जेन जी आंदोलन के बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत की अमेरिका और कनाडा यात्रा ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बदलती भाषा पर बहस छेड़ दी है। न्यूयाॅर्क में मुसलमानों को भारत का अभिन्न हिस्सा बताते हुए समावेशी संदेश देने के बाद टोरंटो में भी उन्होंने विविधता और वैश्विक बंधुत्व की बात की। लेकिन संघ के इतिहास, तीन बार लगे प्रतिबंध और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी संगठनात्मक भूमिका को लेकर सवाल अब भी कायम हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या संघ की सोच बदल रही है या केवल उसकी भाषा?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की अमेरिका और कनाडा यात्रा ऐसे समय हुई है जब भारत में नई पीढ़ी की राजनीतिक बेचैनी और संघ-भाजपा के सामने बदलते सामाजिक समीकरणों को लेकर बहस तेज है। जुलाई 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए जेन जी यानी जेनरेशन जी के आंदोलन ने जिस तरह युवाओं के असंतोष को सामने रखा, उसके बाद अगस्त में भागवत ने स्वयं युवाओं की शिकायतों को वास्तविक बताते हुए आंदोलन को लोकतंत्र में संवाद का एक माध्यम बताया। इसके कुछ ही सप्ताह बाद अमेरिका पहुंचे भागवत ने न्यूयाॅर्क में मुसलमानों को भारत का अभिन्न हिस्सा बताते हुए कहा कि जो हिंदू यह चाहता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, वह हिंदू नहीं रह जाता। इसके बाद 31 अगस्त 2026 को कनाडा के टोरंटो में भी उन्होंने भारत की विविधता, सेवा और मानवता के प्रति योगदान को अपने संबोधन का प्रमुख हिस्सा बनाया। इन घटनाओं को एक साथ रखकर देखा जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संघ अपने सौवें वर्ष में बदलते भारत और बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप अपनी भाषा को नए सिरे से गढ़ रहा है?
जंतर-मंतर से उठी नई पीढ़ी की आवाज
जुलाई 2026 में दिल्ली का जंतर-मंतर युवाओं के बड़े आंदोलन का केंद्र बना। शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली, कथित अनियमितताओं और सरकार की जवाबदेही को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे व्यापक असंतोष का रूप लेता गया। बड़ी संख्या में युवाओं ने सड़कों पर उतरकर सरकार से जवाब मांगा और आंदोलन के दौरान पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव भी हुआ। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग आंदोलन की प्रमुख मांगों में शामिल रही और अंततः प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद छोड़ दिया। इस आंदोलन का महत्व इसलिए भी बढ़ा क्योंकि यह केवल पारम्परिक विपक्षी राजनीति तक सीमित नहीं दिखाई दिया। नई पीढ़ी के ऐसे युवाओं की भागीदारी भी चर्चा में रही जो सीधे सत्ता से सवाल पूछ रहे थे। इसने भाजपा के सामने यह सवाल खड़ा किया कि क्या नई पीढ़ी की प्राथमिकताएं धार्मिक और पहचान आधारित राजनीति से आगे बढ़कर शिक्षा, रोजगार, अवसर, पारदर्शिता और जवाबदेही की ओर तेजी से जा रही हैं।
6 अगस्त 2026 को मोहन भागवत ने जेन जी आंदोलन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि युवाओं की शिकायतों को समझना जरूरी है और कतंत्र में आंदोलन संवाद का एक माध्यम है। संघ प्रमुख की यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि आरएसएस और भाजपा के बीच गहरा वैचारिक और संगठनात्मक सम्बंध है। इसलिए युवाओं के असंतोष को गम्भीरता से लेने का यह संदेश केवल एक सामान्य सामाजिक टिप्पणी नहीं माना गया।
भागवत के अमेरिकी दौरे के मायने
मोहन भागवत 25 अगस्त 2026 को अमेरिका पहुंचे। उनकी यह यात्रा आरएसएस के शताब्दी वर्ष में चल रहे वैश्विक सम्पर्क अभियान का हिस्सा है। अमेरिका के बाद कनाडा और ब्रिटेन उनकी यात्रा में शामिल हैं।
अमेरिका में भागवत ने भारतीय-अमेरिकी उद्योग जगत के लोगों से मुलाकात की और तकनीक, निवेश, अंतरिक्ष, स्वच्छ ऊर्जा तथा युवाओं से जुड़े विषयों पर संवाद किया। वे ‘इस्काॅन’ के न्यूयाॅर्क मंदिर भी पहुंचे लेकिन इस यात्रा का सबसे चर्चित पड़ाव बना मैडिसन स्क्वायर गार्डन जहां उनका कार्यक्रम ऐसे समय आयोजित हुआ जब आरएसएस की विचारधारा को लेकर अमेरिका में राजनीतिक और सामाजिक विरोध पहले ही सामने आ चुका था।
मैडिसन स्क्वायर गार्डन में कार्यक्रम
29 अगस्त 2026 को मैडिसन स्क्वायर गार्डन में ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ का आयोजन हुआ। आयोजकों के अनुसार हजारों लोग इसमें शामिल हुए और बड़ी संख्या में हिंदू-अमेरिकी संगठन इससे जुड़े थे। कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति, संगीत, नृत्य और रक्षाबंधन से जुड़े आयोजन हुए। लेकिन कार्यक्रम के बाहर आरएसएस की विचारधारा के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन भी हुए। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि आरएसएस की हिंदुत्व विचारधारा भारत में धार्मिक बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देती है और अल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा पैदा करती है।
न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने भी भागवत के कार्यक्रम का विरोध किया। उन्होंने आरएसएस की विचारधारा को बहिष्करणवादी बताया और कहा कि भारत को लेकर उनके परिवार की समझ एक बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष समाज की रही है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि निजी कार्यक्रम को रद्द करने का शहर के पास कानूनी अधिकार है या नहीं, यह अलग सवाल है। इसके बावजूद कार्यक्रम हुआ और मोहन भागवत ने मंच से अपना संदेश दिया।
मुसलमानों के बिना भारत नहीं
न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का सबसे चर्चित बयान था कि जो हिंदू यह चाहता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, वह हिंदू नहीं रह जाता। उन्होंने भारत की विविधता को उसकी शक्ति बताया और विभिन्न धार्मिक समुदायों के साथ रहने की भारतीय परम्परा का उल्लेख किया। भागवत ने हिंदू विचार को मुसलमानों के बहिष्कार से अलग करते हुए भारत को एक ऐसी सभ्यता के रूप में प्रस्तुत किया जिसमें अलग-अलग समुदायों के लिए जगह है। हालांकि यह पहली बार नहीं था जब भागवत ने ऐसा बयान दिया। वह 2018 में भी इसी तरह की बात कह चुके हैं। खास बात यह है कि इस बार भारत में नई पीढ़ी के असंतोष, अमेरिका में आरएसएस के खिलाफ विरोध और संगठन के वैश्विक विस्तार के बीच यह संदेश अंतरराष्ट्रीय मंच से दिया गया।
अमेरिका का कार्यक्रम पूरा करने के बाद मोहन भागवत 30 अगस्त 2026 को कनाडा पहुंचे और 31 अगस्त 2026 को टोरंटो में कार्यक्रम को सम्बोधित किया। यह उनकी कनाडा की पहली यात्रा है। यहां भी भागवत का संदेश विविधता और मानवता के इर्द-गिर्द रहा। उन्होंने भारत की उस परम्परा का उल्लेख किया जिसमें अलग-अलग धार्मिक समुदायों को शरण मिलने की बात कही जाती है और मुसलमानों, ईसाइयों, यहूदियों तथा पारसियों का उल्लेख करते हुए भारत को विभिन्न समुदायों के सह-अस्तित्व वाली सभ्यता के रूप में प्रस्तुत किया। कनाडा में भी भागवत की यात्रा विवाद से अछूती नहीं रही। उनके दौरे से पहले कई कनाडाई संगठनों ने सरकार से उनकी यात्रा पर रोक लगाने की मांग की थी। इन संगठनों का आरोप है कि आरएसएस की विचारधारा धार्मिक बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णुता से जुड़ी है। दूसरी तरफ हिंदू और भारतीय-कनाडाई संगठनों के एक हिस्से ने भागवत के दौरे का समर्थन किया। यानी अमेरिका की तरह कनाडा में भी आरएसएस को लेकर तस्वीर एकतरफा नहीं है, समर्थन भी है और विरोध भी।
विदेशों में आरएसएस का विरोध नया नहीं
आरएसएस से वैचारिक रूप से जुड़े संगठन अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में दशकों से सक्रिय हैं। इनमें हिंदू स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस जैसे संगठन सांस्कृतिक, सामाजिक और सामुदायिक गतिविधियां चलाते हैं। समर्थकों के लिए ये संगठन भारतीय संस्कृति और हिंदू समुदाय को संगठित करने का माध्यम हैं जबकि आलोचक इन्हें हिंदुत्व की विचारधारा के अंतरराष्ट्रीय विस्तार के रूप में देखते हैं। कनाडा में आरएसएस से जुड़े नेटवर्क को लेकर मुस्लिम और सिख संगठनों ने कई बार सवाल उठाए हैं। अमेरिका में भी आरएसएस की विचारधारा को लेकर विरोध होता रहा है। इसलिए मोहन भागवत का मौजूदा विदेश दौरा किसी ऐसे संगठन की पहली वैश्विक उपस्थिति नहीं है जिसका अचानक विरोध शुरू हुआ हो। आरएसएस की वैश्विक पहुंच जितनी बढ़ी है, उसकी विचारधारा पर अंतरराष्ट्रीय बहस भी उतनी ही तेज हुई है।
क्या बदल रही है संघ की भाषा?
यहीं इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल खड़ा होता है। जुलाई में जेनरेशन जी आंदोलन ने नई पीढ़ी के असंतोष को सामने रखा। अगस्त में भागवत ने युवाओं की शिकायतों को वास्तविक बताया। 29 अगस्त को न्यूयॉर्क में उन्होंने मुसलमानों को भारत का अभिन्न हिस्सा बताया और 31 अगस्त को टोरंटो में विविधता तथा वैश्विक बंधुत्व की बात की। इन घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या आरएसएस बदलते भारत और बदलते वैश्विक माहौल को समझते हुए अपनी भाषा को पुनर्गठित कर रहा है।
क्या संघ को यह महसूस हो रहा है कि नई पीढ़ी को केवल पहचान की राजनीति के जरिए लम्बे समय तक सम्बोधित नहीं किया जा सकता? क्या शिक्षा, रोजगार, अवसर, जवाबदेही और भविष्य की चिंता नई पीढ़ी के लिए धार्मिक पहचान से ज्यादा महत्वपूर्ण होती जा रही है? क्या संघ अपने सौवें वर्ष में ऐसी छवि बनाना चाहता है जिसमें हिंदुत्व को बहिष्कार के बजाय समावेश और सांस्कृतिक पहचान के रूप में प्रस्तुत किया जाए?
इन सवालों का निश्चित उत्तर अभी देना जल्दबाजी होगी क्योंकि भागवत मुसलमानों को भारत का अभिन्न हिस्सा बताने वाली बात पहले भी कह चुके हैं लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इस समय जिस मंच पर और जिस अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक वातावरण में यह संदेश दिया जा रहा है, उसका महत्व अलग है।
कथनी और करनी की असली परीक्षा
मोहन भागवत का न्यूयाॅर्क और टोरंटो संदेश तभी वास्तविक बदलाव माना जाएगा जब उसकी झलक भारत में भी दिखाई दे। अगर मुसलमानों को भारत का अभिन्न हिस्सा माना जा रहा है तो यह भावना संघ और उससे जुड़े संगठनों के सामाजिक व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए। अगर विविधता भारत की ताकत है तो राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी उसी भाषा की निरंतरता दिखाई देनी चाहिए। अगर युवाओं की शिकायतें वास्तविक हैं तो सत्ता और संगठन दोनों को उनके सवालों के साथ गम्भीर संवाद करना होगा। यही वह जगह है जहां आरएसएस की कथनी और करनी की परीक्षा होगी। एक भाषण पुराने सवालों को समाप्त नहीं कर सकता। संघ का सौ वर्ष का इतिहास, उस पर लगे तीन प्रतिबंध, हिंदुत्व को लेकर विवाद और स्वतंत्रता आंदोलन में संगठनात्मक भूमिका से जुड़े प्रश्न अपनी जगह मौजूद हैं। इसलिए न्यूयाॅर्क और टोरंटो में दिया गया संदेश तभी ऐतिहासिक महत्व हासिल करेगा जब आने वाले समय में संघ के व्यवहार और सार्वजनिक राजनीति में भी उसका प्रभाव दिखाई दे।
मोहन भागवत की अमेरिका और कनाडा यात्रा अभी ब्रिटेन की ओर बढ़ रही है। वहां भी अगर विविधता, संवाद, सह-अस्तित्व और मानवता की यही भाषा प्रमुख रहती है तो आरएसएस की वैश्विक प्रस्तुति में बदलाव की बहस और तेज होगी लेकिन अंतिम परीक्षा भारत में ही होगी, जहां संघ की वैचारिक और सामाजिक भूमिका सबसे ज्यादा प्रभावशाली है।
फिलहाल सवाल यही है कि जंतर-मंतर पर नई पीढ़ी के असंतोष से लेकर न्यूयाॅर्क और टोरंटो के मंचों तक जो नई भाषा दिखाई दे रही है, वह संघ की सोच में वास्तविक बदलाव का संकेत है या बदलते राजनीतिक माहौल के अनुरूप बनाई गई रणनीतिक भाषा क्योंकि किसी संगठन की पहचान केवल उसके मंच से बोले गए शब्दों से नहीं होती बल्कि उन शब्दों के बाद किए गए काम से होती है। क्या बदल रहा है संघ, उसकी सोच, उसकी राजनीति या सिर्फ उसकी भाषा?