अल्मोड़ा में 2027 की जंग पुराने चेहरों पर भरोसा या नई पीढ़ी का दावं?

दो दशक में पांच चुनाव, कांग्रेस-भाजपा के बीच लगातार बदलता जनादेश और 2022 में महज 127 वोटों का अंतर। अल्मोड़ा में 2027 की लड़ाई सिर्फ भाजपा-कांग्रेस में नहीं बल्कि पुराने चेहरों और नई पीढ़ी के बीच भी होगी

सांस्कृतिक नगरी या कहें उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा अपनी बौद्धिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए जानी जाती है। आजादी के बाद इस सीट पर अधिकतर कांग्रेस का ही कब्जा रहा है। अल्मोड़ा के मतदाताओं ने कांग्रेस को तो जिताया ही, जनसंघ के गोविंद सिंह बिष्ट भी यहां से जीतकर विधानसभा पहुंचे। उत्तराखण्ड राज्य बनने से पहले की बात करें तो यहां से शोबन सिंह जीना, गोवर्धन तिवारी, सरस्वती तिवारी, पूरन चंद्र शर्मा, रघुनाथ सिंह चौहान और गोविंद सिंह कुंजवाल ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी इस सीट का प्रतिनिधित्व किया है।

उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद 2002 में भाजपा के कैलाश शर्मा ने कांग्रेस के मनोज तिवारी को पीछे छोड़कर चुनाव जीता लेकिन 2007 में कांग्रेस ने वापसी करते हुए मनोज तिवारी के नेतृत्व में बाजी पलट दी। 2012 में भी मुकाबला कांग्रेस के मनोज तिवारी और भाजपा के रघुनाथ सिंह चौहान के बीच रहा और कांग्रेस ने महज 1,181 वोटों से जीत दर्ज की। 2017 में भाजपा ने रघुनाथ सिंह चौहान को मैदान में उतारकर तस्वीर फिर बदल दी और उन्होंने मनोज तिवारी को 5,379 वोटों से हराया लेकिन 2022 में मुकाबला फिर बेहद कांटे का हो गया। मनोज तिवारी ने भाजपा के कैलाश शर्मा को सिर्फ 127 वोटों से हराया। कांग्रेस को 24,439 और भाजपा को 24,312 वोट मिले। कांग्रेस को 44.90 प्रतिशत और भाजपा को 44.67 प्रतिशत वोट मिले। यानी दो दशक में अल्मोड़ा की जनता ने एक ही बात लगातार साबित की है कि यह सीट किसी दल की स्थायी जागीर नहीं बल्कि चेहरे, संगठन और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के बीच हर चुनाव में नया फैसला देने वाली सीट है। 2027 में डेढ़ सौ से भी कम वोटों का मामूली बदलाव भी पूरी तस्वीर बदल सकता है।

अब जबकि 2027 का विधानसभा चुनाव बहुत दूर नहीं है, सवाल है कि पुराने चेहरों की चौखट पर राजनीति होगी या नए चेहरे चुनावी गणित को बदलेंगे? भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर की जमीन तैयार तो है लेकिन स्थानीय राजनीतिक ताकतें मजबूत होकर सामने आएंगी, यह सवाल भी है। विधानसभा चुनाव भले ही अभी दूर है लेकिन राजनीतिक बिसात बिछनी शुरु हो चुकी है। सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि भाजपा और कांग्रेस में कौन जीतेगा बल्कि यह है कि क्या दोनों प्रमुख दल एक बार फिर पुराने और आजमाए हुए चेहरों पर दांव लगाएंगे या जनता के बीच से निकल रहे नए चेहरों को मौका देंगे?

2002 से 2022 तक अल्मोड़ा विधानसभा में कांग्रेस और भाजपा की राजनीति खासकर विधानसभा चुनावों के लिए कुछ चुनिंदा चेहरों पर सिमटी नजर आती है। कांग्रेस से मनोज तिवारी तो भाजपा में कैलाश शर्मा और रघुनाथ सिंह चैहान प्रमुख चेहरे रहे हैं।

कांग्रेस के सामने सबसे स्वाभाविक चेहरा मौजूदा विधायक मनोज तिवारी का है। सीटिंग विधायक होने के चलते उनकी दावेदारी स्वाभाविक रूप से मजबूत है। 2022 में उन्होंने बेहद करीबी मुकाबले में भाजपा को हराकर सीट कांग्रेस की झोली में डाली थी लेकिन कांग्रेस के सामने यही ताकत उसकी कमजोरी भी बन सकती है। यदि पार्टी केवल इस आधार पर फिर मनोज तिवारी पर भरोसा करती है कि उन्होंने 2022 में भाजपा को हरा दिया था तो सवाल यह भी है कि पिछले बाइस वर्षों में पार्टी ने दूसरी पंक्ति का नेतृत्व कितना तैयार किया?

हरीश रावत सरकार के समय दर्जा राज्यमंत्री रहे बिट्टू कर्नाटक इसी के चलते भाजपा में चले गए थे क्योंकि उन्हें अपने लिए कांग्रेस के अंदर 2027 के लिए भी कोई उम्मीद दिखाई नहीं देती थी। कांग्रेस में स्थानीय स्तर पर संगठन से जुड़े कई कार्यकर्ता और युवा चेहरे लम्बे समय से सक्रिय हैं। वर्तमान में कांग्रेस की अल्मोड़ा जिला कांग्रेस इकाई के जिलाध्यक्ष भूपेंद्र सिंह भोज का नाम उन लोगों में शुमार है जो कांग्रेस के भविष्य की एसेट जरूर हैं। भूपेंद्र सिंह भोज उर्फ गुड्डू भोज छात्रसंघ उपाध्यक्ष, एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष, युवक कांग्रेस की लोकसभा इकाई के अध्यक्ष, जिला महामंत्री और पीसीसी सदस्य रह चुके हैं लेकिन टिकट की राजनीति अक्सर स्थापित नामों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है। इन सवालों के बीच कि क्या आगामी विधानसभा चुनाव सिर्फ मौजूदा विधायक की लोकप्रियता पर लड़ा जाएगा या पार्टी एक नई पीढ़ी को भी सामने लाएगी? नई पीढ़ी के संदर्भ में फिलहाल इसका जवाब ना में ही नजर आता है और यह तय है कि अल्मोड़ा विधानसभा से 2027 के चुनावों में मनोज तिवारी ही कांग्रेस का चेहरा होंगे।

भाजपा के लिए अल्मोड़ा सबसे ज्यादा पेचीदा सीटों में से एक हो सकती है क्योंकि पुरानी और नई पीढ़ी के बीच प्रत्याशी का चयन उसके सामने चुनौती खड़ी कर सकता है। 2012 और 2022 के चुनाव इसका उदाहरण हैं। 2012 में रघुनाथ सिंह चौहान को टिकट मिलने के विरोध के चलते कैलाश शर्मा बागी होकर चुनाव लड़े थे, तब भाजपा यह सीट हार गई थी। 2022 में कैलाश शर्मा को टिकट मिलने पर रघुनाथ सिंह चौहान और कुछ अन्य नेताओं ने विरोध स्वरूप भाजपा से इस्तीफा तक दे दिया था। इस बार भी कैलाश शर्मा अपनी दावेदारी पेश करेंगे। 2002 में वह अल्मोड़ा से विधायक रह चुके हैं। इसी प्रकार रघुनाथ सिंह चौहान जो 2017 में अल्मोड़ा से विधायक रह चुके हैं, वे भी दावेदारी के मूड में बताए जाते हैं। 2002 से 2022 तक हुए पांच विधानसभा चुनावों में अल्मोड़ा भाजपा की चुनावी राजनीति कैलाश शर्मा और रघुनाथ सिंह चौहान के इर्द-गिर्द घूमती रही है। 2002, 2007 और 2022 में कैलाश शर्मा तो 2012 और 2017 में रघुनाथ सिंह चौहान भाजपा के प्रत्याशी रहे। कैलाश शर्मा जहां एक बार विधानसभा पहुंचे, वहीं रघुनाथ सिंह चौहान भी एक ही बार विधानसभा पहुंच पाए। पुराने चेहरे आजमाकर भाजपा यहां से दो बार ही अपने विधायक जितवा पाई है।

भाजपा में अल्मोड़ा सीट पर टिकट को लेकर पहले भी कई नाम चर्चा में रहे हैं। पुराने दौर के कैलाश शर्मा और रघुनाथ सिंह चौहान तो नई पीढ़ी के कुंदन लटवाल, गोविंद पिलख्वाल, रवि रौतेला जैसे नाम भी दावेदारी के रूप में सामने आ रहे हैं। क्या भाजपा इस पीढ़ीगत बदलाव के जोखिम के लिए तैयार है?

नए चेहरों में कुंदन लटवाल अल्मोड़ा की भाजपा राजनीति में लम्बे समय से सक्रिय युवा चेहरा हैं। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भी उन्होंने अपनी दावेदारी पेश की थी। लटवाल की ताकत केवल यह नहीं कि वे अल्मोड़ा की राजनीति में सक्रिय हैं। वे भाजपा युवा मोर्चे के दो बार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। शोबन सिंह जीना अल्मोड़ा परिसर में छात्रसंघ उपाध्यक्ष, छात्र संघ अध्यक्ष, छात्र महासंघ कुमाऊं विश्वविद्यालय के अध्यक्ष के साथ ही जिला पंचायत सदस्य और क्षेत्र पंचायत सदस्य रह चुके हैं। वर्तमान में धामी सरकार में वह उत्तराखण्ड राज्य युवा कल्याणकारी परिषद के उपाध्यक्ष (दर्जाधारी राज्यमंत्री) हैं।

भाजपा की अल्मोड़ा इकाई के पूर्व जिलाध्यक्ष रवि रौतेला जो वर्तमान में भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य हैं, भी दावेदारों में एक हैं। मूलरूप से बागेश्वर निवासी रवि रौतेला पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के नजदीकी लोगों में गिने जाते हैं। भाजपा टिकट को संगठनात्मक अनुभव और पार्टी के अंदर स्वीकार्यता के आधार पर देखती है तो गोविंद पिलखवाल की दावेदारी भी बेहद गम्भीर है।

गोविंद पिलख्वाल  दो कार्यकाल तक भाजपा के अल्मोड़ा जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी उन्हें अल्मोड़ा सीट के टिकट का मजबूत दावेदार माना गया था। 2012 में ही भाजपा ने उन्हें जिला अध्यक्ष बनाया था। गोविंद सिंह पिलखवाल को अभी हाल ही में उत्तराखण्ड हथकरघा एवं हस्तशिल्प विकास परिषद का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जिससे उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा मिला है।

कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए बिट्टू कर्नाटक भी भाजपा से टिकट की दौड़ में शामिल हैं। 2022 के विधानसभा चुनावों में वह कांग्रेस से टिकट की दौड़ में थे। उस वक्त वह निर्दलीय चुनाव लड़ने की भी तैयारी कर रहे थे लेकिन काफी मान-मनौव्वल के बाद उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। कुछ समय बाद वह भाजपा में शामिल हो गए। पुराने सक्रिय कार्यकर्ताओं को छोड़कर भाजपा किसी नए पर दांव लगाएगी, इसमें संदेह है।

अल्मोड़ा उत्तराखण्ड आंदोलन की राजनीतिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इसलिए उत्तराखण्ड क्रांति दल के लिए यह सीट केवल एक विधानसभा सीट नहीं बल्कि उसकी वैचारिक जमीन भी है। 2022 में यूकेडी के भानु प्रकाश जोशी को केवल 518 वोट मिले और वोट शेयर 0.95 प्रतिशत रहा। इस आंकड़े को देखते हुए यूकेडी के लिए 2027 में सबसे बड़ा सवाल है कि क्या वह केवल राज्य आंदोलन और क्षेत्रीय अस्मिता के पुराने नारों के साथ वापस आएगी या नए सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व को सामने लाएगी? अल्मोड़ा जिले में यूकेडी ने संगठन मजबूत करने और 2027 की तैयारी शुरू करने की बात कही है। मूल निवास, जल, जंगल, जमीन जैसे मुद्दों को प्रमुखता देने की रणनीति भी सामने आई है। ये मुद्दे अल्मोड़ा की जमीन से जुड़े हैं लेकिन मुद्दों को वोट में बदलने के लिए यूकेडी को नया, युवा और विश्वसनीय स्थानीय चेहरा चाहिए। 2022 में भानु प्रकाश जोशी पार्टी के प्रत्याशी थे लेकिन वह अल्मोड़ा की जनता का विश्वास नहीं जीत पाए।
उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी की जहां तक बात है, उसकी स्थिति अलग है। पार्टी के पास स्पष्ट क्षेत्रीय मुद्दे हैं लेकिन उसकी चुनावी ताकत सीमित रही है। 2022 में अल्मोड़ा सीट पर उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के गोपाल राम को 336 वोट मिले थे। 2027 में उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही होगा कि क्या वह केवल वैचारिक राजनीति तक सीमित रहेगी या एक ऐसा नया स्थानीय चेहरा खड़ा करेगी जो युवाओं, महिलाओं, बेरोजगारों और पहाड़ी मुद्दों को एक साथ जोड़ सके।

अल्मोड़ा विधानसभा में बसपा की स्थिति फिलहाल बेहद कमजोर दिखाई देती है। 2022 में बसपा उम्मीदवार अशोक कुमार को केवल 365 वोट यानी 0.67 प्रतिशत वोट मिले थे। 2002 से 2022 तक के विधानसभा चुनावों में बसपा का कोई प्रभावी प्रदर्शन नहीं रहा। 2002 में उसके प्रत्याशी सिकन्दर पवार 10 प्रतिशत मतों के साथ 3,507 वोट लाए थे जबकि 2012 में बसपा के टिकट से लड़े शेखर लखचैरा 6,781 वोट लाए थे। इसमें बसपा का वोट कम, प्रत्याशियों का व्यक्तिगत वोट ज्यादा था। मैदानी क्षेत्रों की तरह पहाड़ी क्षेत्रों में बसपा का प्रतिबद्ध वोट बैंक नहीं है जो उसे मुख्य लड़ाई में सामने ला सके। ऐसे में बसपा के लिए 2027 में बूथ स्तर तक संगठन खड़ा कर स्थानीय सामाजिक समीकरणों में अपनी जमीन तलाश कर ऐसे प्रत्याशी को तलाश करना पड़ेगा जो भाजपा और कांग्रेस को चुनौती दे सके। 2022 के चुनावों में जब आम आदमी पार्टी बहुत चर्चा में थी, तब भी अल्मोड़ा के मतदाताओं ने उसे बहुत पसंद नहीं किया था। उसके प्रत्याशी अमित जोशी को 1,665 वोट मिले थे।
कुल मिलाकर 2027 का चुनाव भी सम्भवतः भाजपा-कांग्रेस की लड़ाई का गवाह हो सकता है। उससे पहले उम्मीदवार का चेहरा, उसकी स्थानीय विश्वसनीयता, स्थानीय बनाम बाहरी और पुरानी पीढ़ी बनाम नई पीढ़ी के बीच अंतद्र्वंद्व की बहस चुनाव की तारीख घोषित होने तक यूं ही चलती रहेगी।

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