कटघरे में सरकारी शिक्षा व्यवस्था

कटघरे में सरकारी शिक्षा व्यवस्था

कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी इस समय राजस्थान में एक्टिव मोड में है। उसका ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान राज्य के सरकारी स्कूलों की जमीनी स्थिति को सामने लाने की कोशिश कर रहा है। स्कूलों का निरीक्षण किया जा रहा है, वहां भवन, कक्षाओं, शौचालय, पेयजल और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस अभियान को लेकर राजनीतिक विवाद भी पैदा हो गया है। सरकार इसे राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देख रही है, बीजेपी समर्थक ग्रामीण सीजेपी के स्कूल दौरों का विरोध कर रहे हैं और कांग्रेस सरकार पर शिक्षा व्यवस्था की बदहाली को लेकर सवाल उठा रही है लेकिन इन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों के बीच एक तथ्य ऐसा है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, राजस्थान सरकार के अपने आंकड़े सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर गम्भीर सवाल खड़े करते हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राजस्थान में 611 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जिनके पास अपना भवन नहीं है। दूसरी ओर 64,484 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जिनके पास अपने भवन हैं लेकिन उनमें भी 2,047 स्कूलों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है और 1,049 स्कूलों में पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है। इसका सीधा अर्थ यह है कि स्कूल का अपना भवन होना भी शिक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है। बच्चों को सुरक्षित कक्षा, साफ पेयजल, इस्तेमाल करने योग्य शौचालय, बिजली और पढ़ाई का उचित वातावरण चाहिए। यदि इनमें से बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं तो केवल यह कह देना कि स्कूल के पास अपना भवन है, शिक्षा व्यवस्था की सफलता का प्रमाण नहीं हो सकता।

यहीं से राजस्थान का ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान एक बड़े राष्ट्रीय सवाल में बदल जाता है। काॅकरोच जनता पार्टी आज राजस्थान के सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर सवाल उठा रही है लेकिन जिस समस्या की ओर वह ध्यान खींच रही है वह राजस्थान की सीमा से कहीं आगे जाती है। भारत के करोड़ों बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। उनके लिए स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक अवसरों तक पहुंचने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए सरकारी स्कूलों की स्थिति का सवाल सीधे देश के भविष्य से जुड़ा हुआ है।

21 अगस्त को जयपुर जिले के रामपुरा-कंवरपुरा गांव में सीजेपी की टीम एक सरकारी स्कूल का निरीक्षण करने पहुंची। पार्टी का आरोप था कि स्कूल का मुख्य भवन असुरक्षित घोषित किए जाने के बाद वहां बच्चों की पढ़ाई भैंसों के बाड़े में कराई जा रही है। सीजेपी के सह-संयोजक आशुतोष रांका ने आरोप लगाया कि टीम के स्कूल पहुंचने के बाद कुछ स्थानीय लोगों के साथ विवाद हुआ और उन पर पथराव किया गया। पार्टी ने मारपीट, वाहनों के शीशे तोड़े जाने और कपड़े फाड़े जाने के आरोप भी लगाए। पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए। दूसरी ओर स्थानीय बीजेपी समर्थक ग्रामीणों ने इन आरोपों का विरोध किया और कहा कि स्कूल के लिए 12 लाख रुपए स्वीकृत किए जा चुके हैं तथा गांव के लोग स्वयं स्कूल का निर्माण कराने में सक्षम हैं। उनका कहना था कि उन्हें किसी बाहरी राजनीतिक संगठन की मदद नहीं चाहिए।

यह विवाद अब केवल स्कूल की इमारत का विवाद नहीं रह गया है। राजस्थान सरकार और विपक्ष भी आमने-सामने हैं। स्कूल शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने सीजेपी पर राज्य का माहौल खराब करने की कोशिश का आरोप लगाया है जबकि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने विवाद के लिए बीजेपी कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार ठहराया है। इस बीच शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के अनधिकृत प्रवेश और फोटो-वीडियो बनाने पर रोक लगाने सम्बंधी आदेश भी जारी किया।

इन राजनीतिक बयानों से कहीं ज्यादा जरूरी है कि यदि किसी स्कूल का भवन असुरक्षित घोषित है तो सबसे पहला सवाल यह होना चाहिए कि वह भवन असुरक्षित कब घोषित हुआ, बच्चों को वहां से कब हटाया गया, वैकल्पिक व्यवस्था क्या की गई, नए भवन के लिए पैसा कब स्वीकृत हुआ और निर्माण कब पूरा होगा। यदि किसी स्कूल में पानी नहीं है तो सवाल यह होना चाहिए कि पानी की व्यवस्था कब तक होगी। यदि शौचालय नहीं है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है और निर्माण की समय सीमा क्या है। यदि सरकार इन सवालों के जवाब दे देती है तो किसी भी राजनीतिक अभियान का प्रभाव अपने आप सीमित हो जाएगा।

समस्या यह है कि भारत में शिक्षा पर हमारी सार्वजनिक बहस अक्सर आंकड़ों के एक अलग ही संसार में चलती है। हम बताते हैं कि कितने स्कूल हैं, कितने बच्चे नामांकित हैं, कितने स्कूलों में बिजली है, कितने स्कूलों में शौचालय हैं लेकिन इन आंकड़ों के पीछे मौजूद वास्तविक अनुभव को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। किसी सरकारी रिकाॅर्ड में लिखा हो सकता है कि स्कूल में शौचालय है लेकिन क्या वह शौचालय साफ है? क्या उसमें पानी आता है? क्या उसका इस्तेमाल बच्चे कर सकते हैं? किसी स्कूल में बिजली का कनेक्शन हो सकता है लेकिन क्या बिजली नियमित आती है? किसी स्कूल में कम्प्यूटर हो सकता है लेकिन क्या बच्चे उसका इस्तेमाल कर पाते हैं? यही फर्क कागज पर उपलब्ध सुविधा और जमीन पर उपलब्ध सुविधा के बीच है।

ग्रामीण भारत की शिक्षा व्यवस्था पर हर साल व्यापक तस्वीर पेश करने वाला ‘Annual Status of Education Report’ यानी ASER इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। ASER एक स्वतंत्र नागरिक-आधारित सर्वेक्षण है, जिसे गैर-सरकारी संगठन प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन के सहयोग से तैयार किया जाता है। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों के स्कूल में नामांकन, पढ़ने और गणित की बुनियादी क्षमता तथा स्कूलों में उपलब्ध सुविधाओं जैसी स्थितियों का सर्वेक्षण किया जाता है। इसलिए ASER के आंकड़े हमें सरकारी रिकाॅर्ड से अलग जमीन पर बच्चों और स्कूलों की स्थिति समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम देते हैं।

ASER 2024 की तस्वीर बताती है कि ग्रामीण सरकारी प्राथमिक स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति में सुधार हुआ है लेकिन अभी भी हर बच्चे को सभी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। सर्वेक्षण के दौरान 77.7 प्रतिशत स्कूलों में पीने का पानी उपलब्ध पाया गया जबकि लड़कियों के लिए उपयोग योग्य शौचालय 72 प्रतिशत स्कूलों में पाए गए। बिजली की स्थिति बेहतर दिखाई देती है, 95.9 प्रतिशत स्कूलों में बिजली का कनेक्शन था लेकिन सर्वेक्षण के दिन उनमें से 89.7 प्रतिशत स्कूलों में ही बिजली उपलब्ध थी। यह अंतर महत्वपूर्ण है। कनेक्शन और वास्तविक सुविधा एक ही चीज नहीं हैं। यही बात राजस्थान के आंकड़ों के साथ जोड़कर देखने की जरूरत है। यदि एक तरफ राज्य सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि सैकड़ों सरकारी स्कूलों के पास अपना भवन नहीं है और हजारों स्कूलों में शौचालय तथा पेयजल की सुविधा नहीं है, तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर किए गए स्वतंत्र सर्वेक्षण भी यह बताते हैं कि बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता को केवल कागजी आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता।

शिक्षा व्यवस्था की बदहाली केवल भवन, पानी और शौचालय तक सीमित नहीं है। भारत के सरकारी स्कूलों का संकट उससे कहीं बड़ा है। कहीं शिक्षक कम हैं, कहीं विद्यार्थियों की संख्या कम होने के कारण स्कूलों के विलय की बहस चलती है, कहीं एक ही शिक्षक कई कक्षाओं को पढ़ाता है, कहीं स्कूल तक पहुंचना ही कठिन है और कहीं बच्चों के सीखने का स्तर चिंता पैदा करता है। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में यह समस्या और गम्भीर हो जाती है। स्कूल मौजूद है लेकिन शिक्षक पर्याप्त नहीं। शिक्षक हैं लेकिन विषय विशेषज्ञ नहीं। भवन है लेकिन पुस्तकालय नहीं। कम्प्यूटर है लेकिन इंटरनेट नहीं। इंटरनेट है लेकिन बिजली नियमित नहीं। स्मार्ट क्लास है मगर शिक्षक को उसका उपयोग करने का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं। यानी समस्या किसी एक चीज की नहीं, पूरी व्यवस्था की है।

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ गरीब परिवारों के बच्चों पर पड़ता है। भारत में सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी भूमिका सामाजिक बराबरी की रही है। निजी स्कूलों की फीस वहन करने में असमर्थ परिवारों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूल ही शिक्षा का मुख्य रास्ता हैं। ग्रामीण भारत में आज भी लाखों परिवार अपने बच्चों की शिक्षा के लिए सरकारी व्यवस्था पर निर्भर हैं। ऐसे में सरकारी स्कूल का कमजोर होना केवल शिक्षा विभाग की समस्या नहीं है। यह सामाजिक न्याय की समस्या है।

एक सम्पन्न परिवार के सामने विकल्प होते हैं। यदि उसे अपने बच्चे का स्कूल पसंद नहीं आता तो वह दूसरा स्कूल चुन सकता है लेकिन गरीब परिवार के पास वह विकल्प नहीं होता। उसके बच्चे के लिए गांव का सरकारी स्कूल ही स्कूल है। यदि वहां शिक्षक नहीं हैं, भवन खराब है, पानी नहीं है या शौचालय नहीं है तो वह परिवार अपने बच्चे के लिए दूसरा विकल्प कितनी आसानी से तलाश सकता है? इसलिए सरकारी स्कूल की जर्जर दीवार को केवल एक निर्माण सम्बंधी समस्या के रूप में देखना गलत होगा। वह सामाजिक असमानता की दीवार भी हो सकती है।

सरकारें अक्सर शिक्षा में सुधार की बड़ी-बड़ी योजनाओं की घोषणा करती हैं। नई शिक्षा नीति, डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट क्लास, कौशल विकास, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कोडिंग और आधुनिक तकनीक, इन सबकी अपनी जरूरत और महत्व है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी बच्चे के लिए सबसे पहली जरूरत अभी भी एक सुरक्षित कक्षा है। उसके बाद शिक्षक है, फिर किताब है, फिर पढ़ने का वातावरण है और तकनीक उसके बाद आती है। भारत उस समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की शिक्षा देने की बात कर रहा है, जब उसी देश में कुछ बच्चों के लिए अभी भी यह सुनिश्चित करना चुनौती है कि उनके स्कूल की छत सुरक्षित है। यह विरोधाभास हमारी शिक्षा नीति की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है।

स्मरण रहे भारत को अगर सचमुच विकसित देश बनना है तो उसकी शुरुआत किसी बड़े औद्योगिक काॅरिडोर, किसी नई तकनीकी परियोजना या किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से नहीं होगी। उसकी शुरुआत उस सरकारी स्कूल से होगी जहां एक बच्चा सुबह अपनी किताब लेकर पहुंचता है और उम्मीद करता है कि उसे सुरक्षित भवन, साफ पानी, इस्तेमाल करने योग्य शौचालय, पर्याप्त शिक्षक और सीखने का सम्मानजनक वातावरण मिलेगा। उस बच्चे का भविष्य तभी मजबूत होगा जब उसकी स्कूली व्यवस्था मजबूत होगी। राजस्थान से उठी आवाज इसलिए केवल ‘स्कूल ठीक करो’ की आवाज नहीं है। यह उस भारत को ठीक करने की आवाज है जिसे हम अपने बच्चों के लिए बनाने का दावा करते हैं। स्कूल ठीक होंगे, तभी भविष्य ठीक होगा।

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