क्या एआई छीन लेगा सितारों का स्टारडम?
जिस अभिनेता ने दुनिया को अलविदा कह दिया है, उसका किरदार आज भी पर्दे पर लौट सकता है। सतीश कौशिक की ‘धमाल 4’ में डिजिटल मौजूदगी ने मनोरंजन की दुनिया के सामने ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका असर केवल तकनीक तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि कलाकारों की पहचान, उनके अधिकार और आने वाले समय के स्टारडम पर भी पड़ेगा। अगर किसी अभिनेता के चेहरे, आवाज और अभिनय की डिजिटल प्रतिकृति बनाई जा सकती है तो भविष्य में क्या किसी अभिनेता की जरूरत केवल उसके शरीर तक सीमित रह जाएगी?
सतीश कौशिक हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में रहे जिन्होंने हास्य, चरित्र अभिनय और निर्देशन, तीनों क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई। ‘मिस्टर इंडिया’ का कैलेंडर हो या ‘राम लखन’, ‘साजन चले ससुराल’ और ‘धमाल’ जैसी फिल्में, उनके अभिनय ने उन्हें दर्शकों के बीच एक ऐसी जगह दी जिसे किसी एक भूमिका या एक फिल्म तक सीमित नहीं किया जा सकता। 2023 में उनके निधन के बाद उनके प्रशंसकों के लिए उनकी कमी केवल निजी जीवन में ही महसूस नहीं हुई बल्कि पर्दे पर भी उनकी अनुपस्थिति लगातार महसूस होती रही। ऐसे में ‘धमाल 4’ में बंटा भाई के किरदार की वापसी भावनात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण बन जाती है। तकनीक के सहारे दिवंगत अभिनेता की डिजिटल मौजूदगी को फिल्म में शामिल किया गया है। यह सामान्य कैमरा शूट जैसा नहीं है क्योंकि जिस कलाकार को दर्शक पर्दे पर देख रहे हैं, वह उस दृश्य की शूटिंग के लिए सेट पर मौजूद नहीं था। यही अंतर इस पूरे मामले को महज फिल्मी खबर से कहीं बड़ा बना देता है।
आज यह प्रयोग दर्शकों को सतीश कौशिक की याद दिलाता है और एक कलाकार को श्रद्धांजलि की तरह महसूस होता है लेकिन इसके साथ ही भविष्य का एक कठिन सवाल भी सामने खड़ा हो जाता है। क्या ऐसी तकनीक आने वाले समय में किसी अभिनेता की अनुपस्थिति को स्थायी रूप से भर सकती है? अगर किसी कलाकार के जाने के बाद भी उसका चेहरा, आवाज और किरदार नई फिल्मों में दिखाई दे सकता है तो क्या अभिनेता की मृत्यु अब उसके फिल्मी करियर का अंतिम बिंदु भी होगी?
चेहरा, आवाज और अभिनय भी हो सकते हैं डिजिटल
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने फिल्म निर्माण के कई हिस्सों को तेजी से बदलना शुरू कर दिया है। किसी कलाकार के चेहरे का डिजिटल मॉडल बनाया जा सकता है, उसकी आवाज को डिजिटल तकनीक के माध्यम से दोहराया जा सकता है और उसके चेहरे के भाव तथा शारीरिक गतिविधियों को कम्प्यूटर जनरेटेड इमेजरी के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है। किसी कलाकार को कम उम्र का दिखाना, अलग भाषा में उसकी आवाज तैयार करना या ऐसे दृश्य बनाना जिनके लिए पहले लम्बी शूटिंग और भारी तकनीकी संसाधनों की आवश्यकता होती थी, अब तेजी से सम्भव होता जा रहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आज की फिल्मों में इंसानी अभिनेता समाप्त हो गए हैं या एआई ने पूरी तरह उनकी जगह ले ली है। वास्तविकता यह है कि तकनीक अभी अधिकतर एक सहयोगी उपकरण के रूप में इस्तेमाल हो रही है लेकिन जिस तेजी से यह तकनीक विकसित हो रही है, उसने भविष्य के सिनेमा को लेकर गम्भीर बहस जरूर शुरू कर दी है।
किसी अभिनेता के चेहरे और आवाज की डिजिटल प्रतिकृति तैयार हो जाने के बाद सवाल केवल तकनीक का नहीं रह जाता। सवाल यह बन जाता है कि उस प्रतिकृति के इस्तेमाल का अधिकार किसके पास होगा। क्या अभिनेता ने अपने जीवनकाल में इसके लिए अनुमति दी थी? अगर अनुमति नहीं दी थी तो उसके परिवार की भूमिका क्या होगी? क्या स्टूडियो को उसके पुराने अनुबंध के आधार पर अधिकार मिलेंगे? क्या किसी कलाकार के चेहरे और आवाज को उसकी मृत्यु के बाद भी उसकी इच्छा के विरुद्ध इस्तेमाल किया जा सकता है? सतीश कौशिक की डिजिटल वापसी इन सवालों को सामने लाने वाला एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
सतीश कौशिक का मामला भविष्य की बड़ी बहस का संकेत
मान लीजिए किसी अभिनेता ने अपने जीवन में सौ फिल्मों में काम किया। उसके चेहरे की हजारों तस्वीरें हैं, उसकी आवाज के हजारों घंटे की रिकाॅर्डिंग है और उसके अभिनय के असंख्य दृश्य उपलब्ध हैं। अब वह अभिनेता इस दुनिया में नहीं है। क्या उसकी डिजिटल छवि का इस्तेमाल करके नई फिल्म बनाई जा सकती है? तकनीक का जवाब तेजी से ‘हां’ की दिशा में बढ़ रहा है लेकिन कानून और नैतिकता का जवाब इतना सरल नहीं है। यही वजह है कि सतीश कौशिक की डिजिटल वापसी को केवल एक फिल्म में पुराने किरदार को वापस लाने की घटना मानना पर्याप्त नहीं होगा। आज किसी दिवंगत कलाकार को पर्दे पर सम्मान के साथ वापस लाने की कोशिश दर्शकों को भावुक करती है लेकिन कल यही तकनीक एक बड़े व्यावसायिक माॅडल का हिस्सा बन सकती है। किसी अभिनेता की डिजिटल मौजूदगी को फिल्मों, विज्ञापनों, गेम्स या दूसरे मनोरंजन माध्यमों में इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे में यह सवाल और गम्भीर होगा कि अभिनेता की डिजिटल पहचान पर अधिकार किसका है और उस पहचान से होने वाली कमाई का हकदार कौन होगा।
हालीवुड पहले ही चिंता जता चुका है
एआई को लेकर यह चिंता केवल भारत तक सीमित नहीं है। हाॅलीवुड में कलाकारों और निर्माताओं के बीच विवादों में डिजिटल सपामदमेे यानी कलाकार के चेहरे और पहचान की डिजिटल प्रतिकृति का सवाल प्रमुख मुद्दा बन चुका है। 2023 की हाॅलीवुड हड़ताल के दौरान कलाकारों की प्रमुख चिंताओं में एआई का इस्तेमाल भी शामिल था। कलाकारों की चिंता यह थी कि कहीं ऐसा न हो कि उनकी डिजिटल प्रतिकृति तैयार करके भविष्य में उनकी अनुमति के बिना उसका इस्तेमाल किया जाए। यदि कोई अभिनेता एक बार अपना चेहरा और शरीर डिजिटल स्कैन के रूप में उपलब्ध करा देता है तो भविष्य में उसका उपयोग किस सीमा तक किया जा सकता है, यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
यह केवल रोजगार का सवाल नहीं है। यह किसी व्यक्ति की पहचान, उसकी रचनात्मक सम्पत्ति और उसके भविष्य के नियंत्रण का सवाल भी है। कल्पना कीजिए कि कोई अभिनेता किसी भूमिका के लिए अपना डिजिटल मॉडल उपलब्ध कराता है और वर्षों बाद वही मॉडल किसी दूसरी फिल्म में दिखाई देता है जबकि अभिनेता खुद उस फिल्म का हिस्सा नहीं है। दर्शक पर्दे पर उसे पहचानेंगे लेकिन वास्तव में वह वहां मौजूद नहीं होगा। यही वह स्थिति है जिसमें बॉलीवुड के कलाकारों को एआई के अनियंत्रित इस्तेमाल को लेकर सावधान किया है।
निर्माताओं के लिए एआई क्यों आकर्षक है
फिल्म उद्योग हमेशा ऐसी तकनीक का स्वागत करता रहा है जो काम को तेज और कम खर्चीला बना सके। एआई भी इसी कारण निर्माताओं के लिए आकर्षक है। किसी कलाकार को अलग-अलग उम्र में दिखाना हो, किसी दृश्य को डिजिटल रूप से बदलना हो, वीएफएक्स का काम तेजी से पूरा करना हो या कई भाषाओं में आवाज तैयार करनी हो, एआई इन प्रक्रियाओं को आसान बना सकता है। भविष्य में किसी बड़े कलाकार के व्यस्त कार्यक्रम की समस्या भी कुछ हद तक कम हो सकती है। अभिनेता की डिजिटल उपस्थिति तैयार होने के बाद कुछ ऐसे दृश्यों को बनाया जा सकता है जिनके लिए अभिनेता को शारीरिक रूप से सेट पर मौजूद होने की आवश्यकता न हो लेकिन जहां एक तरफ लागत कम होने और काम तेजी से पूरा होने की सम्भावना है, वहीं दूसरी ओर फिल्म उद्योग में काम करने वाले हजारों लोगों के सामने सवाल खड़ा होगा। जूनियर आर्टिस्ट, डबिंग कलाकार, बैकग्राउंड कलाकार और पोस्ट-प्रोडक्शन से जुड़े कई काम भविष्य में बदल सकते हैं। तकनीक हमेशा रोजगार को खत्म नहीं करती लेकिन वह रोजगार की प्रकृति जरूर बदल देती है। सिनेमा के मामले में भी यही होने की सम्भावना है कि कुछ पुराने काम कम होंगे और नए तरह के तकनीकी तथा रचनात्मक काम सामने आएंगे।
क्या एआई अमिताभ, शाहरुख या सलमान बन सकता है?
यहां सबसे महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। एआई किसी अभिनेता के चेहरे की नकल कर सकता है, उसकी आवाज जैसी आवाज तैयार कर सकता है और उसके लोकप्रिय अंदाज को दोहरा सकता है लेकिन इससे वह अभिनेता नहीं बन जाता। अमिताभ बच्चन केवल उनका चेहरा नहीं हैं। शाहरुख खान केवल उनका रोमांटिक अंदाज नहीं हैं और सलमान खान केवल उनकी स्क्रीन पर्सनैलिटी नहीं हैं। इन सितारों के पीछे दशकों की यात्रा है, उनके संघर्ष हैं, असफलताएं हैं, सफलताएं हैं और दर्शकों के साथ बना गहरा भावनात्मक रिश्ता है। यही स्टारडम की असली ताकत है।
एआई किसी अभिनेता के चेहरे पर मुस्कान पैदा कर सकता है, आवाज में भाव पैदा कर सकता है और अभिनय के अंदाज की नकल कर सकता है लेकिन उस अभिनेता ने जिस जिंदगी को जिया है, जिस संघर्ष से गुजरा है और जिन अनुभवों को अपने अभिनय में उतारा है, उसे मशीन खुद महसूस नहीं करती। यही वह बिंदु है जहां इंसान अभी भी मशीन से अलग है। तकनीक अभिनय की बाहरी अभिव्यक्ति को दोहरा सकती है लेकिन किसी कलाकार के जीवन अनुभव से पैदा हुई संवेदना को हूबहू पैदा कर पाना अभी भी एक बड़ा सवाल है।
नई पीढ़ी का दर्शक शायद अलग फैसला करे
फिर भी यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि दर्शक हमेशा असली अभिनेता को ही चुनेगा। नई पीढ़ी डिजिटल दुनिया में बड़ी हो रही है। उसके लिए वर्चुअल किरदार और डिजिटल पर्सनालिटीज कोई असाधारण चीज नहीं रह गई हैं। अगर आने वाले वर्षों में कोई डिजिटल अभिनेता शानदार किरदार निभाता है, लोकप्रिय हो जाता है और दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ लेता है तो सम्भव है कि दर्शक धीरे-धीरे यह पूछना बंद कर दे कि पर्दे पर दिखाई देने वाला कलाकार इंसान है या डिजिटल।
तब स्टारडम की परिभाषा ही बदल सकती है। अभी तक स्टारडम का सम्बंध अभिनेता के चेहरे, व्यक्तित्व और वास्तविक जीवन से रहा है लेकिन भविष्य में किसी काल्पनिक या डिजिटल किरदार के इर्द-गिर्द भी वही लोकप्रियता पैदा हो सकती है। यदि दर्शक किसी डिजिटल चेहरे का इंतजार करने लगे, उसकी फिल्म देखने के लिए सिनेमाघर जाने लगे और उसके किरदार से भावनात्मक रूप से जुड़ जाए तो उसे स्टार कहने में शायद किसी को आपत्ति नहीं होगी।
क्या भविष्य का सुपरस्टार इंसान नहीं होगा?
कल्पना कीजिए कि वर्ष 2035 में एक फिल्म रिलीज होती है। उसका मुख्य किरदार एक ऐसा डिजिटल अभिनेता है जो कभी बूढ़ा नहीं होता, बीमार नहीं पड़ता, अलग-अलग भाषाओं में बोल सकता है और निर्माता की जरूरत के अनुसार उसके चेहरे और व्यक्तित्व में बदलाव किया जा सकता है। फिल्म सुपरहिट हो जाती है और उसका किरदार करोड़ों लोगों के बीच लोकप्रिय हो जाता है। उसकी अगली फिल्म का इंतजार होने लगता है। तब सवाल उठेगा कि क्या वह सुपरस्टार है?
अगर दर्शक उसे स्टार मानता है तो शायद जवाब हां होगा। इसका मतलब यह होगा कि भविष्य में स्टारडम शरीर से अलग होकर एक डिजिटल पहचान भी बन सकता है लेकिन यहीं एक दूसरी सम्भावना भी है। हो सकता है एआई के दौर में वास्तविक सितारों की कीमत खत्म होने के बजाय और बढ़ जाए। जब डिजिटल चेहरे आसानी से बनाए जा सकेंगे, तब वास्तविक अभिनेता की सबसे बड़ी ताकत उसकी वास्तविकता होगी।
दर्शक शायद यह कहे कि उसे एआई से बना चेहरा नहीं चाहिए, उसे असली अभिनेता चाहिए। जिस तरह डिजिटल मनोरंजन के दौर में लाइव प्रदर्शन का महत्व खत्म नहीं हुआ, उसी तरह एआई के दौर में असली अभिनय की कीमत भी बढ़ सकती है। इसलिए सम्भव है कि एआई फिल्मी सितारों को खत्म न करे बल्कि यह तय करे कि असली सितारा होने का मतलब क्या है।
सतीश कौशिक की डिजिटल वापसी इसी बदलते सिनेमा की एक झलक है। आज यह किसी प्रिय कलाकार को श्रद्धांजलि देने का माध्यम है लेकिन कल यही तकनीक किसी अभिनेता के डिजिटल अधिकारों का बड़ा कारोबार बन सकती है। तब फिल्म उद्योग के सामने केवल यह सवाल नहीं होगा कि एआई कितना अच्छा अभिनय कर सकता है। सवाल यह होगा कि अभिनेता की पहचान का मालिक कौन है, उसके चेहरे का इस्तेमाल कौन कर सकता है, उसकी आवाज पर अधिकार किसका होगा और उसकी डिजिटल मौजूदगी से होने वाली कमाई किसके हिस्से में जाएगी।
सिनेमा ने हमेशा तकनीक को अपनाया है। मूक फिल्मों में आवाज आई, ब्लैक एंड व्हाइट से रंग आया, फिल्म कैमरे से डिजिटल कैमरा आया और फिर ओटीटी ने देखने का तरीका बदल दिया लेकिन एआई का बदलाव इन सब से अलग है, क्योंकि पहली बार तकनीक केवल फिल्म बनाने का तरीका नहीं बदल रही बल्कि फिल्म में मौजूद इंसान की भूमिका को ही चुनौती दे रही है।
शायद इसलिए सतीश कौशिक की वापसी को केवल एक फिल्मी तकनीक के तौर पर देखने के बजाय सिनेमा के बदलते भविष्य की पहली झलक के रूप में देखना चाहिए। अभिनेता की मृत्यु के बाद उसका किरदार पर्दे पर वापस आ सकता है, उसका चेहरा डिजिटल रूप में जीवित रह सकता है और उसकी आवाज को फिर सुनाया जा सकता है लेकिन किसी कलाकार को महान बनाने वाली चीज केवल उसका चेहरा या आवाज नहीं होती। उसके पीछे उसकी पूरी जिंदगी, उसका संघर्ष, उसकी संवेदना और दर्शकों के साथ बना रिश्ता होता है।
एआई चेहरे बना सकता है, आवाज बना सकता है और अभिनय की नकल कर सकता है लेकिन किसी कलाकार की जिंदगी जीकर उस जिंदगी को पर्दे पर उतारना अभी भी इंसान के हिस्से में है। शायद इसी वजह से भविष्य में असली सितारे खत्म नहीं होंगे, वे पहले से कहीं ज्यादा दुर्लभ और मूल्यवान हो जाएंगे।
