चुनावी मुद्दा बनेगा एसआईआर?
जीवन सिंह टनवाल
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार इन दिनों चुनाव आयोग से ज्यादा राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर विपक्ष के हमले, आयोग के भीतर कथित मतभेदों की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की हालिया पूछताछ ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को बहस के बीच ला खड़ा किया है। खासकर दिल्ली में ‘लाॅजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के नाम पर लाखों मतदाताओं को भेजे गए नोटिसों पर अदालत की टिप्पणियों ने विवाद को नया आधार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आयोग से स्पष्टीकरण मांगा और यह भी पूछा कि क्या कुछ नोटिस लगभग यांत्रिक तरीके से जारी किए गए।
इसके बाद राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि जिस एसआईआर को चुनाव आयोग मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन बनाने की कवायद बता रहा है तथा भाजपा इसे चुनावी पारदर्शिता से जोड़ रही है क्या वही प्रक्रिया आने वाले चुनावों में विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकती है? क्या इसका असर सीधे भाजपा पर पड़ेगा या इसकी सबसे बड़ी कीमत चुनाव आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता को चुकानी होगी? सबसे अहम सवाल यह है कि क्या आयोग पारदर्शी प्रक्रिया और प्रभावी समाधान के जरिए विवाद को शांत कर पाएगा?
गौरतलब है कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और वह एसआईआर से जुड़े फैसलों को संस्थागत एवं सामूहिक निर्णय बताता रहा है। 23 सितम्बर को आयोग ने उन रिपोर्टों को खारिज किया जिनमें तीन सदस्यीय आयोग के भीतर एसआईआर को लेकर मतभेद की बात कही गई थी। आयोग के अनुसार विचारों में अंतर स्वाभाविक है लेकिन अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। 26 सितम्बर की बैठक के बाद भी आयोग ने एकजुटता का संदेश दिया। हालांकि एक रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्तों एस.एस. संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में एसआईआर से संबंधित कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में ऐसे निर्णयों का भी उल्लेख है जिन्हें दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर अपनी जानकारी या सहमति के बिना आगे बढ़ाए जाने की बात कही। दूसरी ओर आयोग का कहना है कि आंतरिक विचार-विमर्श में अलग- अलग राय आना सामान्य प्रक्रिया है। अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। यही विरोधाभास विवाद को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना रहा है। विपक्ष के लिए यह केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण का मामला नहीं है। कांग्रेस समेत कई दल आयोग की निष्पक्षता, एसआईआर की प्रक्रिया और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। कुछ विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी की है। इसके उलट भाजपा और उसके समर्थक आयोग के स्पष्टीकरण को पर्याप्त बताते हुए विपक्ष पर संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगा रहे हैं।
दिल्ली का मामला इस बहस को और संवेदनशील बनाता है। हाल में सामने आए आंकड़ों के अनुसार 33 लाख से अधिक मतदाताओं को ‘लाॅजिकल डिस्क्रेपेंसी’ और ‘अनमैप्ड’ जैसी श्रेणियों के तहत नोटिस जारी किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन विसंगतियों का स्पष्ट अर्थ बताने और मतदाताओं को यह समझाने की जरूरत पर जोर दिया है कि वे किस जानकारी या दस्तावेज के जरिए अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं। अदालत ने अतिरिक्त मानवीय जांच और जवाब देने के अधिक सुविधाजनक तरीकों पर भी विचार करने को कहा है। यहीं एसआईआर का तकनीकी पक्ष राजनीतिक मुद्दे में बदल सकता है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण अपने आप में असामान्य प्रक्रिया नहीं है। चुनाव आयोग का घोषित उद्देश्य सूची को अद्यतन रखना और मृत, स्थानांतरित या दोहरे पंजीकरण वाले मतदाताओं की पहचान करना है। आयोग ने राजनीतिक दलों के साथ बैठकें की हैं और मतदाताओं के लिए ऑनलाइन सेवाएं भी उपलब्ध कराई हैं लेकिन सवाल एसआईआर होने का नहीं बल्कि इसे लागू करने के तरीके का है। यदि पात्र मतदाताओं के अधिकार सुरक्षित रहते हैं, शिकायतों का समय पर निपटारा होता है और नोटिस की भाषा स्पष्ट रहती है तो आयोग अपनी प्रक्रिया के पक्ष में भरोसा कायम कर सकता है। इसके विपरीत, यदि बड़ी संख्या में मतदाताओं को दस्तावेजी उलझनों या तकनीकी त्रुटियों का सामना करना पड़ता है तो विपक्ष को इसे चुनावी मुद्दा बनाने का अवसर मिलेगा।
एसआईआर का प्रभाव केवल उन राज्यों तक सीमित नहीं रहेगा जहां निकट भविष्य में चुनाव होने हैं। मतदाता सूची से जुड़ा विवाद सीधे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। यदि किसी दल को लगता है कि उसके समर्थक मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं तो वह इसे चुनावी मंच पर उठाएगा। यही कारण है कि बिहार से शुरू हुई एसआईआर की बहस दिल्ली समेत दूसरे राज्यों तक पहुंच चुकी है।
पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओ.पी. रावत ने भी दिल्ली में ‘लाॅजिकल डिस्क्रेपेंसी’ वाले नोटिसों पर सवाल उठाते हुए उनका आधार स्पष्ट और ठोस रखने की जरूरत बताई है। वहीं आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर विश्लेषकों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि यदि किसी निर्णय पर आयुक्तों को गम्भीर आपत्ति थी तो संस्थागत स्तर पर उपलब्ध प्रक्रियाओं का किस तरह इस्तेमाल किया गया। इससे स्पष्ट है कि विवाद केवल ज्ञानेश कुमार की भूमिका तक सीमित नहीं बल्कि आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया भी इसके दायरे में है।
ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति का संदर्भ भी इस बहस से जुड़ा है। उन्होंने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में कार्यभार सम्भाला था। उनकी नियुक्ति नए कानूनी ढांचे के तहत हुई, जिसमें प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता वाली चयन समिति का प्रावधान है। विपक्ष इस व्यवस्था पर पहले से सवाल उठाता रहा है। अब एसआईआर विवाद ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े पुराने प्रश्नों को फिर चर्चा में ला दिया है। यहीं भाजपा के सामने पेचीदा राजनीतिक स्थिति बनती है। यदि आयोग का खुलकर बचाव करती है तो विपक्ष इसे सरकार और आयोग के बीच निकटता के प्रमाण के रूप में पेश कर सकता है। यदि वह आयोग से दूरी बनाती है तो उसके राजनीतिक बचाव पर सवाल उठ सकते हैं। हालांकि आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी राजनीतिक दलों से अलग रहकर चुनाव प्रक्रिया संचालित करना है।
ऐसे में भाजपा के लिए चुनौती आयोग की संस्थागत भूमिका और पारदर्शिता पर जोर देने की है, न कि हर विवादित प्रशासनिक फैसले को राजनीतिक बचाव का विषय बनाने की। विपक्ष के सामने भी अपनी चुनौती है। एसआईआर में प्रक्रियागत खामियों, पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित होने और नोटिसों की पारदर्शिता जैसे मुद्दों को प्रमाणों के साथ उठाना उसके अभियान को तथ्यात्मक आधार दे सकता है लेकिन यदि बहस केवल आयोग की मंशा या किसी व्यक्ति के इरादे पर केंद्रित होती है तो वास्तविक प्रक्रियागत सवाल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के पीछे छूट सकते हैं। इस बीच चुनाव आयोग ने विवाद कम करने की दिशा में प्रक्रियाओं और तकनीकी व्यवस्थाओं पर स्पष्टीकरण दिया है। डिजिटल पहलों पर अतिरिक्त चर्चा और जांच की बात भी कही गई है। दिल्ली और महाराष्ट्र में एसआईआर से जुड़ी कुछ समय- सीमाएं लगभग एक महीने बढ़ाई गई हैं। इन कदमों से विवाद समाप्त हो जाएगा, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, आयोग के स्पष्टीकरण और अंतिम मतदाता सूची में होने वाले बदलाव इस बहस की दिशा तय करेंगे।
फिलहाल एसआईआर महज मतदाता सूची के तकनीकी पुनरीक्षण का विषय नहीं रह गया है। यह चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, उसकी आंतरिक निर्णय प्रक्रिया, न्यायिक निगरानी और राजनीतिक दलों के बीच संस्थागत भरोसे की बड़ी बहस बन चुका है। आने वाले चुनावों में इसका राजनीतिक असर कितना होगा, यह अभी तय नहीं है लेकिन इतना स्पष्ट है कि एसआईआर की सबसे बड़ी परीक्षा केवल मतदाता सूची को अद्यतन करने में नहीं बल्कि उस प्रक्रिया पर भरोसा कायम करने में होगी। यदि आयोग पारदर्शिता, सुनवाई और शिकायत निवारण के सवालों का संतोषजनक समाधान करता है तो विवाद का दायरा सीमित हो सकता है। अन्यथा एसआईआर चुनावी राजनीति में बार-बार लौटने वाला मुद्दा बन सकता है।
