हरिद्वार में कुम्भ और अर्धकुम्भ केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र भी हैं। इन आयोजनों की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी अखाड़े होते हैं, जिनकी पेशवाई और शाही स्नान पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित करते हैं लेकिन इस बार धार्मिक तैयारियों से अधिक चर्चा अखाड़ों के भीतर चल रही नेतृत्व की लड़ाई की हो रही है। अर्धकुम्भ मेले की तैयारियों के बीच धर्मनगरी हरिद्वार में अखाड़ों की अंदरूनी राजनीति एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। वर्षों से अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के नेतृत्व को लेकर चल रहा विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। तेरह अखाड़े दो गुटों में बंटे हुए हैं और अब पंचायती उदासीन अखाड़े में भी ‘असली’ और ‘नकली’ पदाधिकारियों को लेकर विवाद तेज हो गया है
अर्द्धकुम्भ मेले की तैयारियों के बीच धर्मनगरी हरिद्वार में अखाड़ों की अंदरूनी राजनीति एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। वर्षों से अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के नेतृत्व को लेकर चल रहा विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। तेरह अखाड़े दो गुटों में बंटे हुए हैं और अब पंचायती उदासीन अखाड़े में भी ‘असली’ और ‘नकली’ पदाधिकारियों को लेकर विवाद तेज हो गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल संत समाज में हलचल मचा दी है बल्कि कुम्भ मेला प्रशासन के सामने भी यह चुनौती खड़ी कर दी है कि आधिकारिक तौर पर किसे मान्यता दी जाए।
हरिद्वार में कुम्भ और अर्धकुम्भ केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र भी हैं। इन आयोजनों की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी अखाड़े होते हैं, जिनकी पेशवाई और शाही स्नान पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित करते हैं लेकिन इस बार धार्मिक तैयारियों से अधिक चर्चा अखाड़ों के भीतर चल रही नेतृत्व की लड़ाई की हो रही है।
पंचायती उदासीन अखाड़े के मुखिया श्रीमहंत भगत राम जी महाराज ने आरोप लगाया है कि पंजाब से आए गणेश दास और कश्मीर सिंह स्वयं को अखाड़े का सचिव बताकर भ्रम फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका दावा है कि वास्तविक सचिव गणेश दास हरिद्वार स्थित अखाड़े में उनके साथ मौजूद हैं और बाहरी लोगों द्वारा सचिव होने का दावा पूरी तरह गलत है, वहीं पंजाब से जुड़े पक्ष का कहना है कि संगठन की परम्पराओं और उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार वही वैध प्रतिनिधि हैं। दोनों पक्ष अपने- अपने दस्तावेजों और समर्थकों के आधार पर स्वयं को सही साबित करने में जुटे हैं। यही कारण है कि कुम्भ मेला प्रशासन के लिए यह तय करना आसान नहीं रह गया है कि आधिकारिक बैठकों, भूमि आवंटन, पेशवाई और अन्य व्यवस्थाओं के लिए किस पक्ष से संवाद किया जाए।
वर्षों से सुलग रही है अखाड़ों की सियासत
यह विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ है। पिछले कई वर्षों से अखाड़ों के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं। कभी अध्यक्ष पद को लेकर विवाद हुआ तो कभी सचिव और श्रीमहंत पद पर अधिकार को लेकर संघर्ष सामने आया। कुछ समय पहले निर्मल अखाड़े में भी अध्यक्ष और सचिव पद को लेकर दो गुट आमने-सामने आ गए थे। मामला सार्वजनिक होने के बाद संत समाज में व्यापक चर्चा हुई और प्रशासन को भी स्थिति पर नजर रखनी पड़ी।
धार्मिक मामलों के जानकारों का कहना है कि अखाड़ों की परम्पराएं सदियों पुरानी हैं लेकिन हाल के वर्षों में नेतृत्व के मुद्दे पर बढ़ते विवादों ने उनकी एकजुटता को प्रभावित किया है।
अखाड़ा परिषद भी दो हिस्सों में बंटी
विवाद केवल पंचायती उदासीन अखाड़े तक सीमित नहीं है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद भी फिलहाल दो गुटों में बंटी हुई दिखाई दे रही है। एक पक्ष निरंजनी अखाड़े के श्रीमहंत रवींद्र पुरी महाराज के नेतृत्व में सक्रिय है। यह पक्ष उन्हें अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष मानता है और दावा करता है कि पांच अखाड़ों का समर्थन उनके साथ है। दूसरी तरफ महानिर्वाणी अखाड़े से जुड़े संतों का एक अलग गुट स्वयं को वैध परिषद बताता है। इस गुट का दावा है कि उसे आठ अखाड़ों का समर्थन प्राप्त है और परिषद की वास्तविक वैधता उसी के पास है। दोनों गुट अलग-अलग बैठकें कर रहे हैं, अलग-अलग निर्णय ले रहे हैं और अपने-अपने आदेश जारी कर रहे हैं। इससे संत समाज में भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
27 जून के बाद और गहराया विवाद
सूत्रों के अनुसार 27 जून को अखाड़ा परिषद के पुनर्गठन की घोषणा के बाद विवाद और तेज हो गया। पुनर्गठन के बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के फैसलों को अस्वीकार कर दिया। यही नहीं, कई धार्मिक आयोजनों में दोनों पक्षों ने अलग-अलग उपस्थिति दर्ज कराई। इससे स्पष्ट संकेत मिला कि मतभेद अब केवल संगठन के भीतर ही नहीं बल्कि सार्वजनिक रूप से भी सामने आ चुके हैं।
सबसे बड़ी चुनौती, प्रशासन किसे माने?
कुम्भ मेला प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि एक ही अखाड़े या परिषद के दो-दो अध्यक्ष और सचिव सामने आ जाएं तो प्रशासन आधिकारिक रूप से किसे मान्यता दे। अर्धकुम्भ जैसे विशाल आयोजन में अखाड़ों को भूमि आवंटन, शिविर स्थापना, पेशवाई मार्ग, शाही स्नान की व्यवस्था, सुरक्षा समन्वय और प्रशासनिक बैठकों में भागीदारी जैसी अनेक जिम्मेदारियां निभानी होती हैं। यदि नेतृत्व को लेकर विवाद बना रहता है तो व्यवस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि फिलहाल सभी दावों और दस्तावेजों का परीक्षण किया जा रहा है। हालांकि इस सम्बंध में अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
कई संतों का मानना है कि अखाड़ों के भीतर बढ़ती राजनीति धार्मिक परम्पराओं के लिए शुभ संकेत नहीं है। उनका कहना है कि मतभेदों का समाधान अखाड़ों की आंतरिक व्यवस्था के अनुसार होना चाहिए, न कि सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप के माध्यम से। कुछ वरिष्ठ संतों का यह भी कहना है कि यदि समय रहते सभी पक्ष एक मंच पर नहीं आए तो इसका सीधा असर अर्धकुम्भ की गरिमा पर पड़ सकता है।
श्रद्धालुओं में भी उठ रहे सवाल
हरिद्वार आने वाले श्रद्धालुओं के लिए अखाड़े सनातन परम्परा के प्रतीक हैं लेकिन जब एक ही पद पर कई दावेदार सामने आते हैं तो आम श्रद्धालु भी भ्रमित हो जाता है कि वास्तविक प्रतिनिधि कौन है। धर्म विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के विवादों का शीघ्र समाधान आवश्यक है ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहे।
धार्मिक संगठनों के मामलों में यदि पदाधिकारियों को लेकर विवाद उत्पन्न होता है तो उसका समाधान संगठन के संविधान, पंजीकरण अभिलेखों, न्यायालय के आदेश अथवा सक्षम प्राधिकारी के निर्णय के आधार पर किया जाता है। जब तक कोई सक्षम प्राधिकारी अंतिम निर्णय नहीं देता, तब तक दोनों पक्ष अपने-अपने दावे प्रस्तुत कर सकते हैं। इसलिए इस पूरे मामले में लगाए गए सभी आरोप और दावे सम्बंधित पक्षों के हैं, जिनकी आधिकारिक पुष्टि अभी शेष है।
अर्धकुम्भ की तैयारियां तेज हो रही हैं और समय तेजी से बीत रहा है। ऐसे में यदि अखाड़ों के भीतर नेतृत्व का विवाद नहीं सुलझा तो इसका प्रभाव प्रशासनिक तैयारियों पर भी पड़ सकता है। कुम्भ मेला प्रशासन, राज्य सरकार और संत समाज की जिम्मेदारी होगी कि आपसी संवाद के माध्यम से समाधान निकाला जाए, जिससे विश्वविख्यात धार्मिक आयोजन की गरिमा बनी रहे।
फिलहाल इतना तय है कि इस बार अर्धकुम्भ की तैयारियों के साथ-साथ अखाड़ों की सियासत भी पूरे देश की निगाहों में है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पंचायती उदासीन अखाड़े और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के भीतर चल रहे विवाद किस दिशा में आगे बढ़ते हैं और क्या संत समाज एक बार फिर एकजुट होकर अर्धकुम्भ की परम्पराओं का निर्वहन कर पाएगा।
बात अपनी-अपनी
दोनों राज्यों की पुलिस जांच करेगी। जांच के बाद स्पष्ट हो जाएगा कि कौन असली है और कौन नकली। इसके बाद फैसला हो जाएगा कि किसे पद मिलना चाहिए और किसे नहीं।
श्रीमहंत रवींद्र पुरी महाराज, अध्यक्ष, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद एवं श्रीमहंत, निरंजनी अखाड़ा
अखाड़ों के भीतर चल रहे विवादों की जांच के लिए एक जांच समिति गठित कर दी गई है। समिति जांच पूरी करने के बाद अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी, जिसके आधार पर सभी सच्चाइयां सामने आ जाएंगी।
श्रीमहंत हरिगिरी महाराज, महामंत्री, जूना अखाड़ा
मैं कभी किसी संत की निंदा या सामाजिक उपेक्षा करने वाला कोई शब्द मीडिया के सामने नहीं बोलता। यदि मेरे नाम से ऐसा कुछ कहा जा रहा है तो मैं उसका खंडन करता हूं। मैं दूसरे अखाड़े के बारे में टिप्पणी नहीं करता। हमारी अखाड़ा परिषद का गठन विधिवत और सरकार के नियमों के अनुसार हुआ है। यदि कोई मतभेद है तो उसे आपस में बैठकर सुलझाया जा सकता है।
महंत रवींद्र पुरी जी महाराज, सचिव, महानिर्वाणी अखाड़ा
साधु-संतों में कोई विवाद नहीं होता, विवाद तो गृहस्थों में होता है। हम सभी संत एक हैं और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद भी एक है। जो भी मतभेद हैं, उनका समाधान आपसी संवाद से हो जाएगा। किसी भी प्रकार के आपसी मतभेद नहीं होने चाहिए।
जगतगुरु राजराजेश्वरानंद जी महाराज
हमारे अखाड़े के मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार किसी को नहीं है। रवींद्र पुरी जी महाराज हमारे अखाड़े की जांच कराने वाले कौन होते हैं? यदि किसी प्रकार की जांच होनी है, तो पहले वे अपने ऊपर लगे अन्य आरोपों की जांच कराएं। उसके बाद हमारे बारे में बात करें। हमारे अखाड़े के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार उन्हें किसने दिया है?
श्रीमहंत भगत राम जी महाराज, पंचायती उदासीन अखाड़ा
अखाड़ों के आपसी विवाद से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। हमारा दायित्व केवल सभी तेरह अखाड़ों को स्नान की समुचित और सुचारू व्यवस्था उपलब्ध कराना है। हम यही सुनिश्चित करते हैं कि सभी अखाड़ों का स्नान शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से सम्पन्न हो। अखाड़ों के बीच जो भी मतभेद या विवाद हैं, वे उनका आंतरिक मामला है और उससे हमारा कोई सम्बंध नहीं है।
सोनिका, मेलाधिकारी, हरिद्वार