करीब चार दशक पहले जिस श्रीनगर जलविद्युत परियोजना की शुरुआत उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड की एक महत्वाकांक्षी योजना के रूप में हुई थी, वह समय के साथ निजी क्षेत्र में पहुंची, जीवीके समूह की पहचान बनी और अब दिवाला प्रक्रिया के बाद अडानी समूह के नियंत्रण में जाने की दिशा में बढ़ चुकी है लेकिन सवाल केवल मालिक बदलने का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या उत्तराखण्ड सरकार ने इस बदलाव के साथ राज्य के हितों, पुराने समझौतों, मुफ्त बिजली, राॅयल्टी, पर्यावरणीय दायित्वों और स्थानीय लोगों के अधिकारों की दोबारा समीक्षा की है? ‘दि संडे पोस्ट’ की यह विशेष पड़ताल इसी बदलती कहानी की तह तक जाने का प्रयास है
उत्तराखण्ड की नदियों का इतिहास केवल भौगोलिक नहीं बल्कि राजनीतिक और आर्थिक भी है। हिमालय से निकलने वाली नदियों को लम्बे समय तक राज्य की सबसे बड़ी प्राकृतिक पूंजी माना गया। इन्हीं नदियों के सहारे उत्तराखण्ड को ऊर्जा प्रदेश बनाने का सपना देखा गया। श्रीनगर जलविद्युत परियोजना इसी सपने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक थी लेकिन आज यह परियोजना एक बिल्कुल नए कारण से चर्चा में है। इस बार बहस बिजली उत्पादन या 2013 की आपदा की नहीं बल्कि उसके बदलते काॅरपोरेट स्वामित्व की है।
इस कहानी की शुरुआत वर्ष 1982 से होती है, जब केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) ने अलकनंदा नदी पर 200 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना को तकनीकी एवं आर्थिक स्वीकृति दी। उस समय यह उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड (यूपीएसईबी) की सरकारी परियोजना थी लेकिन 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के साथ देश में बिजली क्षेत्र निजी निवेश के लिए खोला गया। श्रीनगर परियोजना भी उसी परिवर्तन का हिस्सा बनी।
1998 में परियोजना के विकास के लिए निजी क्षेत्र के साथ कार्यान्वयन समझौता हुआ। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद 2006 में संशोधित (रि-स्टेटेड) कार्यान्वयन समझौता किया गया और परियोजना की क्षमता बढ़ाकर 330 मेगावाट कर दी गई। आगे चलकर इस परियोजना का संचालन अलकनंदा हाइड्रो पावर कम्पनी लिमिटेड (एएचपीएल) के माध्यम से हुआ, जो जीवीके समूह की प्रमुख जलविद्युत परिसम्पत्तियों में शामिल थी।
कई वर्षों तक जीवीके समूह ने इस परियोजना को अपनी महत्वपूर्ण ऊर्जा परिसम्पत्ति के रूप में प्रस्तुत किया लेकिन इसी दौरान समूह पर वित्तीय दबाव बढ़ता गया। ऊर्जा क्षेत्र में भारी निवेश, ऋण का बोझ, नकदी प्रवाह की चुनौतियां और अन्य कारोबारी कारणों ने कम्पनी की वित्तीय स्थिति को प्रभावित किया। धीरे-धीरे मामला ऋण पुनर्गठन से आगे बढ़कर दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की प्रक्रिया तक पहुंच गया। यहीं से श्रीनगर जलविद्युत परियोजना की कहानी ने नया मोड़ लिया। अब यह केवल उत्तराखण्ड की परियोजना नहीं रही बल्कि देश के सबसे बड़े काॅरपोरेट अधिग्रहणों में से एक का हिस्सा बन गई। दिवाला प्रक्रिया के दौरान विभिन्न कम्पनियों ने जीवीके एनर्जी की परिसम्पत्तियों में रुचि दिखाई। अंततः अडानी पावर ने अधिग्रहण की दौड़ में बढ़त बनाई और मई 2026 में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने जीवीके एनर्जी के अधिग्रहण को मंजूरी दे दी। जीवीके एनर्जी की सबसे महत्वपूर्ण परिसम्पत्तियों में श्रीनगर की 330 मेगावाट जलविद्युत परियोजना भी शामिल है। यहीं से उत्तराखण्ड के लिए सबसे बड़ा प्रश्न पैदा होता है। जब किसी निजी कम्पनी की जगह दूसरी निजी कम्पनी आती है तो क्या केवल शेयरों का मालिक बदलता है या राज्य के साथ हुए पुराने समझौते भी नए सिरे से परखे जाते हैं? क्या 1998 और 2006 के समझौते स्वतः नए स्वामी पर लागू हो जाते हैं? क्या राज्य सरकार को इस बदलाव के बाद अपने हितों की समीक्षा करनी चाहिए थी? क्या मुफ्त बिजली, राॅयल्टी, स्थानीय रोजगार, पुनर्वास और पर्यावरणीय दायित्वों पर नए सिरे से विचार हुआ? इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट रूप से सार्वजनिक नहीं हैं।
यही इस पूरी खोजी श्रृंखला का उद्देश्य है। यह किसी कॉर्पोरेट समूह के पक्ष या विपक्ष की कहानी नहीं होगी। यह उत्तराखण्ड के हितों की कहानी होगी। यदि परियोजना का नया स्वामित्व राज्य के लिए अधिक निवेश, बेहतर तकनीक और अधिक राजस्व लेकर आता है तो उसका स्वागत होना चाहिए लेकिन यदि इस संक्रमण के दौरान राज्य के अधिकारों और जनता के हितों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया तो उन प्रश्नों को भी सामने लाना पत्रकारिता का दायित्व है।
आने वाले भागों में ‘दि संडे पोस्ट’ जीवीके समूह की वित्तीय यात्रा, दिवाला प्रक्रिया, अडानी समूह के अधिग्रहण, पुराने समझौतों की कानूनी स्थिति, उत्तराखण्ड सरकार की भूमिका और इस पूरी प्रक्रिया के स्थानीय प्रभावों की दस्तावेज आधारित पड़ताल करेगा क्योंकि यह कहानी केवल एक कम्पनी की नहीं बल्कि उस नदी की भी है, जिसके सहारे उत्तराखण्ड ने अपने विकास का सपना बुना था।
कैसे कर्ज के बोझ तले दबा जीवीके और श्रीनगर परियोजना पहुंची दिवाला प्रक्रिया तक?
यदि श्रीनगर जलविद्युत परियोजना की पहली कहानी उत्तराखण्ड के विकास माॅडल की है तो दूसरी कहानी भारत के काॅरपोरेट क्षेत्र के उतार- चढ़ाव की है। यह उस दौर की कहानी है जब देश के बड़े औद्योगिक समूह हवाई अड्डों, बिजली परियोजनाओं, राजमार्गों और शहरी अवसंरचना में तेजी से निवेश कर रहे थे। इन्हीं समूहों में जीवीके भी शामिल था।
एक समय जीवीके समूह को भारत के सबसे महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर समूहों में गिना जाता था। मुम्बई और बेंगलुरु हवाई अड्डों के संचालन से लेकर सड़क, ऊर्जा और खनन तक, कम्पनी ने कई बड़े क्षेत्रों में निवेश किया। श्रीनगर जलविद्युत परियोजना भी इसी विस्तार रणनीति का हिस्सा थी। उत्तराखण्ड में इसे निजी क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजनाओं में गिना जाने लगा। बड़े निवेश के साथ बड़ा कर्ज भी जुड़ता चला गया। देश की अनेक अवसंरचना कम्पनियों की तरह जीवीके भी वित्तीय दबाव में आने लगी। परियोजनाओं के पूरा होने में देरी, बढ़ती लागत, ब्याज का बोझ और नकदी प्रवाह की समस्याओं ने समूह की वित्तीय स्थिति को कमजोर किया। ऊर्जा क्षेत्र में लम्बे समय तक फंसी पूंजी और कर्ज की बढ़ती देनदारियों ने स्थिति को और जटिल बना दिया।
आखिरकार मामला केवल ऋण पुनर्गठन तक सीमित नहीं रहा। वर्ष 2025 में जीवीके एनर्जी Limited के विरुद्ध दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (सीआईआरपी) शुरू हुई। उपलब्ध सार्वजनिक रिकाॅर्ड के अनुसार, यह प्रक्रिया कम्पनी की वित्तीय देनदारियों और भुगतान चूक के बाद प्रारम्भ हुई। इसके बाद कम्पनी के प्रबंधन की जगह एक Resolution
Professional ने प्रक्रिया का संचालन सम्भाला और सम्भावित खरीदारों से रुचि-पत्र (ईओआई) आमंत्रित किए। यहीं से श्रीनगर जलविद्युत परियोजना की कहानी उत्तराखण्ड से निकलकर राष्ट्रीय कॉरपोरेट जगत का विषय बन गई। दिवाला प्रक्रिया में देश के कई बड़े औद्योगिक और ऊर्जा समूहों ने रुचि दिखाई। यह अपने आप में बताता है कि तमाम विवादों और चुनौतियों के बावजूद श्रीनगर की 330 मेगावाट जलविद्युत परियोजना एक मूल्यवान परिसम्पत्ति मानी जाती है। जलविद्युत परियोजनाएं लम्बी अवधि के निवेश मानी जाती हैं और यदि वे संचालन की स्थिति में हों तो बड़े ऊर्जा समूह उनके अधिग्रहण में विशेष रुचि रखते हैं।
दिवाला प्रक्रिया के दौरान कई दावेदार सामने आए। उद्योग जगत की रिपोर्टों के अनुसार, अनेक कम्पनियों ने अभिरुचि दिखाई। शुरुआती दौर में सबसे ऊंची बोली एक अन्य समूह की मानी जा रही थी लेकिन बाद में परिस्थितियां बदलीं और अंततः अडानी पावर का प्रस्ताव आगे बढ़ा। इसके बाद मई 2026 में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने जीवीके एनर्जी लिमिटेड के 100 प्रतिशत अधिग्रहण के लिए अडानी पावर को मंजूरी दे दी। आयोग ने स्पष्ट किया कि यह अधिग्रहण आईबीसी के तहत चल रही काॅरपोरेट इनसाॅल्वेंसी प्रक्रिया के अंतर्गत प्रस्तावित है। जीवीके अपनी सहायक कम्पनी एएचपीएल के माध्यम से उत्तराखण्ड के श्रीनगर स्थित 330 मेगावाट जलविद्युत परियोजना से जुड़ी है लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण कानूनी और नीतिगत प्रश्न खड़ा होता है। क्या सीसीआई की मंजूरी का अर्थ यह है कि परियोजना का स्वामित्व पूरी तरह बदल गया?
उत्तर है नहीं, कम-से-कम कानूनी प्रक्रिया की दृष्टि से यह अंतिम चरण नहीं है। सीसीआई की मंजूरी प्रतिस्पर्धा कानून के तहत आवश्यक नियामकीय स्वीकृति है। इसके बाद भी आईबीसी के तहत लेनदारों की समिति Committee of Creditors), राष्ट्रीय कम्पनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) और अन्य औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी होना आवश्यक होती हैं। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह देखना होगा कि पूरी दिवाला प्रक्रिया किस चरण तक पहुंची है।
यहीं उत्तराखण्ड सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि किसी जलविद्युत परियोजना का स्वामित्व बदलता है तो क्या राज्य सरकार केवल दर्शक बनी रहती है? या उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पुराने समझौतों में निहित सभी दायित्व, मुफ्त बिजली, राॅयल्टी, पर्यावरणीय अनुपालन, पुनर्वास, स्थानीय रोजगार और सामाजिक उत्तरदायित्व, नए स्वामी पर भी समान रूप से लागू रहें? यह केवल कानूनी नहीं बल्कि सार्वजनिक नीति का प्रश्न है।
यही इस रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है। अब यह कहानी केवल जीवीके के वित्तीय संकट की नहीं रही। यह उस संक्रमण की कहानी है, जिसमें उत्तराखण्ड की सबसे महत्वपूर्ण निजी जलविद्युत परियोजना एक काॅरपोरेट समूह से दूसरे समूह की ओर बढ़ रही है और शायद सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है कि क्या इस पूरी प्रक्रिया में उत्तराखण्ड सरकार ने केवल स्वामित्व परिवर्तन देखा या उसने यह भी सुनिश्चित किया कि राज्य और स्थानीय लोगों के हित किसी भी परिस्थिति में कमजोर न पड़ें?
नया मालिक, पुराने समझौते, क्या उत्तराखण्ड के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं?
किसी कम्पनी का अधिग्रहण सामान्य कारोबारी घटना हो सकती है लेकिन जब मामला किसी राज्य के प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित सार्वजनिक महत्व की परियोजना का हो, तब प्रश्न केवल शेयरों के हस्तांतरण का नहीं रह जाता। श्रीनगर जलविद्युत परियोजना के संदर्भ में भी यही स्थिति है। यदि जीवीके एनर्जी के अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होती है और परियोजना का नियंत्रण अडानी समूह के पास आता है तो सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होगा कि नया मालिक कौन है। असली प्रश्न यह होगा कि क्या पुराने अधिकारों और दायित्वों का पूरा ढांचा भी उसी रूप में नए स्वामी पर लागू रहेगा?
श्रीनगर परियोजना केवल एक बिजलीघर नहीं है। इसके साथ 1998 का मूल कार्यान्वयन समझौता, 2006 का संशोधित (रि-स्टेटेड) कार्यान्वयन समझौता, पर्यावरणीय स्वीकृतियां, वन स्वीकृतियां, जल उपयोग की शर्तें, पुनर्वास सम्बंधी दायित्व, मुफ्त बिजली की व्यवस्था, राॅयल्टी, सुरक्षा मानक और स्थानीय समुदायों से जुड़े अनेक दायित्व जुड़े हुए हैं। इनमें से अधिकांश दायित्व परियोजना से जुड़े हैं, न कि केवल किसी एक काॅरपोरेट समूह से। फिर भी स्वामित्व परिवर्तन के समय यह सुनिश्चित करना आवश्यक होता है कि इन दायित्वों के पालन में कोई शिथिलता न आए। यहीं राज्य सरकार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। क्या ऊर्जा विभाग ने यह समीक्षा की है कि स्वामित्व परिवर्तन की स्थिति में सभी संविदात्मक दायित्व यथावत रहेंगे? क्या परियोजना से जुड़े विभागों ने यह देखा कि नए प्रबंधन के साथ समन्वय की क्या व्यवस्था होगी? क्या परियोजना के संचालन, रखरखाव और दीर्घकालिक निवेश की नई योजना सरकार के साथ साझा की गई? यह ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर केवल कम्पनी ही नहीं बल्कि राज्य सरकार को भी देना होगा।
इस पूरी प्रक्रिया में एक और महत्वपूर्ण पक्ष है, स्थानीय समाज का विश्वास। जिन गांवों ने भूमि दी, जिन परिवारों ने परियोजना के कारण अपने जीवन में बदलाव देखा और जिन्होंने वर्षों तक इसके प्रभावों को महसूस किया, उनके लिए कम्पनी का नाम बदलना शायद सबसे बड़ा मुद्दा नहीं है। उनके लिए अधिक महत्वपूर्ण यह है कि क्या नया प्रबंधन स्थानीय रोजगार को बढ़ाएगा, क्या पुनर्वास से जुड़े लम्बित मुद्दों का समाधान करेगा, क्या काॅर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआई) के कार्यक्रमों को नई गति मिलेगी और क्या परियोजना प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं पर अधिक निवेश होगा।
दूसरी ओर अडानी समूह के लिए भी यह केवल एक परिसम्पत्ति का अधिग्रहण नहीं होगा। उसे एक ऐसी परियोजना मिलेगी जो तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण है लेकिन जिसका सार्वजनिक और पर्यावरणीय इतिहास भी उतना ही जटिल रहा है। इसलिए नए प्रबंधन के सामने केवल बिजली उत्पादन बढ़ाने की चुनौती नहीं होगी बल्कि पारदर्शिता, स्थानीय संवाद और विश्वास बहाली की चुनौती भी होगी। यदि कम्पनी उत्तराखण्ड में दीर्घकालिक उपस्थिति चाहती है तो उसे केवल संचालन दक्षता से आगे बढ़कर सामाजिक स्वीकृति (Social Licence to Operate) भी अर्जित करनी होगी।
यही इस कहानी का सबसे रोचक पहलू सामने आता है। भारत में अनेक अवसंरचना परियोजनाओं का स्वामित्व समय-समय पर बदला है लेकिन हर बार यह प्रश्न उठा है कि क्या नए मालिक ने केवल परिसम्पत्ति खरीदी है या उससे जुड़े सार्वजनिक दायित्व भी समान गम्भीरता से स्वीकार किए हैं। श्रीनगर परियोजना के मामले में भी यही कसौटी लागू होगी। इस पूरी प्रक्रिया में एक कानूनी पहलू भी ध्यान देने योग्य है। यदि मूल समझौतों में किसी प्रकार का Change in Control या Assignment सम्बंधी प्रावधान है तो यह देखना आवश्यक होगा कि उसके अनुसार राज्य सरकार की भूमिका क्या है। क्या केवल नियामकीय स्वीकृतियां पर्याप्त हैं या राज्य की औपचारिक सहमति भी आवश्यक है? क्या परियोजना के लाइसेंस और जल उपयोग सम्बंधी अधिकार स्वतः नए स्वामी को हस्तांतरित हो जाते हैं या इसके लिए अलग प्रक्रिया अपनाई जाती है? इन प्रश्नों का उत्तर समझौतों की मूल धाराओं और लागू कानूनों के अध्ययन से ही मिलेगा।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस स्वामित्व परिवर्तन को केवल कॉरपोरेट लेन-देन के रूप में न देखा जाए। श्रीनगर परियोजना उत्तराखण्ड के ऊर्जा भविष्य का हिस्सा है। यदि नया निवेश आता है, तकनीकी उन्नयन होता है, सुरक्षा मानक बेहतर होते हैं और स्थानीय विकास को गति मिलती है तो इसका लाभ राज्य को मिलेगा लेकिन यदि पुराने विवाद, लम्बित दायित्व और सामाजिक प्रश्न अनदेखे रह जाते हैं तो केवल मालिक बदलने से परियोजना की सार्वजनिक स्वीकार्यता नहीं बढ़ेगी। इसलिए अब समय आ गया है कि उत्तराखण्ड सरकार एक स्पष्ट सार्वजनिक स्थिति रखे। क्या उसने नए स्वामित्व परिवर्तन के संदर्भ में परियोजना का पुनर्मूल्यांकन किया है? क्या उसने यह सुनिश्चित किया है कि मुफ्त बिजली, राॅयल्टी, पर्यावरणीय अनुपालन, पुनर्वास, स्थानीय रोजगार और सीएसआर से जुड़े सभी दायित्व बिना किसी बदलाव के जारी रहेंगे? यदि भविष्य में परियोजना के विस्तार या किसी नई तकनीकी योजना का प्रस्ताव आता है तो उसका मूल्यांकन किस आधार पर किया जाएगा?
यही वे प्रश्न हैं जो इस पूरी कहानी को सामान्य कॉरपोरेट अधिग्रहण से अलग बनाते हैं क्योंकि अंततः यह केवल जीवीके से अडानी तक की यात्रा नहीं है बल्कि उत्तराखण्ड की एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक परिसम्पत्ति के भविष्य की कहानी है।
अडानी युग की शुरुआत, क्या बदलेगा श्रीनगर परियोजना का भविष्य?
किसी भी बड़ी अवसंरचना परियोजना का स्वामित्व बदलने के बाद पहला सवाल यही होता है कि अब आगे क्या होगा? क्या केवल कम्पनी का नाम बदलेगा या परियोजना की कार्यप्रणाली, निवेश, तकनीक और स्थानीय विकास की दिशा भी बदलेगी? श्रीनगर जलविद्युत परियोजना के संदर्भ में भी यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
यदि अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया विधिक रूप से पूरी होती है तो अडानी समूह को केवल 330 मेगावाट की एक जलविद्युत परियोजना नहीं मिलेगी। उसके साथ उसे एक ऐसा इतिहास भी मिलेगा, जिसमें वर्षों की इंजीनियरिंग चुनौतियां, पर्यावरणीय बहस, न्यायालयी कार्यवाहियां, स्थानीय अपेक्षाएं और उत्तराखण्ड सरकार के साथ हुए संविदात्मक दायित्व शामिल हैं। इसलिए नए प्रबंधन के सामने पहली चुनौती बिजली उत्पादन बढ़ाने की नहीं बल्कि विश्वास बहाल करने की होगी।
देश में अडानी समूह ऊर्जा क्षेत्र का बड़ा खिलाड़ी है। ताप विद्युत, नवीकरणीय ऊर्जा, ट्रांसमिशन और वितरण जैसे क्षेत्रों में उसका व्यापक अनुभव है। ऐसे में यह तर्क दिया जा सकता है कि एक मजबूत पूंजी क्षमता वाला समूह श्रीनगर परियोजना के संचालन, रखरखाव और तकनीकी उन्नयन में अधिक निवेश कर सकता है। यदि ऐसा होता है तो परियोजना की दक्षता और दीर्घकालिक स्थिरता दोनों को लाभ मिल सकता है लेकिन उत्तराखण्ड के लिए प्रश्न इससे आगे का है।
क्या नया प्रबंधन परियोजना प्रभावित क्षेत्रों के साथ अपने सम्बंधों को नए सिरे से परिभाषित करेगा? क्या स्थानीय युवाओं को अधिक रोजगार मिलेगा? क्या परियोजना के आस-पास के गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और सड़क जैसी सुविधाओं पर सीएसआर के माध्यम से अधिक निवेश होगा? क्या पर्यावरणीय निगरानी को और मजबूत बनाया जाएगा? यही वे कसौटियां होंगी जिन पर नए दौर का मूल्यांकन होगा।
राज्य सरकार के सामने भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। स्वामित्व परिवर्तन केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं होना चाहिए। सरकार चाहे तो इसी अवसर पर परियोजना के अब तक के प्रदर्शन की व्यापक समीक्षा करा सकती है। इसमें यह देखा जा सकता है कि पिछले वर्षों में राज्य को कितनी मुफ्त बिजली मिली, कितनी रॉयल्टी प्राप्त हुई, पर्यावरणीय शर्तों का पालन किस स्तर तक हुआ और पुनर्वास सम्बंधी दायित्वों की वर्तमान स्थिति क्या है। यदि कहीं कमियां हैं तो उन्हें नए प्रबंधन के साथ स्पष्ट कार्ययोजना बनाकर दूर किया जा सकता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू जलवायु परिवर्तन का है। वर्ष 2013 की आपदा, उसके बाद की अतिवृष्टि की घटनाएं और हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते भूस्खलन यह संकेत देते हैं कि जलविद्युत परियोजनाओं के संचालन के पुराने मानक अब पर्याप्त नहीं हो सकते। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि नया प्रबंधन आधुनिक निगरानी प्रणाली, बेहतर सिल्ट प्रबंधन, उन्नत आपदा चेतावनी तंत्र और डाउनस्ट्रीम सुरक्षा पर विशेष ध्यान देगा। यदि ऐसा होता है तो यह केवल कम्पनी के लिए नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए सकारात्मक बदलाव होगा। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया का एक लोकतांत्रिक पक्ष भी है। उत्तराखण्ड की जनता को यह जानने का अधिकार है कि जिस परियोजना से उनके प्राकृतिक संसाधन जुड़े हैं, उसका भविष्य क्या होगा। क्या राज्य सरकार इस स्वामित्व परिवर्तन पर कोई श्वेत पत्र जारी करेगी? क्या विधानसभा में इस विषय पर चर्चा होगी? क्या परियोजना से जुड़े प्रमुख दस्तावेज और प्रदर्शन के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएंगे? पारदर्शिता जितनी अधिक होगी, उतना ही अधिक विश्वास बढ़ेगा।
इस पड़ताल के दौरान एक दिलचस्प तथ्य सामने आता है। श्रीनगर परियोजना पर अब तक अधिकांश बहस या तो 2013 की आपदा पर केंद्रित रही है या फिर बिजली उत्पादन पर लेकिन शायद पहली बार यह प्रश्न गम्भीरता से उठ रहा है कि स्वामित्व परिवर्तन का अर्थ सार्वजनिक हित के संदर्भ में क्या है? क्या नया निवेश राज्य के लिए नए अवसर लेकर आएगा या पुरानी चुनौतियां नए नाम के साथ जारी रहेंगी?
यही कारण है कि श्रीनगर परियोजना केवल एक काॅरपोरेट अधिग्रहण की कहानी नहीं है। यह उत्तराखण्ड की ऊर्जा नीति के अगले अध्याय की शुरुआत भी हो सकती है। यदि सरकार, कम्पनी और स्थानीय समुदाय पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ आगे बढ़ते हैं तो यह परियोजना भविष्य में एक बेहतर माॅडल बन सकती है लेकिन यदि पुराने प्रश्न अनुत्तरित ही रह गए तो स्वामित्व परिवर्तन केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।
अब इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम प्रश्न बचता है, क्या जीवीके से अडानी तक की इस यात्रा में उत्तराखण्ड ने अपने हितों की पर्याप्त रक्षा की और आने वाले वर्षों में राज्य को क्या करना चाहिए ताकि उसकी नदियों से मिलने वाला लाभ वास्तव में जनता तक पहुंचे? मालिक बदलेगा लेकिन क्या व्यवस्था भी बदलेगी?
श्रीनगर जलविद्युत परियोजना की यह कहानी अब एक ऐसे मोड़ पर आकर खड़ी है जहां सबसे बड़ा प्रश्न किसी काॅरपोरेट समूह का नहीं बल्कि उत्तराखण्ड के भविष्य का है। लगभग चार दशक पहले जिस परियोजना को राज्य के ऊर्जा भविष्य का आधार माना गया था, वह अब स्वामित्व परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। ऐसे में यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या इस बदलाव के साथ राज्य की नीतियों, निगरानी व्यवस्था और सार्वजनिक जवाबदेही में भी बदलाव आएगा या केवल कम्पनी का नाम बदलकर कहानी वहीं की वहीं रह जाएगी?
इस पूरी पड़ताल के दौरान एक बात बार-बार सामने आई कि उत्तराखण्ड में जलविद्युत परियोजनाओं का मूल्यांकन अक्सर बिजली उत्पादन और निवेश तक सीमित रहा है लेकिन किसी भी सार्वजनिक महत्व की परियोजना का मूल्यांकन केवल मेगावाट या करोड़ों रुपए के निवेश से नहीं किया जा सकता। उसका आकलन इस आधार पर भी होना चाहिए कि उसने स्थानीय समाज, पर्यावरण और राज्य की अर्थव्यवस्था को कितना मजबूत किया।
आज उत्तराखण्ड सरकार के सामने कम-से-कम दस ऐसे प्रश्न हैं, जिनका सार्वजनिक उत्तर मिलना चाहिए।
- यदि श्रीनगर परियोजना का स्वामित्व नए कॉर्पोरेट समूह के पास जाता है तो क्या 1998 और 2006 के कार्यान्वयन समझौते बिना किसी संशोधन के लागू रहेंगे या सरकार उनकी समीक्षा करेगी?
- क्या राज्य ने यह सुनिश्चित किया है कि मुफ्त बिजली, राॅयल्टी, जल उपयोग शुल्क और अन्य वित्तीय दायित्वों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा?
- क्या परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय दायित्व, मलबा प्रबंधन, नदी संरक्षण और आपदा सुरक्षा सम्बंधी सभी शर्तें नए प्रबंधन पर उसी कठोरता से लागू रहेंगी?
- क्या परियोजना प्रभावित गांवों का पुनर्वास और पुनर्स्थापन पूरी तरह संतोषजनक है? यदि नहीं तो लम्बित मामलों का समाधान कौन करेगा?
- स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के जो वादे किए गए थे, उनका आज क्या परिणाम है? क्या नया प्रबंधन स्थानीय रोजगार नीति पर कोई नई पहल करेगा?
- सीएसआर के माध्यम से परियोजना क्षेत्र में अब तक कितना निवेश हुआ और भविष्य की योजना क्या है?
- क्या राज्य सरकार परियोजना का स्वतंत्र तकनीकी, पर्यावरणीय और वित्तीय ऑडिट कराने पर विचार करेगी?
- क्या जलवायु परिवर्तन और हिमालय में बढ़ते प्राकृतिक जोखिमों को देखते हुए परियोजना की सुरक्षा और आपदा प्रबंधन व्यवस्था का पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा?
- क्या उत्तराखण्ड विधानसभा के सामने इस परियोजना के अब तक के प्रदर्शन पर कोई समग्र रिपोर्ट रखी जाएगी?
- सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न, क्या उत्तराखण्ड सरकार भविष्य की सभी जलविद्युत परियोजनाओं के लिए ऐसी नीति बनाएगी, जिसमें निवेश के साथ-साथ स्थानीय समाज, पर्यावरण और राज्य के आर्थिक हितों का संतुलन अधिक स्पष्ट और पारदर्शी हो?
यही वे प्रश्न हैं जो इस कहानी को एक साधारण कॉरपोरेट अधिग्रहण से अलग बनाते हैं। श्रीनगर जलविद्युत परियोजना का भविष्य चाहे जिस कॉर्पोरेट समूह के हाथों में हो, यह नहीं भूलना चाहिए कि अलकनंदा नदी किसी कम्पनी की सम्पत्ति नहीं है। वह उत्तराखण्ड की प्राकृतिक धरोहर है और उसका उपयोग सार्वजनिक हित की कसौटी पर ही परखा जाएगा।
इसलिए यह समय केवल मालिक बदलने का नहीं बल्कि सोच बदलने का भी है। यदि सरकार इस अवसर का उपयोग व्यापक समीक्षा के लिए करती है तो श्रीनगर परियोजना उत्तराखण्ड के लिए एक नई शुरुआत बन सकती है लेकिन यदि यह संक्रमण केवल फाइलों और शेयरों तक सीमित रहा तो आने वाले वर्षों में वही पुराने प्रश्न फिर उठेंगे।
शायद यही इस पूरी पड़ताल का सबसे बड़ा निष्कर्ष है कि उत्तराखण्ड की नदियों का भविष्य केवल बिजली उत्पादन से तय नहीं होगा। उसे पारदर्शी शासन, मजबूत नियमन, वैज्ञानिक योजना और स्थानीय लोगों के विश्वास से तय होना होगा क्योंकि अंततः किसी भी जलविद्युत परियोजना की सबसे बड़ी सफलता टरबाइन से निकलने वाली बिजली नहीं बल्कि जनता के मन में पैदा होने वाला विश्वास होती है। उस विश्वास की रक्षा की जिम्मेदारी सरकार, कम्पनी और समाज, तीनों की समान है।
बात अपनी-अपनी
हमारी भूमि भी इस परियोजना में गई है और हम स्वयं भी इससे प्रभावित हैं। करीब वर्ष 2006-07 में जेवीके कम्पनी श्रीनगर जलविद्युत परियोजना में आई। उस समय हमने पांच लोगों के साथ मिलकर ग्रुप फाइव इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड नाम से कम्पनी बनाई। हमारी कम्पनी ने खुदाई, लेवलिंग, आरसीसी तथा अन्य निर्माण कार्य किए। वर्ष 2007 से 2012 तक हमने परियोजना में विभिन्न प्रकार के कार्य किए, जिनके वर्क ऑर्डर और भुगतान का पूरा विवरण उपलब्ध है। कार्य पूर्ण होने के बाद कम्पनी ने नियम के अनुसार रिटेंशन मनी काटी, जिसे एक वर्ष बाद वापस किया जाना था। आज तक हमारी ही नहीं बल्कि परियोजना में कार्य करने वाले अनेक लोगों की रिटेंशन मनी वापस नहीं की गई है। परियोजना से प्रभावित कई लोगों को मुआवजे के लिए चेक दिए गए लेकिन उनसे कहा गया कि अभी चेक बैंक में जमा न करें। समय बीतता गया, परियोजना में बिजली उत्पादन शुरू हो गया और बाद में परियोजना बेच दी गई जबकि कई लोगों का भुगतान अधूरा रह गया। कुछ निजी जमीनें बहुत कम कीमत पर खरीदी गईं। कई लोगों को कुछ भुगतान नकद और कुछ चेक के माध्यम से किया गया लेकिन अनेक लोगों का पूरा भुगतान नहीं हो पाया। जिन लोगों को चेक दिए गए, उन्हें भी चेक जमा न करने के लिए कहा गया। कम्पनी ने एक स्थान पर लोगों की कृषि भूमि लीज पर लेकर अपना प्लांट स्थापित किया। लीज का भुगतान आज तक पूरा नहीं किया गया। कम्पनी ने कहा था कि कार्य समाप्त होने के बाद भूमि को उसकी मूल कृषि स्थिति में वापस कर दिया जाएगा लेकिन आज वह भूमि बंजर पड़ी है। वहां बोल्डर, मलबा और धूल का ढेर है। मशीनें भी वर्षों से वहीं खड़ी-खड़ी खराब हो चुकी हैं और भूमि आज भी पहले जैसी स्थिति में नहीं लौटाई गई है। परियोजना से जुड़े अनेक स्थानीय लोगों का भुगतान और अन्य देनदारियां आज भी लम्बित हैं।
विजयंत सिंह नेजवाला, पूर्व कीर्तिनगर ब्लाॅक प्रमुख उपाध्यक्ष, उक्रांद
मेरी जमीन का पूरा मुआवजा आज तक नहीं मिला है। मेरे पास आज भी कम्पनी द्वारा दिए गए चेक मौजूद हैं। कम्पनी के अधिकारी लगातार कहते रहे कि अभी चेक बैंक में मत लगाइए, बाद में लगा देना। इसी तरह टालते-टालते समय निकल गया और मेरा भुगतान पूरा नहीं हो पाया। मेरी दो बसें भी परियोजना में लगी हुई थीं। शुरू में भुगतान देर से मिलता था लेकिन मिल जाता था। परियोजना के अंतिम समय में लगभग तीन महीने तक मेरी दोनों बसों का भुगतान नहीं किया गया। उन बसों में चलने वाले पेट्रोल का खर्च भी मुझे अपनी जेब से उठाना पड़ा। आज तक न तो मेरी जमीन का पूरा पैसा मिला है और न ही मेरी दोनों गाड़ियों का बकाया भुगतान तथा लगभग तीन महीने के पेट्रोल का खर्च कम्पनी ने दिया है।
गिरीश चंद्र, स्थानीय निवासी