तालिबान के पांच साल, चुनौती बरकरार

अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता के पांच साल पूरे हो गए हैं लेकिन उसके खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध खत्म नहीं हुआ है। बदख्शां में हालिया संघर्ष और कई नए संगठनों की सक्रियता ने तालिबान के सामने सुरक्षा की नई चुनौती खड़ी कर दी है। हालांकि फिलहाल कोई भी संगठन इतना मजबूत नहीं है कि तालिबान के कब्जे वाले किसी बड़े इलाके पर स्थायी नियंत्रण स्थापित कर सके

अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी को पांच साल पूरे हो चुके हैं। अगस्त 2021 में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के साथ जिस तरह तालिबान ने तेजी से काबुल पर कब्जा किया था, उसने अफगानिस्तान में दो दशक से चले आ रहे युद्ध का एक अध्याय जरूर बंद किया लेकिन संघर्ष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। तालिबान के खिलाफ कई सशस्त्र संगठन अब भी सक्रिय हैं और पिछले कुछ समय में उनकी गतिविधियां फिर चर्चा में आई हैं। इनमें नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट (एनआरएफ), अफगानिस्तान फ्रीडम फ्रंट और कई छोटे सशस्त्र संगठन शामिल हैं। हालांकि इन संगठनों की गतिविधियों को अभी तालिबान के लिए अस्तित्वगत खतरा नहीं माना जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के आकलन के मुताबिक इन समूहों में से कोई भी अफगानिस्तान के किसी बड़े हिस्से पर स्थायी नियंत्रण कायम करने की स्थिति में नहीं है। फिर भी दूरदराज के इलाकों में होने वाले हमले तालिबान के लिए लगातार सुरक्षा चुनौती बने हुए हैं।

हालिया घटनाक्रम में बदख्शां प्रांत का जेबाक जिला खास तौर पर चर्चा में आया है। यहां अफगानिस्तान फ्रीडम फ्रंट और तालिबान बलों के बीच संघर्ष हुआ। फ्रीडम फ्रंट ने दावा किया कि उसने तालिबान के कई ठिकानों को निशाना बनाया और कुछ सैन्य प्रतिष्ठानों पर कब्जा किया। तालिबान ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि हमले को नाकाम कर दिया गया और हमलावरों को नुकसान पहुंचाया गया। दोनों पक्षों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
पंजशीर से बदख्शां तक
तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद उसका सबसे बड़ा सशस्त्र विरोध पंजशीर घाटी से सामने आया था। पूर्व अफगान सरकार के सुरक्षा बलों और सेना से जुड़े कई लोगों ने नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट के साथ मिलकर
तालिबान के खिलाफ मोर्चा सम्भाला। पंजशीर को तालिबान विरोधी प्रतिरोध का प्रमुख केंद्र माना गया लेकिन तालिबान ने सैन्य अभियान के जरिए घाटी के अधिकांश हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
इसके बाद तालिबान विरोधी प्रतिरोध का स्वरूप बदल गया। बड़े सैन्य मोर्चों की जगह छोटे और अचानक किए जाने वाले हमले सामने आने लगे। अलग-अलग संगठनों ने तालिबान के सुरक्षा प्रतिष्ठानों, गश्ती दलों और सरकारी ठिकानों पर हमले करने के दावे किए। इन हमलों की संख्या और प्रभाव को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं लेकिन इतना स्पष्ट है कि तालिबान विरोधी सशस्त्र गतिविधियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।
समस्या यह भी है कि अफगानिस्तान में तालिबान विरोधी संगठनों की संख्या बढ़ती दिखाई देती है लेकिन उनके बीच कोई मजबूत और एकीकृत कमान नहीं है। कई संगठन एक-दूसरे से अलग काम करते हैं और कई बार एक ही घटना की जिम्मेदारी एक से अधिक समूह लेते हैं। इसलिए केवल संगठनों की संख्या बढ़ने को तालिबान विरोधी आंदोलन की ताकत बढ़ने के रूप में नहीं देखा जा सकता।
तालिबान के खिलाफ सक्रिय संगठनों में एनआरएफ और अफगानिस्तान फ्रीडम फ्रंट सबसे ज्यादा चर्चित हैं। इनके अलावा भी कई छोटे संगठनों के नाम सामने आते रहे हैं। इनमें से कुछ संगठनों का दावा है कि वे पूर्व अफगान सुरक्षा बलों के सदस्यों और तालिबान विरोधी स्थानीय लोगों को अपने साथ जोड़ रहे हैं लेकिन उनके वास्तविक जमीनी नेटवर्क और लड़ाकू क्षमता का स्वतंत्र आकलन मुश्किल है।’
सोशल मीडिया पर भी लड़ाई
अफगानिस्तान में मौजूदा प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण पहलू सोशल मीडिया है। सशस्त्र संगठन अपने अभियानों की जानकारी और हमलों के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित करते हैं। इससे उन्हें अपनी मौजूदगी और प्रभाव दिखाने में मदद मिलती है लेकिन विशेषज्ञों के लिए यह भी एक चुनौती है कि सोशल मीडिया पर किए गए दावों और जमीन पर वास्तविक स्थिति के बीच अंतर किया जाए।
किसी हमले की जिम्मेदारी लेना इस बात का स्वतः प्रमाण नहीं है कि वही संगठन उस हमले के पीछे था। इसलिए घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि, स्थानीय स्रोतों और उपलब्ध तस्वीरों तथा वीडियो की जांच जरूरी हो जाती है।
तालिबान फिलहाल इन संगठनों को बड़ी चुनौती मानने से इनकार करता है। उसके प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद का कहना है कि सरकार का पूरे अफगानिस्तान पर नियंत्रण है और वह किसी भी सशस्त्र समूह से निपटने में सक्षम है। तालिबान का कहना है कि उसके विरोधियों की गतिविधियां सीमित हैं और वे देश में कोई बड़ा इलाका अपने नियंत्रण में लेने की स्थिति में नहीं हैं लेकिन तालिबान के सामने सिर्फ सैन्य चुनौती नहीं है। पांच साल के शासन के बाद उसकी सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि वह अफगानिस्तान में स्थायी राजनीतिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय वैधता कैसे हासिल करता है। महिलाओं और लड़कियों पर लगाए गए प्रतिबंध, लड़कियों की माध्यमिक शिक्षा और महिलाओं की विश्वविद्यालय शिक्षा पर रोक तथा मानवीय संकट ने तालिबान के शासन को लगातार अंतरराष्ट्रीय आलोचना के केंद्र में बनाए रखा है।
अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था भी गम्भीर दबाव में है। मानवीय सहायता पर निर्भरता, बेरोजगारी और गरीबी जैसी समस्याएं अभी भी बड़ी हैं। ऐसे में तालिबान को एक तरफ सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखनी है तो दूसरी तरफ देश की आर्थिक और मानवीय जरूरतों को पूरा करने की चुनौती भी उसके सामने है।
तालिबान के समर्थक पिछले पांच वर्षों को विदेशी सैन्य हस्तक्षेप से मुक्ति और देश की सम्प्रभुता की वापसी के रूप में पेश करते हैं। उनका दावा है कि तालिबान के सत्ता में आने के बाद देश में बड़े पैमाने पर होने वाला युद्ध समाप्त हुआ और सुरक्षा स्थिति में सुधार आया। दूसरी तरफ उसके आलोचक कहते हैं कि हिंसा के
पारम्परिक रूप में कमी आने का अर्थ राजनीतिक स्थिरता नहीं है।
तालिबान विरोधी संगठनों के सामने भी बड़ी मुश्किलें हैं। चार दशक से ज्यादा समय तक युद्ध झेल चुके अफगान समाज में व्यापक गृहयुद्ध की वापसी के लिए जनसमर्थन जुटाना आसान नहीं है। यदि ये संगठन केवल सैन्य हमलों तक सीमित रहते हैं तो उनके लिए तालिबान को सत्ता से हटाना बेहद कठिन होगा। उन्हें स्थानीय आबादी का समर्थन हासिल करने के साथ-साथ यह भी बताना होगा कि तालिबान के बाद अफगानिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था कैसी होगी।
यही इस पूरे संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। तालिबान के खिलाफ हथियार उठाने वाले संगठनों के पास फिलहाल कोई ऐसा साझा राजनीतिक मंच दिखाई नहीं देता जो उन्हें देशव्यापी विकल्प में बदल सके। दूसरी तरफ तालिबान के पास सत्ता, सुरक्षा तंत्र और पूरे देश में प्रशासनिक नियंत्रण है।
इसलिए फिलहाल अफगानिस्तान में किसी नए व्यापक गृहयुद्ध की आशंका को लेकर निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी लेकिन बदख्शां जैसे इलाकों में होने वाली झड़पें यह जरूर बताती हैं कि 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के साथ अफगानिस्तान का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था। उसका स्वरूप बदल गया है।
अब लड़ाई बड़े मोर्चों के बजाय छोटे हमलों, छापामार कार्रवाइयों और सोशल मीडिया के प्रचार में दिखाई दे रही है। आने वाले समय में तालिबान के लिए असली चुनौती यह होगी कि वह इन बिखरे हुए समूहों को एक व्यापक राजनीतिक या सैन्य आंदोलन में बदलने से रोक सके। वहीं विरोधी संगठनों की परीक्षा यह होगी कि वे अलग-अलग नामों और छोटे सैन्य अभियानों से आगे बढ़कर अफगान जनता के सामने कोई विश्वसनीय
राजनीतिक विकल्प रख पाते हैं या नहीं।
पांच साल बाद तालिबान सत्ता में मजबूत जरूर दिखाई देता है लेकिन उसके खिलाफ प्रतिरोध पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अफगानिस्तान में युद्ध की तस्वीर बदल गई है, मगर उसके राजनीतिक और सामाजिक सवाल अभी भी वहीं हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *