गैंडीखाता से लालढांग तक अधूरे विकास की कहानी

गैंडीखाता से लालढांग तक अधूरे विकास की कहानी

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में दिग्गज राजनेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए उनकी पुत्री अनुपमा रावत ने बड़े जनादेश के साथ हरिद्वार ग्रामीण सीट से जीत दर्ज की। क्षेत्र की जनता को उम्मीद थी कि स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली दूर होगी, रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे, जल जीवन मिशन की खामियां सुधरेंगी, वन गुज्जर समुदाय की वर्षों पुरानी समस्याओं का समाधान होगा और गांवों तक विकास की रफ्तार पहुंचेगी लेकिन साढ़े चार वर्ष बाद ‘दि संडे पोस्ट’ की ग्राउंड रिपोर्ट में अधिकांश मतदाताओं ने विधायक के प्रति अपनी गहन निराशा व्यक्त की। जनसम्पर्क, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, पेयजल और प्रशासनिक सुविधाओं जैसे बुनियादी मुद्दों पर अपेक्षित सुधार पूरी विधानसभा में दूर-दूर तक नजर नहीं आता है। सबसे ज्यादा निराशाजनक अनुपम रावत का आम जनता से दूरी का मुद्दा है। कुल मिलाकर विधायक के प्रति खासा जनआक्रोश स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आया है

उत्तराखण्ड की राजनीति में हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा हमेशा से एक महत्वपूर्ण सीट मानी जाती रही है। वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई इस विधानसभा ने पिछले डेढ़ दशक में कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं। वर्ष 2012 में भाजपा के स्वामी यतीश्वरानंद यहां से पहले विधायक बने। वर्ष 2017 में यह सीट पूरे देश की सुर्खियों में तब आई जब तत्कालीन मुख्यमंत्री और कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरों में शामिल हरीश रावत को भाजपा प्रत्याशी स्वामी यतीश्वरानंद ने 12 हजार से अधिक मतों से पराजित कर दिया। इसके बाद वर्ष 2022 में हरीश रावत की पुत्री अनुपमा रावत ने कांग्रेस की वापसी कराते हुए स्वामी यतीश्वरानंद को 4,472 मतों से हराकर यह सीट अपने नाम कर पिता की हार का बदला लिया।

करीब एक लाख 39 हजार मतदाताओं वाली यह पूरी तरह ग्रामीण विधानसभा सामाजिक दृष्टि से भी काफी विविध है। यहां अनुसूचित जाति, ओबीसी, मुस्लिम, किसान और वन गुज्जर समुदाय चुनावी परिणामों को प्रभावित करने वाली बड़ी आबादी हैं। लालढांग, गैंडीखाता, श्यामपुर, कांगड़ी, गाजीवाली, धनपुरा, मुस्ताबाबाद पदार्थाना, गुज्जर बस्ती, मिस्सरपुर, अजीतपुर, पंजनहेड़ी और आस-पास के दर्जनों गांव इस विधानसभा का हिस्सा हैं। गंगा और उसकी सहायक धाराओं के किनारे बसे इस क्षेत्र को हर वर्ष बाढ़, भूमि कटाव और जलभराव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। दूसरी ओर राजाजी टाइगर रिजर्व से सटे होने के कारण वन क्षेत्र, विस्थापन और वनाधिकार जैसे मुद्दे भी यहां की राजनीति के केंद्र में बने रहते हैं।
सरकारी स्तर पर इस विधानसभा में पिछले कुछ वर्षों में जल जीवन मिशन, सड़क निर्माण, स्वास्थ्य केंद्र, अर्धकुम्भ-2027 की तैयारियों, गंगा घाटों के विकास और अन्य योजनाओं के बड़े दावे किए गए हैं लेकिन जब ‘दि संडे पोस्ट’ की टीम गांव-गांव पहुंची तो सरकारी फाइलों में दर्ज विकास और जमीन पर दिखाई देने वाली तस्वीर में बड़ा अंतर नजर आया। गैंडीखाता से लेकर लालढांग और धनपुरा से लेकर वन गुज्जर बस्तियों तक लोगों की शिकायतें लगभग एक जैसी थीं, सड़कें टूटी हैं, पानी की योजनाएं अधूरी हैं, अस्पतालों में डाॅक्टर नहीं हैं, रोजगार नहीं है और जनप्रतिनिधियों तक पहुंच मुश्किल हो गई है।
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि अलग-अलग गांवों और अलग- अलग समुदायों के लोगों से बातचीत के दौरान समस्याएं तो लगभग समान रहीं लेकिन हर व्यक्ति ने उन्हें अपने अनुभवों के आधार पर अलग-अलग तरीके से सामने रखा। कहीं जल जीवन मिशन सबसे बड़ा मुद्दा था, कहीं खनन, कहीं स्वास्थ्य सेवाएं और कहीं आज भी राजस्व ग्राम और भूमिधर अधिकार के लिए दो दशक पुरानी लड़ाई जारी है।
इस विधानसभा यात्रा के दौरान यह भी महसूस हुआ कि गांवों में चुनावी चर्चा अभी से शुरू हो चुकी है। लोग सरकार और विधायक दोनों के कामकाज का अपने-अपने तरीके से मूल्यांकन कर रहे हैं। कुछ लोग पूर्व विधायक के कार्यकाल की तुलना वर्तमान प्रतिनिधि से करते दिखाई दिए तो कुछ लोगों ने साफ कहा कि उन्हें अब किसी दल से ज्यादा उस जनप्रतिनिधि की जरूरत है जो चुनाव के बाद भी गांवों में दिखाई दे। इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए ‘दि संडे पोस्ट’ की टीम हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा के अलग-अलग गांवों में पहुंची। यह रिपोर्ट उसी जमीनी पड़ताल पर आधारित है।
जल जीवन मिशन : पाइप लाइनें बिछीं, सड़कें टूटीं लेकिन कई गांवों तक अब भी नहीं पहुंचा नियमित पानी
केंद्र और राज्य सरकार जल जीवन मिशन को अपनी सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में शामिल करती हैं। दावा है कि हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाया जा रहा है लेकिन हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा के कई गांवों में यह योजना ग्रामीणों के लिए सवालों के घेरे में है।
गैंडीखाता, धनपुरा और आस-पास के गांवों में लोगों ने सबसे पहले इसी योजना का जिक्र किया। लगभग हर गांव में लोगों ने कहा कि नल तो लगा दिए गए, पाइप लाइन भी बिछा दी गई लेकिन पानी की नियमित आपूर्ति आज भी नहीं हो रही जहां पानी पहुंच भी रहा है, वहां समय निश्चित नहीं है। कई जगहों पर पाइप लाइन से लगातार लीकेज हो रहा है और उसका पानी सड़कों पर बहता रहता है।
गैंडीखाता निवासी पूरन सिंह रावत कहते हैं कि गांव की अच्छी-खासी सड़कें पाइप लाइन डालने के नाम पर खोद दी गईं लेकिन बाद में उनकी सही तरीके से मरम्मत नहीं कराई गई। बरसात के मौसम में यही सड़कें दलदल बन जाती हैं और लोगों का पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है। उनका कहना है कि सरकार ने ‘हर घर नल, हर घर जल’ का नारा तो दिया लेकिन यहां कई जगह केवल नल दिखाई देते हैं, पानी नहीं।
वे बताते हैं कि गांव के पास सिंचाई विभाग ने नहर तो बनाई लेकिन उसकी उचित निकासी की व्यवस्था नहीं की। परिणाम यह है कि गांव का गंदा पानी उसी नहर में पहुंचता है और फिर खेतों में फैल जाता है। इससे खेती प्रभावित होती है और बरसात के दिनों में स्थिति और गम्भीर हो जाती है।
केवल गैंडीखाता ही नहीं, धनपुरा और अन्य गांवों में भी लोगों ने निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठाए। ग्रामीणों का कहना है कि कई पानी की टंकियां बनने के एक-दो वर्ष के भीतर ही जर्जर दिखाई देने लगी हैं। उनका आरोप है कि घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया गया जबकि सरकारी रिकाॅर्ड में योजनाएं पूरी दिखा दी गईं।
धनपुरा के लोगों ने बताया कि कई घरों तक कनेक्शन अधूरे हैं। जिन घरों में पानी पहुंचता भी है वहां भी पर्याप्त दबाव नहीं होता। कई बार कई-कई दिनों तक सप्लाई बंद रहती है और लोगों को पुराने हैंडपम्पों या निजी बोरिंग पर निर्भर रहना पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल जीवन मिशन की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो पता चलेगा कि कई स्थानों पर योजनाएं कागजों में पूरी हैं लेकिन धरातल पर अभी भी अधूरी हैं। लोगों का आरोप है कि निगरानी की कमी और निर्माण एजेंसियों की लापरवाही का खामियाजा ग्रामीण भुगत रहे हैं।
गांवों में बातचीत के दौरान कई लोगों ने यह भी कहा कि यदि सड़कें खोदी जाती हैं तो उनका पुनर्निर्माण उसी गुणवत्ता के साथ होना चाहिए जिस गुणवत्ता की सड़क पहले थी लेकिन अधिकांश स्थानों पर ऐसा नहीं हुआ। परिणामस्वरूप आज पाइपलाइन के साथ-साथ टूटी सड़कें भी लोगों की रोजमर्रा की परेशानी बन चुकी हैं।
खनन : रातभर चलती मशीनें, धूल-धक्कड़ और टूटती सड़कें
 

हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा में यदि जल जीवन मिशन के बाद किसी मुद्दे पर सबसे अधिक लोगों ने खुलकर बात की तो वह खनन था। लालढांग, गैंडीखाता, धनपुरा और आस-पास के गांवों में रहने वाले लोगों का कहना है कि खनन अब केवल आर्थिक गतिविधि नहीं रह गया है बल्कि यह उनके दैनिक जीवन, खेती, सड़कों और पर्यावरण पर सीधा असर डाल रहा है। लगभग हर गांव में लोगों ने अलग-अलग शब्दों में एक जैसी शिकायतें दोहराईं, रातभर मशीनें चलती हैं, भारी वाहन लगातार गांवों से गुजरते हैं, धूल उड़ती रहती है, सड़कें टूट चुकी हैं और बरसात में हालात और भी खराब हो जाते हैं।

लालढांग निवासी नजर अंसारी बताते हैं कि ‘‘खनन क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बन चुका है। उनके अनुसार कई ठेकेदार स्थानीय किसानों से कम कीमत पर जमीन खरीद या लीज पर लेकर निर्धारित क्षेत्र से कहीं अधिक हिस्से में खुदाई कर देते हैं। इससे खेतों की प्राकृतिक संरचना बिगड़ जाती है और कई जगह भूमि धंसने जैसी स्थिति भी पैदा हो जाती है।’’ उनका कहना है कि जिन किसानों ने जमीन नहीं भी दी, उनके खेत भी आस-पास की खुदाई से प्रभावित हो रहे हैं।
नजर अंसारी का आरोप है कि खनन में लगे अधिकांश बड़े ठेकेदार स्थानीय नहीं हैं बल्कि हरियाणा और अन्य राज्यों से जुड़े हुए लोग हैं। स्थानीय लोगों को न तो पर्याप्त रोजगार मिलता है और न ही खनन से होने वाले लाभ में उनकी कोई भागीदारी दिखाई देती है। उल्टा उन्हें टूटी सड़कें, धूल और शोर जैसी परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं। वे बताते हैं कि भारी डम्परों और ट्रकों की लगातार आवाजाही ने गांवों की सड़कों की हालत खराब कर दी है। कई सड़कें ऐसी हैं जिनकी मरम्मत वर्षों से नहीं हुई। बरसात में इन सड़कों पर गड्ढों में पानी भर जाता है और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। उनका कहना है कि विकास कार्यों की तुलना में खनन गतिविधियों का असर लोगों के जीवन पर कहीं अधिक दिखाई देता है।
गैंडीखाता निवासी पूरन सिंह रावत भी खनन को लेकर गम्भीर चिंता जताते हैं। उनका कहना है कि रातभर मशीनों के चलने की आवाज से ग्रामीण चैन की नींद तक नहीं सो पाते। कई बार प्रशासनिक स्तर पर खनन बंद होने की घोषणा होती है लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ स्थानों पर गतिविधियां जारी रहती हैं। इससे लोगों के मन में यह धारणा बनती है कि नियमों का पालन समान रूप से नहीं हो रहा।
पूरन सिंह रावत का कहना है कि ‘‘ओवरलोड डम्परों की आवाजाही ने गांव की सड़कें बुरी तरह तोड़ दी हैं। बरसात के मौसम में यही सड़कें कीचड़ और गड्ढों से भर जाती हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों, बुजुर्गों और दोपहिया वाहन चालकों को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ती है।’’ सड़कों की मरम्मत होती भी है तो कुछ ही समय बाद फिर वही स्थिति बन जाती है क्योंकि भारी वाहनों का दबाव लगातार बना रहता है।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि खनन से उड़ने वाली धूल का असर खेती पर पड़ रहा है। खेतों में धूल की परत जमने से फसलों की गुणवत्ता प्रभावित होती है। गर्मियों में स्थिति और गम्भीर हो जाती है, जब दिनभर डम्परों की आवाजाही से पूरे क्षेत्र में धूल का गुबार बना रहता है।
कुछ किसानों का कहना है कि पहले जिन रास्तों से लोग आराम से आवागमन करते थे, अब वहां दिनभर भारी वाहन चलते रहते हैं। इससे पशुओं को चराने ले जाना भी कठिन हो गया है। कई महिलाओं ने बताया कि बच्चों को सड़क पार कराने में भी डर लगता है क्योंकि तेज रफ्तार डम्पर लगातार गुजरते रहते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि वे खनन के पूरी तरह विरोधी नहीं हैं। उनका मानना है कि यदि सरकार की अनुमति से निर्धारित सीमा में और सभी पर्यावरणीय मानकों का पालन करते हुए खनन हो तो किसी को आपत्ति नहीं होगी लेकिन निगरानी की कमी के कारण कई स्थानों पर निर्धारित शर्तों का पालन नहीं होता और उसका सीधा असर स्थानीय लोगों पर पड़ता है। लालढांग और गैंडीखाता के लोगों ने यह भी मांग की कि जिन सड़कों का उपयोग खनन वाहन करते हैं, उनकी नियमित मरम्मत की जिम्मेदारी भी सम्बंधित एजेंसियों की तय होनी चाहिए। साथ ही ओवरलोड वाहनों पर प्रभावी कार्रवाई और रात्रिकालीन खनन गतिविधियों की निगरानी बढ़ाने की भी मांग उठाई गई।
रिपोर्टिंग के दौरान यह साफ दिखाई दिया कि हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा में खनन केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह गया है। यह सड़क, स्वास्थ्य, खेती, सुरक्षा और ग्रामीण जीवन से जुड़ा एक व्यापक प्रश्न बन चुका है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी निगरानी और संतुलित नीति नहीं अपनाई गई तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गम्भीर रूप ले सकती है।
राजस्व ग्राम, भूमिधर अधिकार और अनुसूचित जनजाति के दर्जे की मांग में उलझा वन गुज्जर समुदाय
विधानसभा यात्रा के दौरान यदि कोई ऐसा मुद्दा सामने आया जो केवल विकास से नहीं बल्कि पहचान, अधिकार और अस्तित्व से जुड़ा हुआ है तो वह वन गुज्जर समुदाय की समस्याएं हैं। गैंडीखाता, पथरी से सटी
मुस्ताबाबाद पदार्थाना और लालढांग क्षेत्र में बसे वन गुज्जर परिवारों की शिकायत केवल सड़क, पानी या अस्पताल तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि लगभग दो दशक पहले राजाजी नेशनल पार्क से विस्थापित किए जाने के बाद भी उन्हें वे अधिकार नहीं मिले, जिनका उस समय आश्वासन दिया गया था। स्थानीय लोगों के अनुसार वर्ष 2002 में जब राजाजी नेशनल पार्क क्षेत्र से वन गुर्जर परिवारों का पुनर्वास किया गया था, तब सरकार ने भरोसा दिलाया था कि उन्हें बसने के लिए भूमि मिलेगी और भविष्य में गांवों को राजस्व ग्राम घोषित कर भूमिधर अधिकार भी दिए जाएंगे लेकिन 20 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह वादा अधूरा है। परिणाम यह है कि हजारों लोग आज भी भूमि सम्बंधी अधिकारों और कई सरकारी सुविधाओं से वंचित हैं।
स्थानीय निवासी मोहम्मद सैफी बताते हैं कि ‘‘उनके समुदाय की सबसे बड़ी समस्या मालिकाना हक की है। जब उन्हें जंगलों से विस्थापित किया गया तो यह विश्वास दिलाया गया था कि भविष्य में उन्हें भूमि का अधिकार मिलेगा लेकिन आज तक गांव राजस्व ग्राम घोषित नहीं हो पाया। इस कारण लोग अपनी ही जमीन पर पूर्ण अधिकार नहीं प्राप्त कर सके हैं।’’
भूमिधर अधिकार न होने के कारण लोगों को कई सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता और जमीन से जुड़े अनेक प्रशासनिक कार्य भी अटक जाते हैं। यह केवल एक गांव की समस्या नहीं है। पथरी क्षेत्र की वन गुज्जर बस्तियों सहित पूरे इलाके में यही स्थिति है। सरकार यदि इन बस्तियों को राजस्व ग्राम घोषित कर दे तो हजारों परिवारों का जीवन बदल सकता है। लोगों को भूमि सम्बंधी अधिकार मिलेंगे, सरकारी योजनाओं तक पहुंच आसान होगी और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अधिक सुरक्षित हो सकेगा।
मूल निवास और स्थायी निवास बना युवाओं के भविष्य की सबसे बड़ी बाधा
धनपुरा निवासी मोहम्मद नजाकत अंसारी का कहना है कि ‘‘यहां के युवाओं की सबसे बड़ी समस्या मूल निवास और स्थायी निवास प्रमाण पत्र से जुड़ी हुई है।’’ उनके अनुसार बच्चे पढ़-लिखकर जब सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करने जाते हैं तो आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में पीछे रह जाते हैं। कई परिवारों के पास आज भी भूमि के पूरे कागजात नहीं हैं, जिससे प्रशासनिक प्रक्रियाएं और अधिक जटिल हो जाती हैं।
वे बताते हैं कि उत्तराखण्ड के विभिन्न वन क्षेत्रों से वन गुज्जर परिवारों को लाकर गैंडीखाता और पथरी क्षेत्र की बस्तियों में बसाया गया था लेकिन पुनर्वास के बाद उन्हें वे मूलभूत सुविधाएं और अधिकार नहीं मिले जिनकी अपेक्षा थी। उनका आरोप है कि वर्षों से इस मुद्दे को उठाया जा रहा है लेकिन समाधान अभी तक नहीं निकल पाया।
मोहम्मद नजाकत अंसारी पुनर्वास की तुलना टिहरी बांध परियोजना से विस्थापित परिवारों से करते हुए कहते हैं कि अन्य विस्थापितों को जिस प्रकार भूमि, दस्तावेज और प्रशासनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं, उसी प्रकार की व्यवस्था वन गुज्जर समुदाय के लिए भी होनी चाहिए थी। यदि सभी विस्थापित नागरिक हैं तो सुविधाओं में भेदभाव नहीं होना चाहिए।
अनुसूचित जनजाति का दर्जा भी प्रमुख मांग
वन गुज्जर समुदाय की एक और प्रमुख मांग उत्तराखण्ड में अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिए जाने की है। मोहम्मद सैफी बताते हैं कि ‘‘जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में वन गुज्जर समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है लेकिन उत्तराखण्ड में आज भी यह मांग लम्बित है।’’ यदि यहां भी यह दर्जा मिल जाए तो समुदाय के बच्चों को शिक्षा और रोजगार में आरक्षण का लाभ मिलेगा तथा आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े परिवारों को आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा। ग्रामीणों का कहना है कि इस मांग को कई बार राज्य और केंद्र सरकार के सामने रखा गया है लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका।
अलग ग्राम पंचायत की मांग, दोहरे मापदंड का आरोप
पंचायत व्यवस्था को लेकर भी लोगों में असंतोष दिखाई दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस आबादी के आधार पर नई ग्राम पंचायतों का गठन किया जाता है, उसी आधार पर वन गुज्जर बस्तियों को भी अलग पंचायत मिलनी चाहिए थी। उनका दावा है कि उनकी आबादी इतनी है कि अलग ग्राम पंचायत का गठन आसानी से हो सकता है लेकिन वर्षों से मांग उठने के बावजूद इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। ग्रामीणों का कहना है कि आस-पास के अन्य क्षेत्रों में समय-समय पर पंचायतों का पुनर्गठन हुआ लेकिन वन गुज्जर बस्तियां अब भी पुराने ढांचे में ही बनी हुई हैं। उनका मानना है कि अलग पंचायत बनने से स्थानीय प्रतिनिधित्व मजबूत होगा और प्रशासनिक कार्यों में भी तेजी आएगी।
स्थानीय प्रतिनिधित्व और सुविधाओं की मांग
रोशनदीन सहित कई ग्रामीणों का कहना है कि ‘‘उनकी बस्ती में आज भी अनेक गलियां कच्ची हैं। बरसात में कीचड़ के कारण पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।’’ पुनर्वास के समय स्वास्थ्य केंद्र का भवन तो बना दिया गया लेकिन उसमें डाॅक्टरों की नियुक्ति आज तक नहीं हुई। शिक्षा की स्थिति भी सीमित है। आठवीं के बाद बच्चों को गैंडीखाता जाना पड़ता है और उच्च शिक्षा के लिए हरिद्वार। वन गुज्जर समुदाय के लोगों का कहना है कि उनका पारम्परिक व्यवसाय पशुपालन है। यदि सरकार डेयरी विकास के लिए संगठित व्यवस्था, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराए तो हजारों परिवार आत्मनिर्भर बन सकते हैं। उनका कहना है कि केवल अनुदान नहीं बल्कि दूध संग्रह, विपणन और आधुनिक डेयरी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
अधिकारों की लड़ाई विकास के सवाल से बड़ी
हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा में वन गुज्जर समुदाय की समस्याएं केवल सड़क, बिजली या पानी तक सीमित नहीं हैं। यहां पहचान, भूमि, दस्तावेज, पंचायत, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक अधिकार एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। यही कारण है कि बातचीत में अधिकांश लोगों ने सबसे पहले राजस्व ग्राम और भूमिधर अधिकार का मुद्दा उठाया और उसके बाद अन्य विकास कार्यों की चर्चा की। ग्रामीणों का कहना है कि यदि राजस्व ग्राम का दर्जा, भूमिधर अधिकार, मूल निवास की समस्या और पंचायत व्यवस्था का समाधान हो जाए तो उनके जीवन की आधी समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी। उनका मानना है कि विकास की शुरुआत अधिकारों की मान्यता से होती है और यही लड़ाई वे पिछले दो दशकों से लड़ रहे हैं।
बाढ़, बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और रोजगार का संकट : हर गांव में अलग समस्या लेकिन दर्द एक जैसा
हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा की यात्रा के दौरान यह स्पष्ट महसूस हुआ कि यहां विकास की सबसे बड़ी चुनौती केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। कहीं सड़कें टूटी हैं, कहीं अस्पतालों में डाॅक्टर नहीं हैं, कहीं बच्चों को पढ़ाई के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है और कहीं रोजगार के अभाव में युवा गांव छोड़ने को मजबूर हैं। लालढांग, धनपुरा, गैंडीखाता और वन गुज्जर बस्तियों में रहने वाले लोगों की समस्याएं भले अलग-अलग हों लेकिन उनका निष्कर्ष लगभग एक जैसा है, सरकारी योजनाओं की घोषणाएं तो बहुत हुईं लेकिन उनका पूरा लाभ गांवों तक नहीं पहुंच पाया।
बरसात आते ही गांवों में घुस जाता है पानी
गंगा और उसकी सहायक धाराओं के किनारे बसे होने के कारण हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा का बड़ा हिस्सा हर वर्ष बरसात में बाढ़ और जलभराव की समस्या झेलता है। विशेष रूप से गुज्जर बस्तियों और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों का कहना है कि तेज बारिश के दौरान पानी सीधे गांवों में घुस आता है। इससे खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हो जाती हैं और भूमि कटाव भी तेजी से बढ़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से तटबंध निर्माण की मांग की जा रही है लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं निकला। कई सम्पर्क मार्ग ऐसे हैं जो बरसात में पूरी तरह कीचड़ में बदल जाते हैं। बच्चों का स्कूल जाना मुश्किल हो जाता है, किसानों को खेत तक पहुंचने में परेशानी होती है और यदि कोई बीमार पड़ जाए तो उसे अस्पताल पहुंचाना भी चुनौती बन जाता है। वन गुज्जर बस्तियों के लोगों का कहना है कि यदि मजबूत तटबंध और जलनिकासी व्यवस्था विकसित कर दी जाए तो हर साल होने वाले नुकसान से काफी हद तक बचा जा सकता है।
अस्पतालों की इमारतें हैं लेकिन इलाज के लिए हरिद्वार जाना पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति लगभग हर गांव में लोगों की पहली शिकायतों में शामिल रही।
लालढांग निवासी नजर अंसारी बताते हैं कि ‘‘पूरे क्षेत्र में ऐसा कोई अस्पताल नहीं है जहां लोगों को एक ही स्थान पर समुचित इलाज मिल सके। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जरूर है लेकिन डॉक्टर नियमित रूप से उपलब्ध नहीं रहते। अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे जैसी बुनियादी जांच सुविधाएं नहीं हैं। यदि कोई गम्भीर मरीज आ जाए तो उसे तुरंत हरिद्वार रेफर कर दिया जाता है।’’
धनपुरा के लोगों ने बताया कि वर्ष 2004 में बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भवन और स्टाफ क्वार्टर तो हैं लेकिन संसाधनों और चिकित्सकों की भारी कमी है। कई बार अस्पताल केवल फार्मासिस्ट के भरोसे चलता है।
गैंडीखाता निवासी पूरन सिंह रावत कहते हैं कि ‘‘यहां पेट दर्द जैसी सामान्य बीमारी हो या कोई इमरजेंसी, हमें 25 से 30 किलोमीटर दूर हरिद्वार जाना पड़ता है। अस्पताल है लेकिन उसमें इलाज की व्यवस्था नहीं है।’’
वन गुज्जर बस्ती के रोशनदीन बताते हैं कि पुनर्वास के समय स्वास्थ्य केंद्र की इमारत बनाई गई थी। लगभग बीस वर्ष बीत चुके हैं लेकिन आज भी वहां न नियमित डाॅक्टर हैं और न पर्याप्त स्टाफ। गर्भवती महिलाओं की जांच तक के लिए हरिद्वार जाना पड़ता है। कई बार समय पर इलाज न मिलने से मरीजों की परेशानी और बढ़ जाती है।
ग्रामीणों की मांग है कि लालढांग और आस-पास के पूरे क्षेत्र के लिए कम से कम एक पूर्ण सुविधायुक्त सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बनाया जाए जहां विशेषज्ञ चिकित्सक, जांच सुविधाएं और 24 घंटे आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध हों।
प्राथमिक विद्यालय तक व्यवस्था लेकिन उच्च शिक्षा अब भी दूर
शिक्षा के मामले में हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा की तस्वीर मिश्रित दिखाई देती है। गैंडीखाता में बारहवीं तक विद्यालय संचालित हैं लेकिन यहां डिग्री काॅलेज नहीं है। विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए हरिद्वार या अन्य शहरों का रुख करना पड़ता है। वन गुज्जर बस्ती में स्थिति और कठिन है। यहां केवल आठवीं तक विद्यालय है। इसके बाद बच्चों को छह-सात किलोमीटर दूर गैंडीखाता जाना पड़ता है। परिवहन की उचित व्यवस्था न होने के कारण विशेषकर लड़कियों की पढ़ाई प्रभावित होती है। रोशनदीन बताते हैं कि कई परिवार आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं हैं कि रोजाना बच्चों को दूर पढ़ने भेज सकें। परिणामस्वरूप अनेक छात्र- छात्राएं आठवीं या दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं।
धनपुरा के लोगों का कहना है कि विद्यार्थियों को दस से बारह किलोमीटर दूर शिक्षण संस्थानों तक जाना पड़ता है। वर्षों से क्षेत्र में डिग्री काॅलेज की मांग उठाई जा रही है। हालांकि लालढांग में डिग्री काॅलेज की स्थापना होने से आस-पास के कुछ गांवों को राहत मिली है। नजर अंसारी भी मानते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में डिग्री कॉलेज खुलना सकारात्मक कदम रहा है लेकिन विधानसभा के बाकी ग्रामीण क्षेत्रों तक उच्च शिक्षा की सुविधाएं अभी भी पर्याप्त रूप से नहीं पहुंची हैं।
रोजगार : खेती, पशुपालन और छोटी दुकानें ही सहारा

रोजगार का मुद्दा लगभग हर गांव में युवाओं ने प्रमुखता से उठाया। लालढांग निवासी नजर अंसारी कहते हैं कि क्षेत्र में ऐसा कोई बड़ा उद्योग नहीं है जहां स्थानीय युवाओं को रोजगार मिल सके। उनके अनुसार सरकार और जनप्रतिनिधियों की ओर से ऐसी कोई ठोस योजना नहीं दिखाई देती जिससे गांव के युवाओं को स्थायी रोजगार मिल सके।

वन गुज्जर समुदाय का मुख्य व्यवसाय आज भी पशुपालन और दूध बेचना है। रोशनदीन बताते हैं कि यही उनकी पीढ़ियों का पारम्परिक व्यवसाय है। यदि सरकार आधुनिक डेयरी व्यवस्था, दुग्ध संग्रह केंद्र और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराए तो हजारों परिवारों की आय बढ़ सकती है, वहीं गैंडीखाता और धनपुरा के अधिकांश लोग खेती और छोटी दुकानों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं।
मोहम्मद सैफी बताते हैं कि पूरे लालढांग क्षेत्र में लम्बेे समय से सिडकुल स्थापित करने की मांग की जा रही है। उनका कहना है कि पूर्व सरकार ने इसकी घोषणा भी की थी लेकिन आज तक परियोजना धरातल पर नहीं उतर सकी। यदि यहां औद्योगिक क्षेत्र विकसित हो जाए तो स्थानीय युवाओं को रोजगार के लिए हरिद्वार या दूसरे शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ेगा।
मोहम्मद नजाकत अंसारी का आरोप है कि क्षेत्र के आस-पास मौजूद बड़े संस्थानों और उद्योगों में भी स्थानीय युवाओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। उनका कहना है कि यदि रोजगार के अवसर स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देकर उपलब्ध कराए जाएं तो क्षेत्र की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आ सकता है।
हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा की यह तस्वीर बताती है कि यहां लोगों की अपेक्षाएं केवल सड़क या बिजली तक सीमित नहीं हैं। वे बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्थानीय स्तर पर रोजगार और ऐसी विकास योजनाएं चाहते हैं जिनका लाभ वास्तव में गांवों तक पहुंचे।
प्रशासनिक सुस्ती, अधूरी घोषणाएं और जनप्रतिनिधियों से बढ़ती दूरी
रिपोर्टिंग के दौरान यह स्पष्ट महसूस हुआ कि लोगों की नाराजगी केवल सड़क, अस्पताल या रोजगार तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में ग्रामीणों का कहना है कि उनकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों तक उनकी पहुंच लगातार कम होती जा रही है। गांवों के लोगों को लगता है कि योजनाओं की घोषणाएं तो होती हैं लेकिन उनके क्रियान्वयन की निगरानी कमजोर है और शिकायतों के समाधान की कोई प्रभावी व्यवस्था दिखाई नहीं देती।
‘पटवारी कौन है, हमें पता ही नहीं’
गैंडीखाता निवासी पूरन सिंह रावत प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि गांव के अधिकांश लोगों को यह तक जानकारी नहीं है कि उनके क्षेत्र का पटवारी कौन है। आय, जाति, निवास, भूमि सम्बंधी दस्तावेज या अन्य राजस्व कार्यों के लिए लोगों को बार-बार तहसील और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
यदि गांव में राजस्व अधिकारियों की नियमित मौजूदगी रहे तो लोगों की छोटी-छोटी समस्याएं स्थानीय स्तर पर ही हल हो सकती हैं लेकिन वर्तमान स्थिति में ग्रामीणों को सामान्य कार्यों के लिए भी लम्बी दूरी तय करनी पड़ती है।
राशन कार्ड में गड़बड़ी के आरोप
गैंडीखाता के ग्रामीणों ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को लेकर भी गम्भीर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि यदि निष्पक्ष जांच कराई जाए तो बड़ी संख्या में आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों के पास बीपीएल राशन कार्ड मिल जाएंगे जबकि कई वास्तविक गरीब परिवार एपीएल श्रेणी में शामिल हैं। पात्रता के विपरीत राशन कार्ड बनने के कारण जरूरतमंद परिवार सरकारी योजनाओं और सस्ते राशन के लाभ से वंचित रह जाते हैं। ग्रामीणों की मांग है कि पूरे क्षेत्र में राशन कार्डों का नए सिरे से सत्यापन कराया जाए ताकि वास्तविक लाभार्थियों को उनका अधिकार मिल सके।
लालढांग उप तहसील : घोषणा हुई लेकिन जमीन पर नहीं उतरी
न्याय पंचायत लालढांग की 11 ग्राम पंचायतों के लोगों ने उप तहसील की मांग को क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक मुद्दा बताया। उनका कहना है कि वर्तमान में तहसील से जुड़े कार्यों के लिए 50 से 60 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। स्थायी निवास, आय, जाति प्रमाण पत्र, भूमि अभिलेख और अन्य राजस्व सम्बंधी कार्यों में पूरा दिन निकल जाता है और आर्थिक बोझ भी बढ़ता है।
पूर्व में सरकार ने लालढांग में उप तहसील की घोषणा तो की थी लेकिन आज तक यह केवल घोषणा बनकर रह गई। यदि उप तहसील स्थापित हो जाए तो हजारों लोगों को राहत मिलेगी और अधिकांश प्रशासनिक कार्य स्थानीय स्तर पर ही हो सकेंगे। यह मांग किसी एक गांव की नहीं बल्कि पूरे न्याय पंचायत क्षेत्र की है और इसे अब और टाला नहीं जाना चाहिए।
विधायक के कामकाज पर मिली-जुली नहीं बल्कि अधिकांश जगह असंतोष की राय स्थानीय विधायक से बढ़ती नाराजगी इस विधानसभा यात्रा के दौरान लोगों की राय अलग-अलग अवश्य थी लेकिन एक बात लगभग हर गांव में समान रूप से सुनाई दी, लोग अपने जनप्रतिनिधि को अपने बीच अधिक सक्रिय देखना चाहते हैं।
लालढांग निवासियों का कहना है कि वर्तमान विधायक से लोगों को काफी उम्मीदें थीं लेकिन उनके अनुसार क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए अपेक्षित प्रयास दिखाई नहीं दिए। वे कहते हैं कि स्वास्थ्य सेवाएं पहले जैसी हैं, रोजगार की स्थिति नहीं बदली, खनन की समस्या बनी हुई है और विधायक से आम लोगों की मुलाकात भी आसानी से नहीं हो पाती।
गैंडीखाता निवासियों का कहना है कि चुनाव के बाद विधायक गांव नहीं आईं। उनका आरोप है कि कुछ स्थानों पर विकास कार्य हुए लेकिन अधिकांश गांवों की समस्याएं जस की तस बनी रहीं। वे कहते हैं कि हमें उम्मीद थी कि जल जीवन मिशन, सड़क और स्वास्थ्य जैसी समस्याओं पर तेजी से काम होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
वन गुज्जर बस्ती के लोग वर्तमान और पूर्व विधायक के कार्यकाल की तुलना करते हुए कहते हैं कि पूर्व विधायक स्वामी यतीश्वरानंद के समय क्षेत्र में सड़कों सहित कई विकास कार्य हुए थे। वर्तमान विधायक के कार्यकाल में अपेक्षाओं के अनुरूप काम दिखाई नहीं दिया। हालांकि कुछ स्थानों पर छोटे-मोटे कार्य हुए हैं लेकिन बस्ती की मूल समस्याएं आज भी बनी हुई हैं। वर्तमान विधायक से लोगों को उम्मीद थी कि राजस्व ग्राम, उप तहसील, स्वास्थ्य केंद्र, लिंक सड़कें और रोजगार जैसे मुद्दों पर तेजी से काम होगा लेकिन उनके अनुसार इन प्रमुख मांगों पर अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी। वे कहते हैं कि अब लोग 2027 के चुनाव में ऐसे प्रतिनिधि को चुनना चाहते हैं जो गांवों के बीच रहे और समस्याओं को प्राथमिकता से उठाए।
जमीन की हकीकत क्या कहती है?
हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा यात्रा बताती है कि यहां विकास की तस्वीर एक जैसी नहीं है। कुछ स्थानों पर सड़कें बनी हैं, कुछ क्षेत्रों में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार हुआ है और अर्धकुम्भ-2027 को लेकर बड़े विकास कार्य भी प्रस्तावित हैं लेकिन दूसरी ओर जल जीवन मिशन की अधूरी व्यवस्थाएं, बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं, खनन से प्रभावित ग्रामीण जीवन, वन गुज्जर समुदाय के लम्बित अधिकार, अधूरी लिंक सड़कें, रोजगार का संकट और प्रशासनिक सुस्ती जैसी समस्याएं आज भी लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा हैं।
गांवों में बातचीत के दौरान एक बात बार-बार सुनाई दी, लोग योजनाओं की घोषणा से अधिक उनके परिणाम देखना चाहते हैं। उनके लिए विकास का अर्थ नई घोषणाएं नहीं बल्कि गांव में डाॅक्टर का मिलना, घर तक नियमित पानी पहुंचना, बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलना, खेत तक सड़क पहुंचना, समय पर सरकारी दस्तावेज बनना और युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलना है।
हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा में चुनाव अभी दूर हैं लेकिन राजनीतिक चर्चा शुरू हो चुकी है। गांवों में लोग अब केवल दल नहीं बल्कि काम के आधार पर अपने प्रतिनिधियों का मूल्यांकन करते दिखाई देते हैं। यह असंतोष आने वाले चुनाव में किस रूप में सामने आएगा, इसका फैसला तो समय करेगा लेकिन इतना तय है कि गैंडीखाता से लालढांग और धनपुरा से वन गुज्जर बस्तियों तक जनता अब वादों से अधिक काम का हिसाब मांग रही है।
(नोट :- विधायक अनुपमा रावत बार-बार सम्पर्क करने पर भी साक्षात्कार के लिए उपलब्ध नहीं हुईं।)

हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक: अनुपमा रावत (अवधि : 4.5 वर्ष)
क्र. क्षेत्र                                 मुद्दा / जमीनी स्थिति                                    अंक  (10 में)
  1. जनसम्पर्क एवं उपलब्धता चुनाव के बाद क्षेत्र में सीमित सक्रियता दिखाई दी। अधिकांश ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि विधायक गांवों में कम पहुंचीं  और समस्याओं के समाधान के लिए नियमित संवाद का अभाव रहा।    2
  2. शिक्षा लालढांग में डिग्री काॅलेज क्षेत्र की उपलब्धि रही लेकिन गैंडीखाता, धनपुरा और वन गुज्जर बस्तियों के विद्यार्थियों को आज भी  उच्च शिक्षा के लिए लम्बी दूरी तय करनी पड़ती है।   4
  3. स्वास्थ्य सेवाएं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डाॅक्टरों, विशेषज्ञ चिकित्सकों, अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे और आपातकालीन सुविधाओं का अभाव बरकरार है।  अधिकांश मरीजों को आज भी हरिद्वार रेफर किया जाता है।   3
  4. रोजगार एवं उद्योग स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर विकसित नहीं हुए। प्रस्तावित सिडकुल परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।  खेती, पशुपालन और छोटे व्यवसाय ही आजीविका का मुख्य आधार बने हुए हैं। 3
  5. सड़क एवं आधारभूत ढांचा मुख्य मार्गों पर कुछ कार्य हुए लेकिन गांवों की सम्पर्क सड़कें, पाइपलाइन बिछाने के बाद टूटी सड़कें और खनन से क्षतिग्रस्त मार्ग आज भी बड़ी समस्या हैं। 4
  6. पेयजल एवं जल जीवन मिशन जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन तो बिछी लेकिन नियमित जलापूर्ति, लीकेज और निर्माण गुणवत्ता को लेकर ग्रामीणों में व्यापक असंतोष दिखाई दिया। 4
  7. वन गुज्जर एवं सामाजिक मुद्दे राजस्व ग्राम, भूमिधर अधिकार, मूल निवास, अलग ग्राम पंचायत और अनुसूचित जनजाति के दर्जे जैसे वर्षों पुराने मुद्दों पर कोई ठोस प्रगति दिखाई नहीं दी। 3
  8. प्रशासनिक सुविधाएं लालढांग उप तहसील की घोषणा अब तक लागू नहीं हो सकी। राजस्व सम्बंधी कार्यों के लिए लोगों को आज भी लम्बी दूरी तय करनी पड़ती है। 4
  9. पारदर्शिता एवं जवाबदेही ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने विधायक की उपलब्धता और समस्याओं के समाधान को लेकर असंतोष व्यक्त किया। 3
  10. समग्र विकास कुछ विकास कार्यों के बावजूद स्वास्थ्य, रोजगार, पेयजल, सड़क और प्रशासनिक सुविधाओं जैसे प्रमुख क्षेत्रों में अपेक्षित बदलाव नहीं दिखाई दिया। 4
कुल अंक :  3.2/10                                             फाइनल ग्रेड  : फेल

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