समाजवादी क्या सोच रहे होंगे?
राजकुमार भाटी लम्बे समय से समाजवादी पार्टी की राजनीति को सार्वजनिक मंचों पर मजबूती से रखने वाले चेहरों में हैं। वह पार्टी की विचारधारा, पीडीए की राजनीति और सामाजिक न्याय के सवालों को जिस आक्रामकता के साथ सामने रखते हैं, उसे देखते हुए मेरे मन में यह सवाल आया कि जब उन्होंने धनराज नाथवानी का नाम राज्यसभा के लिए सामने देखा होगा तो उनके भीतर क्या विचार आया होगा? क्या उन्होंने इसे समाजवादी राजनीति के बदलते स्वरूप के रूप में देखा होगा? क्या उन्हें लगा होगा कि आज के दौर में समाजवाद को कॉरपोरेट जगत के अनुभव और पूंजी के साथ भी संवाद करना चाहिए? या उनके मन में लोहिया का वह समाजवाद आया होगा जो आर्थिक असमानता और पूंजी के केंद्रीकरण को लेकर लगातार सचेत करता था?
मैं राजकुमार भाटी के मन की बात नहीं जानता लेकिन वे उस समाजवादी राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अपने को सामाजिक न्याय, पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की आवाज के रूप में प्रस्तुत करती है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा राज्यसभा के लिए धनराज नाथवानी को चुनना उनकी
समाजवादी समझ पर सवाल खड़े करता है।
समाजवादी समझ पर सवाल खड़े करता है।
धनराज नाथवानी रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े वरिष्ठ काॅरपोरेट अधिकारी हैं। उनके पिता परिमल नाथवानी भी रिलायंस से जुड़े रहे और राज्यसभा सदस्य रहे हैं। नाथवानी परिवार और अम्बानी परिवार के बीच लम्बे समय से कारोबारी सम्बंध रहे हैं। इसलिए धनराज नाथवानी का नाम महज एक व्यक्ति का नाम नहीं रह जाता। उसके साथ भारतीय काॅरपोरेट जगत का एक बड़ा नाम और एक बड़ा आर्थिक समूह भी राजनीतिक विमर्श में प्रवेश कर जाता है। ऐसे में प्रश्न उठना स्वभाविक है कि क्या समाजवादी पार्टी बदल रही है? यह प्रश्न केवल आज के अखिलेश यादव से नहीं बल्कि उस पूरी राजनीतिक परम्परा से जुड़ता है जिसमें राम मनोहर लोहिया ने समाजवाद को केवल सत्ता प्राप्त करने की रणनीति नहीं माना था। लोहिया के लिए समाजवाद आर्थिक समानता, सामाजिक न्याय, जाति-विरोध, सत्ता के विकेंद्रीकरण और आम आदमी की स्वतंत्रता का व्यापक कार्यक्रम था। वे समाज को इस तरह बदलना चाहते थे कि व्यक्ति न केवल राजनीतिक सत्ता के सामने स्वतंत्र हो बल्कि आर्थिक ताकत के सामने भी अपने को असहाय महसूस न करे।
इसलिए जब समाजवादी पार्टी एक कॉरपोरेट पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को राज्यसभा भेजती है तो मेरे मन में सबसे पहले यह सवाल नहीं आता कि धनराज नाथवानी अच्छे सांसद साबित होंगे या नहीं। सम्भव है कि वह बहुत प्रभावी सांसद साबित हों। उनका उद्योग जगत का अनुभव संसद के लिए उपयोगी भी हो सकता है। प्रश्न दूसरा है और अधिक बुनियादी है कि समाजवादी पार्टी इस चयन के माध्यम से क्या कहना चाहती है?
क्या वह यह कह रही है कि 21वीं सदी का समाजवाद निजी पूंजी और बड़े उद्योगों को स्वीकार करता है? अगर जवाब हां है तो इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं। किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था में निजी निवेश, उद्योग और पूंजी की अपनी भूमिका है। समाजवादी राजनीति का अर्थ यह भी नहीं कि हर उद्योगपति समाजवाद का विरोधी है लेकिन फिर समाजवादी पार्टी को यह बताना होगा कि उसके समाजवाद की आर्थिक सीमा क्या है? वह बड़े उद्योगों और छोटे कारोबारियों के बीच संतुलन कैसे बनाएगी? बड़े निवेश और छोटे किसान के हित में टकराव होगा तो वह किसके पक्ष में खड़ी होगी? श्रमिक और कॉर्पोरेट प्रबंधन के बीच विवाद होगा तो उसका दृष्टिकोण क्या होगा?
लोहिया इन सवालों को शायद आज से कहीं अधिक तीखे ढंग से पूछते। लोहिया के समाजवाद में समानता कोई चुनावी नारा नहीं थी। वह उनके राजनीतिक दर्शन का केंद्र थी। वह जाति को तोड़ना चाहते थे, आर्थिक गैरबराबरी कम करना चाहते थे और सत्ता को नीचे तक ले जाना चाहते थे। उनका चैखम्भा राज्य गांव, जिला, प्रांत और केंद्र के बीच सत्ता के विकेंद्रीकरण की कल्पना थी। उनकी सप्तक्रांति में स्त्री-पुरुष समानता से लेकर जातिगत भेदभाव के खिलाफ संघर्ष और आर्थिक समानता तक का व्यापक कार्यक्रम था।
आज अखिलेश यादव की राजनीति का केंद्रीय शब्द पीडीए है, पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। यह सामाजिक न्याय की राजनीति का नया राजनीतिक संस्करण है लेकिन मेरे मन में एक दूसरा सवाल भी उठता है कि क्या पीडीए केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का फार्मूला है या उसके भीतर आर्थिक समानता का सवाल भी शामिल है? क्योंकि पिछड़े को टिकट मिल जाना और पिछड़े की आर्थिक स्थिति बदल जाना दो अलग बातें हैं। दलित का विधानसभा या संसद में पहुंचना और दलित परिवार की आर्थिक सुरक्षा दो अलग बातें हैं। अल्पसंख्यक का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और उसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और आर्थिक अवसर दो अलग बातें हैं।
समाजवाद अगर केवल सत्ता में हिस्सेदारी का नाम रह गया तो वह लोहिया का समाजवाद नहीं होगा। लोहिया के लिए सवाल सत्ता में कौन बैठा है, जितना महत्वपूर्ण था, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी था कि सत्ता और सम्पत्ति समाज में किस तरह वितरित हैं।
समाजवाद अगर केवल सत्ता में हिस्सेदारी का नाम रह गया तो वह लोहिया का समाजवाद नहीं होगा। लोहिया के लिए सवाल सत्ता में कौन बैठा है, जितना महत्वपूर्ण था, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी था कि सत्ता और सम्पत्ति समाज में किस तरह वितरित हैं।
क्या समाजवाद और कॉरपोरेट पूंजी के बीच कोई नया समझौता तैयार हो रहा है? क्या अखिलेश यादव यह मानते हैं कि सामाजिक न्याय की राजनीति को आर्थिक विकास और बड़े निवेश के साथ जोड़कर ही आगे बढ़ाया जा सकता है? अगर ऐसा है तो यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रयोग है लेकिन तब समाजवादी पार्टी को जनता से यह भी कहना होगा कि बड़े काॅरपोरेट निवेश और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन कैसे बनेगा क्योंकि राजनीति में पूंजी की जरूरत से कोई इनकार नहीं कर सकता। चुनाव महंगे हैं। संगठन चलाना महंगा है। मीडिया, प्रचार और चुनावी अभियान के लिए संसाधन चाहिए लेकिन जब संसाधन राजनीतिक प्राथमिकताओं को प्रभावित करने लगें तो लोकतंत्र के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है कि क्या राजनीति पूंजी का इस्तेमाल कर रही है या पूंजी राजनीति की दिशा तय करने लगी है?
लोहिया की चिंता शायद यही थी। आज समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती यह नहीं है कि वह उद्योगपतियों से बात करे या नहीं। चुनौती यह है कि वह उद्योगपतियों से बात करते हुए अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता कैसे बनाए रखती है।
राज्यसभा का चुनाव इस लिहाज से दिलचस्प है। लोकसभा में कोई उम्मीदवार अपने क्षेत्र की जनता से वोट मांगता है। विधानसभा में भी यही होता है लेकिन राज्यसभा में पार्टी अपने राजनीतिक प्रतिनिधि का चयन करती है। इसलिए राज्यसभा में भेजा गया व्यक्ति उस पार्टी के राजनीतिक चरित्र का प्रतिनिधि भी माना जाता है। फिर सवाल उठता है कि समाजवादी पार्टी अपने राजनीतिक चरित्र को किस दिशा में ले जा रही है? एक तरफ राजकुमार भाटी जैसे पार्टी प्रवक्ता हैं जो लगातार सामाजिक न्याय और पीडीए की राजनीति की आवाज बनते हैं। दूसरी ओर राज्यसभा में कॉरपोरेट जगत से आने वाला एक चेहरा है। क्या यह विरोधाभास है? या समाजवादी पार्टी के नए राजनीतिक मॉडल का संकेत?
स्मरण रहे राजनीति में विचारधारा का संकट अचानक पैदा नहीं होता। पहले शब्द बदलते हैं, फिर प्राथमिकताएं बदलती हैं और धीरे -धीरे राजनीतिक पहचान का अर्थ बदलने लगता है। समाजवादी पार्टी इस समय शायद उसी संक्रमण के दौर से गुजर रही है।
मुलायम सिंह यादव की समाजवादी राजनीति और अखिलेश यादव की समाजवादी राजनीति एक जैसी नहीं हो सकती। दो अलग समय हैं। मुलायम के समय उत्तर प्रदेश की राजनीति का सामाजिक ढांचा अलग था। आज की अर्थव्यवस्था वैश्विक है, डिजिटल है और कॉरपोरेट पूंजी का प्रभाव पहले से कहीं ज्यादा है। ऐसे में अखिलेश यादव को समाजवाद की एक नई भाषा तलाशनी ही
होगी। नई भाषा में पुराने मूल्यों की आत्मा बची रहनी चाहिए। गरीब का सवाल बचा रहना चाहिए। किसान का सवाल बचा रहना चाहिए। मजदूर का सवाल बचा रहना चाहिए। जाति के खिलाफ संघर्ष बचा रहना चाहिए। आर्थिक गैर बराबरी के खिलाफ आवाज बची रहनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण, सत्ता तथा पूंजी के केंद्रीकरण के खिलाफ लोकतांत्रिक चेतना बची रहनी चाहिए। वरना समाजवाद केवल एक चुनावी ब्रांड बनकर रह जाएगा।
मुझे फिर राजकुमार भाटी याद आते हैं। वह इस समय पार्टी की उस आवाज का प्रतिनिधित्व करते हैं जो टीवी स्टूडियो और सार्वजनिक मंचों पर भाजपा के सामने समाजवादी विचार रखती है। मैं सोचता हूं कि अगर उनसे अकेले में पूछा जाए कि समाजवादी पार्टी के लिए लोहिया आज क्या मायने रखते हैं तो वह निश्चित रूप से सामाजिक न्याय, बराबरी और वंचितों की राजनीति की बात करेंगे। फिर उनसे दूसरा सवाल पूछा जाना चाहिए और अगर लोहिया आज पूछें कि आपने राज्यसभा में एक कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव को क्यों भेजा तो आपका जवाब क्या होगा?
मुझे फिर राजकुमार भाटी याद आते हैं। वह इस समय पार्टी की उस आवाज का प्रतिनिधित्व करते हैं जो टीवी स्टूडियो और सार्वजनिक मंचों पर भाजपा के सामने समाजवादी विचार रखती है। मैं सोचता हूं कि अगर उनसे अकेले में पूछा जाए कि समाजवादी पार्टी के लिए लोहिया आज क्या मायने रखते हैं तो वह निश्चित रूप से सामाजिक न्याय, बराबरी और वंचितों की राजनीति की बात करेंगे। फिर उनसे दूसरा सवाल पूछा जाना चाहिए और अगर लोहिया आज पूछें कि आपने राज्यसभा में एक कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव को क्यों भेजा तो आपका जवाब क्या होगा?
शायद राजकुमार भाटी कहेंगे कि समय बदल गया है। शायद वह कहेंगे कि समाजवाद का मतलब उद्योग विरोध नहीं है। शायद वह कहेंगे कि हमें उद्योग और निवेश चाहिए लेकिन उसका लाभ आम आदमी तक पहुंचना चाहिए। अगर उनका उत्तर ऐसा होगा तो मुझे उसमें समाजवाद का एक आधुनिक संस्करण दिखाई देगा लेकिन तब अखिलेश यादव को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि यह केवल तर्क न रह जाए बल्कि उनकी राजनीति और नीतियों में दिखाई दे। क्योंकि समाजवाद की असली परीक्षा राज्यसभा की सीट से नहीं होगी। उसकी परीक्षा तब होगी जब बड़ा उद्योग और छोटा किसान आमने-सामने होंगे। जब कॉरपोरेट परियोजना और स्थानीय रोजगार के बीच टकराव होगा। जब विकास के नाम पर जमीन का सवाल उठेगा। जब श्रमिक अपने अधिकार मांगेंगे। जब आर्थिक विकास के आंकड़े अच्छे होंगे लेकिन बेरोजगारी बढ़ रही होगी। तब पता चलेगा कि समाजवादी पार्टी किसके साथ खड़ी होती है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि राज्यसभा में कौन गया। सवाल यह है कि समाजवादी पार्टी किस दिशा में जा रही है। उस दिशा को समझने के लिए शायद सबसे पहले हमें फिर से लोहिया को पढ़ना पड़ेगा। हालांकि ऐसा करने के लिए अखिलेश तैयार होंगे, इसमें मुझे शक है। लोहिया का नाम जपने मात्र से कोई समाजवादी नहीं हो जाता। वैसे भी अखिलेश यादव को समाजवादी शब्द विरासत में मिला है। जरूरी नहीं वे मन, मर्म और वचन से समाजवादी हों भी।
