जर्जर भवनों और बदहाल व्यवस्थाओं के बीच सिसक रही विरासत कायाकल्प के इंतजार में ऋषिकुल

हरिद्वार का ऐतिहासिक ऋषिकुल आयुर्वेदिक काॅलेज एवं अस्पताल आज उस मोड़ पर खड़ा है जहां गौरवशाली अतीत और मौजूदा बदहाली के बीच बड़ा फासला दिखाई देता है। जर्जर भवनों से लेकर इमरजेंसी की व्यवस्थाओं और दवाइयों की उपलब्धता तक उठ रहे सवालों के बीच अब जरूरत सिर्फ मरम्मत की नहीं बल्कि पूरे संस्थान के सुनियोजित पुनरुद्धार की है
हरिद्वार का ऋषिकुल केवल एक अस्पताल या आयुर्वेदिक मेडिकल काॅलेज नहीं है। यह उत्तराखण्ड की उस शैक्षणिक और चिकित्सकीय विरासत का हिस्सा है जिसने दशकों तक आयुर्वेद को शिक्षा और उपचार के क्षेत्र में एक अलग पहचान दी लेकिन आज यही ऐतिहासिक संस्थान अपने पुराने और जर्जर भवनों के बीच अपनी पहचान बचाने की जद्दोजहद करता नजर आ रहा है। जिन भवनों में कभी देशभर से विद्यार्थी आयुर्वेद की शिक्षा हासिल करने पहुंचते थे और जहां मरीज बेहतर उपचार की उम्मीद लेकर आते थे, उनमें से कई की मौजूदा स्थिति रखरखाव और मरम्मत की जरूरत की ओर इशारा करती है। सबसे बड़ा सवाल मरीजों और विद्यार्थियों की सुरक्षा का है।

ऋषिकुल की समस्या केवल पुरानी इमारतों तक सीमित नहीं है। अस्पताल की इमरजेंसी में संसाधनों की उपलब्धता, जरूरी दवाइयों और चिकित्सा सामग्री तथा मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर भी शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में सवाल है कि जिस संस्थान ने वर्षों तक आयुर्वेदिक चिकित्सा शिक्षा और उपचार की बड़ी जिम्मेदारी निभाई, वह आज बुनियादी व्यवस्थाओं के सवालों से क्यों जूझ रहा है?
सौ साल से ज्यादा पुरानी विरासत लेकिन भवनों पर संकट
ऋषिकुल की स्थापना और विकास का इतिहास एक सदी से भी अधिक पुराना है। संस्थान की स्थापना वर्ष 1919 में हुई थी और इसकी जड़ें वर्ष 1906 में स्थापित ऋषिकुल ब्रह्माचर्य आश्रम से जुड़ी हैं। लगभग 25 एकड़ में फैले इस परिसर ने लम्बे समय तक आयुर्वेदिक शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इतने पुराने संस्थान के भवनों का नियमित संरचनात्मक परीक्षण और समय-समय पर मरम्मत स्वाभाविक आवश्यकता है लेकिन ऐतिहासिक भवनों की समय रहते देखभाल न हो तो उनकी विरासत धीरे-धीरे जर्जर ढांचे में बदलने लगती है। ऋषिकुल के संदर्भ में यही चिंता अब ज्यादा गम्भीर दिखाई दे रही है। यह सवाल केवल भवन की दीवार, छत या प्लास्टर का नहीं है। अस्पताल परिसर में रोज मरीज, उनके तीमारदार, डाॅक्टर, कर्मचारी और विद्यार्थी मौजूद रहते हैं। ऐसे में किसी भवन की वास्तविक संरचनात्मक स्थिति का तकनीकी परीक्षण कराया जाना जरूरी है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन से भवन सुरक्षित हैं, किन हिस्सों में तत्काल मरम्मत की जरूरत है और किन भवनों के पुनर्निर्माण पर विचार किया जाना चाहिए।
छत का हिस्सा गिरा तो सामने आई खतरे की तस्वीर
सितम्बर 2026 में ऋषिकुल आयुर्वेदिक चिकित्सालय के औषधि वितरण कक्ष की छत का एक हिस्सा गिरने की घटना ने भवनों की स्थिति को लेकर चिंता और बढ़ा दी। घटना में वहां कार्यरत पीआरडी कर्मचारी मलबे की चपेट में आने से बाल-बाल बचे। इसके बाद अस्पताल प्रबंधन ने औषधि वितरण कक्ष को ओपीडी में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया और भवन की जांच कराने की बात कही। यह घटना इस बात का संकेत है कि भवनों की सुरक्षा को अब टालने वाला विषय नहीं माना जा सकता। किसी बड़े हादसे के बाद कार्रवाई करने के बजाय बेहतर होगा कि पूरे परिसर का तकनीकी और संरचनात्मक सर्वेक्षण पहले ही कराया जाए।
इमरजेंसी में सुविधाओं की वास्तविक स्थिति क्या है?
किसी भी अस्पताल की सबसे संवेदनशील इकाई उसकी इमरजेंसी होती है। यहां आने वाले मरीज को तत्काल चिकित्सकीय परीक्षण और उपचार की जरूरत होती है। इसलिए इमरजेंसी में डॉक्टर, बेड, उपकरण, दवाइयां और चिकित्सा सामग्री की उपलब्धता किसी भी अस्पताल की मूल आवश्यकता है। ऋषिकुल में 24 घंटे इमरजेंसी सेवा और 210 बिस्तरों की व्यवस्था बताई जाती है। अस्पताल में आॅपरेशन थिएटर, एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड और पैथोलाॅजी जैसी जांच सुविधाएं भी उपलब्ध हैं लेकिन कागज पर दर्ज सुविधाओं और मरीजों के अनुभव के बीच यदि अंतर दिखाई देता है तो उसकी पड़ताल जरूरी है। मरीज के लिए अस्पताल की वास्तविक गुणवत्ता इस बात से तय होती है कि जरूरत के समय उसे डाॅक्टर, दवा, जांच और उपचार कितनी आसानी से मिलता है।
दवाइयां और ऑपरेशन सामग्री की कमी पर सवाल
सरकारी अस्पताल में इलाज कराने पहुंचने वाले मरीज की सबसे बड़ी उम्मीद यही होती है कि डाॅक्टर की सलाह के मुताबिक जरूरी दवाइयां अस्पताल से मिल जाएं। यदि किसी मरीज को सामान्य और आवश्यक दवा बाहर से खरीदनी पड़ती है तो स्वाभाविक रूप से अस्पताल की दवा आपूर्ति व्यवस्था पर सवाल उठता है।
ऋषिकुल में काॅटन, ग्लव्स, नीडिल और स्टिच जैसी सामान्य चिकित्सा सामग्री की उपलब्धता को लेकर भी शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है। इन शिकायतों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। आखिर समस्या बजट की है, खरीद प्रक्रिया की है, आपूर्ति में देरी की है या मांग और उपलब्धता के बीच समन्वय की कमी है, इसका जवाब व्यवस्था को देना चाहिए। सितम्बर में दवा वितरण कक्ष को स्थानांतरित करने की घटना ने इस पूरे मामले को और महत्वपूर्ण बना दिया है। दवा मरीज के उपचार का पहला हिस्सा है लेकिन दवा बांटने वाला कक्ष ही यदि सुरक्षित नहीं है तो यह व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर गम्भीर सवाल खड़ा करता है।
अस्पताल के साथ विद्यार्थियों का भविष्य भी जुड़ा है
ऋषिकुल की पहचान सिर्फ मरीजों के इलाज से नहीं है। यह एक शिक्षण संस्थान भी है और यहां आयुर्वेदिक चिकित्सा के छात्रों के लिए अस्पताल व्यावहारिक प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम है। मरीजों की जांच, रोगों की पहचान, उपचार प्रक्रिया और चिकित्सकीय अनुभव छात्रों की शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा हैं। ऐसे में अस्पताल की आधारभूत व्यवस्थाएं कमजोर होंगी तो उसका केवल असर मरीजों पर नहीं बल्कि चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर भी पड़ेगा। इसलिए ऋषिकुल के भवनों और अस्पताल की व्यवस्थाओं को केवल निर्माण या स्वास्थ्य विभाग की प्रशासनिक समस्या के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह चिकित्सा शिक्षा, मरीजों की सुरक्षा और संस्थान की भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।
प्रबंधन बदला, लेकिन क्या व्यवस्था बदली?
ऋषिकुल वर्तमान में उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय से जुड़ी व्यवस्था के अंतर्गत संचालित है। प्रबंधन और प्रशासनिक ढांचे में बदलाव का मूल उद्देश्य यदि बेहतर शिक्षा, बेहतर चिकित्सा और बेहतर प्रशासन है तो उसका असर जमीन पर दिखाई देना चाहिए। दवाइयों, भवनों, इमरजेंसी, स्टाफ और मरीज सुविधाओं से जुड़े सवाल बने रहते हैं तो यह समीक्षा जरूरी हो जाती है कि मौजूदा व्यवस्था का लाभ मरीजों और विद्यार्थियों तक कितना पहुंच रहा है। इसी कारण ऋषिकुल और गुरुकुल जैसे संस्थानों को फिर से राज्य सरकार के प्रत्यक्ष अधीन लाने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है। हालांकि ऐसी किसी प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव को केवल भावनात्मक मांग के रूप में नहीं बल्कि स्पष्ट वित्तीय, प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्ययोजना के साथ देखना होगा।
मदन कौशिक के सामने बड़ी चुनौती
मदन कौशिक के आयुष एवं आयुष शिक्षा मंत्री बनने के बाद ऋषिकुल को लेकर स्थानीय स्तर पर उम्मीदें बढ़ी हैं। ऐसे में ऋषिकुल की समस्याओं का समाधान उनके लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती भी है और अवसर भी। सूत्रों के अनुसार, ऋषिकुल के प्रबंधन को पुनः राज्य सरकार के अधीन लाने की सम्भावनाओं को लेकर शासन स्तर पर विचार-विमर्श आगे बढ़ा है। बताया जा रहा है कि आयुष मंत्री मदन कौशिक ने अधिकारियों को इस सम्बंध में जरूरी फाइल तैयार कर प्रस्ताव पेश करने के निर्देश दिए हैं। हालांकि अंतिम निर्णय या औपचारिक शासनादेश सामने आने तक इसे प्रस्तावित प्रक्रिया के रूप में ही देखा जाना चाहिए। जिस प्रकार मदन कौशिक द्वारा ऋषिकुल का लगातार दौरा किया गया है, उससे स्थानीय स्तर पर उम्मीद जगी है लेकिन यदि संस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव होता है तो उसके साथ भवनों की सुरक्षा, अस्पताल की सुविधाओं, चिकित्सा सामग्री, मानव संसाधन और शैक्षणिक ढांचे को मजबूत करने की विस्तृत योजना भी जरूरी होगी। केवल प्रबंधन बदलने से समस्या खत्म नहीं होगी। जरूरत इस बात की है कि नए ढांचे के साथ जवाबदेही भी तय हो और समयबद्ध लक्ष्य भी निर्धारित किए जाएं।
एक तरफ मास्टर प्लान, दूसरी तरफ जर्जर भवन
ऋषिकुल के भविष्य को लेकर एक महत्वपूर्ण पहल के तहत इसके समग्र विकास के लिए मास्टर प्लान पर भी काम किया जा रहा है। योजना में ऋषिकुल को आयुर्वेद, योग, भारतीय ज्ञान परम्परा, शोध, चिकित्सा और समग्र स्वास्थ्य के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की गई है। यह योजना ऋषिकुल के लिए बड़ी सम्भावनाएं खोल सकती है लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा होता है, जब भविष्य के लिए व्यापक मास्टर प्लान तैयार किया जा रहा है, तब वर्तमान में मौजूद भवनों और अस्पताल की सुरक्षा का क्या होगा? मास्टर प्लान का उद्देश्य यदि ऋषिकुल को आधुनिक आयुर्वेद और भारतीय ज्ञान परम्परा का बड़ा केंद्र बनाना है तो उसकी पहली शर्त यही होनी चाहिए कि वर्तमान अस्पताल और शिक्षण व्यवस्था सुरक्षित और सुचारू हो। नए भवनों और सुविधाओं की योजना के साथ पुराने भवनों का संरचनात्मक ऑडिट और जरूरी पुनर्निर्माण भी उसी योजना का हिस्सा होना चाहिए।
अब मरम्मत नहीं, समग्र पुनरुद्धार की जरूरत
ऋषिकुल के लिए अब छोटे-मोटे सुधार शायद पर्याप्त नहीं होंगे। जरूरत एक ऐसी समग्र पुनरुद्धार योजना की है जिसमें पुराने भवनों का तकनीकी सर्वेक्षण, असुरक्षित भवनों का पुनर्निर्माण, सुरक्षित भवनों की मरम्मत, इमरजेंसी का आधुनिकीकरण, पर्याप्त दवाइयों और चिकित्सा सामग्री की उपलब्धता, आधुनिक जांच सुविधाएं तथा पर्याप्त चिकित्सक और पैरामेडिकल स्टाफ शामिल हों। इसके साथ ही विद्यार्थियों के लिए बेहतर क्लीनिकल प्रशिक्षण और शोध सुविधाओं पर भी ध्यान देना होगा। अस्पताल को ऐसा केंद्र बनाया जाना चाहिए जहां उपचार और शिक्षा एक-दूसरे को मजबूत करें। मरीजों की शिकायतों के लिए भी पारदर्शी व्यवस्था जरूरी है। शिकायत दर्ज होने के बाद मरीज को यह पता होना चाहिए कि शिकायत किस अधिकारी के पास पहुंची, उसका निस्तारण कब तक होना है और कार्रवाई क्या हुई।
इतिहास को बचाना है तो वर्तमान को बदलना होगा
ऋषिकुल का इतिहास उसकी सबसे बड़ी पूंजी है लेकिन केवल इतिहास का गौरव किसी संस्थान को जीवित नहीं रख सकता। विरासत को बचाने के लिए वर्तमान व्यवस्था को मजबूत करना पड़ता है। आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ऋषिकुल ने अतीत में क्या दिया। असली सवाल यह है कि आने वाली पीढ़ी को हम कैसा ऋषिकुल देना चाहते हैं।
एक ऐसा ऋषिकुल जहां मरीज सुरक्षित भवन में उपचार पाए, इमरजेंसी में जरूरी संसाधन उपलब्ध हों, दवाइयां समय पर मिलें, चिकित्सा सामग्री की कमी न हो, विद्यार्थी आधुनिक सुविधाओं के बीच बेहतर प्रशिक्षण हासिल करें और ऐतिहासिक भवन अपनी पहचान के साथ सुरक्षित रहें। मुख्यमंत्री स्तर पर प्रस्तावित मास्टर प्लान और संस्थान की मौजूदा जरूरतों के बीच तालमेल बैठाना अब सबसे बड़ी आवश्यकता है। सितम्बर में औषधि वितरण कक्ष की छत गिरने की घटना को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ऋषिकुल को केवल एक पुराने काॅलेज और अस्पताल के रूप में नहीं बल्कि हरिद्वार की ऐतिहासिक, शैक्षणिक और चिकित्सा विरासत के रूप में देखना होगा। अगर सरकार सचमुच इसे आयुर्वेद, योग और भारतीय ज्ञान परम्परा का बड़ा केंद्र बनाना चाहती है तो शुरुआत उसी जगह से करनी होगी जहां आज सबसे ज्यादा जरूरत है, सुरक्षित भवन, मजबूत अस्पताल और जवाबदेह व्यवस्था। वरना जर्जर भवनों के बीच खड़ा ऋषिकुल धीरे-धीरे उस इतिहास में बदल जाएगा, जिसकी चर्चा तो होगी लेकिन जिसकी जीवंत विरासत हमारे सामने मौजूद नहीं होगी।

बात अपनी-अपनी
ऋषिकुल एक अत्यंत पुरानी और महत्वपूर्ण संस्था है। जानकारी मिली है कि करीब तीन-चार महीने पहले शासन से लगभग 187 करोड़ रुपए का बजट आया था, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। संस्था के लिए तीन मंजिला भवन का डीपीआर तैयार कर शासन को भेजा गया है। दवाइयों की उपलब्धता अनियमित है और कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल पा रहा है। करीब आठ महीने बाद वेतन मिला। संस्था को तत्काल ठोस कदम और पर्याप्त बजट की आवश्यकता है।
प्रो. डाॅ. अजय गुप्ता, चिकित्सा अधीक्षक, ऋषिकुल, हरिद्वार
ऋषिकुल की पुरानी बिल्डिंग की स्थिति को देखते हुए समय-समय पर मरम्मत एवं निर्माण कार्य कराया जाता रहा है। अब पूरी बिल्डिंग को ध्वस्त कर नए सिरे से निर्माण कराने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। इसके लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। अब शासन से बजट स्वीकृत होकर मिलने का इंतजार है। बजट प्राप्त होने के बाद ही निर्माण कार्य की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। फिलहाल नई बिल्डिंग के निर्माण की निश्चित समय-सीमा बताना सम्भव नहीं है।
प्रो. डाॅ. ओम प्रकाश सिंह, प्राचार्य, ऋषिकुल मेडिकल कॉलेज एंड हाॅस्पिटल

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