जिस लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का वोट होना चाहिए था वहां धनबल, बाहुबल और राजनीतिक संरक्षण सत्ता की नई करेंसी बनते जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन के भ्रष्टाचार और कैडर संस्कृति को समाप्त करने के वायदे के साथ सत्ता में आई ममता बनर्जी की सरकार के डेढ़ दशक के शासन में ‘शारदा’, ‘नारदा’, ‘कट मनी’, ‘शिक्षक भर्ती’ और ‘राशन घोटाले’ जैसे मामलों ने हर उस उम्मीद को गहरा आघात पहुंचाया जिसका सपना दिखा ममता सत्ता के शिखर पर पहुंची थीं। तृणमूल शासन के दौरान भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी मिसाल बन उभरा है एक दिहाड़ी मजदूर तुलु मंडल। दिहाड़ी मजदूर से कथित तौर पर करोड़ों रुपए के साम्राज्य तक पहुंचने वाले तुलु मंडल का मामला केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं बल्कि उस राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल है जिसमें सत्ता का संरक्षण ईमानदारी से अधिक लाभदायक दिखाई देने लगता है और लोकतंत्र का भरोसा धीरे-धीरे धनबल और बाहुबल के सामने कमजोर पड़ने लगता है
साल 2011 का पश्चिम बंगाल भारतीय राजनीति के इतिहास में केवल एक चुनावी बदलाव का वर्ष नहीं था बल्कि वह एक युग के अंत और दूसरे युग की शुरुआत का प्रतीक था। 34 वर्षों तक लगातार सत्ता में रहने वाले वाममोर्चे को पराजित करना असम्भव माना जाता था। दुनिया के सबसे लम्बे समय तक लोकतांत्रिक तरीके से शासन करने वाले वामपंथी गठबंधन को जनता ने पहली बार सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया। यह केवल सरकार बदलने का फैसला नहीं था बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ जनाक्रोश था जिस पर वर्षों से राजनीतिक अहंकार, पार्टी कैडरवाद, उद्योग विरोधी सोच, प्रशासनिक जड़ता और बढ़ते भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे। सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलन उस परिवर्तन की पृष्ठभूमि बन चुके थे। किसानों की जमीन अधिग्रहण के खिलाफ शुरू हुआ संघर्ष धीरे-धीरे ममता बनर्जी के नेतृत्व में पूरे राज्य के असंतोष का प्रतीक बन गया।
‘मां, माटी, मानुष’ का नारा बंगाल के गांव-गांव तक पहुंचा। लोगों को लगा कि अब राजनीति बदल जाएगी। अब पार्टी कार्यालयों से नहीं, संविधान और कानून से सरकार चलेगी। अब पुलिस राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बजाय आम नागरिकों की सुरक्षा करेगी। अब भ्रष्टाचार खत्म होगा और लोकतंत्र फिर से जनता के हाथों में लौटेगा।
आज लगभग डेढ़ दशक बाद, पश्चिम बंगाल की राजनीति को देखकर यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या 2011 का परिवर्तन वास्तव में केवल चेहरों का परिवर्तन था? क्या सत्ता का चरित्र बदलने के बजाय केवल सत्ता के लाभार्थी बदल गए? क्योंकि जिन आरोपों के आधार पर वामपंथी सरकार को जनता ने खारिज किया था, उससे कहीं अधिक गम्भीर आरोप तृणमूल कांग्रेस सरकार पर लगे और त्रस्त जनता ने अंततः ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल कर दिया। ममता राज में ‘शारदा चिटफंड घोटाला’, ‘नारदा स्टिंग’, ‘कोयला तस्करी’, ‘मवेशी तस्करी’, ‘शिक्षक भर्ती घोटाला’, ‘नगर निकायों में कट मनी’, ‘राशन वितरण घोटाला’, ‘अवैध बालू और पत्थर खनन’, ‘पंचायत स्तर पर कमीशनखोरी’, इन सबने मिलकर पश्चिम बंगाल की राजनीति की ऐसी तस्वीर बनाई जिसमें सत्ता, प्रशासन, पैसा और बाहुबल एक-दूसरे के पूरक दिखाई देने लगे।
ममता की सरकार के भ्रष्ट कारनामों के चलते ‘कट मनी’ भारत की राजनीति में पहली बार इतना चर्चित शब्द बना। गांवों में प्रधानमंत्री आवास योजना से लेकर शौचालय, सड़क, मनरेगा और अन्य सरकारी योजनाओं तक का लाभ लेने के लिए कथित तौर पर स्थानीय नेताओं को कमीशन देने की शिकायतें आम होने लगीं। स्थिति इतनी गम्भीर हुई कि स्वयं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सार्वजनिक मंच से कहना पड़ा कि यदि किसी नेता ने कट मनी ली है तो वह वापस कर दे लेकिन सवाल यह था कि यदि व्यवस्था इतनी पारदर्शी थी तो मुख्यमंत्री को ऐसी अपील करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी?
फिर आया ‘शारदा चिटफंड घोटाला’। हजारों करोड़ रुपए का यह घोटाला केवल आर्थिक अपराध नहीं है बल्कि लाखों गरीब परिवारों के सपनों की हत्या है। छोटे दुकानदार, रिक्शा चालक, खेतिहर मजदूर, गृहिणियां, जिन्होंने अपनी जीवनभर की बचत अधिक ब्याज के लालच में शारदा समूह में जमा की थी, एक झटके में सड़क पर आ गए। जांच के दौरान तृणमूल के कई प्रभावशाली नेताओं, कलाकारों और मीडिया से जुड़े लोगों के नाम सामने आए। इसके बाद ‘नारदा स्टिंग ऑपेऱशन’ ने राजनीति और पैसे के रिश्तों पर नए सवाल खड़े कर दिए। समय बीतता गया और घोटालों की सूची छोटी होने के बजाय लम्बी होती चली गई।
‘शिक्षक भर्ती घोटाले’ ने पूरे देश को चौंका दिया। हजारों युवाओं ने आरोप लगाया कि योग्यता के बजाय रिश्वत और राजनीतिक पहुंच के आधार पर नौकरियां बांटी गईं। तत्कालीन मंत्री पार्थ चटर्जी की करीबी अर्पिता मुखर्जी के फ्लैटों से करोड़ों रुपए की नकदी और सोना बरामद होने की तस्वीरें पूरे देश ने देखीं। नोट गिनने के लिए मशीनें कम पड़ गईं। बाद में ‘राशन घोटाले’ की जांच शुरू हुई और कई प्रभावशाली नेताओं पर कार्रवाई हुई।
इन घटनाओं ने एक बड़े प्रश्न को जन्म दिया कि क्या ममता राज में पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बन चुका था? इसी प्रश्न के बीच सामने आती है एक ऐसी कहानी जो केवल एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। तुलु मंडल की कहानी केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उसके ठिकानों से करोड़ों रुपए नकद और सोना बरामद होने का दावा किया गया है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस राजनीतिक संस्कृति की एक झलक दिखाता है जिसमें सत्ता का संरक्षण, अवैध कारोबार और अकूत सम्पत्ति एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। यह उस व्यवस्था की कहानी है जिसमें एक साधारण मजदूर कुछ वर्षों के भीतर करोड़ों रुपए के साम्राज्य का कथित मालिक बन जाता है और आस-पास के लोग उसकी सफलता को सामान्य मानने लगते हैं।
31 जुलाई को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पश्चिम बंगाल में अवैध धन शोधन से जुड़े एक मामले में तुलु मंडल उर्फ मोहम्मद निजामुद्दीन को गिरफ्तार किया है। ईडी का दावा है कि उसके ठिकानों और उससे जुड़े परिसरों की तलाशी के दौरान लगभग 28.50 करोड़ रुपए नकद, करीब 5 करोड़ रुपए मूल्य का सोना तथा बड़ी मात्रा में सम्पत्ति और निवेश से जुड़े दस्तावेज बरामद किए गए। जांच एजेंसी के अनुसार अब तक की बरामदगी और सम्पत्तियों का अनुमान 50 करोड़ रुपए से अधिक बैठता है और जांच आगे बढ़ने के साथ यह आंकड़ा और बढ़ सकता है।
तुलु मंडल का नाम पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर नहीं उभरा है। जांच एजेंसियों के अनुसार वह लम्बे समय से बीरभूम जिले में सक्रिय उस नेटवर्क का हिस्सा रहा है, जिस पर अवैध पत्थर खनन, बालू कारोबार, परिवहन, सरकारी ठेकों और भूमि कारोबार से जुड़े आरोप लगते रहे हैं। गौरतलब है कि बीरभूम पिछले कुछ वर्षों से पश्चिम बंगाल की राजनीति का सबसे विवादित जिला बन चुका है। यही वह जिला है जहां बोगतुई नरसंहार जैसी घटना हुई जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। यही वह इलाका है जहां तृणमूल कांग्रेस के प्रभावशाली नेता अनुब्रत मंडल का राजनीतिक दबदबा रहा और जिनके खिलाफ भी केंद्रीय एजेंसियां जांच कर चुकी हैं।
ईडी का आरोप है कि तुलु मंडल का आर्थिक साम्राज्य भी इसी राजनीतिक और कारोबारी नेटवर्क के बीच विकसित हुआ। जांच एजेंसी के अनुसार वह केवल एक कारोबारी नहीं था बल्कि ऐसे कई लेन-देन का हिस्सा था जिनमें अवैध रूप से अर्जित धन को वैध बनाने की कोशिश की गई। एजेंसी का दावा है कि उसके पास कई कम्पनियों, अचल सम्पत्तियों, महंगी गाड़ियों और सोने में किए गए निवेश के सुराग मिले हैं।
दिहाड़ी मजदूर से खरबपति बनने का सफर
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस व्यक्ति के बारे में आज करोड़ों की सम्पत्ति का दावा किया जा रहा है, उसके अतीत की कहानी बिल्कुल अलग है। स्थानीय लोगों और जांच से जुड़े अधिकारियों के अनुसार तुलु मंडल ने अपने जीवन की शुरुआत एक दिहाड़ी मजदूर के रूप में की थी। वह पत्थर तोड़ने, ट्रकों पर माल लादने और खदानों में सामान्य मजदूरी का काम करता था। उस समय किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यही व्यक्ति कुछ वर्षों बाद अरबों रुपए के अवैध साम्राज्य का कथित मालिक बन जाएगा।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार जांच के दौरान सामने आया कि धीरे-धीरे उसने डम्पर ट्रकों, लोरियों और पत्थर परिवहन के कारोबार में प्रवेश किया। इसके बाद अवैध पत्थर खनन और सप्लाई के नेटवर्क से उसका सम्पर्क बढ़ता गया। कहा जाता है कि उसने स्थानीय स्तर पर मजदूर से ठेकेदार और फिर कारोबारी बनने का सफर बेहद तेजी से तय किया। यही वह बिंदु है जहां सवाल खड़े होने शुरू होते हैं।
क्या केवल व्यापारिक कौशल के बल पर कोई व्यक्ति कुछ वर्षों में इतनी बड़ी सम्पत्ति का मालिक बन सकता है? यदि हां तो फिर जांच एजेंसियां उसके खिलाफ धन शोधन, संगठित अपराध और अवैध सम्पत्ति के आरोप क्यों लगा रही हैं? यदि नहीं तो फिर उसके पीछे कौन-सी ताकतें थीं जिन्होंने इस आर्थिक उछाल को सम्भव बनाया?
ईडी अदालत में यही दावा कर रही है कि तुलु मंडल अकेला खिलाड़ी नहीं है। एजेंसी के अनुसार उसके सम्बंध ऐसे प्रभावशाली लोगों से थे जिनके राजनीतिक और प्रशासनिक नेटवर्क ने इस पूरे कारोबार को बढ़ने में मदद की। रिपोर्ट के अनुसार जांच के दौरान यह भी सामने आया कि तुलु मंडल ने बड़ी मात्रा में जमीनें खरीदीं। कई मकान, व्यावसायिक परिसम्पत्तियां, ट्रक, डम्पर और भारी मशीनें उसके या उससे जुड़े लोगों के नाम पर मिली हैं।
ईडी अब इन सभी सम्पत्तियों के वित्तीय स्रोतों की जांच कर रही है। जांच एजेंसी का दावा है कि तुलु मंडल के घर से बरामद नकदी केवल उसकी घोषित आय से मेल नहीं खाती। यही कारण है कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत उसके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। हालांकि यह कहानी यहीं समाप्त नहीं होती क्योंकि तुलु मंडल का नाम सामने आते ही पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।
भाजपा इसे तृणमूल कांग्रेस के संरक्षण में पनपे भ्रष्टाचार का नया उदाहरण बता रही है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि पश्चिम बंगाल में ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने राजनीतिक संरक्षण के दम पर अकूत सम्पत्ति अर्जित की और अब केंद्रीय एजेंसियों की जांच में उनकी परतें खुल रही हैं। दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों को पूरी तरह राजनीतिक बताया है। पार्टी का कहना है कि केंद्र सरकार विपक्षी राज्यों में केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में कर रही है और हर कार्रवाई को चुनावी राजनीति से जोड़कर देखा जाना चाहिए लेकिन राजनीतिक बयानबाजी से अलग यदि केवल तथ्यों को देखा जाए तो सबसे बड़ा प्रश्न वही है जो हर आम नागरिक पूछ रहा है कि एक दिहाड़ी मजदूर आखिर कुछ वर्षों में करोड़ों रुपए की नकदी, सोना और सम्पत्तियों तक कैसे पहुंच गया? यदि यह सम्पत्ति वैध है तो उसके स्रोत सार्वजनिक होने चाहिए। यदि अवैध है तो केवल एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर देने से समस्या समाप्त नहीं होगी। तब उस पूरे राजनीतिक, प्रशासनिक और कारोबारी नेटवर्क की भी जवाबदेही तय करनी होगी जिसने ऐसे लोगों को फलने-फूलने का अवसर दिया।
दलदल में रविन्द्रनाथ ठाकुर की बीरभूम
तुलु मंडल की कहानी को केवल एक व्यक्ति की कथित अवैध सम्पत्ति के रूप में पढ़ना भूल होगी। यह उस पूरे राजनीतिक और आर्थिक तंत्र को समझने का अवसर है, जिसने पिछले डेढ़ दशक में पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों में समानांतर शक्ति केंद्र पैदा कर दिए। बीरभूम इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। कभी रवीन्द्रनाथ ठाकुर और शांति निकेतन के कारण सांस्कृतिक पहचान रखने वाला यह जिला पिछले कुछ वर्षों में राजनीति, हिंसा, अवैध खनन और केंद्रीय एजेंसियों की जांच के कारण राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा है।
बीरभूम की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा पत्थर खदानों और क्रशर उद्योग पर निर्भर है। हजारों लोग इससे रोजगार पाते हैं लेकिन वर्षों से यह आरोप भी लगता रहा है कि इस उद्योग का बड़ा हिस्सा राजनीतिक संरक्षण, अवैध खनन और नकद लेन-देन के सहारे चलता है। यही कारण है कि जब भी केंद्रीय एजेंसियों ने यहां कार्रवाई की, उनका ध्यान केवल किसी एक कारोबारी तक सीमित नहीं रहा बल्कि पूरे नेटवर्क पर गया।
इसी नेटवर्क के केंद्र में वर्षों तक तृणमूल कांग्रेस के कद्दावर नेता अनुब्रत मंडल का नाम चर्चा में रहा है। बीरभूम में उन्हें केवल एक नेता नहीं बल्कि तृणमूल के सबसे प्रभावशाली संगठनकर्ता के रूप में देखा जाता था। जिला प्रशासन से लेकर पार्टी संगठन तक उनकी पकड़ की चर्चा राजनीतिक गलियारों में होती रही। विरोधी दल लगातार आरोप लगाते रहे कि जिले में कोई भी बड़ा आर्थिक या राजनीतिक फैसला उनके प्रभाव के बिना सम्भव नहीं था। तृणमूल कांग्रेस हमेशा इन आरोपों को खारिज करती रही और उन्हें राजनीतिक षड्यंत्र बताती रही।
केंद्रीय एजेंसियों की जांच ने इस बहस को और तेज कर दिया है। पहले मवेशी तस्करी के मामले में सीबीआई की जांच शुरू हुई। उसके बाद ईडी ने धन शोधन के पहलुओं की जांच की। अनुब्रत मंडल की गिरफ्तारी हुई, उनके कई करीबी लोगों से पूछताछ हुई और अब धीरे-धीरे जांच का दायरा बढ़ता जा रहा है। एजेंसियों का आरोप था कि अवैध कारोबार से अर्जित धन को विभिन्न कम्पनियों, सम्पत्तियों और बेनामी निवेशों के जरिए वैध बनाया गया। इन आरोपों का अंतिम फैसला अदालतों को करना है लेकिन जांच ने यह स्पष्ट कर दिया कि मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे नेटवर्क का है। इसी संदर्भ में तुलु मंडल का नाम सामने आता है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार ईडी का आरोप है कि तुलु मंडल केवल एक स्वतंत्र कारोबारी नहीं है बल्कि वह उसी आर्थिक तंत्र का हिस्सा है जिसमें पत्थर कारोबार, परिवहन, भूमि निवेश और नकद लेन-देन एक- दूसरे से जुड़े हुए हैं। जांच एजेंसी का दावा है कि उसके पास ऐसे वित्तीय लेन-देन के दस्तावेज मिले हैं जो इस नेटवर्क की परतें खोल सकते हैं। ईडी ने अदालत में यह कहा है कि तुलु मंडल के पास से बरामद सम्पत्ति केवल नकदी और सोने तक सीमित नहीं है। एजेंसी को कई मकानों, जमीनों, डम्पर ट्रकों, भारी वाहनों और व्यावसायिक निवेशों के सुराग मिले हैं। यदि जांच में यह साबित होता है कि इन सम्पत्तियों का स्रोत अवैध था तो यह मामला केवल आय से अधिक सम्पत्ति का नहीं बल्कि संगठित आर्थिक अपराध का बन जाता है।
धन और बाहुबल का बढ़ता वर्चस्व
यहीं भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। क्या कारण है कि देश के अलग-अलग राज्यों में बार-बार ऐसे लोग सामने आते हैं जिनकी शुरुआत बेहद साधारण होती है लेकिन कुछ वर्षों के भीतर वे करोड़ों-अरबों रुपए की सम्पत्ति के मालिक बन जाते हैं? यह प्रश्न केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र से लेकर झारखंड, बिहार से लेकर तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश तक समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। लगभग हर मामले में एक समान तत्व दिखाई देता है, राजनीतिक संरक्षण, सरकारी ठेकों तक पहुंच, प्रशासनिक सहयोग और अवैध कारोबार का गठजोड़। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि सत्ता कानून के अधीन होगी लेकिन जब कानून को लागू करने वाली संस्थाओं पर ही राजनीतिक प्रभाव बढ़ने लगे, तब सबसे पहले अपराध का स्वरूप बदलता है। अपराधी अब कानून से छिपकर नहीं बल्कि सत्ता की छाया में काम करने लगता है। उसके लिए पुलिस, प्रशासन और स्थानीय राजनीति सुरक्षा कवच का काम करने लगते हैं। ऐसे में अवैध कारोबार केवल आर्थिक गतिविधि नहीं रह जाता बल्कि राजनीतिक निवेश बन जाता है।
तुलु मंडल का मामला इसी बड़े सवाल का नया अध्याय है। यह उस राजनीतिक अर्थव्यवस्था की कहानी है जिसमें सत्ता, सम्पत्ति और प्रभाव एक-दूसरे को लगातार मजबूत करते हैं। यदि तुलु मंडल की कहानी को केवल एक व्यक्ति के कथित आर्थिक अपराध के रूप में देखा जाए तो सम्भव है कि कुछ महीनों बाद यह मामला भी दूसरी खबरों की भीड़ में गुम हो जाए लेकिन यदि इसे पश्चिम बंगाल की पिछले पंद्रह वर्षों की राजनीतिक यात्रा के संदर्भ में देखा जाए तो यह एक बड़े पैटर्न का हिस्सा दिखाई देता है। ऐसा पैटर्न जिसमें सत्ता परिवर्तन तो हुआ लेकिन सत्ता की संस्कृति नहीं बदली। बल्कि कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भ्रष्टाचार पहले की तुलना में अधिक संगठित, अधिक व्यापक और अधिक संस्थागत स्वरूप में सामने आया।
शारदा चिटफंड घोटाले की कहानी
इस सिलसिले की सबसे बड़ी कड़ी है शारदा चिटफंड घोटाला। साल 2013 में जब शारदा समूह का साम्राज्य धराशायी हुआ तो लाखों परिवारों की जमा पूंजी रातों-रात डूब गई। इस समूह ने पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा, त्रिपुरा और झारखंड सहित पूर्वी भारत के लाखों छोटे निवेशकों से ऊंचे रिटर्न का वादा कर हजारों करोड़ रुपए जुटाए थे। इनमें अधिकांश वे लोग थे जो बैंकिंग व्यवस्था से दूर थे, रिक्शा चालक, खेतिहर मजदूर, घरेलू महिलाएं, छोटे दुकानदार और निम्न मध्यम वर्ग के कर्मचारी।
जब कम्पनी ढही तो निवेशकों के पास न पैसा बचा, न कानूनी सुरक्षा। कई लोगों ने आत्महत्या तक कर ली। जांच के दौरान अनेक प्रभावशाली राजनीतिक नेताओं, फिल्मी हस्तियों और मीडिया संस्थानों के नाम सामने आए। सीबीआई और ईडी की जांच शुरू हुई। कई गिरफ्तारियां हुईं। हालांकि अंतिम दोष तय करने का अधिकार न्यायालय के पास है लेकिन इस घोटाले ने एक बात स्पष्ट कर दी कि यदि राजनीतिक संरक्षण मिल जाए तो वित्तीय अपराध कितने बड़े स्तर पर किए जा सकते हैं।
शारदा के बाद आया नारदा स्टिंग ऑपरेशन
2016 में सार्वजनिक हुए इस स्टिंग वीडियो में तृणमूल के कई वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं को कथित रूप से एक फर्जी कम्पनी के प्रतिनिधि से नकद राशि लेते हुए दिखाया गया। वीडियो ने पूरे देश में राजनीतिक भूचाल ला दिया। मामला अदालतों तक पहुंचा, जांच एजेंसियां सक्रिय हुईं और वर्षों तक यह विवाद चलता रहा। तृणमूल कांग्रेस ने शुरू से ही स्टिंग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए और इसे राजनीतिक साजिश बताया जबकि विपक्ष ने इसे भ्रष्टाचार का प्रत्यक्ष प्रमाण कहा।
‘कट मनी’ ने ध्वस्त की ममता की छवि
पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार पर सबसे तीखी सार्वजनिक बहस‘कट मनी’ को लेकर हुई है। ‘कट मनी’ कोई कानूनी शब्द नहीं है लेकिन बंगाल की राजनीति में यह आम बोलचाल का हिस्सा बन गया है। आरोप लगाए गए कि प्रधानमंत्री आवास योजना, मनरेगा, सड़क निर्माण, शौचालय, वृद्धावस्था पेंशन, राशन कार्ड और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए लाभार्थियों से स्थानीय स्तर पर तृणमूल नेताओं द्वारा कमीशन लिया जाता था। गांवों में यह शिकायत इतनी आम हो गई कि कई स्थानों पर लोगों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए।
स्थिति तब और गम्भीर हो गई जब स्वयं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सार्वजनिक तौर पर कहना पड़ा कि यदि उनके किसी नेता या कार्यकर्ता ने ‘कट मनी’ ली है तो वह लोगों को वापस कर दे। मुख्यमंत्री का यह बयान राजनीतिक रूप से असाधारण था। विपक्ष ने इसे इस बात की स्वीकारोक्ति बताया कि समस्या वास्तविक है जबकि तृणमूल ने कहा कि मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करना चाहती हैं।
शिक्षक भर्ती घोटालों ने कमजोर किया ममता को
सबसे बड़ा झटका तब लगा जब शिक्षक भर्ती घोटाला सामने आया। हजारों युवाओं ने आरोप लगाया कि मेरिट सूची में नाम होने के बावजूद नौकरी नहीं मिली जबकि पैसे लेकर अयोग्य लोगों की नियुक्ति कर दी गई। मामला कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचा। अदालत ने कई नियुक्तियां रद्द कर दीं और केंद्रीय एजेंसियों को जांच के निर्देश दिए। जांच के दौरान तत्कालीन शिक्षामंत्री पार्थ चटर्जी की करीबी अर्पिता मुखर्जी के फ्लैटों से करोड़ों रुपए नकद, सोना और विदेशी मुद्रा बरामद हुई। नोटों के ढेर और उन्हें गिनती मशीनों से करने की तस्वीरें देश में भ्रष्टाचार की प्रतीक बन गईं।
राशन घोटाले से शर्मसार हुई ममता
इसके बाद राशन वितरण घोटाले ने नई बहस छेड़ दी। आरोप लगे कि गरीबों के लिए भेजा गया अनाज और खाद्य सामग्री व्यवस्थित तरीके से डायवर्ट की गई। ईडी ने कई स्थानों पर छापे मारे और कुछ प्रभावशाली नेताओं को गिरफ्तार किया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि गरीबों के अधिकार तक को नहीं छोड़ा गया जबकि तृणमूल कांग्रेस ने इन मामलों को राजनीतिक प्रतिशोध बताया। यदि इन सभी मामलों को अलग-अलग घटनाओं की तरह देखा जाए तो वे सामान्य आपराधिक जांच प्रतीत हो सकती हैं लेकिन जब इन्हें एक साथ रखा जाता है तो एक समान प्रवृत्ति उभरकर सामने आती है कि हर मामले में सत्ता के करीब रहने वाले प्रभावशाली लोगों, अवैध आर्थिक लाभ और राजनीतिक संरक्षण के आरोप दिखाई देते हैं। इसीलिए तुलु मंडल का मामला केवल एक और ईडी की कार्रवाई नहीं है। यह उसी लम्बी श्ृंखला की अगली कड़ी माना जा रहा है जिसमें बार-बार एक ही प्रश्न उठता है कि क्या ममता राज में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक प्रभाव आर्थिक समृद्धि का सबसे तेज रास्ता बन गया था?
तुलु मंडल के खिलाफ लगे आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्णय अदालत करेगी। उसे भारतीय कानून के अनुसार निष्पक्ष सुनवाई और अपनी सफाई का पूरा अधिकार है लेकिन यदि जांच एजेंसियों के दावे सही साबित होते हैं तो यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं होगी। तब यह उस राजनीतिक व्यवस्था का अभियोगपत्र होगा जिसमें एक दिहाड़ी मजदूर कुछ वर्षों में करोड़ों रुपए की नकदी, सोना, कम्पनियों और अचल सम्पत्तियों का कथित मालिक बन जाता है जबकि उसी राज्य में लाखों युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं।
असल सवाल तुलु मंडल नहीं है
असल सवाल यह है कि आखिर ऐसी राजनीतिक व्यवस्था कैसे बनती है जिसमें एक सामान्य मजदूर कुछ वर्षों में करोड़ों रुपए की सम्पत्ति का कथित मालिक बन जाता है जबकि उसी राज्य में लाखों शिक्षित युवा सरकारी नौकरी की प्रतीक्षा में उम्र पार कर रहे होते हैं, किसान अपनी फसल का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं और छोटे उद्योग बंद हो रहे होते हैं। यदि किसी व्यक्ति की सम्पत्ति वैध व्यापार से बनी है तो उसका स्वागत होना चाहिए। लोकतंत्र मेहनत, उद्यमिता और सफलता का विरोधी नहीं है लेकिन यदि वही सम्पत्ति राजनीतिक संरक्षण, अवैध खनन, सरकारी ठेकों में हेराफेरी, प्रशासनिक मिलीभगत और धन शोधन के जरिए अर्जित हुई हो तो वह केवल आर्थिक अपराध नहीं रह जाती। तब वह लोकतंत्र की आत्मा पर हमला बन जाती है।
भारतीय संविधान ने राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाया था लेकिन पिछले कुछ दशकों में राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण की प्रक्रिया लगातार गहरी होती गई है। चुनाव लड़ने की लागत बढ़ी है। राजनीतिक दलों को भारी आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। स्थानीय स्तर पर चुनावों में धनबल और बाहुबल का प्रभाव बढ़ा है। परिणामस्वरूप सत्ता और अवैध आर्थिक गतिविधियों के बीच एक ऐसा गठजोड़ विकसित हुआ है जो केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं।
पश्चिम बंगाल का मामला इसलिए अधिक गम्भीर दिखाई देता है क्योंकि 2011 में जनता ने जिस परिवर्तन के लिए मतदान किया था, उसकी सबसे बड़ी वजह ही भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा और कैडर संस्कृति से मुक्ति थी। जनता ने यह उम्मीद नहीं की थी कि कुछ वर्षों बाद ‘कट मनी’ जैसे शब्द आम बोलचाल का हिस्सा बन जाएंगे, शिक्षक भर्ती जैसे मामलों में अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ेगा, राशन वितरण में अनियमितताओं के आरोप लगेंगे और एक के बाद एक केंद्रीय एजेंसियां राज्य के प्रभावशाली नेताओं और कारोबारियों के यहां छापे मारती दिखाई देंगी।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास होता है। जब आम नागरिक यह मानने लगता है कि बिना राजनीतिक संरक्षण के न व्यापार आगे बढ़ सकता है, न सरकारी काम हो सकता है और न न्याय मिल सकता है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल चुनावी प्रक्रिया बनकर रह जाता है।
तुलु मंडल का मामला इसलिए एक प्रतीकात्मक मामला बन गया है। यह केवल करोड़ों रुपए की नकदी या सोने की बरामदगी का मामला नहीं है। यह उस प्रश्न का प्रतीक है जिसे आज देश का हर नागरिक पूछ रहा है कि क्या राजनीति का उद्देश्य सार्वजनिक जीवन को बेहतर बनाना है या सत्ता के इर्द-गिर्द ऐसे आर्थिक साम्राज्य खड़े करना जिनकी जड़ें जनता के अधिकारों और सरकारी संसाधनों तक फैली हों?
पश्चिम बंगाल की जनता ने 2011 में परिवर्तन के लिए वोट दिया था। आज, पंद्रह वर्ष बाद, वही जनता फिर एक चैराहे पर खड़ी दिखाई देती है। इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र में कोई भी सरकार स्थायी नहीं होती लेकिन जनता की स्मृति में यह दर्ज रहता है कि किसने उम्मीदें जगाईं और किसने उन्हें तोड़ा। तुलु मंडल का मामला अंततः एक व्यक्ति का मुकदमा नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति का आईना है जिसमें यदि धन और सत्ता का गठजोड़ कानून से अधिक शक्तिशाली हो जाए तो लोकतंत्र धीरे-धीरे जनता के हाथों से फिसलने लगता है और किसी भी लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा खतरा दूसरा नहीं हो सकता।