के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को छोटा कर देगा। आज राजनीतिक निशाना ज्ञानेश कुमार हैं लेकिन असली सवाल चुनाव आयोग की संस्थागत कार्यप्रणाली का है। मतदाता सूची किसके नियंत्रण में है, ईसीआईनेट और ईआरओनेट में अधिकारों का वास्तविक बंटवारा क्या है, नए मतदाता के फाॅर्म-6 में अतिरिक्त जानकारी जोड़ने का आधार क्या है, स्थानीय निर्वाचन अधिकारी के फैसले को तकनीकी सिस्टम किस सीमा तक प्रभावित कर सकता है, पश्चिम बंगाल में लाखों अपीलों की प्रक्रिया किस स्तर पर तय हुई और आयोग के तीनों सदस्यों के बीच निर्णय किस तरह लिए जाते हैं, ये सवाल ज्ञानेश कुमार के बाद भी बने रहेंगे।
यदि चुनाव आयोग कहता है कि सभी महत्वपूर्ण फैसले तीनों आयुक्तों की सहमति से हुए और अंतिम निर्णय सर्वसम्मत थे तो देश यह जानना चाहेगा कि इन आपत्तियों के बाद क्या चर्चा हुई, क्या बदला और किस आधार पर अंतिम सहमति बनी। क्योंकि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल चुनाव कराने से नहीं बनती। वह इस भरोसे से बनती है कि चुनाव कराने वाली संस्था खुद अपने भीतर पारदर्शी, सामूहिक और नियमबद्ध तरीके से निर्णय ले रही है। अब बंद कमरे की बहस देश के सामने है। सवाल यह नहीं रह गया कि चुनाव आयोग के भीतर असहमति थी या नहीं। सवाल यह है कि उस असहमति के बाद फैसला कैसे हुआ।