दो दशक से विकास के दावों के बावजूद सल्ट में सड़क, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पलायन की समस्याएं अब भी बड़ा सवाल हैं। विधायक महेश जीना के कार्यकाल में कुछ सड़कों, पेयजल योजनाओं और स्थानीय विकास कार्यों का दावा है लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि बुनियादी सुविधाओं के अभाव में गांव खाली हो रहे हैं और अस्पताल रेफर सेंटर बनकर रह गए हैं। आखिर 2002 से 2026 तक सल्ट की विकास यात्रा ने लोगों की जिंदगी कितनी बदली?
सल्ट विधानसभा क्षेत्र उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले के कुमाऊं मंडल का एक महत्वपूर्ण पहाड़ी क्षेत्र है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों, स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और मजबूत राजनीतिक चेतना के कारण सल्ट की अपनी विशिष्ट पहचान है। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान हुआ खुमाड़ गोलीकांड इस क्षेत्र के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। 5 सितम्बर 1942 को खुमाड़ में ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों पर पुलिस ने गोली चला दी थी, जिसमें स्वतंत्रता सेनानी गंगा राम और खीमानंद शहीद हुए। इसी ऐतिहासिक घटना के कारण सल्ट को अक्सर ‘कुमाऊं का बारदोली’ कहा जाता है।
आजादी के बाद सल्ट उन पर्वतीय विधानसभा क्षेत्रों में रही जहां लम्बे समय तक कांग्रेस का प्रभाव रहा। बाद के दशकों में भारतीय जनता पार्टी ने भी यहां मजबूत राजनीतिक आधार बनाया। विधानसभा क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा पहाड़ी है, जहां ऊंची-नीची पहाड़ियां, गहरी घाटियां और देवदार के जंगल इसकी प्राकृतिक पहचान हैं। प्रशासनिक रूप से सल्ट विधानसभा क्षेत्र सल्ट और स्याल्दे विकासखंडों के बड़े हिस्से को समेटता है। इसकी सीमाएं रामनगर, द्वाराहाट, रानीखेत, नैनीताल और पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र से जुड़ती हैं। यही भौगोलिक स्थिति इसे राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है।
सीमित कृषि भूमि और कठिन पर्वतीय भूगोल के कारण स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, संचार और रोजगार की समस्याएं यहां लम्बे समय से बनी हुई हैं। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद सल्ट आज भी बेहतर सड़क संपर्क, स्वास्थ्य सेवाओं, उच्च शिक्षा, सिंचाई और स्थानीय रोजगार की मांग को लेकर चर्चा में रहता है। चुनावों में भी इन मुद्दों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि क्षेत्र की भौगोलिक विषमताओं को देखते हुए यहां विशेष विकास योजनाओं की जरूरत है, ताकि पलायन पर रोक लग सके और युवाओं को अपने क्षेत्र में ही रोजगार के अवसर मिल सकें।
वर्ष 2002 से 2026 तक के लम्बे कालखंड को देखें तो सल्ट विधानसभा क्षेत्र के कई इलाके आज भी विकास की राह देख रहे हैं। विकास के लिए किए गए कई बड़े दावों का असर ग्रामीणों को अपेक्षित रूप में धरातल पर दिखाई नहीं देता। बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के लिए लोगों का संघर्ष जारी है। ‘दि संडे पोस्ट’ की विधानसभा यात्रा में विधानसभा क्षेत्र की तस्वीर मिली-जुली नजर आती है। एक ओर विधायक निधि और विभिन्न सरकारी योजनाओं से सड़क, पेयजल तथा अन्य निर्माण कार्य होने का दावा है तो दूसरी तरफ बड़ी संख्या में ग्रामीण मूलभूत सुविधाओं के अभाव की शिकायत कर रहे हैं।
ग्रामीण इलाकों में सड़क कनेक्टिविटी की स्थिति कई जगह अब भी चिंता का विषय है। सड़क नहीं होने या खराब होने के कारण लोगों को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। मरीजों, स्कूली विद्यार्थियों और किसानों को इसका सबसे अधिक खामियाजा उठाना पड़ता है। जमरिया, साकर, न्योल गांव, सिमार, सराइखेत, इकूखेत, कुलान्तेश्वर, मौलेखाल जोगीजवाड़, मानीला, तल्ला सल्ट, झड़गांव, चम्पानगर और स्याल्दे विकासखंड क्षेत्र में स्थानीय लोगों ने सड़क, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार से जुड़ी समस्याएं सामने रखीं।
मौलेखाल ब्लाॅक के अंतर्गत ग्राम पंचायत जमरिया के स्थानीय निवासी और राष्ट्रीय हिंदू वाहिनी युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष आशीष परोड़िया बताते हैं कि ग्राम सभा सिमरिया के अंतर्गत साकर, बलूली, बनकट, बड़ासी और जमरिया गांव आते हैं। उनके अनुसार बनकट और बड़ासी में अब कोई व्यक्ति निवास नहीं करता और पलायन के चलते पूरा गांव खाली हो चुका है। उनका कहना है कि इन पांच गांवों के बीच प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा तक उपलब्ध नहीं है और रोजगार के अभाव में युवाओं का पलायन लगातार जारी है।
सिमार के स्थानीय निवासी रमेश चंद्र गौताड़िया भी क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या पलायन को मानते हैं। उनका कहना है कि राष्ट्रीय पार्टियां भाजपा और कांग्रेस ने जो वादे किए, वे उन पर पूरी तरह खरे नहीं उतर पाए। दोनों दलों की सरकारें रही हैं लेकिन लोगों को जरूरी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल सकीं। उनका कहना है कि वे खुद क्षेत्र में स्वरोजगार से जुड़ना चाहते हैं लेकिन बिजली और पानी जैसी बुनियादी जरूरतों की कमी के कारण स्टार्टअप शुरू करना भी मुश्किल लगता है।
सड़कों की स्थिति पर नजर डालें तो वल्मरा-सियाल्दे-केदार मोटर मार्ग, चचरोटी-स्याल्दे बाजार-देघाट-जौरासी, तामाढोन-गोलना, देघाट- नागचूलाखाल और सराइखेत की सड़कों को लेकर स्थानीय लोगों ने सवाल उठाए हैं। युवक कांग्रेस से जुड़े अमित रावत का कहना है कि मरचूला से भिकियासैंण के लिए सड़क हरीश रावत के मुख्यमंत्री रहते 2014 में काटी गई थी लेकिन उसका काम ठीक ढंग से नहीं हुआ। उनके अनुसार सड़क में गड्ढे हो गए हैं और पैचवर्क पर ही करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं।
उनका कहना है कि झिमार से भीताकोट सड़क प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनी लेकिन उसका अलाइनमेंट ठीक नहीं होने के कारण वहां वाहनों का चलना खतरे से खाली नहीं है। मौलेखाल से डोटियाल मार्ग भी खराब स्थिति में है। थाला-मुंडा सड़क करीब 12 साल से अधूरी पड़ी है। अमित रावत का आरोप है कि सड़क का काम तो ठीक ढंग से नहीं हुआ लेकिन ठेकेदार द्वारा अवैध खनन कर पत्थर बेचने का काम जरूर किया गया। कुनोली-मुंडा सड़क भी लम्बे समय से अधूरी है।
ग्रामसभा न्यौला गांव, मल्ला सल्ट, के स्थानीय निवासी फकीर सिंह बताते हैं कि करीब पांच किलोमीटर सड़क ब्लाॅक प्रमुख की निधि से 2025 में काटी गई थी लेकिन अभी तक वह सुचारू रूप से चालू नहीं हो पाई है। बरसात में ग्रामीणों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। मरीजों, स्कूली विद्यार्थियों और किसानों को विशेष परेशानी होती है।
ग्राम मठखानी-जोगीजवाड़, जिसे अम्बेडकर गांव भी बताया जाता है, के निवासी देवराम के अनुसार बजवाड़ से कुलान्तेश्वर तक करीब एक किलोमीटर मार्ग ही बन पाया है। इसके आगे प्राथमिक विद्यालय जोगीजवाड़ तक लगभग चार किलोमीटर रास्ता खराब है। ग्रामीणों को नदी के किनारे जान जोखिम में डालकर आवागमन करना पड़ता है। भटोली (तड़म) और टुकुरा से चमाड़ गांव तक भी सड़क पूरी नहीं होने के कारण मरीजों को कई बार डोली के सहारे लाना पड़ता है।
ग्राम साकर, विकासखंड मौलेखाल, के निवासी प्रताप सिंह के अनुसार क्षेत्र में पानी और सड़क की समस्या सबसे गम्भीर है। ग्राम जमरिया की सड़क लम्बे समय से खराब है। पिछले दो-तीन वर्षों से सर्वे की बात चल रही है लेकिन धरातल पर कुछ नजर नहीं आता। उनका मानना है कि मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण इस क्षेत्र से तेजी से पलायन हो रहा है।
पलायन के पीछे सिर्फ सड़क और रोजगार का संकट नहीं है। जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक ने कृषि को भी संकट में डाल दिया है। ग्रामीणों के अनुसार कृषि योग्य भूमि और फल पट्टी का बड़ा हिस्सा बंजर होता जा रहा है। जंगली जानवरों से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था नहीं होने की शिकायत लगातार सामने आती है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार वन विभाग के अधिकारियों से शिकायत की गई लेकिन स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं आया। स्थानीय मंडी का अभाव भी किसानों की समस्या बढ़ाता है। जो कृषि उत्पाद पैदा होते हैं, उनके उचित विपणन की व्यवस्था नहीं है।
स्याल्दे ब्लाॅक के इकूखेत की निवासी कमला स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर सवाल उठाती हैं। उनका कहना है कि सल्ट विधानसभा में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कई जगह रेफर सेंटर बनकर रह गए हैं। बेहतर इलाज के लिए लोगों को रामनगर या काशीपुर ही नहीं, कई बार दिल्ली तक जाना पड़ता है। पेयजल और सिंचाई की समस्या भी सल्ट के लिए पुरानी चुनौती है। प्राकृतिक रूप से दुर्गम इस क्षेत्र में ‘हर घर नल, हर घर जल’ योजना का लाभ सभी गांवों तक अपेक्षित रूप से नहीं पहुंचने की शिकायत है। ग्रामीणों का कहना है कि पाइप लाइन तो बिछाई गई हैं लेकिन नियमित जलापूर्ति बहुत सीमित गांवों में ही हो पा रही है। कोटेश्वर पम्पिंग योजना से भी गर्मियों में बिजली की समस्या के कारण पानी की आपूर्ति प्रभावित होती है।
विधायक महेश जीना का कहना है कि मानिला-बरकिंडा-कोटेश्वर पेयजल योजना उनके भाई सुरेंद्र जीना द्वारा लाई गई थी। उनके अनुसार उनके प्रयास से 17 करोड़ 43 लाख रुपए की भवानी देवी पेयजल योजना का निर्माण कराया गया है। इसके अलावा बंधनगढ़ पेयजल योजना और सिमार पम्प योजना सहित अनेक पेयजल योजनाएं स्वीकृत कराई गई हैं। विधायक के अनुसार लक्ष्य प्रत्येक परिवार को 55 लीटर पानी उपलब्ध कराना है। उनका यह भी कहना है कि कुछ लोग पानी का दुरुपयोग करते हैं, जिसके कारण आपूर्ति सुचारू रूप से प्रभावित होती है।
पलायन की समस्या को लेकर सिमार गांव के पूर्व प्रधान कल्याण सिंह रावत कहते हैं कि यह क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती है। पलायन आयोग के आंकड़े भी सल्ट और आस-पास के क्षेत्रों की इस तस्वीर की पुष्टि करते हैं। 2011 की जनगणना और उसके बाद जारी रिपोर्टों में इस क्षेत्र के कई गांवों के खाली होने की स्थिति सामने आई है। उपलब्ध अध्ययनों में कृषि पर निर्भरता और बेरोजगारी को ग्रामीण आबादी के घटने का प्रमुख कारण बताया गया है। एक अध्ययन के अनुसार 26 से 35 वर्ष के युवाओं का बड़ा हिस्सा रोजगार की तलाश में बाहर जा रहा है। सिंचाई सुविधाओं के अभाव, कम कृषि उत्पादकता और जंगली जानवरों के डर ने भी खेती छोड़ने और पलायन को बढ़ावा दिया है।
सल्ट के गांवों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक होना भी पलायन के सामाजिक प्रभाव को दर्शाता है। रोजगार की तलाश में पुरुषों और खासकर युवाओं के बाहर जाने के कारण गांवों में बुजुर्गों और महिलाओं की संख्या बढ़ती गई। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप भी बदला है और कई परिवार बाहरी आय पर निर्भर होते चले गए हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर विधायक जीना भी सुधार की जरूरत स्वीकार करते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के कारण उन्हें रामनगर, काशीपुर और दूसरे शहरों पर निर्भर रहना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं के लिए अल्ट्रासाउंड जैसी मूलभूत सुविधा उपलब्ध न होना बड़ी समस्या है। स्याल्दे और मौलेखाल दोनों विकासखंडों में अस्पतालों की क्षमता और संसाधनों को लेकर शिकायतें हैं।
राजकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय आरोग्य मंदिर, मठखानी की फार्मासिस्ट ऑफिसर पूजा रावत का कहना है कि सबसे जरूरी डाॅक्टर की उपलब्धता है। उनके अनुसार यदि लैब, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी और जरूरी स्टाफ की व्यवस्था हो जाए तो क्षेत्र की कई स्वास्थ्य समस्याएं दूर हो सकती हैं। उनका कहना है कि सरकार द्वारा बनाए गए कुछ आवास भी खाली पड़े हैं।
सराइखेत स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र टाइप-ए की सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी शिल्पी वादवानी के अनुसार जनवरी 2026 में डाॅक्टर के कहीं और ज्वाइन करने के बाद से पद खाली है। फार्मासिस्ट, नर्सिंग स्टाफ, हाउसकीपिंग, लैब और अल्ट्रासाउंड की उचित व्यवस्था नहीं होने के कारण मरीजों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र देघाट रेफर करना पड़ता है। अल्ट्रासाउंड के लिए रामनगर या काशीपुर भेजना पड़ता है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी तस्वीर बहुत बेहतर नहीं है। प्राथमिक विद्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। माध्यमिक विद्यालयों में कई विषयों के शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। कहीं बच्चे हैं तो शिक्षक नहीं और कहीं शिक्षक हैं तो विद्यार्थियों की संख्या लगातार घट रही है। उच्च शिक्षा के लिए स्याल्दे और मानिला में डिग्री कॉलेज जरूर हैं लेकिन स्थानीय युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करने वाले व्यावसायिक और रोजगारपरक पाठ्यक्रमों का अभाव है। इंटरमीडिएट के बाद प्रोफेशनल शिक्षा के विकल्प सीमित हैं। बीएससी के बाद एमएससी, बीएलएलबी, मास कम्युनिकेशन और अन्य रोजगारपरक पाठ्यक्रमों की उपलब्धता नहीं होने के कारण युवाओं को उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाना पड़ता है। यही स्थिति आगे चलकर रोजगार के लिए पलायन का कारण बनती है।
उत्तराखण्ड परिवर्तन दल के जिला महामंत्री हरीश रौतेला का कहना है कि सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसे मूलभूत क्षेत्रों में उतना काम नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था। उनके अनुसार विधायक द्वारा सड़कें बनाई गईं लेकिन जिन क्षेत्रों में ज्यादा जरूरत थी, वहां अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। उनका आरोप है कि जनता की बात नहीं सुनी गई। पेयजल पम्पिंग योजनाओं की सफलता पर भी उन्होंने सवाल उठाए और कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में छोटी-सी बीमारी के लिए भी मरीजों को रेफर कर दिया जाता है।
पूर्व विधायक और कांग्रेस नेता रणजीत सिंह रावत के कार्यकाल को लेकर क्षेत्र में अलग राय सुनने को मिलती है। वर्ष 2002 से 2012 के बीच उनके कार्यकाल में सड़क, शिक्षा और पेयजल के क्षेत्र में कई काम होने का दावा किया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार उस दौर में जहां पहाड़ी क्षेत्रों में हाॅटमिक्स सड़कें इक्का-दुक्का दिखाई देती थीं, वहीं सल्ट क्षेत्र में कई सड़कों को हाॅटमिक्स किया गया। विद्यालयों की स्थिति सुधारने और नई पेयजल योजनाएं लाने के प्रयास भी किए गए। हालांकि वर्तमान विधायक महेश जीना के समर्थक और उनके पक्ष में बोलने वाले लोग भी विकास कार्यों की एक अलग तस्वीर पेश करते हैं।
उनका कहना है कि विधायक निधि से कई गांवों में सड़कें बनाई गई हैं और मंदिरों का सौंदर्यीकरण भी हुआ है। कुछ गांवों में दो-दो किलोमीटर तक सड़क निर्माण का काम हुआ है। बड़े स्तर पर ऐसे कार्य नहीं हो पाए हैं, जिनकी अपेक्षा क्षेत्र की जनता ने की थी।
स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर क्षेत्र में व्यापक असंतोष है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सल्ट से देघाट तक ऐसा अस्पताल नहीं है जहां गम्भीर या विशेषज्ञ उपचार की पर्याप्त व्यवस्था हो। छोटी से छोटी स्वास्थ्य समस्या के लिए भी रामनगर, काशीपुर या निजी अस्पतालों की ओर जाना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर यह मांग भी उठती रही है कि सल्ट और स्याल्दे के बीच बेहतर अस्पताल बनाया जाए, मानिला में मेडिकल कॉलेज या उच्च स्तरीय चिकित्सा संस्थान की सम्भावना तलाश की जाए और देघाट अस्पताल का उच्चीकरण किया जाए।
कृषि और रोजगार के लिए स्थानीय मंडी की मांग भी सामने आती है। क्षेत्र में अखरोट, नाशपाती और लाखौरी मिर्च जैसे उत्पाद होते हैं लेकिन किसानों को अपने उत्पादों के उचित विपणन के लिए स्थानीय बाजार नहीं मिलता। उत्तराखण्ड जनकल्याण समिति के संरक्षक राजेंद्र सिंह नेगी का कहना है कि भिकियासैंण या डोटियाल के बीच उपमंडी विकसित की जा सकती है। इससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलने के साथ-साथ आढ़त और अन्य गतिविधियों के माध्यम से रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं। उनका कहना है कि क्षेत्र में बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त सैनिक हैं लेकिन मूलभूत सुविधाओं के अभाव में उनके घरों पर भी ताले लगे हैं। उनके अनुसार विधायक के लिए यह देखना जरूरी है कि एक साल में मूलभूत सुविधाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और पानी के क्षेत्र में कितना काम हुआ और उसका वास्तविक लाभ कितने लोगों तक पहुंचा।
सल्ट की राजनीति का एक दूसरा पहलू भी है। पिछले करीब एक दशक से विधानसभा में भाजपा का प्रभाव मजबूत रहा है और महेश जीना विधायक हैं। विपक्ष का आरोप है कि विकास के मूल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाकर ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा दिया गया। उत्तराखण्ड जनकल्याण समिति के अध्यक्ष सुनील टम्टा का कहना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और सड़क जैसे मुद्दों पर गम्भीरता से काम होना चाहिए। उनका सवाल है कि यदि विकास हो रहा है तो पलायन क्यों जारी है? पांच-दस साल बाद सल्ट की स्थिति क्या होगी, इस पर सरकारों को दूरदृष्टि के साथ सोचना चाहिए।
टम्टा का यह भी कहना है कि इंटरमीडिएट के बाद रोजगारपरक शिक्षा के पर्याप्त विकल्प नहीं हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था में पूरी विधानसभा में अल्ट्रासाउंड की सुविधा का अभाव एक गम्भीर सवाल है। इन बुनियादी सुविधाओं की जिम्मेदारी आखिर किसकी है और क्या विधायक तथा सांसद विधानसभा और संसद में इन मुद्दों को उतनी गम्भीरता से उठा रहे हैं, जितनी आवश्यकता है। उनके अनुसार शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी, बिजली और रोजगार कोई एहसान नहीं बल्कि नागरिकों के अधिकारों से जुड़े प्रश्न हैं।
वहीं पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण रावत ने मौजूदा व्यवस्था पर गम्भीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि पिछले दस वर्षों से भाजपा या जीना परिवार का राजनीतिक प्रभाव रहा है लेकिन पहले के जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और सड़क जैसी बुनियादी जरूरतें थीं। उनके अनुसार आज न तो विकास दिखाई देता है और न ही जनप्रतिनिधियों का व्यवहार संतोषजनक है। उन्होंने सड़कों की गुणवत्ता, विधायक निधि के कामों में पारदर्शिता और सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि स्कूल बंद हो रहे हैं, अस्पताल रेफर सेंटर बने हुए हैं और गांव खाली हो रहे हैं जबकि शराब के ठेके बढ़ रहे हैं।
विधायक निधि से हुए कार्यों को लेकर भी अलग-अलग राय सामने आती है। जहां समर्थक इन कार्यों को स्थानीय विकास के लिए महत्वपूर्ण बताते हैं, वहीं विरोधी पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं। सड़क निर्माण में गुणवत्ता, लागत और काम की निगरानी को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल उठाए गए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि सम्बंधित विभागीय रिकाॅर्ड और जांच के बिना नहीं की जा सकती लेकिन यह जरूर स्पष्ट है कि विकास कार्यों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक असंतोष मौजूद है।
जंगली जानवरों का सवाल भी सल्ट की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि खेती बचाना मुश्किल हो गया है। खेतों में फसल खड़ी करना जोखिम भरा है और जंगली जानवरों से होने वाले नुकसान के कारण कई परिवारों ने खेती छोड़ दी है। ऐसे में सिंचाई, मंडी और कृषि सहायता की योजनाएं तभी प्रभावी हो सकती हैं जब फसल को जंगली जानवरों से बचाने की ठोस व्यवस्था हो।
सल्ट में सड़क, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा के सवाल आपस में जुड़े हुए हैं। सड़क नहीं होगी तो अस्पताल तक पहुंचना मुश्किल होगा। अस्पताल नहीं होगा तो मामूली इलाज के लिए भी शहर जाना पड़ेगा। स्थानीय रोजगार नहीं होगा तो युवा बाहर जाएंगे। युवा बाहर जाएंगे तो गांव खाली होंगे। खेती जंगली जानवरों से सुरक्षित नहीं होगी और बाजार नहीं मिलेगा तो कृषि भी खत्म होती जाएगी। यही वह चक्र है जो सल्ट के विकास के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।
सल्ट विधानसभा की विकास यात्रा को सिर्फ सड़कें बनने या कुछ योजनाओं के स्वीकृत होने से नहीं मापा जा सकता। असली सवाल यह है कि क्या गांवों में लोग टिक रहे हैं? क्या बच्चे अच्छी शिक्षा पा रहे हैं? क्या बीमार व्यक्ति को समय पर इलाज मिल रहा है? क्या किसान अपनी फसल से आय कमा पा रहा है? क्या युवाओं को रोजगार के लिए घर छोड़ना नहीं पड़ रहा? क्या महिलाओं को सुरक्षित और सुलभ स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही हैं? क्या गांवों में बिजली, पानी और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं नियमित रूप से उपलब्ध हैं?
अगर विकास की सबसे सरल परिभाषा यही है कि विकास के साथ लोगों का जीवन बेहतर हो और पलायन कम हो तो सल्ट की तस्वीर अभी भी कई गम्भीर सवाल खड़े करती है। 2002 से 2026 तक की यात्रा में सड़कें बनीं, योजनाएं स्वीकृत हुईं, कुछ गांवों तक विकास पहुंचा और विधायक निधि से कई छोटे-बड़े काम हुए लेकिन दूसरी तरफ ऐसे गांव भी हैं जो खाली हो चुके हैं, स्कूलों में बच्चों की संख्या घट रही है, अस्पतालों में डाॅक्टर और संसाधनों की कमी है, किसान जंगली जानवरों से परेशान हैं और युवाओं के सामने रोजगार का सवाल जस का तस है।
सल्ट की असली विकास यात्रा इसलिए सरकारी आंकड़ों और राजनीतिक दावों से आगे जाकर गांवों के खाली होते घरों, बंद होते स्कूलों, अधूरी सड़कों, रेफर होते मरीजों और बंजर होते खेतों में दिखाई देती है। सवाल अब यह नहीं है कि सल्ट में विकास हुआ या नहीं। सवाल यह है कि जो विकास हुआ, वह इतना क्यों नहीं हो पाया कि सल्ट के गांवों में लोगों को रोक सके? यही सवाल आने वाले वर्षों में इस विधानसभा की राजनीति और विकास की दिशा तय करेगा।
अधिवक्ता ललित बिष्ट का आरोप है कि क्षेत्र की मूलभूत जरूरतों को लेकर आवाज उठाने वालों पर भी कार्रवाई की गई। उनके अनुसार शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और पानी जैसे मुद्दों को लेकर संवैधानिक आंदोलन किया गया लेकिन 60 लोगों पर एफआईआर दर्ज कर दी गई। इन आरोपों पर भी सम्बंधित सरकारी पक्ष का जवाब सामने आना जरूरी है।
सल्ट की जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगले दस वर्षों की विकास नीति क्या होगी। क्या प्राथमिकता केवल सड़क निर्माण और छोटे स्थानीय कार्य रहेंगे या शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, सिंचाई और पलायन को एक साथ जोड़कर कोई दीर्घकालिक नीति बनेगी? क्योंकि अगर गांव बचाने हैं तो केवल सड़क नहीं, गांव में रहने की वजह भी पैदा करनी होगी। रोजगार चाहिए, अच्छी शिक्षा चाहिए, इलाज चाहिए, पानी चाहिए, खेती की सुरक्षा चाहिए और युवाओं के लिए भविष्य चाहिए। सल्ट की विकास यात्रा का अगला अध्याय इसी कसौटी पर लिखा जाएगा।
सल्ट विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक : महेश जीना (अवधि : 4.5 वर्ष)
क्र. क्षेत्र मुद्दा / जमीनी स्थिति अंक (10 में)
- जनसम्पर्क एवं उपलब्धता लम्बे समय से क्षेत्र में भाजपा की मजबूत राजनीतिक पकड़ के बीच महेश जीना की क्षेत्र में सक्रियता दिखाई देती है और स्थानीय स्तर पर उनकी पहुंच भी है लेकिन सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी और पलायन जैसे मुद्दों को लेकर जनता के एक हिस्से में नाराजगी बढ़ी है। 4
- शिक्षा प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। कई जगह शिक्षक नहीं हैं तो कहीं विद्यार्थियों की संख्या लगातार घट रही है। स्याल्दे और मानिला में डिग्री कॉलेज होने के बावजूद रोजगारपरक और प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों का अभाव है। 3
- स्वास्थ्य सेवाएं सल्ट और स्याल्दे क्षेत्र के अस्पतालों में डाॅक्टर, नर्सिंग स्टाफ, लैब और अन्य संसाधनों की कमी की शिकायतें हैं। पूरी विधानसभा में अल्ट्रासाउंड जैसी सुविधा का अभाव और मरीजों का देघाट, रामनगर, काशीपुर तक रेफर होना बड़ी कमजोरी है। 3
- रोजगार एवं पलायन स्थानीय रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं बन पाए। युवाओं का लगातार पलायन हो रहा है और कई गांव खाली हो चुके हैं। स्वरोजगार के लिए बिजली, पानी, बाजार और कनेक्टिविटी की समस्याएं बाधा बनी हुई हैं। 2
- सड़क एवं आधारभूत ढांचा विधायक निधि और अन्य योजनाओं से कई सम्पर्क मार्ग और सड़कें बनी हैं लेकिन अनेक प्रमुख मार्ग खराब या अधूरे हैं। थाला-मुंडा, कुनोली-मुंडा, मौलेखाल-डोटियाल सहित कई सड़कों को लेकर ग्रामीणों में असंतोष है। 3
- पेयजल एवं सिंचाई भवानी देवी, बंधनगढ़, सिमार पम्प और मानिला-बरकिंडा-कोटेश्वर जैसी योजनाओं को विधायक अपनी उपलब्धियों में गिनाते हैं लेकिन ग्रामीणों के अनुसार पाइपलाइन बिछने के बावजूद नियमित जलापूर्ति बड़ी संख्या में गांवों तक नहीं पहुंची और सिंचाई की समस्या कायम है। 4
- कृषि एवं जंगली जानवर जंगली जानवरों के आतंक से खेती लगातार प्रभावित हो रही है और कई खेत बंजर हो रहे हैं। सिंचाई तथा कृषि उत्पादों के विपणन की समस्या भी बनी हुई है। स्थानीय उपमंडी की मांग के बावजूद बड़ा समाधान दिखाई नहीं देता। 3
- स्थानीय अर्थव्यवस्था एवं पर्यटन सल्ट में बागवानी, कृषि और पर्यटन की पर्याप्त सम्भावनाएं हैं लेकिन स्थानीय उत्पादों के लिए बाजार और रोजगार का मजबूत ढांचा विकसित नहीं हो पाया। अखरोट, नाशपाती और लाखौरी मिर्च जैसे उत्पादों के लिए उपमंडी की मांग अब भी बनी हुई है। 3
- विधायक निधि एवं विकास कार्य विधायक निधि से सड़क, सम्पर्क मार्ग और मंदिरों के सौंदर्यीकरण जैसे कई स्थानीय कार्य हुए हैं। हालांकि बड़े स्तर के विकास कार्यों और इन कार्यों की प्राथमिकता, गुणवत्ता तथा पारदर्शिता को लेकर विपक्ष और स्थानीय लोगों ने सवाल उठाए हैं। 4
- पारदर्शिता एवं जवाबदेही विधायक की ओर से कई योजनाओं और विकास कार्यों का दावा किया गया है लेकिन जमीन पर काम की गुणवत्ता और प्राथमिकता को लेकर सवाल मौजूद हैं। जनता की मूलभूत समस्याओं पर व्यापक असंतोष जवाबदेही के स्तर को कमजोर करता है। 2
कुल अंक : 3.1/10 फाइनल ग्रेड : फेल
‘अपने भाई के विजन को पूरा कर रहा हूं’
वर्ष 2021 में अपने छोटे भाई एवं सल्ट के तत्कालीन विधायक स्वर्गीय सुरेंद्र सिंह जीना के निधन के बाद हुए उपचुनाव में जीत हासिल कर महेश जीना पहली बार विधानसभा पहुंचे। इसके बाद वर्ष 2022 के चुनाव में भी जीत दर्ज कर अपना प्रतिनिधित्व कायम रखा। सल्ट से जुड़े विकास कार्यों, क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, रोजगार, पलायन और पर्यटन से जुड़े मुद्दों तथा अपने कार्यकाल की उपलब्धियों और चुनौतियों को लेकर उन्होंने ‘दि संडे पोस्ट’ से बातचीत में अपनी बात रखी
आपका विधायक के रूप में दूसरा कार्यकाल पूरा होने को है इस कार्यकाल को सल्ट के प्रतिनिधि के रूप में सबसे बड़ी विकास की उपलब्धि किसे मानते हैं?
मेरे भाई सुरेंद्र सिंह जीना यहां से तीन बार के विधायक थे। उनका कोरोना काल में निधन होने के पश्चात मुझे भाजपा ने उनके कामों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी, उनके कार्यकाल में कुछ कार्य पाइपलाइन में थे, मेरे द्वारा उनकी वित्तीय स्वीकृति या शासनादेश नहीं कराया जाता तो वो धरातल में नहीं उतर पाते। मैं अपने भाई के विजन को लेकर चल रहा हूं जो इस सल्ट विधानसभा को अग्रणी विधानसभा बनाने के लिए प्रयासरत थे। मैंने अपने पांच साल के कार्यकाल में अनेकों कार्य कराए जैसे एक कहड़गांव पुल की साढ़े चैदह करोड़ की स्वीकृति कराई, मरचूला -भिक्यासैंण मोटर मार्ग प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत 41 करोड़ स्वीकृत हो गए हैं जो हेमकुंड साहिब बद्रीनाथ, द्वाराहाट, रानीखेत सल्ट, देघाट, स्याल्दे, रामनगर को जोड़ेगी। इसके अलावा कई सड़कों का काम चल रहा है जैसे मरचूला से धनियाल, टामाडोन गोलना रोड, पीपना डंगनेट, मुनेड़ रोड, 12 किलोमीटर बिहाड़ी रथखाल से डोनाली मासी से परथोला। ऐसे अनेक सड़कों का कार्य मेरे द्वारा लोक निर्माण विभाग, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के माध्यम से बनाई गई हैं। मेरे विधायक निधि से 85 से 90 सड़के पूरी सल्ट विधानसभा क्षेत्र में काटी गई हैं।
‘हर घर जल, हर घर नल’ योजना के तहत सल्ट में हजारों पानी के कनेक्शन देने के दावे किए गए लेकिन धरातल पर कड़वी सच्चाई यह है कि गर्मियों में तो दूर सामान्य दिनों में भी सल्ट के दूर-दराज के गांव में हफ्तों तक पानी नहीं आता और लोग प्राकृतिक नौलों और धारों के भरोसे हैं क्या यह योजना की नाकामी नहीं है?
देखिए मेरे भाई जब विधायक थे तब मानिला-बरकिंडा व कोटेश्वर पेयजल योजना लाई गई तथा मेरे द्वारा 17 करोड़ 43 लाख रुपए से भवानी पेयजल योजना का निर्माण किया गया। इसके अलावा बंधनगढ़ पेयजल योजना, झिमार पम्पिंग योजना ऐसे अनेक पेयजल योजना ‘हर घर जल, हर एक नल’ योजना के तहत सल्ट में लाई जा रही है, मेरा मानना है कि यह पेयजल योजना है जो प्रत्येक परिवार को रोजाना 55 लीटर पानी दिया जाता है लेकिन इसका दुरुपयोग हो रहा है जिससे कि क्षेत्र में पूर्ण रूप से पानी की आपूर्ति नहीं हो पा रही है और हां मानता हूं कि जिन गांवों में अभी भी परेशानी है उसके लिए लगातार मैं प्रयासरत हूं।
मरचूला बस हादसे के समय सल्ट और आस-पास के क्षेत्र में तत्काल ट्रामा सेंटर और विशेषज्ञ डाॅक्टर की कमी साफ उजागर हुई थी। मानिला देवाल, भिक्यासैंण के अस्पतालों में आपके द्वारा किए गए दावों के बावजूद आपातकालीन परिस्थितियों में स्थानीय जनता को आज भी इलाज के लिए दिल्ली या अन्य बड़े शहरों की ओर रुख क्यों करना पड़ता है डाॅक्टर और विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी है, कई अस्पताल फार्मासिस्ट के भरोसे हैं उनके लिए आपके द्वारा क्या प्रयास किए गए?
एक टाइम ऐसा था जहां एक या दो एमबीबीएस डॉक्टर हुआ करते थे जो आप कह रहे हैं अस्पताल फार्मासिस्ट के भरोसे चल रहे हैं यह निराधार है। आज पूरी सल्ट विधानसभा में डाॅक्टर की उपलब्धता है। पूर्व की सरकारों ने पीजी, मेडिकल काॅलेज नहीं खोले तो आज बाहर से पढ़ कर लोग यहां नहीं आना चाहते, यह सारी व्यवस्था धीरे-धीरे ही पूरी की जा सकती है। कई समय पहले सड़कों का अभाव था। आज गांव-गांव तक सड़कें बन गई हैं, मेरे द्वारा स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनेकों कार्य किए गए। मानिला अस्पताल की बिल्डिंग बनाई गई, देवाल में आॅक्सीजन प्लांट लगाया गया। देघाट में 2 करोड़ की लागत से ट्रांजिट हाॅस्टल बनाया गया, डिजिटल एक्स-रे मशीन लगाई गई। मेरा और भाजपा सरकार का प्रयास है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में अस्पतालों में डॉक्टर की पूर्ण रूप से उपलब्धता हो और मरीजों को उचित इलाज मिल पाए।
सल्ट के युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार या किसी बड़े उद्योग क्लस्टर की स्थापना क्यों नहीं की जा सकी। केवल सरकारी योजनाओं की रीपैकेजिंग के अलावा पलायन को रोकने के लिए आपका खुद का क्या विजन और ठोस नीति है?
सरकार द्वारा लगातार योजनाएं बनाई जा रही हैं। मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, दुग्ध एवं पशुपालन, मधुमक्खी पालन, जैविक खेती, बागवानी एवं फल उत्पादन जैसी योजनाओं से रोजगार की व्यवस्था यहां स्थानीय स्तर पर की जा रही है लेकिन समस्या तब पैदा हो रही है जब यहां का युवा बाहरी शिक्षण संस्थानों में प्रवेश ले रहा है और शिक्षा ग्रहण करने के दौरान वहीं स्थापित हो जा रहा है जो लोग बड़े पद पर आसीन हैं वह पहाड़ की तरफ आना ही नहीं चाहते। यहां रोजगार के अवसर नहीं खोलना चाहते, अगर बाहर का व्यक्ति यहां पर इंडस्ट्री या रोजगार के कोई भी अवसर को स्थापित करना चाहता है तो स्थानीय स्तर पर उसका विरोध किया जाता है लेकिन फिर भी मेरे द्वारा लगातार प्रयास किए जा रहे हैं कि स्थानीय स्तर पर रोजगार स्थापित किया जाए जिससे यहां का युवा पलायन न कर सके।
शिक्षा एक बुनियादी जरूरत है लेकिन सुविधाओं के अभाव में सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या और शिक्षकों की कमी के चलते या कहीं बेहतर शिक्षा सुविधा न होने के कारण लोग अपने बच्चों को पढ़ने के लिए रामनगर या मैदानी क्षेत्रों में भेज रहे हैं। इसके लिए आपकी क्या योजना है?
मैं लगातार क्षेत्र में रहता हूं, मैंने रिवर्स पलायन करके क्षेत्र में मकान बनाया है और मैं लगातार प्रयासरत हूं कि शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर कर सकूं। मेरे अथक प्रयासों से स्याल्दे डिग्री काॅलेज की सुरेंद्र सिंह जीना के नाम पर घोषणा हुई, जिसमंे छह करोड़ लगभग लागत से इसके अंतर्गत आर्ट हाउस बनवा रहा हूं, वहां दो करोड रुपए कंप्यूटर के लिए दिए गए तथा हाॅस्टल, जिम, पार्क इत्यादि का निर्माण हुआ है और साढ़े चार करोड़ की लागत से तल्ला सल्ट डिग्री काॅलेज का निर्माण हुआ है और मानिला के डिग्री काॅलेज का भी निर्माण किया गया व अनेकों इंटर काॅलेज के लिए पैसा दिया गया, अभी मछोड़, गुमटी पीसी इंटर काॅलेज पीएम श्री में नेवल गांव इंटर काॅलेज चितौली, कुलांटेश्वर काॅलेज को नामित किया गया।
पलायन वैसे पूरे उत्तराखण्ड की समस्या है लेकिन इसका असर सल्ट में ज्यादा नजर आता है इसे रोकने के लिए आपके द्वारा क्या प्रयास किए गए?
हां, मैं मानता हूं, पलायन पूरे उत्तराखण्ड की समस्या है लेकिन इसका ज्यादा असर सल्ट में देखने को मिलता है। हमारे पास कुमाऊं में आने के मुख्य द्वारा रामनगर है, सल्ट विधानसभा के अन्तर्गत शहर नजदीक होने से लोगों ने रोजगार के लिए रामनगर, काशीपुर को रुख किया। आज पूरे परिवार के साथ पलायन करके वहीं के स्थाई निवासी हो गए हैं। पलायन को रोकने के लिए हमें मिलकर प्रयास करना होगा। करोड़ों की योजना पहाड़ों के लिए लाई जा रही हैं लेकिन लोग फिर भी शहर की तरफ जाना चाहते हैं यहां कोई काम नहीं करना चाहता।
सल्ट में पर्यटन की अपार सम्भावनाएं हैं ये महत्वपूर्ण टूरिज्म हब बन सकता है। सल्ट को मास टूरिज्म और इको टूरिज्म से जोड़ने के कोई विशेष प्रयास यहां नजर नहीं आते, पर्यटन के क्षेत्र में आपकी प्राथमिकताएं क्या है,जिससे यहां का युवा इसे रोजगार का जरिया बना सके?
हां, मैं मानता हूं यहां पर्यटन कि आपार सम्भावनाएं हैं, मैं इसके लिए लगातार प्रयास कर रहा हूं, मैंने यहां के प्रसिद्ध मंदिर मारचूला, मानिला, जौरासी, कालिंका मंदिर व अन्य पर्यटन स्थलों के जीर्णोद्धार के लिए काम किया है, जिससे ये महत्वपूर्ण टूरिज्म हब बन सके। होम स्टे व अन्य कार्यों के माध्यम से यहां के स्थानीय युवाओं के रोजगार के अवसर बन सके और चाय बागवानी के लिए जौरासी में काम चल रहा है। अगर क्षेत्र में बेहतर व्यवस्था होगी तो दूरिज्म भी बढ़ेगा।
सल्ट की कई सड़के आज भी बदहाल हैं। भटोली (तड़म) हो, टुकरा से चमाड गांव जैसी महत्वपूर्ण सड़कों का काम पूरा न होने से मरीजों को डोली में ले जाना पड़ता है इसकी जवाबदेही किसकी मानी जाए। इसके अलावा कई सड़कें अधूरी हैं, इन्हें कब तक ठीक किया जाएगा?
मेरे द्वारा सल्ट विधानसभा के अंतर्गत कई जगह सड़कों का निर्माण किया गया और वर्तमान में भी विधायक निधि से भी सड़कें काटी जा रही हैं लेकिन कुछ रोड अभी भी पाइपलाइन में है जिसके लिए मेरे द्वारा पूरा प्रयास किया जा रहा है। जिन सड़कों की आप बात कर रहे हैं उनमें बहुत सारी दिक्कतें हैं लम्बी कानूनी प्रक्रिया हैं। जो वन भूमि के अधीन है वह स्थानी लोगों की जमीन व मकान बीच में आने से यह तब अधर में लटकी हुई हैं। लेकिन क्या विधायक रोड भी काटे व वन भूमि के मुकदमे भी झेले क्या यह जायज है?
सरकारी प्रक्रिया की लचर गति के चलते युवाओं के लिए योजनाओं की प्रशासनिक मंजूरी प्रशिक्षण और बैंक लोन के लिए बार-बार चक्कर काटने पड़ते हैं इसके लिए युवाओं को आप कितना सहयोग कर पाते हैं?
देखिए मैं आपको बताऊं। स्थानीय लोगों के जो ईमानदारी के मामले होते हैं वहां मैं साथ खड़े रहता हूं। अगर सही दिशा में काम किया जाए तो यह रोजगार करने के लिए सरकार द्वारा आर्थिक सहयोग की प्रथम श्रेणी है, भाजपा सरकार पहाड़ों के लोगों के लिए रोजगार के सुनहरे अवसर प्रदान कर रही है लेकिन दुर्भाग्य से यहां के लोग बैंक से ऋण तो ले रहे हैं लेकिन कोई भी जमीन पर रोजगार को स्थापित नहीं कर रहे हैं जिससे कि सही समय पर किस्त ना चुका पाने से कर्ज में डूब रहे हैं।