पर्दा गिर गया लेकिन आवाज बाकी है

भारतीय सिनेमा में नाना पाटेकर सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे। वह अपने आप में एक अभिनय की भाषा थे, जिसमें गुस्सा था, दर्द था, संवेदना थी, व्यंग्य था और जिंदगी की कड़वी सच्चाइयों से निकली हुई एक अद्भुत ईमानदारी थी। गरीबी और संघर्ष से निकलकर राष्ट्रीय पुरस्कारों और पद्मश्री तक पहुंचे नाना ने साबित किया कि महान अभिनेता बनने के लिए नायक का चेहरा नहीं किरदार के भीतर उतर जाने की क्षमता चाहिए। ‘परिंदा’ से ‘क्रांतिवीर’, ‘प्रहार’ और ‘नटसम्राट’ से ‘वेलकम’ के उदय शेट्टी तक उन्होंने भारतीय सिनेमा को ऐसे किरदार दिए जो उनके जाने के बाद भी जीवित रहेंगे

सिनेमा में कुछ अभिनेता आते हैं और चले जाते हैं। कुछ अभिनेता अपनी फिल्मों के कारण याद किए जाते हैं और कुछ अपने किरदारों के कारण लेकिन बहुत कम ऐसे कलाकार होते हैं जिनके जाने के बाद ऐसा महसूस होता है कि सिनेमा की भाषा का एक हिस्सा ही हमारे बीच से चला गया। नाना पाटेकर ऐसे ही अभिनेता थे। वह सिर्फ अभिनेता नहीं थे, वह अभिनय की एक अलग शैली थे। उनकी आवाज में एक खास तरह की खुरदुराहट थी, चेहरे पर जिंदगी की कठोरता दिखाई देती थी, आंखों में बेचैनी और संवाद बोलने के अंदाज में ऐसा विश्वास कि दर्शक कुछ ही क्षणों में भूल जाता था कि वह किसी अभिनेता को देख रहा है। उसे लगता था कि सामने कोई किरदार नहीं बल्कि जिंदगी से निकला हुआ कोई वास्तविक आदमी खड़ा है।

75 वर्ष की उम्र में नाना पाटेकर का निधन भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़े अध्याय का अंत है। उनके जाने की खबर ने उन तमाम किरदारों को फिर से लोगों की स्मृतियों में लौटा दिया, जिनसे नाना ने हिंदी और मराठी सिनेमा को समृद्ध किया। ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘प्रहार’, ‘अब तक छप्पन’, ‘नटसम्राट’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों को अलग-अलग नजर से देखा जा सकता है लेकिन इन सभी में एक चीज समान है, नाना पाटेकर की मौजूदगी। वह पर्दे पर आते थे तो दृश्य उनका हो जाता था।

नाना की कहानी किसी फिल्मी परिवार से निकलकर स्टार बनने की कहानी नहीं थी। यह संघर्ष से निकले एक ऐसे कलाकार की कहानी थी जिसने जिंदगी की कठिनाइयों को अपनी कला का हिस्सा बना लिया। उनका जन्म महाराष्ट्र में हुआ। उनका बचपन आर्थिक कठिनाइयों में बीता। उन्होंने बहुत कम उम्र में काम करना शुरू कर दिया था। कभी दिन में काम, फिर स्कूल और कभी खाने के लिए भी संघर्ष। जिस आदमी को आगे चलकर लाखों-करोड़ों दर्शक भारतीय सिनेमा के महान अभिनेताओं में गिनने लगे, उसने जिंदगी के शुरुआती दौर में अभाव को बहुत करीब से देखा था। शायद यही वह अनुभव था जिसने उनके अभिनय को असाधारण बनाया। नाना गरीबी का अभिनय नहीं करते थे क्योंकि उन्होंने गरीबी देखी थी। वह भूख को संवाद में नहीं समझाते थे क्योंकि उन्होंने भूख महसूस की थी। वह अकेलेपन को केवल चेहरे पर नहीं लाते थे क्योंकि उन्होंने जिंदगी में उसके कई रूप देखे थे। इसलिए उनके अभिनय में एक ऐसी सच्चाई थी जिसे केवल अभिनय की तकनीक से हासिल करना मुश्किल है। रंगमंच ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा। रंगमंच से उन्होंने संवाद, देहभाषा और दर्शकों के सामने भाव को नियंत्रित करने की कला सीखी लेकिन नाना ने इन तकनीकों को कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उनके अभिनय में तकनीक दिखाई नहीं देती थी। दिखाई देता था तो सिर्फ इंसान।

उनकी आवाज उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी। वह आवाज कभी आदेश देती थी, कभी गुस्सा करती थी, कभी डराती थी, कभी हंसाती थी और कभी अचानक इतनी धीमी हो जाती थी कि दर्शक अपनी सांस रोककर उसे सुनने लगता था। नाना जानते थे कि संवाद सिर्फ शब्द नहीं होते। संवाद के पीछे आदमी की पूरी जिंदगी खड़ी होती है। शायद इसीलिए उनके बोले हुए कई संवाद फिल्मों से बाहर निकलकर लोगों की स्मृति का हिस्सा बन गए।

फिल्मों में उनकी शुरुआती यात्रा धीरे-धीरे आगे बढ़ी लेकिन ‘परिंदा’ ने नाना पाटेकर को वह पहचान दी जिसने उन्हें हिंदी सिनेमा के बड़े अभिनेताओं की कतार में ला खड़ा किया। उनके किरदार में हिंसा थी, बेचैनी थी और भीतर छिपी हुई टूटन थी। उन्होंने यह साबित कर दिया कि किसी किरदार को प्रभावशाली बनाने के लिए उसे लगातार चिल्लाने की जरूरत नहीं होती। कई बार आंखों की एक हल्की हरकत, चेहरे का एक भाव और कुछ सेकंड की खामोशी ही पूरा दृश्य बदल देती है।
इसके बाद ‘क्रांतिवीर’ में नाना पाटेकर एक अलग ही रूप में सामने आए। इस फिल्म में उनके भीतर का आक्रोश जैसे पर्दे से बाहर निकल आया। वह केवल एक किरदार की नाराजगी नहीं थी। उसमें उस समाज के प्रति गुस्सा था जो अन्याय, भ्रष्टाचार और असमानता से जूझ रहा था। नाना के संवाद दर्शकों के भीतर दबे आक्रोश की आवाज बन गए। उनकी आवाज में इतनी तीव्रता थी कि कई बार लगता था जैसे अभिनेता नहीं, कोई आम आदमी व्यवस्था से सवाल पूछ रहा हो। यही नाना की विशेषता थी। वह किरदार को बड़ा नहीं बनाते थे, वह किरदार को वास्तविक बना देते थे। इसी कारण उनका अभिनय कभी-कभी असहज भी करता था। वह दर्शक को आराम नहीं देते थे। वह उसे सोचने पर मजबूर करते थे।

नाना पाटेकर को केवल गम्भीर और आक्रामक भूमिकाओं तक सीमित करना उनके साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा। जिस अभिनेता ने ‘क्रांतिवीर’ में व्यवस्था पर सवाल उठाए, वही ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी बनकर करोड़ों लोगों को हंसा सकता था। उदय शेट्टी नाना के अभिनय की बहुमुखी प्रतिभा का शानदार उदाहरण है। उनके पास हास्य पैदा करने के लिए किसी बनावटी अंदाज की जरूरत नहीं थी। वही आवाज, वही चेहरा, वही गुस्सा लेकिन परिस्थिति बदलते ही वही सब हास्य में बदल गया।

‘वेलकम’ के उदय शेट्टी को देखकर शायद नई पीढ़ी के बहुत से दर्शकों को पहली बार समझ आया कि नाना पाटेकर केवल गम्भीर अभिनय के अभिनेता नहीं हैं। वह कॉमेडी को भी उसी गहराई से जी सकते हैं। उनकी कॉमेडी भी किरदार से पैदा होती थी, अभिनेता की कोशिश से नहीं। नाना पाटेकर का एक और महत्वपूर्ण पक्ष था निर्देशक बनना। ‘प्रहार’ केवल उनके अभिनय की फिल्म नहीं थी। उन्होंने उसे निर्देशित भी किया। सैनिक जीवन, अनुशासन, हिंसा और मानसिक संघर्ष को उन्होंने जिस तरह फिल्म में रखा, वह बताता है कि वह सिनेमा को केवल अभिनेता की नजर से नहीं देखते थे। उनके लिए कहानी और किरदार सबसे महत्वपूर्ण थे। नाना की यही सोच उन्हें उस दौर के कई सितारों से अलग करती थी। वह स्टार बनने की होड़ में नहीं थे। उन्होंने अपने लिए ग्लैमर की दुनिया से ज्यादा अभिनय की दुनिया चुनी। पुरस्कार उन्हें मिले, राष्ट्रीय सम्मान मिला, पद्मश्री मिला लेकिन उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान पुरस्कारों की सूची नहीं थी। उनकी पहचान वह विश्वास था जो दर्शक उनके नाम के साथ जोड़ता था, अगर नाना पाटेकर हैं तो किरदार में कुछ असली जरूर होगा।

मराठी सिनेमा में ‘नटसम्राट’ ने उनके अभिनय को एक और ऊंचाई दी। एक ऐसा कलाकार जिसने पूरी जिंदगी मंच पर बिताई, तालियां सुनीं, किरदार निभाए और फिर उम्र के उस पड़ाव पर पहुंचा जहां मंच पीछे छूट जाता है और जीवन का अकेलापन सामने खड़ा हो जाता है। नाना ने उस बूढ़े अभिनेता की टूटन, अहंकार, स्मृति, प्रेम और अकेलेपन को जिस गहराई से निभाया, वह उनके लम्बे अभिनय जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया। ‘नटसम्राट’ में नाना को देखना सिर्फ अभिनय देखना नहीं था। वह जैसे एक अभिनेता का अपने ही जीवन से सामना था। मंच पर हजारों लोगों के सामने खड़े रहने वाला आदमी जब जिंदगी के मंच पर अकेला रह जाता है तो उसके भीतर क्या बचता है, इस सवाल को नाना ने अपने चेहरे और आवाज के जरिए सामने रखा। यही कारण है कि नाना पाटेकर के अभिनय को केवल संवादों से नहीं समझा जा सकता। उन्हें समझने के लिए उनकी खामोशी देखनी पड़ती है। उनकी आंखें देखनी पड़ती हैं। उनके चेहरे का वह भाव देखना पड़ता है जब वह कुछ कहने से पहले रुकते हैं। वह विराम भी उनके अभिनय का हिस्सा था।

नाना की जिंदगी का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि उन्होंने अपनी सफलता को अपने शुरुआती संघर्ष से कभी पूरी तरह अलग नहीं किया। शायद इसलिए उनके भीतर एक सामान्य आदमी हमेशा मौजूद रहा। वह जानते थे कि जिंदगी कितनी असुरक्षित हो सकती है। यही कारण है कि उनके किरदारों में आम आदमी दिखाई देता था, उसका गुस्सा, उसकी बेबसी, उसकी महत्वाकांक्षा, उसका अकेलापन और उसकी जिद।

आज उनके जाने के बाद उनकी फिल्मों को दोबारा देखने का अर्थ भी बदल जाएगा। ‘परिंदा’ में उनका चेहरा अब सिर्फ एक किरदार का चेहरा नहीं रहेगा। ‘क्रांतिवीर’ में उनका गुस्सा सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं रहेगा। ‘प्रहार’ में सैनिक का संघर्ष और ‘नटसम्राट’ में बूढ़े कलाकार की पीड़ा और गहरी महसूस होगी। फिर अचानक ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी सामने आएगा और शायद दर्शक मुस्कुरा देगा। यही किसी बड़े कलाकार की असली विरासत होती है। वह किसी एक भाव में कैद नहीं होता। वह दुख में भी मिलता है और हंसी में भी। वह गुस्से में भी दिखाई देता है और खामोशी में भी।

नाना पाटेकर के पास तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार थे, पद्मश्री था, लम्बा फिल्मी करियर था और अनगिनत यादगार भूमिकाएं थीं लेकिन शायद उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने यह साबित किया कि अभिनेता बनने के लिए पारम्परिक अर्थों में नायक होना जरूरी नहीं है। जरूरी है कि आप किरदार के भीतर उतर सकें और दर्शक को यह विश्वास दिला सकें कि पर्दे पर जो आदमी दिखाई दे रहा है, वह सचमुच मौजूद है। नाना पाटेकर ने अभिनय नहीं किया, उन्होंने किरदारों को जिंदगी दी। इसलिए उनके जाने के बाद भी उनके किरदार हमारे बीच रहेंगे। कोई ‘क्रांतिवीर’ याद करेगा, कोई ‘परिंदा’, कोई ‘प्रहार’, कोई ‘नटसम्राट’ और कोई ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी।

एक अभिनेता का शरीर चला जाता है लेकिन उसका अभिनय नहीं जाता। आवाज चली जाती है लेकिन संवाद रह जाते हैं। चेहरा चला जाता है लेकिन किरदार रह जाते हैं और नाना पाटेकर ने इतने किरदार किए हैं कि उन्हें याद करने के लिए किसी एक फिल्म की जरूरत नहीं पड़ेगी।

महान कलाकारों की यही आखिरी जीत होती है। वह चले जाते हैं लेकिन उनके किरदार जाने से इनकार कर देते हैं। नाना पाटेकर के लिए शायद इससे बेहतर श्रद्धांजलि और क्या होगी कि आने वाली पीढ़ियों का कोई अभिनेता उनकी फिल्म देखें और कहंे कि अभिनय ऐसा भी किया जा सकता है। पर्दा गिर गया है, नाना… लेकिन आपकी आवाज अभी बाकी है।

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