संकट में धर्मगुरु जग्गी वासुदेव

अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त धर्मगुरु जग्गी वासुदेव की भाजपा संग नजदीकी जगजाहिर रही है। तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक सरकार के समय जग्गी वासुदेव की तूती बोला करती थी। अब लेकिन द्रमुक के सत्ता में आने के साथ ही सद्गुरु का प्रभामंडल कम पड़ता स्पष्ट नजर आ रहा है। भाजपा ने राज्य विधानसभा चुनावों के समय घोषणा की थी कि यदि उसकी सरकार बनी तो राज्य के सभी मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया जाएगा। सरकार लेकिन नास्तिकों की पार्टी कहलाए जाने वाली द्रमुक की बनी। द्रमुक किसी भी सूरत में राज्य के धर्म स्थलों को निजी हाथों में सौंपने वाली है नहीं। सद्गुरु जग्गी वासुदेव लंबे अर्से से सरकारी नियंत्रण हटाए जाने के पक्षधर रहे हैं। ऐसे में स्टालिन सरकार ने सद्गुरु की ‘ईशा फाउंडेशन’ पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। कोयंबटूर में इस संस्था का आलीशान भवन राज्य सरकार के निशाने पर आ चुका है। सरकार का दावा है कि सद्गुरु का यह भवन सरकारी जमीन पर बना है। इतना ही नहीं राज्य सरकार ने 1994 से लेकर अब तक ‘ईशा फाउंडेशन’ द्वारा राज्यभर में निर्मित सभी भवनों की जांच शुरू करवा डाली है। इस जांच का जिम्मा स्टालिन ने अपने तेज-तर्रार वित्त मंत्री पलनीवेल थ्यागराजन (पीटीआर) को सौंपा है। पीटीआर संग जग्गी वासुदेव के रिश्ते तनावपूर्ण बताए जाते हैं। ऐसे में खबर जोरों पर है कि जग्गी वासुदेव केंद्र सरकार की शरण में पहुंच चुके हैं। यदि तमिलनाडु के सीएम केंद्र सरकार की सुनते हैं तो ठीक अन्यथा सद्गुरु का संकट गहराया जाना तय है।

ममता की नजर दिल्ली पर

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