नितिन गडकरी को कभी मोदी सरकार का सबसे ताकतवर और मोस्ट परफाॅर्मिंग मंत्री माना जाता था लेकिन अब उनके सामने एक साथ कई राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल खड़े हैं। ई-20 और एथेनाॅल विवाद में उनके परिवार से जुड़े कारोबारी हितों पर उठे सवाल, सतीश शेट्टी हत्याकांड से जुड़ी पुरानी राजनीतिक चर्चा, दिल्ली-मुम्बई, दिल्ली-देहरादून और द्वारका एक्सप्रेसवे समेत कई महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की गुणवत्ता पर उठते सवाल और सम्भावित मोदी मंत्रिमंडल फेरबदल की अटकलों ने गडकरी के राजनीतिक भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सत्ता के गलियारों में अफवाहों का बाजार गर्म है कि मोदी सरकार 2027 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले अपनी टीम में बड़े बदलाव कर सकती है। सवाल यह है कि इस बदलाव में गडकरी की भूमिका क्या होगी, वही पुराना मंत्रालय, कोई नई जिम्मेदारी, मंत्रिमंडल से विदाई या फिर कोई संवैधानिक पद?
नरेंद्र मोदी सरकार के लम्बे कार्यकाल में नितिन गडकरी उन मंत्रियों में रहे जिनकी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनी। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय उनके नाम से इस तरह जुड़ गया कि हाईवे, एक्सप्रेसवे, पुल और सुरंगों की बात होते ही गडकरी का चेहरा सामने आने लगा। उन्होंने सड़क निर्माण की गति को सरकार की उपलब्धियों का बड़ा प्रतीक बनाया और खुद को ऐसे मंत्री के रूप में स्थापित किया जो योजनाओं को जमीन पर उतारने की क्षमता रखता है। यही कारण रहा कि कई बार उन्हें मोदी सरकार का मोस्ट परफार्मिंग मिनिस्टर कहा गया और उनके काम की प्रशंसा सरकार के समर्थकों के साथ-साथ राजनीतिक विरोधियों की तरफ से भी सुनाई दी।
अब वही गडकरी पहली बार ऐसी राजनीतिक परिस्थिति में दिखाई दे रहे हैं जहां उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि, इंफ्रास्ट्रक्चर ही उनके सामने सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी है। एक के बाद एक नई सड़क परियोजनाओं में बारिश के बाद सामने आई समस्याएं, एथेनाॅल 20 को लेकर बढ़ता असंतोष और परिवार से जुड़े कारोबारी सवाल उनकी सार्वजनिक छवि पर दबाव बना रहे हैं। इसी बीच सम्भावित कैबिनेट फेरबदल की खबरों ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है कि क्या गडकरी का राजनीतिक और प्रशासनिक दौर किसी नए मोड़ पर पहुंच गया है।
एक्सप्रेसवे की चमक पर बारिश ने उठाए सवाल
गडकरी के मंत्रालय की सबसे बड़ी पहचान तेजी से बनते एक्सप्रेसवे हैं लेकिन 2026 के मानसून ने कई महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की गुणवत्ता पर सवाल खड़े किए हैं। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर उद्घाटन के कुछ ही समय बाद बारिश के दौरान सड़क में बड़े गड्ढे सामने आए। यह परियोजना करीब 12 हजार करोड़ रुपए की लागत वाली महत्वपूर्ण परियोजनाओं में गिनी जाती है और इसे उत्तर भारत के आधुनिक सड़क नेटवर्क की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया गया था। ऐसे में शुरुआती मानसून में ही सड़क की हालत पर सवाल उठना स्वाभाविक रूप से सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा करता है।
इसके बाद दिल्ली-मुम्बई एक्सप्रेसवे भी चर्चा में आया। गुजरात के अंकलेश्वर के पास सड़क में बड़ा गड्ढा सामने आया और राजस्थान के सवाई माधोपुर क्षेत्र में भी सड़क के क्षतिग्रस्त होने की खबरें आईं। दिल्ली-मुम्बई एक्सप्रेसवे देश की सबसे महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं में शामिल है और इसकी लागत एक लाख करोड़ रुपए से अधिक बताई जाती है। जिस परियोजना को भारत के नए इंफ्रास्ट्रक्चर माॅडल की मिसाल के रूप में प्रस्तुत किया गया हो, उसमें मानसून के दौरान ऐसी समस्याएं सामने आना केवल स्थानीय सड़क की खराबी नहीं रह जाती बल्कि पूरी निर्माण व्यवस्था की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करता है।
द्वारका एक्सप्रेसवे की स्थिति ने भी इस बहस को आगे बढ़ाया। दिल्ली-एनसीआर की इस महत्वपूर्ण परियोजना के सर्विस रोड्स और कनेक्शन लिंक्स में क्षति की शिकायतें सामने आईं। कुछ हिस्सों में असफाल्ट लेयर उखड़ने, पानी और सीपेज से जुड़ी समस्याओं तथा मरम्मत के बाद फिर खराबी आने की खबरों ने सवाल उठाया कि क्या निर्माण की गति के साथ गुणवत्ता और मेंटेनेंस पर उतना ही ध्यान दिया गया है।
उत्तर प्रदेश में गंगा एक्सप्रेसवे से जुड़े एक लिंक रोड का हिस्सा उन्नाव में बारिश के दौरान धंसने की खबर ने भी चिंता बढ़ाई। सड़क के नीचे की मिट्टी बहने और स्लोप प्रोटेक्शन की व्यवस्था पर सवाल उठे। इस तरह अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग परियोजनाओं से जुड़ी घटनाओं ने यह बहस पैदा कर दी कि भारत के नए एक्सप्रेसवे नेटवर्क में निर्माण की गुणवत्ता, जल निकासी, डिजाइन और मेंटेनेंस की व्यवस्था को लेकर कहीं गम्भीर कमी तो नहीं है। इन परियोजनाओं की जिम्मेदारी केवल केंद्रीय मंत्री की व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं है। एनएचएआई, ठेकेदार, कंसल्टेंट्स, इंजीनियर्स और मेंटेनेंस एजेंसीज की अपनी भूमिकाएं हैं लेकिन राजनीतिक जिम्मेदारी मंत्रालय तक जरूर पहुंचती है, खासकर तब जब उस मंत्रालय की सबसे बड़ी उपलब्धि ही सड़क निर्माण को बताया गया हो। गडकरी ने खुद हाल में खराब डीपीआर, सबसे कम बोली के आधार पर काम लेने वाली कंपनियों और सब काॅन्ट्रैक्टिंग की कई परतों पर सवाल उठाए हैं। इससे साफ है कि अब सड़क निर्माण की बहस केवल किलोमीटर बढ़ाने की नहीं रही बल्कि गुणवत्ता और जवाबदेही की भी हो गई है।
एथेनॉल 20 ने बदल दिया गडकरी के सामने सवाल
गडकरी की दूसरी बड़ी चुनौती एथेनाॅल नीति है। गडकरी लम्बे समय से एथेनाॅल और वैकल्पिक ईंधन के समर्थक रहे हैं। उनका तर्क रहा है कि भारत को पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करनी चाहिए, किसानों के लिए एथेनाॅल एक बड़ा बाजार बन सकता है और देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिल सकती है लेकिन एथेनाॅल ई-20 लागू होने के बाद इस नीति का दूसरा पक्ष सामने आया। पुराने वाहनों की फ्यूल इफ्फिइंसी, माइलेज और इंजन पर सम्भावित प्रभाव को लेकर वाहन मालिकों में चिंता बढ़ी। एथेनाॅल ई-20 धीरे-धीरे एक तकनीकी या ऊर्जा नीति का मुद्दा न रहकर उपभोक्ता के आर्थिक हित का मुद्दा बन गया। विपक्ष इसे हाथों-हाथ लिया और सवाल उठाया कि पुराने वाहन एथेनाॅल ई-20 से कम माइलेज देते हैं तो उसका आर्थिक बोझ किस पर पड़ेगा।
इसी विवाद के बीच नितिन गडकरी के परिवार से जुड़े कारोबारी हितों का मुद्दा सामने आया। विपक्ष की तरफ से आरोप लगाए गए कि उनके परिवार के कारोबार का एथेनाॅल क्षेत्र से सम्बंध है और इसलिए एथेनाॅल नीति में सम्भावित हितों का टकराव हो सकता है। गडकरी ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा कि उनके परिवार के कारोबार में एथेनाॅल की हिस्सेदारी बहुत सीमित है तथा उनकी सरकारी नीतियों और परिवार के कारोबारी हितों को जोड़ना गलत है। फिर भी राजनीतिक असर अपनी जगह है। सत्ता के गलियारों में अब यह चर्चा है कि जिस नीति को गडकरी लम्बे समय से देश के ऊर्जा भविष्य से जोड़ते रहे हैं, वही नीति अब उनके लिए राजनीतिक परेशानी का कारण बन गई है। एथेनाॅल ई-20 विवाद इतना बढ़ा कि सोशल मीडिया पर गडकरी से जुड़े कई दावे और आरोप अदालत तक पहुंच गए और बाॅम्बे हाईकोर्ट में भी मामला सामने आया। यानी यह विवाद केवल संसद या राजनीतिक मंच तक सीमित नहीं रहा।
सतीश शेट्टी मामला फिर क्यों चर्चा में?
गडकरी के राजनीतिक अतीत में विवादों की चर्चा नई नहीं है। सतीश शेट्टी हत्याकांड का नाम भी समय-समय पर उनके राजनीतिक संदर्भ में सामने आता रहा है। पुणे के आरटीआई कार्यकर्ता सतीश शेट्टी ने पुणे-मुम्बई एक्सप्रेसवे से जुड़ी जमीनों में कथित गड़बड़ियों को लेकर शिकायतें की थीं। बाद में उनकी हत्या कर दी गई। मामले की जांच के दौरान आईआरबी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर्स और उसके प्रमुख वीरेंद्र म्हैस्कर का नाम सामने आया तथा सीबीआई ने आईआरबी से जुड़े परिसरों पर छापे भी मारे।
उस दौर में नितिन गडकरी और आईआरबी से जुड़े कारोबारी और राजनीतिक सम्बंधों को लेकर भी सवाल उठे थे। इसी वजह से सतीश शेट्टी हत्याकांड की चर्चा जब भी गडकरी से जुड़े पुराने विवादों की सूची सामने आती है तो फिर शुरू हो जाती है।
क्या गडकरी और मोदी के रिश्ते भी समीकरण बदलेंगे?
नितिन गडकरी की स्थिति को समझने के लिए नरेंद्र मोदी के साथ उनके राजनीतिक सम्बंधों की चर्चा भी जरूरी है। सत्ता के गलियारों में लम्बे समय से यह चर्चा रही है कि मोदी और गडकरी के बीच वह राजनीतिक समीकरण कभी नहीं रहा जो मोदी और अमित शाह के बीच दिखाई देता है। गडकरी की अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि है, वे भाजपा अध्यक्ष रह चुके हैं और संघ परिवार में उनका स्वतंत्र सम्पर्क रहा है। महाराष्ट्र की राजनीति में भी उनकी अपनी पहचान है। मोदी सरकार ने 2024 में उन्हें फिर सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय देकर यह जरूर संकेत दिया था कि उस समय उन पर भरोसा कायम था लेकिन अब 2026 में परिस्थितियां बदल चुकी हैं। आने वाले विधानसभा और 2029 लोकसभा चुनावों की तैयारी के बीच भाजपा संगठन और सरकार दोनों में नई टीम को लेकर चर्चा है। ऐसे में वरिष्ठ मंत्रियों के प्रदर्शन, राजनीतिक उपयोगिता और क्षेत्रीय समीकरणों को नए सिरे से देखा जाना स्वाभाविक है।
कैबिनेट फेरबदल और गडकरी का भविष्य
सत्ता के गलियारों में इन दिनों अफवाहों का बाजार गर्म है कि मोदी सरकार मंत्रिमंडल में बड़ा फेरबदल कर सकती है। 2027 में उत्तर प्रदेश, गुजरात, उत्तराखण्ड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों में चुनाव होने हैं। भाजपा के लिए इन चुनावों के राजनीतिक समीकरण महत्वपूर्ण हैं और उसके बाद 2029 का लोकसभा चुनाव सामने होगा। ऐसे में मंत्रिमंडल का पुनर्गठन केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि चुनावी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। कुछ रिपोर्टों में गडकरी के मंत्रालय में बदलाव की सम्भावना की चर्चा हुई है। यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक अटकलें तेज हो जाती हैं। अगर गडकरी का मंत्रालय बदला जाता है तो इसका अर्थ यह नहीं होगा कि उनकी राजनीतिक यात्रा समाप्त हो गई। सरकार उन्हें कोई दूसरा महत्वपूर्ण मंत्रालय दे सकती है और सड़क परिवहन मंत्रालय किसी नए चेहरे को सौंप सकती है।
दूसरी सम्भावना यह है कि सरकार गडकरी को उसी मंत्रालय में बनाए रखे और उनसे सड़क परियोजनाओं की गुणवत्ता सुधारने की अपेक्षा करे। आखिर इंफ्रास्ट्रक्चर का अगला चरण अभी बहुत बड़ा है और गडकरी का अनुभव सरकार के लिए उपयोगी हो सकता है। तीसरी सम्भावना मंत्रिमंडल से बाहर किए जाने की है और चैथी सम्भावना किसी संवैधानिक पद की है। वरिष्ठ नेताओं को राज्यपाल बनाए जाने की चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं और हाल के राजनीतिक विमर्श में मनोहर लाल खट्टर समेत कुछ नेताओं के नाम ऐसी अटकलों में आए हैं। अगर गडकरी को राज्यपाल जैसी संवैधानिक भूमिका दी जाती है तो इसका अर्थ यह होगा कि उन्हें सम्मानजनक पद तो मिल रहा है लेकिन सक्रिय केंद्रीय राजनीति में उनकी भूमिका सीमित की जा रही है। यही कारण है कि गडकरी के मामले में कोई भी बदलाव सामान्य विभागीय फेरबदल नहीं माना जाएगा।
तो क्या विदाई का समय आ गया?
फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि नितिन गडकरी की मंत्रिमंडल से विदाई तय हो चुकी है लेकिन यह भी सच है कि उनके सामने पिछले कुछ वर्षों की तुलना में कहीं ज्यादा राजनीतिक चुनौतियां खड़ी हैं। ई-20 विवाद ने उनकी नीति को बहस के केंद्र में ला दिया है, परिवार से जुड़े कारोबारी सवालों ने विपक्ष को हमला करने का मौका दिया है, पुराने विवाद फिर चर्चा में हैं और कई नए एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता ने उनके मंत्रालय के प्रदर्शन पर सवाल खड़े किए हैं।
इन सबके बीच अगर मंत्रिमंडल में बड़ा फेरबदल होता है तो गडकरी का नाम स्वाभाविक रूप से सबसे ज्यादा चर्चा में रहेगा। उनकी विदाई होती है तो इसे केवल किसी मंत्री को हटाए जाने के रूप में नहीं देखा जाएगा। यह भाजपा के भीतर पुराने और स्वतंत्र राजनीतिक चेहरों की भूमिका तथा मोदी सरकार की अगली टीम के बारे में बड़ा संकेत होगा। अगर उनका मंत्रालय बदला जाता है तो सरकार शायद उन्हें बनाए रखते हुए उनकी राजनीतिक भूमिका को नया रूप देना चाहती है। अगर उन्हें उसी मंत्रालय में रखा जाता है तो यह माना जाएगा कि तमाम विवादों के बावजूद मोदी सरकार को अभी भी उनके अनुभव और राजनीतिक उपयोगिता पर भरोसा है। अगर उन्हें किसी संवैधानिक पद पर भेजा जाता है तो यह सक्रिय केंद्रीय राजनीति में उनके प्रभाव को सीमित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जाएगा। इसलिए फिलहाल सवाल का जवाब ‘हां’ या ‘नहीं’ में देना जल्दबाजी होगी लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि जिस नितिन गडकरी को कभी मोदी सरकार की सबसे मजबूत उपलब्धियों का चेहरा माना जाता था, आज उन्हीं की राजनीतिक स्थिति पर सबसे ज्यादा अटकलें लग रही हैं।