उत्तराखण्ड की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट में चल रही जनहित याचिका अब एक बड़े सवाल में बदल चुकी है कि क्या पहाड़ में अस्पताल केवल भवन और स्वीकृत पदों की संख्या हैं या वहां वास्तव में मरीजों को इलाज भी मिलता है? 2025 में दायर जनहित याचिका ने डाॅक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी, खराब पड़े चिकित्सा उपकरणों, विशेषज्ञ डाॅक्टरों के अभाव, दवाओं की अनउपलब्धता, मरीजों की लगातार रेफरल व्यवस्था और आईपीएचएस मानकों पर सवाल उठाए थे। इसी मामले में अदालत के सामने भवाली के टीबी सैनिटोरियम में 200 बेड के मल्टी स्पेशलिटी-कम-सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का प्रस्ताव आया, जिसकी शुरुआती लागत करीब 250 करोड़ रुपए बताई गई थी लेकिन 2026 में मामला एक नए संकट तक पहुंच गया। सरकारी मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी की 45 प्रतिशत से अधिक फैकल्टी पद खाली होने के बीच 16 फैकल्टी सदस्यों के तबादले और बी.डी. पांडे अस्पताल नैनीताल से छह विशेषज्ञ डाॅक्टरों को बिना तत्काल विकल्प के हटाए जाने का मुद्दा अदालत के सामने आया। 3 जुलाई के बाद 5 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट ने सरकार से फिर जवाब मांगा और चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर डाॅक्टरों के सामूहिक तबादलों से पैदा हुई समस्या के समाधान तथा भवाली अस्पताल की प्रगति बताने का निर्देश दिया। अदालत के आदेशों में दर्ज तथ्य बताते हैं कि उत्तराखण्ड में स्वास्थ्य संकट केवल डाॅक्टरों की कमी का नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की क्षमता और उसके वास्तविक संचालन के बीच बढ़ती खाई का संकट है
उत्तराखण्ड बनने के 26 साल बाद भी पहाड़ की सबसे पुरानी समस्याओं में स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली शामिल है। राज्य में सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों का नेटवर्क मौजूद है लेकिन सवाल यह है कि इन अस्पतालों में इलाज की वास्तविक क्षमता कितनी है। किसी अस्पताल में 200 बेड स्वीकृत होना और उन सभी बेड का मरीजों के लिए उपलब्ध होना एक बात नहीं है। डाॅक्टरों के पद स्वीकृत होना और विशेषज्ञ डाॅक्टरों का अस्पताल में मौजूद होना दूसरी बात है। मशीन खरीद लेना और उसका नियमित रूप से काम करना तीसरी बात है। यही अंतर उत्तराखण्ड की स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी कहानी बनकर सामने आ रहा है। इस अंतर को लेकर उत्तराखण्ड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से नैनीताल हाईकोर्ट में WPPIL/202/2025 जनहित याचिका दायर की गई। मामला केवल किसी एक अस्पताल की शिकायत नहीं था। याचिका में पूरे राज्य, खासकर पर्वतीय क्षेत्रों की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर गम्भीर सवाल उठाए गए।
याचिका में स्वास्थ्य व्यवस्था का पूरा खाका अदालत के सामने याचिका में कहा गया कि पहाड़ी क्षेत्रों में सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त डाॅक्टर, चिकित्सा कर्मचारी, दवाएं, उपकरण और दूसरी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। कई जगहों पर विशेषज्ञ सेवाओं का अभाव है और गम्भीर मरीजों को उच्च चिकित्सा केंद्रों के लिए रेफर करना पड़ता है।
याचिका में यह भी मांग की गई कि राज्य के अस्पतालों को Indian Public Health Standards यानी IPHS के अनुरूप विकसित किया जाए। पर्वतीय क्षेत्रों में मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल स्थापित किए जाएं, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाएं बनाई जाएं ताकि बीमारियों की समय पर जांच और नियंत्रण हो सके। याचिका में दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के साथ-साथ पहाड़ी क्षेत्रों में काम करने वाले डाॅक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को आवासीय सुविधाएं तथा प्रोत्साहन देने की मांग भी की गई।
दूरदराज के गांवों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए मोबाइल हेल्थ यूनिट, मोबाइल मेडिकल वाहन और टेलीमेडिसिन सेवाओं को प्रभावी बनाने की मांग भी याचिका में की गई। इसके अलावा आयुष्मान भारत, अटल आयुष्मान उत्तराखण्ड, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जैसी योजनाओं को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग की गई। यानी याचिका का दायरा केवल यह पूछने तक सीमित नहीं था कि अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं हैं। इसमें सवाल उठाया गया कि पहाड़ के आखिरी व्यक्ति तक सरकारी स्वास्थ्य सेवा किस तरह पहुंचेगी।
2018 में भी अदालत के सामने था यही संकट
दिलचस्प और चिंताजनक बात यह है कि भवाली और नैनीताल की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर हाईकोर्ट के सामने यह समस्या पहली बार नहीं आई थी। वर्ष 2018 में भी एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान नैनीताल जिले के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, स्टाफ, जगह और चिकित्सा उपकरणों की कमी का मुद्दा उठा था।
उस समय अदालत ने भवाली के टीबी सेनेटोरियम परिसर में मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल शुरू करने, नए भवन तैयार करने और भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों के अनुरूप सुविधाएं विकसित करने के निर्देश दिए थे। बी.डी. पाण्डे जिला अस्पताल में कार्डियक केयर यूनिट और जेरियाट्रिक वार्ड जैसी सुविधाओं के साथ कार्डियोलाॅजिस्ट और स्त्री रोग विशेषज्ञ उपलब्ध कराने से जुड़े निर्देश भी सामने आए थे।
आठ साल बाद तस्वीर यह है कि भवाली में उसी तरह के एक बड़े मल्टी स्पेशलिटी-कम-सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की जरूरत फिर हाईकोर्ट के सामने है। यह अपने आप में सरकार के लिए बड़ा सवाल है, अगर 2018 में समाधान की दिशा दिखाई गई थी तो 2025-26 में समस्या फिर अदालत के सामने क्यों खड़ी है?
250 करोड़ का प्रस्ताव, 200 बेड का अस्पताल
नवम्बर-दिसम्बर 2025 की सुनवाई में मामले ने भवाली को केंद्र में ला दिया। अदालत के सामने यह बात आई कि भवाली टीबी सेनेटोरियम परिसर को अपग्रेड कर मल्टी स्पेशलिटी और सुपर स्पेशलिटी अस्पताल विकसित किया जा सकता है।
8 दिसम्बर 2025 की सुनवाई में चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग की महानिदेशक की ओर से अदालत को बताया गया कि प्रस्तावित अस्पताल के लिए लगभग 250 करोड़ रुपए का प्रारम्भिक अनुमान तैयार किया गया है। इसमें करीब 160 करोड़ रुपए अस्पताल की इमारतों और लगभग 90 करोड़ रुपए आवासीय भवनों के लिए प्रस्तावित किए गए थे।
एक नौ सदस्यीय टीम ने स्थल का निरीक्षण किया था और इसके बाद प्रस्ताव तैयार किया गया। निर्माण की कार्यदायी संस्था के रूप में ब्रिज एंड रूफ कम्पनी इंडिया लिमिटेड को नामित किए जाने की जानकारी भी अदालत को दी गई। प्रस्तावित अस्पताल की क्षमता 200 बेड बताई गई लेकिन यहीं एक दूसरा आंकड़ा सामने आया जिसने पूरी बहस का रुख बदल दिया।
200 बेड स्वीकृत, चल रहे सिर्फ 121
नैनीताल के बी.डी. पांडे जिला अस्पताल के लिए 200 बेड स्वीकृत हैं लेकिन 8 दिसम्बर 2025 को हाईकोर्ट के सामने जो स्थिति रखी गई, उसके अनुसार इनमें से केवल 121 बेड ही संचालित थे। यानी कागज पर 200 बेड और वास्तविक संचालन में 121 बेड।
अदालत ने इसी कारण अस्पताल की वास्तविक बेड क्षमता, IPHS मानकों के अनुरूप उसकी स्थिति, औसत बेड ऑक्यूपेंसी और चिकित्सा तथा इंजीनियरिंग उपकरणों की उपलब्धता का विस्तृत विवरण मांगा।
यह सवाल केवल बी.डी. पाण्डे अस्पताल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अगर एक जिला अस्पताल की स्वीकृत क्षमता और वास्तविक संचालन क्षमता में इतना अंतर है तो राज्य के दूसरे जिला अस्पतालों में क्या स्थिति है? यही वह सवाल है जिसका जवाब उत्तराखण्ड की स्वास्थ्य व्यवस्था का वास्तविक मूल्यांकन कर सकता है। नैनीताल के रैमसे अस्पताल की स्थिति भी अदालत के सामने आई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वहां केवल 10 बेड संचालित बताए गए।
ऐसे में पहाड़ से आने वाले गम्भीर मरीज के सामने विकल्प क्या बचता है? उसे रेफर किया जाता है। रेफरल ही उत्तराखण्ड की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे गम्भीर कमजोर कड़ी बनता जा रहा है।
हल्द्वानी, पूरे कुमाऊं का रेफरल सेंटर, फिर डॉक्टर क्यों हटाए?
2026 में जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह समस्या और गम्भीर रूप में सामने आई। अदालत को बताया गया कि सरकारी मेडिकल काॅलेज हल्द्वानी पूरे कुमाऊं क्षेत्र का प्रमुख रेफरल अस्पताल है। यहां केवल कुमाऊं के जिलों से ही गम्भीर मरीज नहीं आते बल्कि कुमाऊं से बाहर के क्षेत्रों और यहां तक कि पौड़ी-गढ़वाल तथा चमोली के हिस्सों से भी मरीज रेफर होकर पहुंचते हैं। इसी संस्थान में फैकल्टी की भारी कमी के बीच बड़ी संख्या में तबादलों का मामला अदालत के सामने आया। सुनवाई में बताया गया कि जून 2026 के अंतिम सप्ताह तक सरकारी मेडिकल काॅलेज हल्द्वानी में 45 प्रतिशत से अधिक फैकल्टी पद रिक्त थे। इसके बावजूद 16 फैकल्टी सदस्यों को दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिया गया।
सवाल सीधा था कि जिस संस्थान पर पूरे कुमाऊं और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों के गम्भीर मरीजों का दबाव है, वहां पहले से ही लगभग आधे फैकल्टी पद खाली हैं तो उपलब्ध विशेषज्ञों को भी दूसरी जगह भेजने का निर्णय किस आधार पर लिया गया?
नैनीताल से छह विशेषज्ञ गए, विकल्प नहीं आया
इसी सुनवाई में बी.डी. पांडे सरकारी अस्पताल नैनीताल की स्थिति भी सामने आई। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि पिछले सप्ताह छह विशेषज्ञ डाॅक्टरों का नैनीताल से तबादला कर दिया गया लेकिन उनके स्थान पर तत्काल कोई विकल्प उपलब्ध नहीं कराया गया। पहाड़ में डाॅक्टरों की कमी कोई नई समस्या नहीं है। ऐसे में उपलब्ध विशेषज्ञों का तबादला और उनकी जगह तत्काल नियुक्ति न होना सीधे मरीजों की चिकित्सा सुविधा को प्रभावित कर सकता है।
विशेष रूप से गम्भीर मरीजों के मामले में यह केवल प्रशासनिक
तबादला नहीं रह जाता। डाॅक्टर की अनुपलब्धता का अर्थ कई बार दूसरे शहर में रेफर किया जाना होता है और पहाड़ी इलाके में रेफरल का मतलब कई घंटे का अतिरिक्त सफर हो सकता है।
3 जुलाई को सरकार ने कहा, मामला फिर देखेंगे
इसी मुद्दे पर 3 जुलाई 2026 को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। अदालत के आदेश में दर्ज है कि पिछली कार्यवाही में हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज और बी.डी. पांडे अस्पताल नैनीताल से फैकल्टी तथा डॉक्टरों के सामूहिक तबादलों से पैदा हुई समस्याओं को अदालत ने चिन्हित किया था।
सरकार की ओर से कहा गया कि राज्य सरकार इस मामले को दोबारा देखने के लिए तैयार है और आवश्यक निर्णय एक सप्ताह के भीतर लिया जाएगा। इसी सुनवाई में भवाली के प्रस्तावित मल्टीस्पेशलिटी-कम-सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का मामला भी अदालत के सामने था।
अदालत को बताया गया कि सरकार ने निर्माण एजेंसी ब्रिज एंड रूफ कम्पनी इंडिया लिमिटेड से मास्टर प्लान और डीपीआर तैयार करने को कहा था। डीपीआर 15 फरवरी 2026 को जमा की गई। इसके बाद
महानिदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य ने 24 फरवरी 2026 को सम्बंधित एजेंसी से प्रस्तावित निर्माण से जुड़ी आवश्यक जानकारी और रिकाॅर्ड उपलब्ध कराने को कहा। इसके बाद की वास्तविक प्रगति के बारे में 3 जुलाई की सुनवाई में सरकार की ओर से स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा सकी। अदालत ने चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव से भवाली अस्पताल की प्रगति पर रिपोर्ट मांगी।
5 अगस्त को अदालत ने फिर मांगा हिसाब
पांच अगस्त 2026 का आदेश इस मामले को और महत्वपूर्ण बना देता है। अदालत ने दर्ज किया कि 3 जुलाई की पिछली कार्यवाही में हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज और बी.डी. पांडे अस्पताल नैनीताल से हुए सामूहिक तबादलों से उत्पन्न समस्याओं को उठाया गया था। उम्मीद थी कि चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव इस बीच समस्या का समाधान करेंगे। अगली सुनवाई तक सरकार की ओर से न तो अपेक्षित हलफनामा दाखिल हो सका और न ही अदालत को यह स्पष्ट बताया जा सका कि समस्या के समाधान के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए। इसके बाद अदालत ने मामले को गम्भीरता से लेते हुए सचिव, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया। सचिव को सामूहिक तबादलों से पैदा हुई समस्याओं के समाधान के लिए उठाए गए कदमों और भवाली में प्रस्तावित मल्टी स्पेशलिटी-कम-सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की वर्तमान प्रगति के बारे में अदालत को बताना था।
राज्य के अधिवक्ता को आदेश की जानकारी सचिव तक 48 घंटे के भीतर पहुंचाने का निर्देश भी दिया गया। यानी जिस स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियों को लेकर 2025 में जनहित याचिका दायर हुई थी, उसका जवाब 2026 में भी सरकार से अदालत मांग रही है।
सवाल सिर्फ नया अस्पताल बनाने का नहीं
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या उत्तराखण्ड स्वास्थ्य व्यवस्था का समाधान केवल नए अस्पताल बनाने में खोज सकता है? भवाली में 250 करोड़ रुपए की लागत से 200 बेड के मल्टी स्पेशलिटी -कम-सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की योजना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है लेकिन उसी समय बी.डी. पाण्डे जैसे मौजूदा जिला अस्पताल में 200 स्वीकृत बेड में से 121 का ही संचालन होना और हल्द्वानी मेडिकल काॅलेज में भारी फैकल्टी रिक्तियों के बावजूद तबादले होना बताता है कि समस्या नई इमारतों से कहीं बड़ी है।
अस्पताल के लिए भवन चाहिए लेकिन भवन के भीतर डॉक्टर भी चाहिए। डॉक्टर चाहिए तो नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ भी चाहिए। उपकरण चाहिए तो उन्हें चलाने वाले तकनीकी कर्मचारी चाहिए। मशीन चाहिए तो उसकी नियमित मेंटेनेंस भी चाहिए। दवा चाहिए तो उसकी निरंतर आपूर्ति चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण, इन सबको पहाड़ के दूरदराज इलाकों तक पहुंचाने की व्यवस्था चाहिए।
याचिका में मोबाइल हेल्थ यूनिट और टेलीमेडिसिन की मांग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हर गांव में सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बनाना सम्भव नहीं है लेकिन हर मरीज को विशेषज्ञ सलाह और जरूरी प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है।
अब पूरे राज्य का स्वास्थ्य ऑडिट जरूरी
हाईकोर्ट में सामने आए आंकड़े यह सवाल उठाते हैं कि उत्तराखण्ड सरकार को अब पूरे राज्य की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का वास्तविक आॅडिट सार्वजनिक करना चाहिए। हर जिला अस्पताल में कितने बेड
स्वीकृत हैं और कितने चल रहे हैं? कितने डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं और कितने खाली हैं? कितने विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हैं? कितने नर्सिंग और पैरामेडिकल पद रिक्त हैं? कितने ऑपरेशन थिएटर वास्तव में संचालित हैं? कितने आईसीयू और वेंटिलेटर काम कर रहे हैं? कितने एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन उपकरण चालू हैं? पिछले वर्षों में कितने मरीजों को दूसरे अस्पतालों में रेफर किया गया?
इन सवालों के आंकड़े सामने आए बिना केवल अस्पतालों की संख्या बताना उत्तराखण्ड की स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर नहीं दिखा सकता क्योंकि इस मामले की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि एक तरफ 250 करोड़ रुपए के नए अस्पताल की योजना है और दूसरी ओर मौजूदा 200 बेड वाले अस्पताल में केवल 121 बेड संचालित हैं। एक तरफ पहाड़ के लिए विशेषज्ञ स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत है और दूसरी ओर पूरे कुमाऊं के रेफरल सेंटर हल्द्वानी मेडिकल काॅलेज में 45 प्रतिशत से अधिक फैकल्टी पद खाली बताए जा रहे हैं।
2018 में भवाली में मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल की जरूरत अदालत के सामने थी। 2025 में फिर उसी क्षेत्र में मल्टी स्पेशलिटी और सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की योजना अदालत के सामने आई। 2026 में अदालत को उसी स्वास्थ्य ढांचे में डाॅक्टरों और फैकल्टी के तबादलों से पैदा हुई नई समस्या पर सरकार से जवाब मांगना पड़ा। इसलिए अब सवाल केवल यह नहीं है कि भवाली का अस्पताल कब बनेगा।
मशीनें और विशेषज्ञ साथ हों, तभी सुधरेगी स्वास्थ्य व्यवस्था
उत्तराखण्ड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर ध्यान दें। पूर्व में 2018 में हाईकोर्ट ने जो व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए थे, उसके बाद वहां कुछ उपकरणों की खरीद हुई थी और व्यवस्थाएं बेहतर की गई थी लेकिन उसके बाद लगातार मेंटेनेंस न होने के कारण और उचित संख्या में स्पेशलिस्ट की तैनाती नहीं हो पाने के कारण वहां पर उन ऑपरेटर्स का, उन मशीनों का लाभ नहीं उठाया जा सका तो वर्तमान में जब उत्तराखण्ड हाईकोर्ट पूरे उत्तराखण्ड के सरकारी अस्पतालों की खासकर जिला अस्पतालों की दुर्दशा के सम्बंध में जो मामला दायर हुआ है, उसकी सुनवाई कर रही थी तो उसी दौरान नैनीताल में बी.डी. पाण्डे अस्पताल से छह विशेषज्ञ चिकित्सकों का ट्रांसफर हो गया, जिस कारण वहां पर पब्लिक को भारी परेशानी हो रही थी, जिसके बाद कोर्ट ने दोबारा संज्ञान लिया और स्वास्थ्य सचिव को कोर्ट ने बुलाया था। फिर उनसे जांच करवाई तो जांच में कमियां सामने आईं, जिसके बाद अब उनको सुधारने के लिए विभाग ने कोर्ट को आश्वासन दिया है।
सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में सबसे बड़ी कमी तो ये है कि जो भारतीय पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड हैं, आईपीएचएस के जो मानक हैं भारत सरकार द्वारा जारी, उन मानकों के अनुसार कभी भी यहां पूरी व्यवस्था स्थापित नहीं की गई है। अस्पतालों के लिए किस स्तर की सुविधाएं होनी चाहिए, पहले उनका कोई उल्लेख नहीं है। दूसरी कमी है कि अस्पताल तो खोल दिए लेकिन वहां पर चिकित्सकों के लिए पर्याप्त आवास, उचित सुविधा के आवास और दूसरा कि चिकित्सकों को उन स्थानों पर लाने-जाने के लिए, मतलब प्राइवेट सेक्टर में वो न आकर्षित हों तो इसके लिए पर्याप्त मात्रा में आकर्षक पैकेज देने की आवश्यकता थी। तीसरी बात ये है कि जो स्वास्थ्य व्यवस्था है पूरे पहाड़ में तो उसको बिल्कुल अनसाइंटिफिक तरीके से चलाया जाता है। उसमें ये है कि कई जगह पर जिला अस्पताल भी है, वहीं मेडिकल काॅलेज भी है और कई जगह पर दूर-दूर तक प्राइमरी हेल्थ सेंटर नहीं है। मतलब कारण ये है कि कुछ जगह तो है स्वास्थ्य व्यवस्था और कई जगह दूर-दूर तक उचित एक्सपर्टीज के डाॅक्टर नहीं हैं और कुछ शहर ऐसे हैं जहां डिस्ट्रिक्ट हाॅस्पिटल है, सब हाॅस्पिटल है, वहां पर मेडिकल काॅलेज है। रुद्रपुर ऐसा ही है, हल्द्वानी ऐसा ही है, पिथौरागढ़ ऐसा ही है, अल्मोड़ा ऐसा ही है तो उसकी वजह से भी पर्याप्त जो है वो उसका डिस्ट्रिब्यूशन प्राॅपर नहीं है।
भारतीय पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड की स्टडी की जानी चाहिए और दूसरा कि मेडिकल काॅलेजेस से जो भी रियायती दरों से पढ़ रहे हैं, मात्र बाॅन्ड के आधार पर ये कह देना कि अगर आप सेवा नहीं करेंगे सरकारी संस्थान में तो बाॅन्ड का पैसा आपको देना पड़ेगा, पर्याप्त नहीं है। रीजन ये है कि डाॅक्टर को एक आकर्षक पैकेज मिलता है प्राइवेट सेक्टर में तो वो आराम से उस बाॅन्ड का पैसा चुकाकर चला जाता है जबकि रियायती दरों में उसको मेडिकल काॅलेज में हम पढ़ा रहे हैं तो इस चीज का ध्यान रखना पड़ेगा। तीसरी एक खास बात ये है कि जो भी स्वास्थ्य मंत्री आता है जो भी सरकार आती है वो पाॅलिसीज में चेंज करते रहते हैं आमतौर पर। एक कंटीन्यूअस उनको स्ट्रेंथन करने की अस्पतालों की व्यवस्था यहां आज तक नहीं चल पाई है। हर मंत्री, हर सचिव अपने हिसाब से स्वास्थ्य सेवाओं की जो कंटीन्यूटी है, उसको चेंज करता रहता है तो वो कभी भी रिदम में नहीं आ पाती। कई जगह एक्सपर्ट्स हैं तो मशीन नहीं है उनकी एक्सपर्टीज के कई जगह मशीनें हैं तो उनके एक्सपर्टीज के वहां पर डॉक्टर नहीं हैं, सर्जन्स नहीं हैं, ये दिक्कत है।
दुष्यंत मैनाली, अधिवक्ता, हाई कोर्ट, नैनीताल