पहाड़ के बेटे ने आसमान में खोजा रास्ता

उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा में एक युवा ने पहाड़ की दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच आने-जाने की मुश्किल का समाधान आसमान में तलाशने की कोशिश की है। काफलीखान के रवि टम्टा ने ड्रोन तकनीक को आधार बनाकर सिंगल-सीटर इलेक्ट्रिक फ्लाइंग व्हीकल का प्रोटोटाइप तैयार किया है, जिसका अल्मोड़ा में परीक्षण भी किया गया है।  ‘SKYNEX’ नाम का यह प्रयोग अभी शुरुआती चरण में है और इसे व्यावसायिक ‘फ्लाइंग कार’ कहना जल्दबाजी होगी लेकिन सीमित संसाधनों के बीच पहाड़ के एक युवा का यह तकनीकी नवाचार उन सम्भावनाओं की ओर जरूर इशारा करता है, जिनसे भविष्य में दुर्गम पहाड़ी इलाकों की परिवहन और आपातकालीन जरूरतों के लिए नए रास्ते खुल सकते हैं

उत्तराखण्ड के पहाड़ों की कहानी अक्सर पलायन, बंद होते स्कूल, रोजगार की तलाश में मैदानों की ओर जाते युवाओं और दुर्गम इलाकों तक पहुंचने में आने वाली मुश्किलों से शुरू होती है लेकिन अल्मोड़ा के एक युवा की कहानी इस परिचित तस्वीर में एक अलग रंग भरती है। काफलीखान गांव के रवि टम्टा ने पहाड़ की भौगोलिक मुश्किलों को देखते हुए सड़क के बजाय आसमान में रास्ता तलाशने का प्रयोग किया है। रवि ने एक सिंगल-सीटर इलेक्ट्रिक फ्लाइंग व्हीकल का प्रोटोटाइप तैयार किया है, जिसे ‘HAPIDA SKYNEX’ नाम दिया गया है।  ‘SKYNEX’ को ड्रोन तकनीक के संशोधित और उन्नत स्वरूप पर विकसित किया गया है।

रवि टम्टा का यह प्रयोग इसलिए खास है क्योंकि पहाड़ में दूरी केवल किलोमीटर से तय नहीं होती। किसी गांव से बाजार, अस्पताल या दूसरे कस्बे तक पहुंचने में सड़क की स्थिति, घुमावदार पहाड़ी रास्ते, मौसम और भूस्खलन जैसी परिस्थितियां समय को कई गुना बढ़ा देती हैं। रवि के मुताबिक करीब 40 किलोमीटर की ऐसी दूरी, जिसे सड़क से तय करने में लगभग डेढ़ घंटे लग सकते हैं भविष्य में हवाई रास्ते से करीब दस मिनट में पूरी की जा सकती है।

‘SKYNEX’ को लेकर सबसे ज्यादा आकर्षण इसलिए है क्योंकि इसे एक छोटे पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले युवा द्वारा विकसित किए गए प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि तकनीकी दृष्टि से इसे अभी तैयार ‘फ्लाइंग कार’ कहना जल्दबाजी होगी लेकिन किसी प्रयोग की अहमियत केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह आज बाजार में उतर चुका है या नहीं। कई बार महत्वपूर्ण बात यह होती है कि किसी ने समस्या को किस तरह देखा और उसके समाधान के लिए कौन-सा सवाल उठाया। रवि टम्टा के मामले में यह सवाल है कि अगर पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सड़क से दूरी अधिक हो जाती है तो क्या भविष्य की तकनीक उस दूरी को कम कर सकती है?

रवि के लिए यह पहला तकनीकी प्रयोग भी नहीं है। उनकी संस्था ‘Hapida’ की वेबसाइट पर उनके कई नवाचारों का उल्लेख मिलता है। इनमें बांस का काम करने वाले लोगों की मेहनत कम करने के लिए ‘बैम्बू स्लाइसर मशीन’, ‘बैम्बू स्मार्ट स्टिक’ वाहन के टायर से जुड़ी ‘पंचर साॅल्विंग किट’, मोबाइल चार्ज करने वाले जूते और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए ‘इलेक्ट्रोलाइट पम्प’ शामिल हैं। संस्था के अनुसार उसका उद्देश्य विज्ञान और तकनीक के जरिए पहाड़ी क्षेत्रों और गांवों की समस्याओं के समाधान तलाशना है।
रवि का एक पुराना प्रयोग जंगल की आग से भी जुड़ा रहा है। वर्ष 2022 में उनके द्वारा बिना पानी के जंगल की आग पर नियंत्रण पाने वाली मशीन विकसित करने की कोशिश की खबर सामने आई थी। उस समय रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने मशीन का प्रदर्शन अधिकारियों के सामने किया था।  ‘SKYNEX’ की कहानी को इसी पृष्ठभूमि में देखने पर इसका महत्व बढ़ जाता है। यह केवल एक ऐसी मशीन की कहानी नहीं रह जाती जिसे देखकर लोग कुछ सेकंड के लिए रोमांचित हों। यह उस सोच की कहानी बन जाती है जिसमें कोई युवा अपने आस-पास की समस्याओं को देखकर उनके लिए तकनीकी समाधान खोजने की कोशिश करता है।

उत्तराखण्ड जैसे पहाड़ी राज्य में यातायात और सम्पर्क की समस्या का महत्व किसी से छिपा नहीं है। सड़कें यहां जीवनरेखा हैं लेकिन पहाड़ी इलाकों में सड़क निर्माण और उनका रखरखाव मैदानी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है। भूस्खलन, बादल फटना, भारी बारिश और अन्य प्राकृतिक घटनाएं कई बार सड़कों को बाधित कर देती हैं। ऐसे में भविष्य की हवाई तकनीक अगर सुरक्षित, विश्वसनीय और किफायती बनती है तो दुर्गम क्षेत्रों के लिए इसके सम्भावित इस्तेमाल पर विचार किया जा सकता है। हालांकि यहां उम्मीद और वास्तविकता के बीच फर्क बनाए रखना जरूरी है।

अभी यह कहना सम्भव नहीं है कि  ‘SKYNEX’ उत्तराखण्ड की परिवहन व्यवस्था बदल देगा। न ही इसे आज की तारीख में व्यावसायिक ‘उड़न कार’ कहा जा सकता है। इसके लिए लम्बी तकनीकी और नियामकीय प्रक्रिया बाकी है लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि अल्मोड़ा के एक युवा ने उस दिशा में प्रयोग शुरू किया है जिस दिशा में दुनिया के कई हिस्सों में व्यक्तिगत हवाई परिवहन को लेकर शोध और विकास हो रहा है।

इस कहानी का दूसरा पहलू उत्तराखण्ड के युवाओं से जुड़ा है। राज्य में पलायन की समस्या पर वर्षों से चर्चा होती रही है। युवाओं को पहाड़ में रोकने के लिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है लेकिन इसके साथ एक और जरूरत है, ऐसा वातावरण जिसमें स्थानीय युवा अपने विचारों और प्रयोगों को आगे बढ़ा सकें।

अगर किसी युवा के पास कोई नया विचार है तो केवल उसकी तारीफ काफी नहीं है। उसे प्रयोगशाला चाहिए, तकनीकी मार्गदर्शन चाहिए, धन चाहिए, फंडिंग चाहिए और सबसे बढ़कर ऐसे संस्थानों की जरूरत है जो उसके प्रयासों को वैज्ञानिक कसौटी पर परख सकें। किसी प्रयोग को सफल बनाने के लिए व्यक्तिगत प्रतिभा के साथ नवाचार इकोसिस्टम भी जरूरी होता है।

रवि टम्टा की कहानी इसी सवाल को सामने लाती है कि क्या उत्तराखण्ड अपने स्थानीय वैज्ञानिकों के लिए ऐसा इकोसिस्टम तैयार कर सकता है। अगर पहाड़ के युवाओं को स्थानीय समस्याओं के समाधान विकसित करने के लिए तकनीकी सहायता मिले तो ऐसे नवाचार स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा भी बन सकते हैं।

रवि की संस्था के पुराने प्रयोगों को देखें तो उनमें एक बात समान दिखाई देती है कि समस्या आस-पास की है और समाधान खोजने की कोशिश भी वहीं से शुरू होती है। बांस के काम से लेकर जंगल की आग तक और अब हवाई परिवहन तक, यह सोच स्थानीय परिस्थितियों को तकनीक से जोड़ने की है।

यही कारण है कि  ‘SKYNEX’  की उड़ान को केवल ‘फ्लाइंग कार’ के रोमांच से देखना इस कहानी को छोटा कर देगा। असली सवाल यह है कि क्या भारत के छोटे शहरों और गांवों में बैठे युवा भविष्य की तकनीक के निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकते हैं। अल्मोड़ा का यह प्रयोग इस सवाल का एक शुरुआती उत्तर जरूर देता है।

रवि टम्टा की कहानी इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि यह सफलता की अंतिम कहानी नहीं है। यह शुरुआत की कहानी है। एक प्रयोग आज हवा में कुछ पल के लिए उठता है। कल उसमें सुधार हो सकता है। उसकी उड़ने की क्षमता बढ़ सकती है। उड़ान तकनीक बेहतर हो सकता है। सुरक्षा प्रणालियां विकसित हो सकती हैं। या सम्भव है कि यह प्रयोग आगे किसी दूसरे और बेहतर नवाचार का आधार बने। विज्ञान और तकनीक की दुनिया में हर प्रयोग का अंतिम परिणाम पहले से तय नहीं होता लेकिन एक चीज तय होती है कि बिना प्रयोग के कोई नई तकनीक पैदा नहीं होती।

उत्तराखण्ड के संदर्भ में यह सोच और भी महत्वपूर्ण है। जिस राज्य से युवाओं के पलायन की खबरें लगातार आती हैं, उसी राज्य के एक युवा की यह कहानी बताती है कि पहाड़ केवल लोगों को बाहर भेजने की जगह नहीं है। पहाड़ में रहने वाला युवा भी तकनीक, उद्यमिता और नवाचार की दुनिया में अपनी जगह बना सकता है।
रवि टम्टा की उड़ान अभी छोटी है।  ‘SKYNEX’   अभी शुरुआती चरण में है। उसके सामने कई तकनीकी और नियामकीय चुनौतियां हैं लेकिन किसी भी बड़ी यात्रा की शुरुआत एक छोटे कदम से होती है। यह भी सम्भव है कि आने वाले वर्षों में  ‘SKYNEX’ का स्वरूप बदल जाए, तकनीक बदल जाए या कोई दूसरा आविष्कार इस दिशा को आगे ले जाए लेकिन आज की तारीख में यह प्रयोग कम से कम इतना जरूर कहता है कि पहाड़ की समस्या का समाधान खोजने के लिए आसमान की ओर देखना भी सम्भव है।

यह कहानी इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है कि इसमें केवल उपलब्धि का दावा नहीं बल्कि कोशिश दिखाई देती है। एक युवा अपने आस-पास की कठिनाइयों को देखकर यह तय करता है कि वह सिर्फ शिकायत नहीं करेगा बल्कि समाधान खोजने की कोशिश करेगा। वह प्रयोग करेगा, असफल होगा, फिर कोशिश करेगा और एक दिन अपनी मशीन को जमीन से ऊपर उठते देखेगा। शायद यही किसी समाज की सबसे बड़ी ताकत होती है, उसके युवाओं का यह विश्वास कि समस्याएं हमेशा के लिए नहीं होतीं और रास्ते हमेशा जमीन पर ही नहीं होते।
अल्मोड़ा की इस छोटी-सी उड़ान का भविष्य क्या होगा, यह अभी कहना मुश्किल है लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि पहाड़ के एक युवा ने सड़क से लम्बी पड़ने वाली दूरी को देखकर आसमान में एक नया रास्ता तलाशने की कोशिश की है। मशीन ने अभी छोटी उड़ान भरी है लेकिन सोच की उड़ान शायद उससे कहीं आगे जा चुकी है।

बात अपनी-अपनी

मैं धौला देवी ब्लाॅक के दूरस्थ ग्राम दुबाड़ का निवासी हूं जहां रोड नहीं है। इमरजेंसी मेडिकल आवश्यकता के समय अस्पताल पहुंचना मुश्किल हो जाता है। इसके लिए अपने गांव में फंडिंग करके मैंने स्वयं रोड बनाई लेकिन जब मुझे लगा कि इससे भी काम नहीं चलेगा तो मैं चाहता था कि इमरजेंसी मेडिकल के समय कोई फंसता है तो समय से उपचार न मिलने के कारण किसी की जान न जाए। आवागमन के साधन में सुलभ नहीं थे तो मेरे मन में था कि कुछ ऐसी व्हीकल बनाओ जो घंटे का सफर मिनट में मे तय कर दे और यह एयर टैक्सी के माध्यम से ही सम्भव था। 11 साल पहले मैंने एक हेलीकाॅप्टर बनाया था और अब उड़ने वाली व्हीकल बनाई है। मेरा द्वारा बनाए गए इस व्हीकल में लगने वाले अधिकतर कलपुर्जे मैं खुद ही बनाता हूं। इसमें मेरे 13 साल की मेहनत है। सिंगल सीटर अभी मैंने बनाया है इसे टू सीटर बनाने पर काम कर रहा हूं। अभी उसमें कुछ और त् – क् करके उसमें हमें एडवांस्ड सेफ्टी फीचर डालने हैं, उसके लिए मैं काम कर रहा हूं। यह सिर्फ प्रोटोटाइप है इसको मैं और भी उन्नत बनाऊंगा। इसके फाइनल होने पर मार्केट में उतर जाएगा।

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