हिमालय जरूरी या विकास?
कुछ दिन हुए फेसबुक पर आई एक पोस्ट पर नजर और मन दोनों अटक गए। उत्तराखण्ड के आवास सचिव डाॅ. राजेश कुमार की इस पोस्ट के अनुसार उत्तराखण्ड सरकार की ओर से रेलवे फ्रीज जोन में लागू 400 मीटर के प्रतिबंधों की समीक्षा करने जा रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर आवास एवं शहरी विकास विभाग ने उन क्षेत्रों की स्थिति का आकलन शुरू किया है, जहां ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है। सरकार का तर्क स्वाभाविक है कि जब रेल परियोजना अपने अंतिम चरण में पहुंच रही है तो लम्बे समय से रुकी होटल, होमस्टे, आवासीय और व्यावसायिक गतिविधियों को सुरक्षा मानकों के अनुरूप फिर से अनुमति क्यों न दी जाए लेकिन इसी फैसले के साथ एक बड़ा और शायद ज्यादा जरूरी सवाल खड़ा होता है कि क्या रेल आने के बाद पहाड़ में निर्माण की रफ्तार भी उसी तरह बढ़ाई जानी चाहिए, जिस रफ्तार से रेल की पटरियां बिछ रही हैं?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना कोई सामान्य मैदानी रेल परियोजना नहीं है। लगभग 125-126 किलोमीटर लम्बी यह लाइन गंगा और अलकनंदा की घाटियों से गुजरती है और इसका बहुत बड़ा हिस्सा सुरंगों के भीतर है। परियोजना से जुड़े सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मुख्य सुरंगों और एस्केप सुरंगों की कुल लम्बाई मिलाकर लगभग दो सौ किलोमीटर के आस-पास सुरंग निर्माण का काम शामिल है। जुलाई 2026 तक मुख्य सुरंगों में करीब 101 किलोमीटर और एस्केप सुरंगों में 95 किलोमीटर से अधिक काम पूरा होने की जानकारी केंद्र सरकार ने दी थी। यानी इस परियोजना की असली कहानी पहाड़ को काटकर रेल लाइन बनाने से ज्यादा पहाड़ के भीतर जाकर उसके भूगर्भीय ढांचे के साथ काम करने की कहानी है।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना की भूगर्भीय चुनौती पर सबसे महत्वपूर्ण हालिया अध्ययनों में से एक 2026 में प्रकाशित वैज्ञानिक शोध है। यह अध्ययन आईआईटी रूड़की, आईआईटी धनबाद तथा दो अन्य संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं ने किया है। अध्ययन ने ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन की दो सुरंगों में पृथ्वी के भीतर होने वाली हलचलों से कमजोर चट्टानों (tectonically disturbed rock) में होने वाले, सिकुड़ने वाले प्रभाव (squeezing behaviour) यानी चट्टान के दबाव के कारण सुरंग के भीतर होने वाली विकृति का जिक्र है। शोधकर्ताओं के अनुसार कमजोर और टेक्टोनिक रूप से प्रभावित चट्टानों में सुरंग खोदने के चलते सुरंग बनने के बाद बदलाव हो सकता है।
इस परियोजना के इंजीनियर भी मानते हैं कि भूगर्भीय चुनौती असाधारण है। इस परियोजना से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय इंजीनियरिंग कम्पनी लोमबार्डी (Lombardi) के अनुसार यहां निर्माण सामान्य पहाड़ी निर्माण जैसा नहीं है। जिस क्षेत्र में एक साथ कमजोर चट्टान, भूगर्भीय फाॅल्ट, अधिक पानी, पुराने भूस्खलन और भूकम्पीय संवेदनशीलता मौजूद हो, वहां परियोजना के पूरा हो जाने के बाद भी निगरानी खत्म नहीं की जा सकती है।
मेरा ध्यान डाॅ. राजेश कुमार की पोस्ट पर एक अन्य कारण से भी गया। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना के निर्माण के दौरान रुद्रप्रयाग के चोपड़ा गधेरा में मलबा डम्प किए जाने की शिकायत के बाद एनजीटी ने मामले को संज्ञान में लिया था। एनजीटी की जांच में निर्धारित डम्पिंग क्षेत्र से बाहर मलबा डाले जाने और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन की पुष्टि हुई थी। एनजीटी के समक्ष रखे गए रिकाॅर्ड में करीब 2.41 हेक्टेयर क्षेत्र में अनधिकृत डम्पिंग और खनिजों के इस्तेमाल से जुड़े नियमों के उल्लंघन का उल्लेख आया। इसके बाद रेलवे विकास निगम लिमिटेड और निर्माण कम्पनी पर करीब 2.03 करोड़ रुपए का पर्यावरणीय जुर्माना लगाया गया था। यानी परियोजना के मामले में यह कहना कि ‘‘पर्यावरणीय नियमों का पालन हर स्तर पर बिल्कुल सही हो रहा है’’, ऐसा नहीं है। सुरंग निर्माण जितना बड़ा होगा, खुदाई से निकलने वाले मलबे की मात्रा भी उतनी ही बड़ी होगी। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग परियोजना में सुरंगों की असाधारण लम्बाई को देखते हुए यह कोई छोटा पर्यावरणीय प्रश्न नहीं है।
हिमालय में सुरंग निर्माण की दूसरी बड़ी चुनौती भूमिगत जल है। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग परियोजना से जुड़े तकनीकी अध्ययनों में यहां पर पानी के रिसाव की बात सामने आई है और इसे परियोजना की प्रमुख इंजीनियरिंग चुनौतियों में शामिल किया गया है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि पहाड़ के भीतर मौजूद पानी केवल सुरंग के भीतर आने वाला पानी नहीं है। भूजल प्रणाली कई बार ऊपर बसे गांवों के प्राकृतिक और स्थानीय जलस्रोतों से जुड़ी होती है।
2022 की एक विस्तृत रिपोर्ट ने चमोली के पणई पोखरी गांव के जलस्रोत के सूखने को ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना के सुरंग निर्माण से जोड़ा था। रिपोर्ट में स्थानीय लोगों के अनुभव और परियोजना के कारण जलस्रोत पर पड़े प्रभाव का विवरण दिया गया था। इसे परियोजना के कारण होने वाली व्यापक क्षति का निर्णायक वैज्ञानिक प्रमाण नहीं माना जा सकता लेकिन यह उस स्थानीय चिंता का महत्वपूर्ण दस्तावेज जरूर है कि सुरंग निर्माण का असर भूमिगत जल प्रणाली तक पहुंच सकता है। हालांकि सिलक्यारा-बड़कोट सुरंग का हादसा अलग परियोजना का मामला है लेकिन हिमालयी सुरंग निर्माण के जोखिम को समझने के लिए सिलकियारा एक महत्वपूर्ण उदाहरण जरूर है।
अब असली चिंता रेलवे फ्रीज जोन की समीक्षा से जुड़ती है। यदि 400 मीटर का प्रतिबंध धीरे-धीरे हटता है और रेलवे कॉरिडोर के आस-पास होटल, रिसाॅर्ट, होमस्टे, आवासीय भवन, पार्किंग और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का विस्तार शुरू होता है तो स्थान की धारण क्षमता (carrying capacity) का सवाल आता है। एनजीटी ने भी हिमालयी क्षेत्रों में धारण क्षमता के अध्ययन की जरूरत पर जोर दिया है। इसका मतलब केवल यह गणना करना नहीं है कि एक क्षेत्र में कितने पर्यटक आ सकते हैं। इसमें भूगर्भीय स्थिरता, जल उपलब्धता, सीवेज व्यवस्था, ठोस कचरा, सड़क क्षमता, ढलान, वन क्षेत्र, जलस्रोत और आपदा जोखिम जैसे अनेक कारकों को एक साथ देखना होता है। इसलिए रेलवे फ्रीज जोन की समीक्षा यदि केवल इस आधार पर होती है कि ‘‘रेलवे का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है, इसलिए प्रतिबंध हटा दिए जाएं’’ तो यह अधूरा और खतरनाक दृष्टिकोण होगा।
रेल परियोजना के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क यही है कि यह पहाड़ की अर्थव्यवस्था को बदल सकती है। यह बात सही भी है। बेहतर रेल सम्पर्क से पर्यटन, स्थानीय उत्पादों, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ सकती है। सड़क पर यातायात का दबाव कम हो सकता है और यात्रा का समय घट सकता है लेकिन यही रेल यदि पहाड़ में बड़े पैमाने पर रियल एस्टेट और होटल निर्माण की दौड़ शुरू कर देती है तो तस्वीर बदल सकती है।
मान लीजिए किसी छोटे पहाड़ी कस्बे में आज 2,000 लोग रहते हैं। रेल आने के बाद वहां होटल, पार्किंग और नए आवासीय परिसर बनते हैं। पर्यटकों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। पानी की मांग बढ़ती है। सीवेज बढ़ता है। सड़क चैड़ी करनी पड़ती है। ढलान काटे जाते हैं। पार्किंग के लिए पहाड़ काटा जाता है। निर्माण सामग्री और मलबे की आवाजाही बढ़ती है। तब पर्यावरणीय प्रभाव किसी एक परियोजना का नहीं रहेगा। वह पूरे क्षेत्र का संचयी प्रभाव होगा और यही वह गलती है जिसे हिमालय बार-बार अपने तरीके से समझाता रहा है।
यह भी उतना ही जरूरी है कि इस पूरे विमर्श को विकास विरोधी बहस न बनाया जाए। वैज्ञानिक अध्ययनों का मूल संदेश यह नहीं है कि हिमालय में कोई सुरंग या रेल परियोजना बनाई ही नहीं जा सकती। आईआईटी रूड़की और अन्य तकनीकी संस्थानों के अध्ययन असल में यह बताते हैं कि परियोजना को किस प्रकार के भूगर्भीय जोखिमों से निपटना पड़ रहा है।
इसी तरह अंतरराष्ट्रीय इंजीनियरिंग विशेषज्ञों ने भी परियोजना को तकनीकी रूप से सम्भव माना है लेकिन साथ ही सुरंगों भीतर पानी का रिसाव, भूस्खलन और भूकम्प के खतरे जैसी चुनौतियों को स्पष्ट रूप से दर्ज किया है। इसलिए सवाल रेल बनाम पर्यावरण का नहीं होना चाहिए। सवाल यह होना चाहिए कि रेल बने लेकिन उसके बाद पहाड़ में विकास की सीमा कौन तय करेगा?
फ्रीज जोन की समीक्षा अवसर है, खतरा नहीं, यदि नियम वैज्ञानिक हों सरकार द्वारा 400 मीटर फ्रीज जोन की समीक्षा को पूरी तरह नकारना उचित नहीं होगा। वर्षों से प्रतिबंधों के कारण स्थानीय लोगों और कारोबारियों की समस्याएं भी वास्तविक हैं लेकिन प्रतिबंध हटाने से पहले हर क्षेत्र का अलग वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी है।
जहां-जहां पर खतरे हैं, वहां अलग नियम होने चाहिए। जहां भूस्खलन का इतिहास है, वहां बड़े निर्माण पर कड़े प्रतिबंध होने चाहिए। जहां springs या महत्वपूर्ण जलधाराएं हैं, वहां भूजल अध्ययन के बिना निर्माण की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। जहां ढलान कमजोर है, वहां भवन निर्माण की सीमा तय होनी चाहिए। रेलवे स्टेशन के आस-पास भी केवल सम्भावित बाजार को ही नहीं देखा जाना चाहिए। वहां पानी कितना है, सीवेज कहां जाएगा, ठोस कचरा कैसे सम्भलेगा, पार्किंग कितनी होगी, सड़क कितना भार सह सकती है और आपदा की स्थिति में बचाव कैसे होगा, इन सभी सवालों का जवाब पहले होना चाहिए।
जहां-जहां पर खतरे हैं, वहां अलग नियम होने चाहिए। जहां भूस्खलन का इतिहास है, वहां बड़े निर्माण पर कड़े प्रतिबंध होने चाहिए। जहां springs या महत्वपूर्ण जलधाराएं हैं, वहां भूजल अध्ययन के बिना निर्माण की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। जहां ढलान कमजोर है, वहां भवन निर्माण की सीमा तय होनी चाहिए। रेलवे स्टेशन के आस-पास भी केवल सम्भावित बाजार को ही नहीं देखा जाना चाहिए। वहां पानी कितना है, सीवेज कहां जाएगा, ठोस कचरा कैसे सम्भलेगा, पार्किंग कितनी होगी, सड़क कितना भार सह सकती है और आपदा की स्थिति में बचाव कैसे होगा, इन सभी सवालों का जवाब पहले होना चाहिए।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना के निर्माण का बड़ा हिस्सा पूरा होने के बाद आम तौर पर यह माना जा रहा है कि कठिन दौर खत्म हो गया लेकिन पर्यावरणीय दृष्टि से शायद कठिन दौर का दूसरा चरण अब शुरू होगा। निर्माण के दौरान पहाड़ के भीतर सुरंगें बनीं। अब उन सुरंगों के ऊपर और आस-पास मानव गतिविधियां बढ़ेंगी। रेलवे स्टेशन आर्थिक केंद्र बनेंगे। पर्यटक बढ़ेंगे। होटल और होमस्टे बनेंगे। जमीन की कीमतें बढ़ेंगी। सड़क और पार्किंग का दबाव बढ़ेगा। यानी पहाड़ पर दबाव केवल निर्माण मशीनों से नहीं आएगा। रेल आने के बाद आने वाला विकास भी पहाड़ पर उतना ही बड़ा दबाव डाल सकता है। चोपड़ा गदेरा की जांच और एनजीटी की कार्रवाई यह बताती है कि पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन का खतरा केवल काल्पनिक नहीं है और सिलक्यारा की विशेषज्ञ जांच ने पूरे हिमालय में सुरंग निर्माण के जोखिमों पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस को और गम्भीर बनाया है। इसलिए मुख्यमंत्री के निर्देश पर हो रही फ्रीज जोन समीक्षा को सिर्फ निर्माण की अनुमति का प्रशासनिक मामला नहीं माना जाना चाहिए। यह उत्तराखण्ड के लिए एक बड़ा नीति निर्णय है। सरकार चाहे तो इसे केवल प्रतिबंध हटाने की प्रक्रिया बना सकती है लेकिन इससे कहीं बेहतर रास्ता यह होगा कि इसे हिमालयी विकास की नई नीति की शुरुआत बनाया जाए। हर स्टेशन के लिए धरना क्षमता तय हो। हर बड़े निर्माण से पहले ढलान की मजबूती तय हो। जल स्रोतों की लगातार मॉनिटरिंग हो। मलबा निस्तारण की जीपीएस आधारित निगरानी हो। डंपिंग साइटों की क्षमता और मानसून में उनकी स्थिरता का स्वतंत्र ऑडिट हो। निर्माण की अनुमति भूगर्भीय जोखिम के आधार पर क्षेत्रवार तय हो। सबसे महत्वपूर्ण कि रेलवे, पर्यटन, सड़क, होटल और शहरी विकास को अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के हिस्से के रूप में देखा जाए। तभी रेल वास्तव में पहाड़ की विकास यात्रा की साथी बनेगी। वरना खतरा यह है कि हम पहाड़ तक रेल तो पहुंचा दें लेकिन रेल के साथ ऐसा विकास भी पहुंचा दें जिसे सम्भालने की क्षमता स्वयं पहाड़ के पास न हो। हिमालय को विकास से बचाने की जरूरत नहीं है। जरूरत इस बात की है कि विकास को हिमालय की सीमा समझाई जाए।
