विपक्ष को मुद्दे देने की यह कैसी राजनीति? भाजपा को आखिर हुआ क्या है?

जिस भाजपा ने वर्षों तक विपक्ष को उसके ही बयानों और गलतियों के सहारे घेरा, वह आज खुद ऐसे विवादों में क्यों फंसती जा रही है जिनसे विपक्ष को बैठे-बिठाए राजनीतिक हथियार मिल जाता है? हल्द्वानी में मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के मंच के शुद्धिकरण से लेकर राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी, छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और संविधान बदलने के डर तक, सवाल सिर्फ एक घटना का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भाजपा की राजनीतिक मशीनरी में कहीं वह सतर्कता कम हो गई है जो कभी उसे विपक्ष से कई कदम आगे रखती थी?

भारतीय राजनीति में कुछ घटनाएं सरकार के खिलाफ इसलिए नहीं जातीं कि विपक्ष ने उन्हें बहुत शानदार ढंग से उठाया बल्कि इसलिए जाती हैं क्योंकि सत्ता पक्ष खुद विपक्ष को वह मुद्दा उपलब्ध करा देता है। हल्द्वानी की घटना को इसी नजरिए से देखना चाहिए। आठ अगस्त को कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने हल्द्वानी के रामलीला मैदान में जनसभा की। इसके दो दिन बाद उसी मंच का भाजपा से जुड़े स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में ‘शुद्धिकरण’ किया गया और वहां हवन आयोजित हुआ। खड़गे ने 13 अगस्त को संसद के अंतिम दिन राज्यसभा में इस घटना को उठाते हुए इसे अपने साथ दलित होने के कारण भेदभाव से जोड़ा और सवाल किया कि लोकतंत्र में क्या ऐसा व्यवहार स्वीकार्य है। भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा को तत्काल सदन में सफाई देनी पड़ी। उन्होंने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताया, इसकी निंदा की और जांच का आश्वासन दिया।

यहीं भाजपा के लिए असली समस्या पैदा होती है। हल्द्वानी में जो हुआ, वह अब किसी स्थानीय धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रह गया था। भाजपा के स्थानीय नेताओं की मौजूदगी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के मंच का शुद्धिकरण किया जाना अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संदेश बन गया। खड़गे के संसद में इस मुद्दे को उठाते ही यह मामला जाति, सामाजिक समानता, संवैधानिक मूल्यों और राजनीतिक गरिमा के सवाल में बदल गया। कांग्रेस को कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। उसके अध्यक्ष संसद में खड़े हुए और पूरा मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया। प्रियंका गांधी ने इसे भाजपा-आरएसएस की मानसिकता से जोड़ दिया और प्रधानमंत्री से माफी की मांग कर दी। कांग्रेस सांसद कुमारी शैलजा ने तो यहां तक कहा कि उत्तराखण्ड को ऐसी विचारधारा और मानसिकता से ‘शुद्धिकरण’ की जरूरत है। यानी जो घटना स्थानीय स्तर पर हुई थी, वह देखते-देखते संसद के पटल पर भाजपा के सामने खड़ी हो गई।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और बात बेहद महत्वपूर्ण है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। जैसे ही खड़गे ने राज्यसभा में हल्द्वानी के शुद्धिकरण का मुद्दा उठाया और विपक्ष ने इस पर हंगामा शुरू किया, उसके कुछ ही समय बाद लोकसभा की कार्यवाही भी समाप्त घोषित कर दी गई। यह महज संयोग हो सकता है लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह आशंका स्वाभाविक है कि सरकार को अंदाजा हो गया था कि अब विपक्ष इस घटना को लोकसभा में भी बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश करेगा। ऐसे में चर्चा और सम्भावित हंगामे की नौबत आने से पहले ही सदन की कार्यवाही समाप्त कर दी गई। यदि विपक्ष को इस मुद्दे पर सदन में विस्तार से बोलने का अवसर मिलता तो भाजपा को एक ऐसे विषय पर जवाब देना पड़ता जिसमें तस्वीरें, स्थानीय नेताओं की मौजूदगी और ‘शुद्धिकरण’ जैसे शब्द उसके लिए राजनीतिक रूप से बेहद असहज स्थिति पैदा कर सकते थे। यानी जिस घटना को भाजपा के स्थानीय नेताओं ने शायद अपने राजनीतिक-सामाजिक नजरिए से देखा होगा, उसने राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के लिए असहज सवाल खड़ा कर दिया और संसद में खड़गे के सवाल के बाद लोकसभा की कार्यवाही समाप्त हो जाना इस बात की राजनीतिक आशंका को और मजबूत करता है कि सरकार विपक्ष को इस मुद्दे को सदन में विस्तार देने का अवसर नहीं देना चाहती थी।
भारी हंगामे के बीच राज्यसभा भी लगभग 12 बजे अगले सत्र तक के लिए स्थगित कर दी गई। इस तरह मानसून सत्र समाप्त हो गया लेकिन हल्द्वानी की घटना ने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया, आखिर भाजपा को हो क्या गया है कि वह बार-बार विपक्ष को ऐसे मुद्दे उपलब्ध करा रही है, जिन पर उसे बाद में सफाई देनी पड़ती है?
यह पहली बार नहीं है जब भाजपा को अपने ही खेमे से पैदा हुए किसी विवाद के बाद पीछे हटना पड़ा हो। सबसे बड़ा उदाहरण नूपुर शर्मा का है। 2022 में भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा की पैगम्बर मोहम्मद पर टिप्पणी ने देश के भीतर ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। भाजपा को उनसे दूरी बनानी पड़ी, उन्हें निलम्बित किया गया और दिल्ली भाजपा के नेता नवीन जिंदल को भी पार्टी से बाहर किया गया। नूपुर शर्मा ने बाद में अपने बयान वापस लिए। उस समय राजनीतिक विश्लेषण का एक बड़ा सवाल यही था कि भाजपा को अपने एक प्रवक्ता के बयान के कारण अचानक ‘सभी धर्मों का सम्मान’ करने की अपनी आधिकारिक स्थिति को जोर देकर सामने क्यों लाना पड़ा।
दूसरा उदाहरण कृषि कानूनों का है। तीन कृषि कानूनों को सरकार कृषि सुधारों के रूप में पेश कर रही थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं कहा था कि इन कानूनों का उद्देश्य किसानों, विशेषकर छोटे किसानों को लाभ पहुंचाना था लेकिन लम्बे किसान आंदोलन और राजनीतिक दबाव के बाद नवम्बर 2021 में प्रधानमंत्री ने स्वयं तीनों कानून वापस लेने की घोषणा की। यह केवल किसी नीति के वापस लेने की कहानी नहीं थी। राजनीतिक संदेश यह गया कि सरकार ने जनता को समझाने की कोशिश की लेकिन व्यापक सामाजिक प्रतिरोध के सामने उसे अपनी स्थिति बदलनी पड़ी। भाजपा ने उस समय भी राजनीतिक नुकसान को नियंत्रित किया लेकिन सवाल उठा कि इतनी बड़ी नीति लागू करने से पहले क्या राजनीतिक और सामाजिक संवाद पर्याप्त था?
2024 के लोकसभा चुनाव ने इस सवाल को और गम्भीर बना दिया था। ‘400 पार’ का नारा भाजपा के लिए शक्ति का प्रतीक था लेकिन विपक्ष ने इसी नारे को संविधान बदलने के डर से जोड़ दिया। भाजपा के कुछ नेताओं और उम्मीदवारों की संविधान बदलने सम्बंधी टिप्पणियों ने विपक्ष को अतिरिक्त सामग्री दी। अंततः नरेंद्र मोदी को स्वयं इस नैरेटिव का जवाब देना पड़ा। भाजपा को यह बताने के लिए जोर लगाना पड़ा कि संविधान में बदलाव कर आरक्षण खत्म करने या संविधान बदलने का उसका कोई इरादा नहीं है। यहां भी सवाल वही था, क्या भाजपा को खुद अपने विरोधियों के लिए इतना आसान नैरेटिव उपलब्ध कराने की जरूरत थी? आज हल्द्वानी में वही सवाल एक नए रूप में सामने है।
भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा केवल कांग्रेस नहीं है। असली खतरा यह है कि वह अपने विरोधियों को ऐसी तस्वीरें और घटनाएं उपलब्ध करा दे जिनके सामने उसके तमाम भाषण कमजोर पड़ जाएं। राजनीति में एक तस्वीर कई हजार शब्दों से ज्यादा प्रभावशाली होती है। एक दलित नेता और देश के प्रमुख विपक्षी दल के अध्यक्ष की सभा के बाद उसी मंच का ‘शुद्धिकरण’, यह तस्वीर अपने आपमें कांग्रेस के लिए एक पूरा राजनीतिक भाषण बन जाती है। भाजपा के लिए यह समझना कठिन नहीं होना चाहिए कि इसका राजनीतिक अर्थ क्या निकलेगा।
इसी तरह राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी का मामला भी भाजपा के लिए असहज करने वाला है। राम मंदिर भाजपा की राजनीतिक यात्रा का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक मुद्दा रहा है। ऐसे में मंदिर से जुड़े चढ़ावे में चोरी या गबन के आरोप सामान्य भ्रष्टाचार के आरोपों से अलग राजनीतिक अर्थ रखते हैं। इस मामले में जांच और गिरफ्तारियों की खबरें सामने आईं। विपक्ष के लिए सवाल तैयार था, जिस राम मंदिर को भाजपा ने आस्था और राष्ट्रवाद के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में राजनीति के केंद्र में रखा, उसी मंदिर के चढ़ावे की सुरक्षा और प्रबंधन पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
छात्रों के विरोध और पुलिस कार्रवाई का मामला भी इसी क्रम में आता है। पूरे मानसून सत्र में विपक्ष ने छात्रों के मुद्दे को उठाया और सरकार से जवाब मांगा। सरकार ने चर्चा की पेशकश की, विपक्ष ने अलग शर्तें रखीं और सदन में गतिरोध जारी रहा लेकिन राजनीतिक संचार की दृष्टि से विपक्ष को यह कहने का मौका जरूर मिला कि सरकार छात्रों के सवालों का सामना नहीं करना चाहती। यही वह जगह है जहां भाजपा को अपनी पुरानी राजनीतिक शैली पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत कभी यह थी कि वह नैरेटिव सेट करती थी। आज उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह बन सकती है कि कई बार नैरेटिव उसके खिलाफ घटनाओं से अपने आप बन जाता है क्या इसका अर्थ यह है कि भाजपा कमजोर हो गई है? जरूरी नहीं। भाजपा अभी भी देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक मशीनों में से एक है। उसके पास संगठन है, संसाधन हैं, सरकार है, राज्यों में व्यापक नेटवर्क है और एक मजबूत वैचारिक आधार है लेकिन सत्ता में लम्बे समय तक रहने के बाद  भी राजनीतिक दल के सामने एक खतरा पैदा होता है, वह अपने समर्थक तंत्र की हर गतिविधि को राजनीतिक रूप से सुरक्षित मानने लगता है।
यही आत्मविश्वास कभी-कभी राजनीतिक लापरवाही में बदल जाता है। भाजपा के सामने आज चुनौती यह नहीं है कि वह अपने विरोधियों को चुप करा दे। चुनौती यह है कि वह अपने ही समर्थक तंत्र को यह समझाए कि हर लड़ाई लड़ना जरूरी नहीं है, हर धार्मिक प्रतीक का राजनीतिक इस्तेमाल जरूरी नहीं है और हर विवादित कार्रवाई अंततः पार्टी के खाते में ही लिखी जाती है। हल्द्वानी की घटना का सबसे बड़ा सबक शायद यही है। अगर किसी मंच पर किसी राजनीतिक नेता ने भाषण दिया और उसके बाद भाजपा से जुड़े स्थानीय नेताओं की मौजूदगी में उसी मंच का धार्मिक ‘शुद्धिकरण’ किया जाता है तो उसके राजनीतिक अर्थ से भाजपा बच नहीं सकती। वह इसे केवल धार्मिक अनुष्ठान कहकर खारिज नहीं कर सकती। क्योंकि जब राजनीति में कोई प्रतीक सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल होता है तो उसका संदेश भी सार्वजनिक ही होता है और यदि वह नेता दलित समुदाय से आता है तथा राष्ट्रीय विपक्ष का नेता है तो घटना की संवेदनशीलता कई गुना बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में भाजपा को विपक्ष के आरोपों से ज्यादा अपने लोगों से सवाल करना चाहिए। आखिर यह काम किया ही क्यों गया?
क्या वह अब अपने विरोधियों से ज्यादा अपने ही समर्थक तंत्र की राजनीतिक असावधानी से परेशान होने लगी है? क्या केंद्रीय नेतृत्व और जमीनी संगठन के बीच वह राजनीतिक संवाद कमजोर हुआ है जो किसी विवाद को पैदा होने से पहले रोक सके? या फिर लम्बे समय तक सत्ता में रहने के कारण भाजपा को यह लगने लगा है कि हर विवाद अंततः उसके पक्ष में मोड़ा जा सकता है?
अगर ऐसा है तो यह खतरनाक भ्रम है। राजनीति में कोई भी पार्टी हमेशा अपने विरोधियों की गलतियों पर निर्भर नहीं रह सकती। उसे अपनी गलतियों को भी रोकना पड़ता है और आज भाजपा के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न शायद यही है कि वह विपक्ष को मुद्दे देना कब बंद करेगी।
हल्द्वानी की घटना का राजनीतिक असर कितना होगा, यह आने वाले दिनों में पता चलेगा लेकिन संसद के आखिरी दिन का घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर देता है। खड़गे ने जैसे ही यह मुद्दा राज्यसभा में उठाया, विपक्ष ने हंगामा शुरू किया और थोड़ी ही देर बाद लोकसभा की कार्यवाही भी अगले सत्र तक के लिए समाप्त घोषित कर दी गई। इससे यह राजनीतिक आशंका पैदा होना स्वाभाविक है कि सरकार को अंदाजा था कि विपक्ष इस घटना को लोकसभा में भी बड़ा मुद्दा बनाएगा और सरकार उस बहस से बचना चाहती थी।
यदि ऐसा था तो यह भाजपा की रणनीतिक परेशानी का सबसे स्पष्ट संकेत है, एक स्थानीय घटना इतनी राजनीतिक रूप से असहज हो गई कि सरकार को संसद में उसके विस्तार की आशंका होने लगी। यही भाजपा के लिए सबसे बड़ी चेतावनी है। जिस पार्टी ने विपक्ष की हर गलती को राजनीतिक अवसर में बदलना सीखा था, उसे अब यह सीखना होगा कि अपने ही खेमे की हर गलती को विपक्ष का अवसर बनने से कैसे रोका जाए क्योंकि आज की राजनीति में विपक्ष हमेशा मुद्दे नहीं बनाता। कई बार सत्ता पक्ष खुद उसके लिए मुद्दे तैयार करके भेज देता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *