पच्चीस साल का साथ, फिर भी अधूरा विकास

पच्चीस साल का साथ, फिर भी अधूरा विकास

हरिद्वार विधानसभा ने लगातार 25 वर्षों तक मदन कौशिक पर भरोसा जताया। इस दौरान वे शिक्षा मंत्री, शहरी विकास मंत्री और आबकारी मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी रहे लेकिन ‘दि संडे पोस्ट’ की जमीनी पड़ताल में सामने आया है कि धर्मनगरी आज भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, उच्च शिक्षा, रोजगार, जल निकासी, स्वच्छता और नशे जैसी गम्भीर समस्याओं से जूझ रही है। जनता का कहना है कि अब केवल लम्बे राजनीतिक कार्यकाल या विकास के दावों से नहीं बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से जनप्रतिनिधियों का मूल्यांकन होना चाहिए

हरिद्वार विधानसभा सीट उत्तराखण्ड की सबसे चर्चित सीटों में से एक है। इस सीट का अपना एक अलग राजनीतिक और भौगोलिक महत्व है, यह सीट धार्मिक नगरी हरिद्वार के मुख्य शहर, हर की पैड़ी, कनखल और मयूरपुर जैसे प्रमुख शहरी हिस्सों को कवर करती है। यह उत्तराखण्ड की सबसे महत्वपूर्ण और वीआईपी विधानसभा सीटों में गिनी जाती है। राज्य बनने से पहले (जब यह उत्तर प्रदेश का हिस्सा था), 1957 और 1969 में यहां से कांग्रेस के शांति प्रपन्न शर्मा चुनाव जीते थे। 1974 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के राजेंद्र कुमार गर्ग और 1977 में जनता पार्टी के राज कुमार शर्मा ने भी यहां का प्रतिनिधित्व किया था। साल 2000 में राज्य बनने के बाद, 2002 में यहां पहली बार विधानसभा चुनाव हुए। तब से लेकर आज तक (2002, 2007, 2012, 2017 और 2022) इस सीट पर लगातार भाजपा के नेता मदन कौशिक का कब्जा रहा है जो राज्य में एक अनोखा रिकॉर्ड है। यह पूरी तरह से एक शहरी सीट है। इसमें हरिद्वार नगर निगम के 35 वार्ड शामिल हैं। 2022 के विधानसभा चुनावों के आंकड़ों के अनुसार, इस निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 1,49,108 पंजीकृत मतदाता हैं। गंगा के तट पर बसी हरिद्वार नगरी देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक पहचान के लिए जानी जाती है। हरकी पैड़ी की आरती, कुम्भ का आयोजन और लाखों श्रद्धालुओं की आस्था इस शहर को विशेष बनाती है लेकिन इसी धार्मिकनगरी की गली-मोहल्लों और बाजारों में जब विकास के मुद्दों को लेकर लोगों से बातचीत की गई तो कई ऐसे सवाल सामने आए, जो हरिद्वार की बदलती तस्वीर पर सोचने को मजबूर करते हैं।

हरिद्वार विधानसभा क्षेत्र पिछले करीब 25 वर्षों से एक ही राजनीतिक नेतृत्व के अधीन रहा है। जनता ने लगातार विश्वास जताया और एक ही विधायक को लम्बे समय तक प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया। इतने लम्बे राजनीतिक कार्यकाल के बाद यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर हरिद्वार को इस दौरान क्या मिला? क्या शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं में सुधार हुआ? क्या रोजगार के अवसर बढ़े? क्या युवाओं को नशे के दलदल से बचाया जा सका? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए ‘दि संडे पोस्ट’ ने हरिद्वार विधानसभा क्षेत्र में ग्राउंड रिपोर्टिंग की। इस दौरान स्थानीय निवासीयों, यात्रियों, श्रद्धालुओं और सत्ता से जुड़े जनप्रतिनिधियों व अन्य कई लोगों से बातचीत की। बातचीत में सामने आए मुद्दे केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहे बल्कि उन्होंने शहर के विकास, प्रशासनिक व्यवस्था और आम लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं पर भी कई सवाल खड़े किए।

25 साल लेकिन अपेक्षित विकास नहीं
पिछले लगभग 25 वर्षों से हरिद्वार विधानसभा का प्रतिनिधित्व एक ही व्यक्ति भाजपा नेता मदन कौशिक कर रहे हैं। जनता ने राजनीतिक स्थिरता दी, लगातार अवसर दिए और कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी भी मिली लेकिन इसके बावजूद हरिद्वार को वे उपलब्धियां नहीं मिल सकीं जिनकी लोगों को उम्मीद थी। यदि कोई क्षेत्र लगातार इतने वर्षों तक एक ही जनप्रतिनिधि के हाथ में रहे तो वहां शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं में बड़ा बदलाव दिखाई देना चाहिए। इस दौरान बड़े सरकारी शिक्षण संस्थान, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार के नए अवसर विकसित किए जा सकते थे लेकिन हरिद्वार के छात्रों को आज भी उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है। इसी तरह गम्भीर बीमारी की स्थिति में मरीजों को देहरादून, ऋषिकेश एम्स या दिल्ली रेफर किया जाता है जबकि विधायक इस दौरान शिक्षा मंत्री रहे, शहरी विकास मंत्री रहे, आबकारी मंत्री भी रहे लेकिन हरिद्वार को क्या मिला? यदि कोई व्यक्ति शिक्षा मंत्री रहा हो तो स्वाभाविक रूप से उसके विधानसभा क्षेत्र में उच्च शिक्षा की दिशा में बड़े संस्थान स्थापित होने चाहिए थे। यदि शहरी विकास मंत्री रहा हो तो शहर की आधारभूत सुविधाओं में व्यापक परिवर्तन दिखाई देना चाहिए था लेकिन हरिद्वार में शिक्षा और शहरी विकास दोनों क्षेत्रों में अपेक्षित बदलाव नहीं दिखता। विकास को केवल सड़क और नाली तक सीमित नहीं किया जा सकता। शहर की असली प्रगति शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से होती है।

धर्मनगरी में अगर कुछ बढ़ा है तो नशे का कारोबार
हरिद्वार केवल एक शहर नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। हरिद्वार की धार्मिक पहचान को देखते हुए यहां शराब और नशे के मुद्दे पर गम्भीरता से विचार होना चाहिए। ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान सबसे बड़ा मुद्दा जो बार-बार सामने आया, वह था नशे का बढ़ता प्रभाव। हरिद्वार को मद्यनिषेध क्षेत्र घोषित करने के पीछे उद्देश्य इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक गरिमा को बनाए रखना था। इसके बावजूद शहर में शराब की उपलब्धता और बिक्री को लेकर शिकायतें सामने आती रहती हैं। नशे के कारोबार पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा और इसके पीछे सत्ता संरक्षण होने की भी आशंका जताई जाती रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हरिद्वार में शराब, स्मैक, गांजा और अन्य नशीले पदार्थों का कारोबार बढ़ा है। इसका सबसे अधिक असर युवाओं पर पड़ रहा है। नशे की वजह से कई परिवार प्रभावित हो रहे हैं। किसी मां का बेटा, किसी पिता का पुत्र और किसी बहन का भाई इस समस्या की वजह से परेशान हो रहा है।

स्थानीय निवासी चंद्रमोहन कौशिक कहते हैं कि ‘‘हरिद्वार की पहचान मां गंगा और धार्मिक आस्था से होनी चाहिए लेकिन आज शहर के कई हिस्सों में शराब, स्मैक, गांजा और चरस जैसे नशीले पदार्थों का कारोबार चर्चा का विषय बना हुआ है, नशे की समस्या शहर के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। स्थानीय लोगों को पता होता है कि किन क्षेत्रों में अवैध गतिविधियां चल रही हैं। पुलिस और प्रशासन के पास भी अपने सूचना तंत्र (एलआईयू) और अन्य एजेंसियां मौजूद हैं, इसके बावजूद समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पा रही।’’

हरिद्वार के पूर्व सभासद अशोक शर्मा का कहना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य मुख्य यहीं हैं जिसमें हरिद्वार पिछड़ा हुआ है। यहां नशा फैल चुका है और पुलिस की सक्रियता ऐसी है कि यहां गली-गली दुकानों में खुलेआम शराब बिकती है। हरिद्वार में सिर्फ लूट का विकास हुआ है। ये हरिद्वार का दुर्भाग्य है कि पिछले 25 सालों से हेराफेरी और धनबल की वजह से हरिद्वार अच्छे विधायक से वंचित है। देह व्यापार के खिलाफ मैं आवाज उठा चुका हूं, मैंने प्रदर्शन भी किए हैं, देह व्यापार खुलेआम चल रहा है, बस अड्डे से लेकर रेलवे स्टेशन तक स्टैंड्स पर, बहुत अधिकता वेश्याओं की उपस्थिति रहती है।

स्वास्थ्य सुविधाओं पर गम्भीर सवाल
हरिद्वार जैसे महत्वपूर्ण जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी दिखाई दी। विधानसभा भ्रमण के दौरान स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर लगभग हर किसी ने चिंता जताई। शहर में ऐसा मजबूत सरकारी स्वास्थ्य ढांचा अब तक नहीं बन पाया है जहां गम्भीर मरीजों का बेहतर इलाज हो सके। यदि किसी की तबीयत गम्भीर हो जाए तो आज भी उसे देहरादून, ऋषिकेश एम्स या दिल्ली रेफर किया जाता है। हरिद्वार का प्रमुख सरकारी अस्पताल मेला अस्पताल है लेकिन वहां विशेषज्ञ डाॅक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कमी है।

डाॅ. राजेश गुप्ता, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस), मेला अस्पताल, हरिद्वार की मानें तो ‘‘अस्पताल में वर्तमान में फिजिशियन, सर्जन, ऑर्थोपेडिक सर्जन, मनोचिकित्सक एवं नेत्र रोग विशेषज्ञ सहित विभिन्न चिकित्सकों की सेवाएं उपलब्ध हैं। आवश्यक चिकित्सा उपकरण और मशीनें भी उपलब्ध हैं। आगामी कुम्भ मेले को देखते हुए अस्पताल को अपग्रेड किया जा रहा है। इसके तहत नई मशीनें उपलब्ध कराई जाएंगी तथा ऑपरेशन थिएटर (ओटी) को भी आधुनिक बनाया जाएगा। मेला अस्पताल के आसपास जिला अस्पताल, उप जिला अस्पताल और महिला अस्पताल संचालित हैं लेकिन तीनों अस्पतालों में पीजी विशेषज्ञ चिकित्सकों के स्वीकृत पद नहीं हैं। गम्भीर मरीजों, विशेषकर कार्डियक अरेस्ट जैसी आपात स्थितियों में अस्पताल के
चिकित्सक प्राथमिक उपचार और आवश्यक जीवन रक्षक दवाएं देने के बाद मरीज को उसकी स्थिति के अनुसार एम्स ऋषिकेश सहित उच्च चिकित्सा संस्थानों के लिए रेफर करते हैं।’’ उन्होंने बताया कि अस्पताल में वर्तमान में 70 बेड की सुविधा उपलब्ध है और मरीजों को अधिकतम दवाएं अस्पताल से ही उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। वीआईपी ड्यूटी के लिए चिकित्सकों की तैनाती रोस्टर के अनुसार की जाती है, वहीं कुम्भ मेले के दौरान सरकार अतिरिक्त डाॅक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और अस्थायी अस्पतालों की व्यवस्था भी करती है। दूसरी तरफ ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान स्थानीय लोगों और मरीजों का कहना था कि बढ़ती मरीजों की संख्या और आगामी कुम्भ मेले को देखते हुए विशेषज्ञ चिकित्सकों के स्वीकृत पद, आधुनिक जांच सुविधाओं और चिकित्सा संसाधनों में और विस्तार की जरूरत है।

शिक्षा में नहीं हुए बदलाव
शिक्षा किसी भी क्षेत्र के भविष्य की नींव होती है लेकिन इस दिशा में हरिद्वार विधानसभा में अपेक्षित कार्य नहीं हुआ। हरिद्वार में उच्च शिक्षा के लिए ऐसे संस्थान विकसित नहीं हुए जो स्थानीय युवाओं को बड़े स्तर पर अवसर दे सकें। हरिद्वार के युवाओं को आज भी उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है। स्थानीयों का कहना है विधायक के इतने लम्बे राजनीतिक कार्यकाल के दौरान कोई ऐसा बड़ा शिक्षण संस्थान स्थापित नहीं हुआ जिसे हरिद्वार की उपलब्धि कहा जा सके।

मेडिकल कॉलेज बना लेकिन जनता को क्या मिला?
नगर निगम की ओर से पूर्व में लगभग 500 बीघा भूमि स्कूल और अस्पताल जैसी सार्वजनिक सुविधाओं के लिए उपलब्ध कराई गई थी। इसी भूमि पर करोड़ों रुपए की लागत से मेडिकल काॅलेज की इमारत बनाई गई। निर्माण के बाद इस संस्थान का संचालन निजी हाथों में चला गया। ऐसे में सवाल उठता है यदि अंततः निजी संस्था को ही संचालन सौंपना था तो सरकारी धन से इतना बड़ा निवेश क्यों किया गया। स्थानीय लोगों की अपेक्षा थी कि हरिद्वार में ऐसा सरकारी मेडिकल काॅलेज बने जहां आम और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बेहतर और सस्ता इलाज मिल सके। यदि हरिद्वार में मजबूत सरकारी चिकित्सा व्यवस्था विकसित होती तो लोगों को देहरादून, ऋषिकेश या दिल्ली नहीं जाना पड़ता। रिपोर्टिंग के दौरान यह सामने आया कि हरिद्वार राजकीय मेडिकल काॅलेज अस्पताल आज भी स्थायी बिजली कनेक्शन के बिना संचालित हो रहा है। ऐसे में बिजली आपूर्ति बाधित होने पर ओपीडी, जांच और उपचार जैसी स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित होने का खतरा बना रहता है। मेडिकल काॅलेज में अध्ययनरत एमबीबीएस के करीब 200 छात्र-छात्राओं की पढ़ाई भी इन अव्यवस्थाओं का खामियाजा भुगत रही है। बिजली कटने पर स्मार्ट क्लास, प्रोजेक्टर आधारित शिक्षण और अन्य डिजिटल संसाधन बंद हो जाते हैं।

आधुनिक मेडिकल शिक्षा के लिए जरूरी तकनीकी सुविधाएं लगातार बाधित रहने से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। मेडिकल कॉलेज बनने का उद्देश्य भविष्य के चिकित्सकों को बेहतर प्रशिक्षण देना था लेकिन बुनियादी सुविधाएं पूरी नहीं होने से यह लक्ष्य अधूरा दिखाई दे रहा है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार फिलहाल जनरेटर के माध्यम से व्यवस्था संचालित की जा रही है जबकि स्थायी बिजली कनेक्शन के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा जा चुका है।

सड़कों और शहर की व्यवस्था पर सवाल
‘दि संडे पोस्ट’ की टीम ने हरिद्वार शहर के कई प्रमुख क्षेत्रों का दौरा किया। हरिद्वार, रानीपुर मोड़, मोती बाजार, सुभाष घाट, कनखल, हरकी पैड़ी, भीमकोटा, भूपतवाला सहित कई इलाकों में स्थानीय लोगों से बातचीत की गई और जमीनी स्थिति को देखा गया। इस दौरान कई जगह सड़कों की खराब स्थिति सामने आई। शहर की कई सड़कें लम्बे समय से खुदी हुई हैं और निर्माण कार्य धीमी गति से चल रहे हैं जिससे स्थानीय लोगों, दुकानदारों और श्रद्धालुओं को परेशानी उठानी पड़ती है। साथ ही पूरे हरिद्वार की अगर बात करें तो कहीं भी जल निकासी की व्यवस्था नहीं है। एक बारिश होने पर ही पूरा हरिद्वार पानी में डूबा हुआ होता है, जगह-जगह पानी भर जाता है, नालियों से पानी बाहर आकर सड़कों पर आ जाता है, सड़कों के गड्ढों में पानी भर जाता है जो काफी जोखिम भरा साबित होता है, पानी भर जाने से पूरे सड़क पर गड्ढे का पता नहीं लग पाता जिसके चलते दुर्घटना होने ही सम्भावना काफी हद तक बढ़ जाती है। लोगों के घरों में दुकानों में पानी चले जाता हैं, जिस कारण पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।

कुम्भ की तैयारियों में भ्रष्टाचार का दावा
हरिद्वार विश्व प्रसिद्ध कुम्भ नगरी है और यहां होने वाले बड़े कुम्भ के आयोजन के नाम पर हर बार सरकारों को बड़ी मात्रा में बजट मिलता है लेकिन उसका पूरा लाभ शहर को नहीं मिल पाता। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष अशोक त्रिपाठी ने सतीकुंड जीर्णोद्धार कार्य को लेकर गम्भीर अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। उनके अनुसार लगभग 5 करोड़ रुपए की लागत से होने वाले कार्य को 61 करोड़ रुपए में कराया जा रहा है। वे यह भी दावा करते हैं कि इन कार्यों में उत्तराखण्ड की एजेंसियों, जैसे पीडब्ल्यूडी या हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण के बजाए गुजरात की कम्पनियों को काम दिया गया है। उनका कहना है कि यदि स्थानीय एजेंसियां सक्षम हैं तो बाहरी एजेंसियों को प्राथमिकता क्यों दी गई, इसकी भी जांच होनी चाहिए। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और सम्बंधित विभाग की ओर से इस सम्बंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं हो सकी।

अर्धकुम्भ या कुम्भ? भ्रम में धर्म
धार्मिक आयोजनों को लेकर भी जनता ने सवाल उठाए हैं। सनातन परम्पराओं में कुम्भ और अर्धकुम्भ का अपना अलग महत्व है। कुम्भ और अर्धकुम्भ के नामों को लेकर उपजा विवाद मुख्य रूप से सनातन धार्मिक परम्पराओं, आधुनिक प्रशासनिक ब्रांडिंग और भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोपों के बीच टकराव का परिणाम है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार हर 6 वर्ष में होने वाले आयोजन को शास्त्रों में ‘अर्धकुम्भ’ और 12 वर्ष वाले आयोजन को ‘पूर्ण कुम्भ’ कहा गया है लेकिन सरकारों द्वारा वैश्विक स्तर पर बड़ी ब्रांडिंग करने और अधिक बजट आवंटित कराने के उद्देश्य से अर्धकुम्भ को ‘कुम्भ’ और पूर्ण कुम्भ को ‘महाकुम्भ’ नाम दे दिया गया है। जनता, संतों और आलोचकों का सीधा आरोप है कि इस नाम परिवर्तन के पीछे प्रशासनिक अधिकारियों और नेताओं की मंशा कुम्भ के बड़े नाम पर भारी-भरकम सरकारी बजट पास कराकर अपनी जेबें भरने और वित्तीय अनियमितताएं करने की है, क्योंकि बड़े आयोजन के नाम पर बिना टेंडर या आपातकालीन नियमों के तहत करोड़ों रुपए के फंड का बंदरबांट करना आसान हो जाता है। हरिद्वार में पिछला पूर्ण कुम्भ कायदे से 2022 में होना था लेकिन ग्रहों के विशेष संयोग के कारण एक साल पहले 2021 में ही हो गया। अब परम्परा के अनुसार 6 साल बाद यानी 2027 में वहां ‘अर्धकुम्भ’ होना चाहिए लेकिन प्रशासनिक स्तर पर इसे ‘कुम्भ’ के रूप में पेश किया जा रहा है, जिससे आम जनता में भ्रम फैल रहा है। उनके अनुसार धार्मिक आयोजनों के नाम में परिवर्तन कर केवल बजट खर्च करने की मानसिकता नहीं होनी चाहिए। प्रशासन का तर्क है कि इस बदलाव से वैश्विक स्तर पर ब्रांडिंग होती है और बुनियादी ढांचे का विकास होता है लेकिन जमीन पर आम जनता इसे धार्मिक आस्था के बाजारीकरण और भ्रष्टाचार को छिपाने का एक बड़ा जरिया मानती है।

गंगा सभा के अध्यक्ष और राज्य सरकार में दायित्वधारी नितिन गौतम का इस मुद्दे पर कहना है कि ‘‘देखिए अर्द्धकुम्भ या कुम्भ दोनों ही हमारे सनातन के पर्व हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी ने इस बात के लिए पहले से ही कहा कि 2021 में जो कुम्भ हुआ था उसके अंदर बहुत सारे श्रद्धालु स्नान से वंचित रह गए थे। उन सभी श्रद्धालुओं की श्रद्धा को ध्यान में रखते हुए इस अर्द्धकुम्भ को कुम्भ के जैसा दिव्य और भव्य करने की योजना सरकार की है।’’

रोजगार के दावों और जमीनी हकीकत पर सवाल
उत्तराखण्ड गठन के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में सिडकुल की स्थापना हरिद्वार के लिए एक बड़ी औद्योगिक बदलाव थी। इससे हजारों युवाओं को रोजगार मिला और आस-पास के राज्यों के लोग भी रोजगार के लिए हरिद्वार आए।

सिडकुल में लगभग 450-500 कम्पनियां स्थापित हुईं लेकिन अब स्थानीयों का आरोप है कि स्थानीय युवाओं को अपेक्षित अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। बाहरी राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों के लोगों को अधिक रोजगार मिलता है, जबकि स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। साथ ही वर्तमान समय में अनेक उद्योग सुविधाओं के अभाव में पलायन की स्थिति में हैं। उनका कहना है कि उद्योगों को अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने से रोजगार के अवसर प्रभावित हो रहे हैं। सरकारें रोजगार देने के दावे करती हैं लेकिन सरकार के पास युवाओं के लिए कोई ठोस रोजगार नीति दिखाई नहीं देती। हरिद्वार का बड़ा वर्ग आज भी अपने छोटे- छोटे व्यवसायों के सहारे जीवन- यापन कर रहा है। शहर में अधिकांश लोग दुकान, ठेला, होटल, रेस्टोरेंट या अन्य छोटे व्यवसायों पर निर्भर हैं। इसका असर स्थानीय युवाओं पर पड़ रहा है और बेरोजगारी लगातार चिंता का विषय बनी हुई है।

देह व्यापार के आरोप
आज  हरिद्वार में आने वाला श्रद्धालु जिस पवित्र वातावरण की उम्मीद करता है, कई स्थानों पर उसे वैसा माहौल दिखाई नहीं देता। स्थानीय लोगों ने ‘दि संडे पोस्ट’ टीम को बताया कि शहर के कुछ इलाकों, विशेषकर रेलवे स्टेशन और शिवमूर्ति क्षेत्र के आस-पास, नशे और अन्य अवैध गतिविधियों की शिकायतें लम्बे समय से स्थानीय लोग उठाते रहे हैं। लोगों का आरोप है कि इन क्षेत्रों में कथित रूप से देह व्यापार जैसी गतिविधियां भी होती हैं जिससे शहर की छवि प्रभावित होती है। यदि पुलिस और प्रशासन सक्रिय हैं तो फिर अवैध कारोबार पूरी तरह खत्म क्यों नहीं हो रहा। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी है। यदि धार्मिक नगरी में इस प्रकार की गतिविधियां होती हैं तो यह केवल कानून व्यवस्था का ही नहीं बल्कि शहर की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का भी विषय है।

घाटों की स्थिति और शहर की सफाई व्यवस्था को लेकर भी उठे सवाल
हरिद्वार के घाटों की जो पहचान पहले थी, उसमें बदलाव आया है। रिपोर्टिंग के दौरान कई जगहों पर सफाई और रखरखाव की कमी साफ दिखाई दी। सुभाष घाट की स्थिति गंदगी, दुर्गंध से भरपूर और रखरखाव की कमी देखने को मिली, स्थानीयों से बात करने पर उन्होंने कहा कि बचपन में लोग अपने परिवार के साथ घाटों पर घंटों बैठते थे। श्रद्धालु घर से भोजन लेकर आते थे और घाटों पर बैठकर प्रसाद ग्रहण करते थे लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं रहा घाटों में ज्यादा समय के लिए बैठना तो मानो असम्भव हो गया है। जिस शहर की पहचान गंगा और घाटों से हो, वहां स्वच्छता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

परिणाम देने वाले नेतृत्व की दरकार
रिपोर्टिंग के दौरान जिन लोगों से बातचीत हुई, उनमें राजनीतिक विचार अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन कुछ मुद्दे लगभग सभी की बातचीत में समान रूप से सामने आए, बेहतर सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की आवश्यकता। उच्च शिक्षा के लिए बड़े संस्थानों की मांग। नशे के कारोबार पर प्रभावी कार्रवाई। स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार। सड़कों और आधारभूत सुविधाओं का समयबद्ध विकास। धार्मिक स्थलों और घाटों की स्वच्छता। कुम्भ और अन्य विकास कार्यों में पारदर्शिता। स्थानीय लोग केवल नेता की पहुंच या व्यक्तिगत व्यवहार को ही विकास का पैमाना नहीं मानते। वे चाहते हैं कि उनका प्रतिनिधि  मूलभूत सुविधाओं में ऐसा बदलाव करे जो आने वाली पीढ़ियों को लाभ दे। 25 वर्षों के लम्बे राजनीतिक दौर के बाद अब जनता उपलब्धियों का हिसाब जमीन पर दिखाई देने वाले बदलावों से करना चाहती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान विधायक की जनता के बीच मजबूत राजनीतिक पकड़ रही है। वे रिकाॅर्ड मतों से चुनाव जीतते रहे हैं और लोगों से उनका व्यक्तिगत सम्पर्क भी अच्छा माना जाता है लेकिन केवल लोकप्रिय होना ही पर्याप्त नहीं है। जनता अब विकास के ठोस परिणाम देखना चाहती है। हरिद्वार जैसे धार्मिक और ऐतिहासिक शहर को शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं में देश के अग्रणी शहरों में शामिल होना चाहिए था। अब जनता की अपेक्षा केवल व्यवहारिक और लोकप्रिय विधायक तक सीमित नहीं है बल्कि ऐसे जनप्रतिनिधि की है जो हरिद्वार को विकसित विधानसभा के रूप में स्थापित कर सके।

योजनाओं की लम्बी सूची लेकिन जमीन पर कितनी बदली तस्वीर?
हरिद्वार में विकास के दावों की फेहरिस्त भी लम्बी है। शहर में मेडिकल काॅलेज, रिंग रोड, क्रिकेट स्टेडियम, स्पोर्ट्स काॅम्प्लेक्स और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी कई योजनाओं को बदलाव की तस्वीर के तौर पर पेश किया जा रहा है। महिला एवं बाल चिकित्सालय के पुनर्निर्माण और उत्तरी हरिद्वार में डिग्री कॉलेज शुरू होने जैसी उपलब्धियों का भी उल्लेख किया जाता है लेकिन सवाल यह है कि इन योजनाओं का असर आम हरिद्वारवासी की जिंदगी में कितना दिखाई दे रहा है? क्योंकि विकास केवल परियोजनाओं के नाम और घोषणाओं से नहीं बल्कि उसके जमीन पर उतरने और लोगों को मिलने वाली सुविधाओं से तय होता है। एक तरफ शहर में बड़े
प्रोजेक्ट्स की बात हो रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय लोग अब भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, उच्च शिक्षा के अवसरों, रोजगार और शहर की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं। हरिद्वार आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के बीच शहर को ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जिससे लोग केवल स्नान कर वापस न लौटें बल्कि यहां रुकें, पर्यटन बढ़े और स्थानीय व्यापार को लाभ मिले। कुम्भ और बड़े आयोजनों के नाम पर हर बार करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं लेकिन स्थायी विकास की कसौटी पर शहर कितना आगे बढ़ा है, यह सवाल अब भी बना हुआ है। हरिद्वार की चुनौती केवल नए निर्माण खड़े करने की नहीं बल्कि उन निर्माणों और योजनाओं को आमजन के जीवन में वास्तविक बदलाव में बदलने की है।

भाजपा जिला अध्यक्ष आशुतोष शर्मा का कहना है कि ‘‘मैं नहीं समझता कि हरिद्वार के विकास में कोई कमी हुई है, आज आप देख रहे हैं मेडिकल काॅलेज भी हरिद्वार में, रिंग रोड भी हरिद्वार में, अन्य बहुत सारी योजनाएं गतिमान हैं और कई सारी चीजें बनी भी हैं। राष्ट्रीय स्तर का क्रिकेट स्टेडियम युवाओं के लिए बना है। स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स बन गया है जहां हम स्टेट ऑफ दी आर्ट फैसिलिटीज दे रहे हैं युवाओं को। जिला चिकित्सालय उसका डीपीआर बन चुका है, महिला चिकित्सालय का पुनः निर्माण हो चुका है और वहां बाकायदा एक पीपी मोड पर बहुत ही सुंदर वुमन एंड चाइल्ड हॉस्पिटल रन हो रहा है। शिक्षा की अगर बात करें तो मेडिकल काॅलेज हमारे वहां बन गया है और उत्तरी हरिद्वार में एक परेशानी आती थी डिग्री कॉलेज नहीं था वो डिग्री काॅलेज शुरू हो चुका है। हरिद्वार तीर्थ नगरी है। यहां की मूल आबादी लगभग डेढ़ से 2 लाख है। आपने जैसे नशे की भी बात की आप देखेंगे पिछले दिनों बहुत सारे प्रकरण हुए। गंगा किनारे लोग बैठकर शराब पी रहे हैं, नशा कर रहे हैं और वो अधिकतर लोग बाहर के थे स्थानीय लोगों का ऐसा आचरण देखने में कम आया तो ये भी जो विषय है देह व्यापार इसमें जितनी भी कार्यवाही अभी तक पुलिस ने की उसमें अधिकतर महिलाएं हरिद्वार जनपद नहीं उत्तराखण्ड की भी नहीं है।’’

सवालों से दूरी या जवाबदेही से परहेज?
‘दि संडे पोस्ट’ की ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान हरिद्वार विधानसभा के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा करने पर विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला। इन तमाम मुद्दों पर क्षेत्र के लम्बे समय से रहे विधायक, जिन्हें उनके समर्थक ‘विकास पुरुष’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं, मदन कौशिक का पक्ष जानने का प्रयास किया गया। विधायक के निजी सहायक से बातचीत के बाद रिपोर्टिंग टीम को उनके कार्यालय बुलाया गया लेकिन कार्यालय पहुंचने पर विधायक ने उपेक्षापूर्ण लहजे में कहा, ‘‘मैं इंटरव्यू देता ही नहीं।’’ लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि केवल विकास के दावे करने के लिए नहीं बल्कि उन दावों पर जनता और मीडिया के सवालों का जवाब देने के लिए भी उत्तरदायी होते हैं। ऐसे में जब एक ओर विधानसभा की जमीनी तस्वीर कई गम्भीर प्रश्न खड़े कर रही हो और दूसरी तरफ जनप्रतिनिधि स्वयं उन प्रश्नों पर सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने से परहेज करें तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि सब कुछ संतोषजनक है तो जवाबदेही से दूरी क्यों? आखिर जनता की ओर से पूछे जा रहे सवालों का जवाब कौन देगा क्योंकि लोकतंत्र में चुप्पी भी कई बार अपने आप में एक जवाब मानी जाती है।

हरिद्वार की इस ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आई तस्वीर यह बताती है कि आस्था की इस नगरी में विकास को लेकर लोगों के मन में कई सवाल हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जनता अपने विधायक की उपलब्धता और व्यवहार को महत्व देती थी लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं।  कई लोगों ने यह भी कहा कि 25 वर्षों का समय किसी भी विधानसभा क्षेत्र की तस्वीर बदलने के लिए पर्याप्त माना जाता है। इसलिए अब लोग विकास को केवल घोषणाओं से नहीं बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से आंकना चाहते हैं। दूसरी ओर यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है। किसी भी जनप्रतिनिधि के कार्यों का सबसे बड़ा मूल्यांकन चुनाव के समय मतदाता करते हैं। आने वाले समय में यह देखना होगा कि हरिद्वार की जनता विकास के इन मुद्दों को किस रूप में देखती है और अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर क्या निर्णय लेती है।

बात अपनी-अपनी
हरिद्वार पहले से बहुत विकसित हुआ है तो इसका श्रेय नारायण दत्त तिवारी जी और उनके बाद हरीश रावत जी को जाता है लेकिन दुर्भाग्य यह कि 10 साल से यहां भाजपा की सरकार है जिसमें हमने जो विकास के कार्य किए थे वो सब ठप्प कर दिए हैं। पूरे जिले में तिवारी जी ने जो सड़कें बनवाई थी उन सड़कों में गड्ढे हो चुके हैं, उन गड्ढों को भरने का काम तक ये सरकार नहीं कर पाई। जो तिवारी जी ने फैक्ट्रियों का जाल बुना था आज उनको ये सही सुविधा नहीं दे पा रहे हैं जिस कारण फैक्ट्री मालिक फैक्ट्रियां बंद करके जा रहे हैं। नई फैक्ट्री नहीं लग रही है। ये शिक्षा और स्वास्थ्य में भी हरिद्वार पिछड़ा हुआ है। मुझे लगता है कि जो जनप्रतिनिधि यहां से लगातार जीतकर आ रहे हैं उनकी इच्छा शक्ति में कहीं न कहीं कमी है। वर्तमान जनप्रतिनिधि स्वास्थ्य, शिक्षा के विकास की एक ईंट भी नहीं रख पाए हैं।
संजय पालीवाल, कांग्रेस, कार्यकर्ता

देखिए भारतीय जानता पार्टी के वरिष्ठ नेता मदन कौशिक जी 5 बार से विधायक हैं और यह कोई आसान कार्य नहीं होता है। विधायक जी की कार्यशैली, उनका लोगों से जुड़ाव बहुत अच्छा है। वो अनुभवी हंै लेकिन मेरा हमेशा से ये कहना रहा है कि 25 साल एक युग परिवर्तन के बराबर है तो कहीं न कहीं आने वाले समय में हरिद्वार शहर को किसी युवा नेतृत्व की सख्त जरूरत होगी जो नए जोश के साथ, नए सोच के साथ विधानसभा में काम करे और जो कुछ हरिद्वार विधानसभा में कमियां हैं, परेशानियां हैं उसे दूर करें। हरिद्वार पूरे विश्व की अध्यात्मिक नगरी है लेकिन आज कहीं न कहीं हरिद्वार का पर्यटन है, जो पर्यटक हैं वो यहां से शिफ्ट होकर
देहरादून, मसूरी, ऋषिकेश की तरफ जुड़ रहे हैं जिससे यहां की अर्थव्यवस्था,यहां के व्यवसाय, पर असर पड़ना शुरू हो गया है तो हरिद्वार के अंदर ऐसी सुविधाएं, ऐसा सौंदर्यीकरण, ऐसी व्यवस्था, योजना होनी चाहिए जिससे यात्री, पर्यटक शहर के अंदर रुकें।
डाॅ. विशाल गर्ग, प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य, भाजपा

भारतीय जनता पार्टी के मदन कौशिक 25 वर्षों से यहां के विधायक हैं। इतने लम्बे समय तक एक ही विधायक को जनता ने मौका दिया लेकिन शहर का अपेक्षित विकास कुछ नहीं हुआ। अगर कुछ हुआ तो उन्होंने आबकारी मंत्री रहते हुए घर-घर में शराब पहुंचाने का कार्य किया। उनके विधायक और मंत्री रहते कुम्भ से जुड़े विकास कार्यों में अनियमितताओं और भ्रष्टाचार का खेला, खेला जाता रहा है, स्थानीय एजेंसियों की अनदेखी कर बाहरी कम्पनियों को कार्य दिए जा रहे हैं। 2010 के कुम्भ में इन पर आरोप लगे थे और 2012 का चुनाव हारते-हारते बचे थे। आज फिर कुम्भ के कार्यों में अनियमिताएं हो रही हैं, भारी भ्रष्टाचार हो रहा है। अर्द्धकुम्भ को कुम्भ के नाम पर केवल धन खर्च करने का माध्यम बनाया जा रहा है।
अमन गर्ग, अध्यक्ष, जिला महानगर, कांग्रेस कमेटी

मैं हरिद्वार में हरकी पैड़ी के निकट रहता हूं। मेरा जन्म 1972 का है, मैं तब से ही हरिद्वार को देखता आ रहा हूं। इसका विकास तब से कितना हुआ, कितना नहीं इसमें मैं यही कहना चाहूंगा कि हरिद्वार की स्थिति वहीं की वहीं है। 25 सालों से मदन कौशिक यहां के विधायक हैं लेकिन विकास की बात करूं तो कोई भी उपलब्धि हमें कहीं नहीं दिखी है। गली-गली के अंदर शराब का व्यवसाय चल रहा है। यहां आप जाएंगे तो शिव मूर्ति है, स्टेशन के नजदीक, वहां इतना घिनौना व्यवसाय हो रहा है वेश्यावृत्ति तक हो रही है। यहां की सड़कें लगभग 2 वर्षों से खुदी पड़ी हैं, उन सड़कों का कोई भी कार्य सुचारू रूप से नहीं हो रहा है। नशे के कारोबारियों पर अंकुश लगा नहीं, हरिद्वार के अंदर स्थित मेला अस्पताल में विशेषज्ञ डाॅक्टरों का अभाव है, पैरा मेडिकल का भी अभाव है  कुछ मुख्य मशीनें वहां नहीं है। गम्भीर मरीजों व बीमारी का वहां इलाज नहीं हो पता है। ये तो वास्तव में उनकी चतुराई ही कहेंगे कि उन्होंने घर-घर तक युवाओं तक अपनी जो पकड़ बनाई है उसके चलते वे जीतते आ रहे हैं। अब लेकिन समझना होगा कि उन्हें जनता की मांग सिर्फ व्यवहारिक विधायक तक सीमित नहीं है उन्हें विकसित विधानसभा बना सके ऐसे विधायक की जरूरत है।
चंद्रमोहन कौशिक, स्थानीय निवासी

जितनी जनता की अपेक्षा थी उसके अनुरूप विकास कम हुआ है विधायक का कार्यकाल 50-50 प्रतिशत रहा है। अगर बात विधायक के व्यवहार की करें तो लगातार 5 चुनावों से वही जीत रहे हैं तो इसका अंदाजा हम लगा सकते हैं कि वे व्यवहार कुशल हैं। बाकी रही बात  नशे के बढ़ते जाल की तो नशा हमारी नशों में, हमारे खून में ही बस गया है। कोई भी इसके लिए जागरूक नहीं है, न सरकारें, न जनप्रतिनिधि और न ही आम नागरिक। देखिए हरिद्वार जाना जाता है सांस्कृतिक विरासत के लिए। पौराणिक हरकी पैड़ी का अपना महत्व है लेकिन अगर आप हरकी पैड़ी जाएंगे तो आपको वहां सारी अव्यवस्थाएं मिलेंगी। जनता का भी जागरूक होना जरूरी है। मेरे अनुसार इस शहर की जनता सोई हुई है।
दिनेश जोशी, स्थानीय निवासी

हरिद्वार विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक : मदन कौशिक (अवधि : 4 वर्ष)

क्र. क्षेत्र                          मुद्दा / जमीनी स्थिति                              अंक  (10 में)

  1. जनसम्पर्क एवं उपलब्धता लम्बे समय से क्षेत्र में मजबूत राजनीतिक पकड़ और जनता के बीच सक्रिय उपस्थिति लेकिन मीडिया के सवालों से दूरी पर सवाल 5
  2. शिक्षा 25 वर्षों के कार्यकाल के बावजूद हरिद्वार में कोई बड़ा सरकारी उच्च शिक्षण संस्थान विकसित नहीं हो सका 3
  3. स्वास्थ्य सेवाएं मेला अस्पताल और मेडिकल काॅलेज होने के बावजूद विशेषज्ञ डाॅक्टरों, उन्नत उपचार और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल कायम 4
  4. रोजगार एवं उद्योग सिडकुल से रोजगार मिला लेकिन स्थानीय युवाओं को अपेक्षित अवसर नहीं मिले और नई रोजगार नीति का अभाव दिखा 2
  5. सड़क एवं आधारभूत ढांचा कई परियोजनाएं शुरू हुईं लेकिन जलभराव, टूटी सड़कें और धीमे निर्माण कार्य आम समस्या बने हुए हैं 2
  6. पर्यटन एवं धार्मिक विकास कुम्भ और धार्मिक पर्यटन के लिए कई योजनाएं बनीं लेकिन स्थायी पर्यटन विकास और श्रद्धालुओं की सुविधाओं में अपेक्षित सुधार नहीं 2
  7. कानून व्यवस्था एवं नशा नियंत्रण धार्मिक नगरी में नशे और अवैध गतिविधियों को लेकर लगातार शिकायतें, प्रभावी नियंत्रण दिखाई नहीं दिया 2
  8. स्वच्छता एवं नगर प्रबंधन घाटों की सफाई, कूड़ा प्रबंधन और जल निकासी व्यवस्था को लेकर जनता में व्यापक असंतोष 4
  9. पारदर्शिता एवं जवाबदेही विधायक ने ‘दि संडे पोस्ट’ को साक्षात्कार देने से इनकार किया जिससे जवाबदेही पर प्रश्न खड़े हुए 2
  10. समग्र विकास कुछ बड़ी परियोजनाओं के बावजूद शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और शहरी प्रबंधन में अपेक्षित परिवर्तन नहीं दिखा 5

कुल अंक :  3.1/10                           फाइनल ग्रेड : फेल

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