बढ़ती दूरी या चुनावी मजबूरी?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर तस्वीर दिलचस्प होती जा रही है। दोनों दल सार्वजनिक तौर पर साथ रहने के संकेत दे रहे हैं लेकिन सीटों के बंटवारे और चुनावी रणनीति को लेकर अंदरखाने खींचतान की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। हाल के दिनों में दोनों दलों की ओर से मिले संकेतों ने इस चर्चा को और हवा दी है। सितम्बर के अंत में अखिलेश यादव के इंडिया ब्लाॅक की बैठक से दूरी बनाने की खबर आई थी। इसके बाद भी उन्होंने 2027 का चुनाव कांग्रेस के साथ लड़ने की बात दोहराई। कांग्रेस की नई प्रदेश अध्यक्ष अराधना मिश्रा ने भी 3 अक्टूबर को गठबंधन को पटरी पर बताते हुए कहा कि पार्टी सभी 403 विधानसभा सीटों पर अपना संगठन मजबूत कर रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सपा-कांग्रेस के बीच यह दूरी वास्तविक है या चुनावी मजबूरी दोनों को फिर एक साथ खड़ा कर देगी? राजनीतिक पंडितों का कहना है कि असल पेच सीटों के बंटवारे का है। कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए ज्यादा सीटों और बेहतर मानी जाने वाली सीटों पर जोर दे रही है जबकि सपा अपने संगठन और पिछले चुनावी प्रदर्शन के आधार पर बड़ा हिस्सा अपने पास रखना चाहती है। कांग्रेस करीब 125-135 सीटों की मांग कर सकती है, जबकि सपा अपने सहयोगियों के लिए सीमित सीटें छोड़ने की रणनीति पर आगे बढ़ती दिख रही है। फिर भी दोनों दलों के लिए अलग राह आसान नहीं मानी जा रही। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने साथ मिलकर उत्तर प्रदेश की 80 में से 43 सीटें जीती थीं। यही प्रदर्शन दोनों दलों के लिए गठबंधन को बनाए रखने का महत्वपूर्ण आधार है। खास बात यह है कि 4 अक्टूबर को अखिलेश यादव ने सीटों की संख्या के बजाय गठबंधन की जीत को बड़ा मुद्दा बताया। इससे संकेत मिल रहा है कि सीट बंटवारे पर बातचीत भले कठिन हो लेकिन दरवाजा बंद करने की स्थिति फिलहाल नहीं है।
एमवीए की परीक्षा, महायुति में खींचतान

महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों गठबंधन जितने दिखाई दे रहे हैं उनके भीतर उतनी ही राजनीतिक खींचतान भी नजर आ रही है। 23 अक्टूबर को होने वाले विधान परिषद की पांच सीटों के चुनाव ने सत्तारूढ़ महायुति और विपक्षी महाविकास आघाड़ी दोनों के सामने सीट बंटवारे और आपसी तालमेल की परीक्षा खड़ी कर दी है। महायुति ने पांच सीटों के लिए फाॅर्मूला तय कर लिया है। इस फॉर्मूले के तहत भाजपा को तीन, शिवसेना को एक और एनसीपी को एक सीट मिली है लेकिन इसके बावजूद भाजपा, शिवसेना और अजित पवार गुट की एनसीपी के बीच दावेदारी को लेकर खींचतान की खबरें सामने आई हैं। खास तौर पर पुणे शिक्षक सीट को लेकर भाजपा और शिंदे गुट की दावेदारी चर्चा में है। दूसरी तरफ एमवीए की मुश्किलें कुछ ज्यादा पेचीदा दिखाई दे रही हैं। कांग्रेस ने अमरावती शिक्षक, नागपुर स्नातक और पुणे शिक्षक सीटों पर अपनी दावेदारी जताई है जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार गुट की एनसीपी भी कुछ सीटों पर दावा कर रहे हैं। अमरावती में कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) ने अलग-अलग उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने साफ संकेत दिया है कि सहमति नहीं बनी तो गठबंधन के भीतर ‘फ्रेंडली फाइट’ भी हो सकती है। ऐसी स्थिति में सवाल उठ रहा है कि विधान परिषद की सीटों को लेकर पैदा हुई यह खींचतान क्या केवल स्थानीय चुनाव तक सीमित रहेगी या आने वाले निकाय चुनावों में भी इसका असर दिखाई देगा? खासकर तब जब मुंबई की राजनीति में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की नजदीकी नया आयाम जोड़ रही है। इससे एमवीए के भीतर तालमेल को लेकर चर्चाएं और तेज हुई हैं। ऐसे में अगले कुछ दिनों में असली नजर उम्मीदवारों की अंतिम सूची और गठबंधन धर्म पर रहेगी। क्या एमवीए आखिरी वक्त पर सीटों का तालमेल बैठा लेगा या ‘फ्रेंडली फाइट’ को स्वीकार करेगा? क्या महायुति के भीतर सीटों का बंटवारा आगे कोई नई नाराजगी पैदा करेगा? महाराष्ट्र में फिलहाल यही सवाल राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।

कांग्रेस का हाथ थामेंगे उमेश कुमार?

उत्तराखण्ड की खानपुर विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक उमेश कुमार की फोटो और वीडियो एक ओर जहां कांग्रेस की राज्य प्रभारी एवं एआईसीसी महासचिव कुमारी शैलजा संग सोशल मीडिया में तैर रहे हैं तो वहीं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने 2016 में कांग्रेस सरकार गिरने के घटनाक्रम का हवाला देते हुए उमेश कुमार को लेकर कांग्रेस नेताओं पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि जिस व्यक्ति के कारण कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा उसे अब पार्टी में सम्मान दिए जाने की कोशिश हो रही है। इसके बाद से उमेश कुमार की कांग्रेस में सम्भावित एंट्री को लेकर सियासी हलचल एक बार फिर तेज हो गई है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि रावत का विरोध महज पुराने विवाद की प्रतिक्रिया नहीं बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हरिद्वार और खानपुर क्षेत्र में राजनीतिक समीकरणों को लेकर उनकी चिंता का संकेत भी है। अब निगाह इस बात पर है कि कांग्रेस आलाकमान उमेश कुमार को लेकर क्या रुख अपनाता है और रावत की आपत्तियों का समाधान कैसे करता है।

सपा ने क्यों नहीं उतारा तीसरा उम्मीदवार?

उत्तर प्रदेश की दस राज्यसभा सीटों को लेकर कई दिनों से चल रही सियासी गहमागहमी के बीच समाजवादी पार्टी ने अपना तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला लिया है। इसके साथ ही भाजपा के आठ और सपा के दो उम्मीदवारों का निर्विरोध चुना जाना लगभग तय हो गया है लेकिन सियासी हलकों में सवाल उठ रहा है कि अखिलेश यादव ने कुछ दिन पहले ही दावा किया था कि तीसरे उम्मीदवार के लिए जरूरी संख्या जुटाई जा रही है। ऐसे में अचानक कदम पीछे खींचने के पीछे सबसे बड़ा कारण क्या है? राजनीतिक पंडितों का कहना है कि तीसरा उम्मीदवार उतारने पर भाजपा और सपा दोनों खेमों में विधायकों को अपने पक्ष में करने की कोशिश होती। इससे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा के भीतर असहज स्थिति पैदा होने का खतरा था। एक दूसरा पहलू यह भी है कि सपा के सामने जीत की गारंटी नहीं थी। ऐसे में मुकाबला हारने की स्थिति में पार्टी को
राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता था। इसलिए अखिलेश ने राज्यसभा की तीन सीटों के बजाय विधानसभा की 403 सीटों पर फोकस करने का संकेत दिया है। यानी अखिलेश ने तत्काल सियासी रोमांच के बजाय 2027 के लिए अपने विधायकों को एकजुट रखने को प्राथमिकता दी है।

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