बॉलीवुड का जासूस कभी रहस्यमय किरदार था, फिर देशभक्त नायक बना, उसके बाद सुपरहीरो और अब राष्ट्रवाद का सिनेमाई चेहरा है। ‘टाइगर’, ‘राजी’, ‘मद्रास कैफे’, ‘पठान’ और ‘आईबी 71’ जैसी फिल्मों ने ‘राॅ’ और ‘आईबी’ की अपनी-अपनी तस्वीर बनाई है लेकिन प्रश्न यह कि पर्दे पर गोलियां चलाने वाला यह जासूस वास्तविक खुफिया दुनिया से कितना मेल खाता है और सिनेमा ने हमारे भीतर जासूसी, देशभक्ति और दुश्मन की कैसी छवि बनाई है?
भारतीय सिनेमा में जासूस कोई नया किरदार नहीं है। हिंदी फिल्मों में जासूस बहुत पहले से मौजूद रहा है लेकिन उसका स्वरूप लगातार बदलता गया। कभी वह रहस्यमय व्यक्ति था जो नकली पहचान के साथ दुश्मन के बीच पहुंचता था, कभी वह अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र का पर्दाफाश करने वाला अधिकारी था और अब वह ऐसा सुपरहीरो है जो अकेले पूरी दुनिया को बचा सकता है। इस बदलाव को केवल फिल्मी मनोरंजन का बदलाव मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसके भीतर भारतीय समाज में बदलते राष्ट्रवाद, आतंकवाद, सीमा विवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंता की कहानी भी छिपी है।
भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी ‘राॅ’ और आंतरिक खुफिया व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली ‘आईबी’ का वास्तविक काम गोपनीय होता है। यही वजह है कि सिनेमा के लिए इस दुनिया को वास्तविक रूप में प्रस्तुत करना आसान नहीं है। खुफिया काम का बड़ा हिस्सा सूचनाएं जुटाने, उनका विश्लेषण करने, सम्पर्क बनाने, किसी सूचना की विश्वसनीयता जांचने और लम्बे समय तक धैर्य के साथ काम करने में गुजर सकता है लेकिन यह सब पर्दे पर बहुत रोमांचक नहीं लगता। इसलिए फिल्मी जासूस को बंदूक मिलती है, कार मिलती है, दुश्मन मिलता है और अंत में एक बड़ा मिशन। यहीं से फिल्मी जासूस और असली जासूस के बीच अंतर पैदा होता है।
‘राॅ’ की स्थापना 1968 में हुई लेकिन लम्बे समय तक हिंदी फिल्मों में इस संस्था का इस्तेमाल उस तरह नहीं हुआ जैसा पिछले डेढ़ दशक में देखने को मिला। शुरुआती जासूसी फिल्मों में एजेंट प्रायः काल्पनिक होते थे। बाद में आतंकवाद और भारत-पाकिस्तान तनाव ने जासूसी फिल्मों की कहानियों को अधिक राजनीतिक बना दिया। ‘राॅ’ का नाम धीरे-धीरे दर्शकों के लिए एक परिचित सिनेमाई पहचान बनने लगा।
‘एक था टाइगर’ इस बदलाव का महत्वपूर्ण पड़ाव था। सलमान खान का टाइगर सिर्फ खुफिया अधिकारी नहीं था, वह एक स्टार था। वह विदेशों में मिशन करता है, दुश्मनों से लड़ता है और उसी दुश्मन देश की एजेंट से प्रेम भी करता है। इसके साथ ‘राॅ’ एजेंट का एक नया माॅडल लोकप्रिय हुआ, अत्यंत सक्षम, निडर, आकर्षक और देश के लिए किसी भी सीमा तक जाने वाला नायक। आगे चलकर ‘टाइगर जिंदा है’, ‘वाॅर’ और ‘पठान’ जैसी फिल्मों ने इसी माॅडल को और बड़ा किया। इन फिल्मों में खुफिया एजेंट सूचना जुटाने वाले अधिकारी से आगे बढ़कर एक्शन सुपरहीरो बन जाता है। वह दर्जनों दुश्मनों से अकेला लड़ता है, असम्भव परिस्थितियों से बाहर निकलता है और कई बार अपने वरिष्ठों के आदेशों को भी चुनौती देकर अंततः सही साबित होता है। दर्शक को यह रोमांचित करता है लेकिन वास्तविक खुफिया व्यवस्था के संदर्भ में यह एक बड़ा सिनेमाई भ्रम है। असली खुफिया काम किसी एक व्यक्ति का वन-मैन शो नहीं होता। उसमें सूचनाओं का विश्लेषण, तकनीकी विशेषज्ञता, टीमवर्क, गोपनीय सम्पर्क और संस्थागत निर्णय महत्वपूर्ण होते हैं।
इसका दूसरा चेहरा ‘राजी’ में दिखाई देता है। यहां जासूस सुपरहीरो नहीं है। सहमत एक सामान्य लड़की है, जिसकी शादी एक पाकिस्तानी परिवार में होती है और वह भारत के लिए सूचनाएं जुटाती है। उसके पास बंदूक से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी पहचान छिपाने की क्षमता है। उसे आस- पास के लोगों के बीच रहते हुए हर समय अभिनय करना पड़ता है। यहां जासूसी का रोमांच गोलीबारी से नहीं, मानसिक तनाव से पैदा होता है।
‘राजी’ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह जासूस को इंसान बनाती है। सहमत देश के लिए काम करती है लेकिन उसके भीतर भावनाएं भी हैं। वह जिस परिवार में जाती है, उससे रिश्ते बनते हैं और फिर उसी परिवार से जुड़ी सूचनाएं उसे अपने देश तक पहुंचानी होती हैं। यहां देशभक्ति और मानवीय संवेदना एक-दूसरे के विरोध में खड़ी दिखाई देती हैं।
‘मद्रास कैफे’ ने जासूसी को एक अलग राजनीतिक संदर्भ में देखा। श्रीलंका के गृहयुद्ध, राजनीतिक हिंसा और राजीव गांधी की हत्या की पृष्ठभूमि में बनी यह फिल्म बताती है कि वास्तविक दुनिया में जासूसी केवल नायक बनाम खलनायक की कहानी नहीं होती। वहां राजनीतिक संगठन, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां, अधूरी सूचनाएं और गलत फैसले भी कहानी का हिस्सा होते हैं। यहां जासूस हर बार सफल नहीं होता और यही इसे बाकी कई स्पाई फिल्मों से अलग बनाता है।
इसके बाद ‘आईबी 71’ जैसी फिल्म आती है जो इंटेलीजेंस ब्यूरो को केंद्र में रखती है। यह याद दिलाती है कि देश की सुरक्षा केवल सीमा पर लड़ने वाले सैनिकों या बंदूक उठाने वाले एजेंटों से नहीं होती। सूचना जुटाना, सम्भावित खतरे को समझना और समय रहते उसके संकेतों को पहचानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यही वह काम है जिसे सिनेमा अक्सर कम दिखाता है क्योंकि किसी दस्तावेज को पढ़ना या किसी सूचना का विश्लेषण करना विस्फोट से कम रोमांचक दिखाई देता है। यहीं एक बड़ा सवाल पैदा होता है कि क्या बाॅलीवुड ने जासूस को राष्ट्रवाद का चेहरा बना दिया है?
इसका जवाब पूरी तरह हां या ना में नहीं दिया जा सकता। देशभक्ति अपने आप में गलत विषय नहीं है। देश के लिए काम करने वाले सैनिक या खुफिया अधिकारी का बलिदान सम्मान का विषय है लेकिन सिनेमा जब देशभक्ति को केवल दुश्मन को हराने, गोली चलाने और बदला लेने से जोड़ने लगता है, तब राष्ट्रवाद की तस्वीर संकरी हो जाती है।
एक वैज्ञानिक भी देशभक्त हो सकता है। एक शिक्षक भी। एक पत्रकार भी। एक डॉक्टर भी। एक खुफिया विश्लेषक भी। यहां तक कि युद्ध रोकने वाला व्यक्ति भी उतना ही देशभक्त हो सकता है जितना युद्ध जीतने वाला लेकिन फिल्मों में देशभक्ति का सबसे आसान दृश्य है, दुश्मन को खत्म करना।
यही वजह है कि पिछले वर्षों की स्पाई फिल्मों में ‘हम बनाम वे’ का फार्मूला मजबूत हुआ। भारत का एजेंट सही है, सामने वाला खलनायक है और अंत में भारत जीतता है। इस फॉर्मूले ने बाॅक्स ऑफिस पर सफलता दिलाई लेकिन इसके साथ एक जटिल सवाल भी पैदा किया कि क्या किसी देश की सरकार और वहां के आम नागरिक को एक ही नजर से देखा जा सकता है?
‘राजी’ इस सवाल को कुछ हद तक तोड़ती है। वहां पाकिस्तान केवल दुश्मन देश नहीं है। वहां एक परिवार है, रिश्ते हैं और सामान्य लोग हैं। यही अंतर महत्वपूर्ण है। किसी देश की सरकार, उसकी खुफिया एजेंसी और वहां के आम नागरिक अलग-अलग चीजें हैं। पर मुख्यधारा का सिनेमा कई बार इस जटिलता को सरल कर देता है। फिर आता है खुफिया एजेंसियों और लोकतंत्र का सवाल। ‘राॅ’ और ‘आईबी’ जैसी संस्थाएं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी हैं लेकिन लोकतंत्र में शक्ति के साथ जवाबदेही भी जरूरी है। खुफिया एजेंसियों का काम गोपनीय होता है मगर इसका अर्थ यह नहीं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर हर सवाल अनुचित हो जाता है। फिल्मों ने इस सवाल को बहुत कम छुआ है। शायद इसलिए कि संसदीय निगरानी, संस्थागत जवाबदेही और नागरिक अधिकारों पर बहस से मसाला फिल्म बनाना कठिन है लेकिन यही वह कहानी हो सकती है जिसकी भारतीय सिनेमा को अब जरूरत है।
एक ऐसी स्पाई फिल्म जिसमें सबसे बड़ा सवाल यह न हो कि नायक ने कितने दुश्मनों को मारा बल्कि यह हो कि उसे मिली सूचना सही थी या नहीं। जहां नायक का संघर्ष किसी आतंकवादी से ज्यादा गलत सूचना से हो। जहां राजनीतिक दबाव के कारण कोई ऑपरेशन विफल हो जाए। जहां एजेंट को अपने ही निर्णय पर संदेह हो। जहां राष्ट्रहित तथा व्यक्तिगत नैतिकता के बीच वास्तविक टकराव दिखाई दे क्योंकि वास्तविक खुफिया दुनिया में सबसे बड़ा हथियार बंदूक नहीं, सूचना है। सबसे बड़ी सफलता कई बार यह होती है कि किसी को पता ही न चले कि कोई आॅपरेशन हुआ था।
फिल्मी जासूस की सबसे बड़ी विडम्बना यही है। वास्तविक जासूस सफल होकर अदृश्य हो जाता है जबकि फिल्मी जासूस सफल होकर सुपरस्टार बन जाता है। आने वाले समय में भारतीय स्पाई सिनेमा के सामने यही चुनौती है कि वह जासूस को सुपरहीरो से वापस इंसान बनाए। ऐसा इंसान जो देश के लिए काम करता है लेकिन डरता भी है, जो मिशन पूरा करता है उसकी कीमत भी चुकाता है, जो दुश्मन से मुकाबला करता है लेकिन हर दूसरे देश के नागरिक को दुश्मन नहीं मानता।
दुनिया भी बदल चुकी है। आज जासूसी केवल सीमा पार जाकर किसी अड्डे में घुसने का नाम नहीं है। साइबर सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल निगरानी, डीपफेक, डेटा और सोशल मीडिया ने खुफिया दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। ऐसे में आने वाली फिल्मों का जासूस शायद बंदूक से ज्यादा डेटा के साथ दिखाई दे क्यों न ऐसी फिल्म बने जिसमें एक एजेंट बिना एक गोली चलाए किसी बड़े हमले को रोक दे? क्यों न कहानी इस बात पर हो कि लाखों लोगों तक पहुंचाई जा रही एक फर्जी सूचना के पीछे कौन है? क्यों न जासूस की सबसे बड़ी जीत युद्ध शुरू करना नहीं बल्कि युद्ध को रोकना हो?
शायद भारतीय स्पाई सिनेमा की अगली छलांग यही होगी। अब तक हमने ऐसे जासूस देखे हैं जो दुश्मन को खत्म कर देते हैं। आने वाले समय में हमें ऐसा जासूस देखना चाहिए जो खतरे को पैदा होने से पहले पहचान ले क्योंकि अंततः देश किसी सुपरहीरो से नहीं चलता। देश उन अनगिनत लोगों से चलता है जो बिना नाम, बिना चेहरे और बिना तालियों के अपना काम करते हैं। असली जासूस की सबसे बड़ी कहानी शायद यही है, वह इतिहास बदल देता है लेकिन इतिहास में उसका नाम तक नहीं आता और यही वह जगह है जहां बाॅलीवुड का जासूस पहली बार सचमुच बड़ा हो सकता है। सुपरहीरो बनकर नहीं, इंसान बनकर।