गौरव से गर्त तक

गौरव से गर्त तक

भारतीय पत्रकारिता का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें कुछ नाम ऐसे होंगे जिन्हें न तो नजरअंदाज किया जा सकेगा और न ही एक ही रंग में रंगा जा सकेगा। तरुण तेजपाल ऐसा ही एक नाम है। उनके जीवन को केवल एक सफल पत्रकार, एक प्रतिभाशाली लेखक या फिर एक दोष सिद्ध व्यक्ति के रूप में देखना, उनके व्यक्तित्व और उनके प्रभाव, दोनों के साथ अन्याय होगा। वह भारतीय पत्रकारिता के उस दौर के प्रतिनिधि थे, जब मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं बल्कि सत्ता के विरुद्ध सबसे प्रभावशाली हथियार बनकर उभर रहा था लेकिन यही ‘तरुण गाथा’ हमें यह भी बताती है कि असाधारण सफलता और असाधारण पतन के बीच की दूरी कई बार बेहद कम होती है।

तरुण तेजपाल उस पीढ़ी के पत्रकार थे जिसने अखबारों के पारम्परिक ढांचे से बाहर निकलकर पत्रकारिता को आक्रामक बनाया। उन्होंने ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’, ‘इंडिया टुडे’ और ‘आउटलुक’ जैसे बड़े संस्थानों में काम किया। उनकी भाषा पर असाधारण पकड़ थी शायद अब भी होगी और सत्ता की कार्यप्रणाली को समझने की गहरी क्षमता भी लेकिन उन्हें केवल एक अच्छे रिपोर्टर या सम्पादक के रूप में याद नहीं किया जाता। उन्हें याद किया जाता है इसलिए कि उन्होंने वर्ष 2000 में ‘तहलका’ की स्थापना की और भारतीय खोजी पत्रकारिता की दिशा बदल दी।
उस समय इंटरनेट पत्रकारिता अपने शुरुआती चरण में थी। अधिकांश लोग इसे अखबारों का विकल्प नहीं मानते थे लेकिन तरुण तेजपाल ने इसे हथियार बनाया। तहलका ने शुरुआत से ही यह स्पष्ट कर दिया कि उसका लक्ष्य प्रेस विज्ञप्तियां छापना या नेताओं के बयान प्रकाशित करना नहीं बल्कि सत्ता की उन परतों को खोलना है जिन तक सामान्य पत्रकारिता की पहुंच नहीं होती और यहीं से शुरू हुई वह यात्रा जिसने तरुण तेजपाल को भारतीय
पत्रकारिता का सबसे चर्चित चेहरा बना दिया लेकिन यह भी उतना ही सच है कि तरुण तेजपाल को केवल स्टिंग ऑपरेशन का पत्रकार कहना उनके व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। वह मूलतः एक लेखक हैं। उनकी भाषा में साहित्य की संवेदनशीलता है और पत्रकारिता में वही साहित्यिक गहराई दिखाई देती थी। यही कारण था कि जब उन्होंने उपन्यास लेखन की ओर कदम बढ़ाया तो उन्हें केवल भारत में ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय साहित्य जगत में भी गम्भीरता से लिया गया।
वर्ष 2005 में प्रकाशित उनका पहला उपन्यास ‘द अल्केमी ऑफ डिजायर’ केवल एक प्रेम कहानी नहीं था। उसमें प्रेम, स्मृति, इतिहास, कामना और मनुष्य के भीतर चलने वाले अंतर्द्वंद्व का गहरा चित्रण था। यह उपन्यास कई देशों में प्रकाशित हुआ, अनेक भाषाओं में अनूदित हुआ और आलोचकों ने उसकी भाषा तथा कथ्य की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। इसके बाद वर्ष 2009 में प्रकाशित ‘द स्टोरी ऑफ माई असैसिन्स’ ने उन्हें विश्व साहित्य में स्थापित कर दिया। भारतीय समाज, अपराध, राजनीति और सत्ता की परतों को जिस तरह इस उपन्यास में उकेरा गया, उसने उन्हें समकालीन भारतीय अंग्रेजी साहित्य के प्रमुख रचनाकारों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। बाद में ‘द वैली आॅफ मास्क्स’ और ‘द लोन फाॅक्स डांसिंग’ जैसी कृतियों ने भी यह साबित किया कि तरुण तेजपाल केवल एक खोजी पत्रकार नहीं बल्कि एक गम्भीर चिंतक और कथाकार भी हैं।
यही कारण था कि एक समय भारतीय मीडिया जगत में तरुण तेजपाल को लेकर लगभग एक आभामंडल बन चुका था। युवा पत्रकार उन्हें आदर्श मानते थे। पत्रकारिता के विद्यार्थी उनके स्टिंग ऑपरेशनों का अध्ययन करते थे। साहित्य प्रेमी उनके उपन्यासों पर चर्चा करते थे। विश्वविद्यालयों में उन्हें व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाता था। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वे भारतीय मीडिया का प्रतिनिधित्व करते थे। ऐसा लगता था कि उन्होंने पत्रकारिता और साहित्य, दोनों क्षेत्रों में वह मुकाम हासिल कर लिया है जहां पहुंचना अधिकांश लोगों के लिए केवल सपना होता है लेकिन इतिहास बार-बार यह सिद्ध करता है कि किसी भी सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति की सबसे बड़ी पूंजी उसकी विश्वसनीयता होती है। प्रतिष्ठा वर्षों में बनती है किंतु ध्वस्त होने में एक क्षण भी नहीं लगता। तरुण तेजपाल के जीवन में वह क्षण नवम्बर 2013 में आया।
गोवा में आयोजित ‘थिंक फेस्ट’ उस समय देश के सबसे प्रतिष्ठित बौद्धिक आयोजनों में गिना जाता था। राजनीति, साहित्य, सिनेमा, उद्योग और मीडिया की बड़ी हस्तियां उसमें शामिल होती थीं। इसी आयोजन के दौरान ‘तहलका’ की एक युवा महिला सहकर्मी ने आरोप लगाया कि होटल की लिफ्ट में तरुण तेजपाल ने दो अलग-अलग अवसरों पर उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। आरोप सामने आते ही पूरा देश स्तब्ध रह गया। यह केवल इसलिए बड़ी खबर नहीं थी कि आरोपी एक प्रसिद्ध पत्रकार था बल्कि इसलिए भी कि वर्षों तक सत्ता, नैतिकता और जवाबदेही पर सवाल उठाने वाला व्यक्ति स्वयं कठघरे में खड़ा था।
इसके बाद घटनाएं तेजी से बदलती चली गईं। तरुण तेजपाल ने पहले स्वयं को सम्पादकीय जिम्मेदारियों से अलग करने की घोषणा की। फिर मामला पुलिस तक पहुंचा। एफआईआर दर्ज हुई, गिरफ्तारी हुई और लम्बी न्यायिक प्रक्रिया शुरू हुई। जो व्यक्ति कभी दूसरों से जवाब मांगता था, अब वही अदालत में अपने जवाब दे रहा था। मीडिया, जिसने वर्षों तक तरुण तेजपाल को नायक की तरह प्रस्तुत किया था, अब उसी मीडिया में उनके खिलाफ चल रहे मुकदमे की हर सुनवाई सुर्खियां बनने लगी।
यहीं से तरुण तेजपाल की निजी त्रासदी और भारतीय पत्रकारिता की सार्वजनिक बहस एक-दूसरे में घुलने लगी। सवाल केवल यह नहीं रह गया था कि अदालत क्या फैसला देगी। सवाल यह भी था कि क्या किसी व्यक्ति की असाधारण पेशेवर उपलब्धियां उसके निजी जीवन के गम्भीर आरोपों के सामने कोई महत्व रखती हैं? क्या महान पत्रकार होना किसी व्यक्ति के चरित्र का अंतिम प्रमाण है? फिर सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का पैमाना सभी के लिए समान होना चाहिए?
इन प्रश्नों के उत्तर अदालतें नहीं देती हैं। अदालत केवल कानून के आधार पर निर्णय देती है लेकिन समाज और इतिहास इन प्रश्नों पर लगातार विचार करते रहते हैं। न्यायिक प्रक्रिया लम्बी चली। इस दौरान यह मामला केवल एक आपराधिक मुकदमा नहीं रहा बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था, मीडिया और समाज, तीनों के लिए एक परीक्षा बन गया। एक ओर वे लोग थे जो इसे कार्यस्थल पर महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा से जुड़ा मामला मान रहे थे तो दूसरी तरफ वे लोग भी थे जो निष्पक्ष सुनवाई और अभियुक्त के कानूनी अधिकारों की बात कर रहे थे। लगभग आठ वर्षों तक चली सुनवाई के बाद निचली अदालत ने तरुण तेजपाल को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। उस फैसले ने भी कम विवाद पैदा नहीं किया। अनेक कानूनी विशेषज्ञों ने निर्णय की भाषा, पीड़िता के आचरण पर की गई टिप्पणियों और साक्ष्यों के मूल्यांकन पर गम्भीर प्रश्न उठाए। गोवा सरकार ने इस निर्णय को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
उच्च न्यायालय ने जब इस मामले की पुनः समीक्षा की तो उसने निचली अदालत की कई टिप्पणियों को स्वीकार नहीं किया है। अदालत ने कहा है कि किसी यौन अपराध की पीड़िता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह किसी पूर्व निर्धारित सामाजिक मानक के अनुरूप व्यवहार करे। भय, सदमा, अपराधबोध या सामान्य दिखने की कोशिश, इनमें से कोई भी प्रतिक्रिया अस्वाभाविक नहीं मानी जा सकती। न्यायालय ने यह भी माना कि साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन निचली अदालत द्वारा उचित ढंग से नहीं किया गया था। अंततः तरुण तेजपाल को दोषी ठहराते हुए दस वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है।
यहीं पर तरुण तेजपाल की कहानी एक गहरी विडम्बना बन जाती है। जिस व्यक्ति ने अपने पूरे पत्रकारिता जीवन में सत्ता से जवाबदेही की मांग की, वही अंततः स्वयं न्यायिक जवाबदेही के दायरे में आ गया। जिसने दूसरों के नैतिक आचरण पर सवाल उठाए, उसके अपने आचरण पर कानून ने अंतिम टिप्पणी कर दी। यह विडम्बना केवल तरुण तेजपाल की नहीं है बल्कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हर उस व्यक्ति की है जो यह मान बैठता है कि उसकी उपलब्धियां उसके निजी आचरण का कवच बन जाएंगी लेकिन इस पूरे प्रसंग का एक और पक्ष भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है।
तरुण तेजपाल के पतन के साथ ही भारतीय खोजी पत्रकारिता का वह दौर भी लगभग समाप्त हो चला है जिसने सत्ता को लगातार चुनौती दी थी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ‘तहलका’ के शुरुआती वर्षों के बाद भारतीय मीडिया धीरे-धीरे कॉरपोरेट नियंत्रण, टीआरपी की प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच उलझता चला गया। आज खोजी पत्रकारिता का स्थान धीरे-धीरे स्टूडियो बहसों, शोर-शराबे और वैचारिक ध्रुवीकरण ने ले लिया है। जिन स्टिंग ऑपरेशनों को कभी लोकतंत्र का सबसे प्रभावी औजार माना जाता था, वे बाद के वर्षों में कई बार ब्लैकमेल, सनसनी और टीआरपी के साधन के रूप में भी इस्तेमाल किए जाने लगे हैं। परिणाम यह हुआ कि स्टिंग पत्रकारिता की विश्वसनीयता भी अब प्रश्नचिन्हों के घेरे में आ चुकी है।
यही कारण है कि आज तरुण तेजपाल का मूल्यांकन करते समय केवल उनके अपराध या केवल उनकी उपलब्धियों को देखना पर्याप्त नहीं होगा। उनकी विरासत बहुआयामी है। उन्होंने भारतीय पत्रकारिता को निर्भीकता दी, सत्ता से सवाल पूछने का साहस दिया और खोजी पत्रकारिता को नई पहचान दी। साथ ही उन्होंने ऐसी कार्यशैली को भी लोकप्रिय बनाया जिसने पत्रकारिता की नैतिक सीमाओं को लेकर एक अंतहीन बहस छेड़ दी। इस बहस का कोई सरल निष्कर्ष नहीं है लेकिन इतना निश्चित है कि भारतीय मीडिया का इतिहास लिखते समय तरुण तेजपाल का नाम केवल एक व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि एक पूरे युग, उसकी उपलब्धियों, उसकी महत्वाकांक्षाओं और उसकी विफलताओं के प्रतीक के रूप में दर्ज किया जाएगा।

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