एक अदद बागी की कहानी

हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से शहर से निकलकर बिना किसी फिल्मी विरासत के बाॅलीवुड पर राज करने वाली कंगना रनौत आज भारतीय राजनीति की सबसे विवादित सांसदों में गिनी जाती हैं। अभिनय में राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली यह अभिनेत्री नेपोटिज्म के खिलाफ सबसे बुलंद आवाज बनी लेकिन कई बार अपने विवादित बयानों से खुद भी कटघरे में खड़ी हुई। आखिर कंगना एक साहसी कलाकार हैं, एक राजनीतिक योद्धा या अपने ही विरोधाभासों में उलझा हुआ व्यक्तित्व?

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के एक सामान्य परिवार में जन्मी कंगना रनौत का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। परिवार चाहता था कि वह पढ़ाई करें और एक सुरक्षित पेशा चुनें लेकिन कंगना ने अपनी राह खुद बनाने का फैसला किया। किशोरावस्था में ही घर छोड़कर दिल्ली और फिर मुम्बई का रुख करना उस समय किसी साधारण परिवार की लड़की के लिए बेहद कठिन निर्णय था।

मुम्बई ने उनका स्वागत खुले हाथों से नहीं किया। न उनके पास किसी बड़े फिल्मी परिवार का सहारा था, न कोई प्रभावशाली गाॅडफादर। हिंदी भाषा पर पकड़ सीमित थी, आर्थिक असुरक्षा अलग थी और फिल्म उद्योग में पैर जमाने की चुनौती अलग लेकिन कंगना के भीतर एक ऐसी बेचैनी थी जो उन्हें लगातार आगे बढ़ाती रही। यही बेचैनी आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान बनी।
संघर्ष के दिनों में उनका नाम अभिनेता आदित्य पंचोली के साथ जुड़ा। बाद में दोनों के रिश्तों में आई कड़वाहट सार्वजनिक विवाद में बदल गई। वर्षों बाद अभिनेता अध्ययन सुमन के साथ उनके सम्बंध और फिर अभिनेता ऋतिक रोशन के साथ चला लम्बा विवाद भी राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा। इन घटनाओं ने कंगना के निजी जीवन को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया। इन विवादों में अलग-अलग पक्षों के अपने दावे रहे और सच का फैसला पूरी तरह कभी नहीं हो सका लेकिन एक बात स्पष्ट रही कि कंगना ने कभी अपने जीवन के कठिन अध्यायों को छिपाने की कोशिश नहीं की।
शायद यही कारण है कि उनका व्यक्तित्व कई बार असहज करता है। अधिकांश सार्वजनिक हस्तियां अपने जीवन का एक चमकदार संस्करण दुनिया के सामने पेश करती हैं जबकि कंगना ने अपनी कमजोरियों को भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। उन्होंने स्वयं कई साक्षात्कारों में कहा कि संघर्ष के शुरुआती वर्षों में वे नशे की गिरफ्त में चली गई थीं और बाद में उन्होंने उस दौर से बाहर निकलने के लिए कठिन संघर्ष किया। भारतीय समाज में इस तरह की स्वीकारोक्ति दुर्लभ है और इसी कारण उनकी यह स्पष्टवादिता भी चर्चा का विषय बनी लेकिन यदि केवल विवादों के आधार पर कंगना का मूल्यांकन किया जाए तो यह उनके साथ अन्याय होगा। अभिनय के क्षेत्र में उन्होंने जो उपलब्धियां हासिल की, वे किसी भी कलाकार के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकती हैं।
‘फैशन’ ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई, ‘तनु वेड्स मनु’ ने उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाया और ‘क्वीन’ ने उन्हें हिंदी सिनेमा की सबसे सक्षम अभिनेत्रियों की श्रेणी में स्थापित कर दिया। बाद में ‘मणिकर्णिका’ जैसी फिल्मों ने भी यह साबित किया कि वह केवल ग्लैमर की अभिनेत्री नहीं बल्कि कठिन और चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं निभाने का साहस रखने वाली कलाकार हैं।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार केवल लोकप्रियता से नहीं मिलते। वे अभिनय की गुणवत्ता का प्रमाण होते हैं। कंगना उन चुनिंदा अभिनेत्रियों में हैं जिन्होंने बार-बार यह साबित किया कि प्रतिभा विरासत की मोहताज नहीं होती। शायद यही वजह है कि उनके कट्टर आलोचक भी उनके अभिनय पर उंगली उठाने से बचते हैं।
यहीं से कंगना की दूसरी कहानी शुरू होती है। एक ऐसी कहानी जिसमें कैमरे के सामने अभिनय करने वाली अभिनेत्री धीरे-धीरे वास्तविक जीवन में भी सत्ता, व्यवस्था और स्थापित समूहों से टकराने लगी। यही वह दौर था जब कंगना केवल फिल्म स्टार नहीं रहीं बल्कि एक सार्वजनिक विमर्श का विषय बन गईं। बाॅलीवुड से टकराव, राजनीति की राह और बढ़ते विवाद कंगना के करियर का सबसे बड़ा मोड़ केवल ‘क्वीन’ की सफलता नहीं थी। असली मोड़ तब आया जब उसने तय किया कि वह केवल फिल्मों में अभिनय नहीं करेगी बल्कि फिल्म उद्योग की स्थापित व्यवस्था को भी चुनौती देगी। यह चुनौती आसान नहीं थी क्योंकि बाॅलीवुड में वर्षों से ऐसे कई मुद्दे थे जिन पर सब धीरे-धीरे बात करते थे लेकिन खुलकर बोलने का साहस बहुत कम लोग जुटा पाते थे।
करण जौहर के लोकप्रिय टाॅक शो में कंगना ने पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर ‘नेपोटिज्म’ यानी परिवारवाद का मुद्दा उठाया। उसने करण जौहर को सीधे-सीधे ‘नेपोटिज्म का झंडाबरदार’ कहा। उस समय फिल्म उद्योग के बड़े हिस्से ने इसे एक विवादास्पद बयान माना और कंगना की आलोचना भी हुई लेकिन समय बीतने के साथ यही बहस पूरे देश में फैल गई। आज फिल्म उद्योग में परिवारवाद और अवसरों के असमान वितरण पर चर्चा होती है तो कंगना की उस शुरुआती लड़ाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यहीं कंगना का व्यक्तित्व दूसरे कलाकारों से अलग दिखाई देता है। वह उन मुद्दों पर बोलती है जिन पर बोलना जोखिम भरा होता है। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है लेकिन यही स्वभाव कई बार उसे ऐसे बयानों तक भी ले जाता है जो उसके विरोधियों को उसे कठघरे में खड़ा करने का अवसर दे देते हैं।
2020 में अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद कंगना फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गई। उसने फिल्म उद्योग की कार्यप्रणाली, कथित गुटबाजी, मानसिक दबाव और अवसरों की असमानता जैसे मुद्दों पर लगातार बयान दिए।
इसी दौर में महाराष्ट्र की तत्कालीन सरकार और शिवसेना के साथ उनका टकराव हुआ। मुम्बई को लेकर दिए गए एक बयान के बाद बृहन्मुम्बई महानगरपालिका ने उनके कार्यालय पर कार्रवाई की। सरकार ने इसे अवैध निर्माण के खिलाफ कदम बताया जबकि कंगना ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध कहा। बाद में अदालत ने कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठाए। इस पूरे विवाद ने कंगना को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया। वह अब केवल अभिनेत्री नहीं थीं बल्कि एक राजनीतिक प्रतीक बन चुकी थीं। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी से उनका जुड़ाव और लोकसभा चुनाव जीतकर संसद तक पहुंचना उनके सार्वजनिक जीवन का नया अध्याय बना। राजनीति में आने के बाद भी उनका अंदाज नहीं बदला। वह पहले की तरह ही बेबाक रहीं। कई बार उनके बयान विपक्ष के निशाने पर आए और कई बार उनके अपने राजनीतिक सहयोगियों के लिए भी असहज स्थिति पैदा करते रहे।
यहीं से कंगना के व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष सामने आता है। वह अपने समर्थकों को भी उतना ही चौंकाती हैं जितना विरोधियों को। वह किसी पारम्परिक राजनेता की तरह नपे-तुले शब्दों में बात नहीं करतीं। कई बार उनकी भाषा और उनकी शैली उनके तर्कों पर भारी पड़ जाती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उनका वह बयान था जिसमें उन्होंने कहा कि भारत को ‘वास्तविक आजादी’ 2014 के बाद मिली। यह टिप्पणी व्यापक विवाद का कारण बनी। हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं को लेकर कंगना द्वारा इस्तेमाल की गई आपत्तिजनक भाषा ने भी यही सवाल खड़ा किया। किसी आंदोलन से असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है लेकिन विरोध कर रहे युवाओं के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग लोकतांत्रिक संवाद की गरिमा को कमजोर करता है। एक सांसद के रूप में कंगना से अपेक्षा अधिक होती है। उनके शब्द केवल व्यक्तिगत राय नहीं रहते बल्कि सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन जाते हैं। यही वह बिंदु है जहां कंगना की आलोचना जरूरी हो जाती है।
निर्भीकता और अभद्रता में अंतर होता है। बेबाकी और गैर-जिम्मेदार बयान भी एक जैसी चीजें नहीं हैं। कंगना कई बार इस सीमा को पार कर जाती हैं और यही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी कमजोरी दिखाई देती है।
साहस, विरोधाभास और एक अधूरी कहानी कंगना रनौत का मूल्यांकन करना आसान नहीं है। उन्हें केवल एक अभिनेत्री, केवल एक सांसद या केवल एक विवादित सार्वजनिक हस्ती कह देना उनके पूरे व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। वे उन लोगों में हैं जिनके भीतर असाधारण प्रतिभा और असाधारण आवेग, दोनों साथ-साथ चलते हैं। यही कारण है कि उनकी हर उपलब्धि के साथ एक विवाद और लगभग हर विवाद के साथ एक उपलब्धि जुड़ी दिखाई देती है।
एक दिलचस्प प्रश्न यह भी है कि यदि कंगना किसी दूसरी राजनीतिक विचारधारा के साथ खड़ी होतीं तो क्या उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन अलग तरीके से होता? सम्भव है कि इसका उत्तर ‘हां’ हो। भारतीय राजनीति में अक्सर व्यक्तियों का आकलन उनकी पूरी यात्रा के आधार पर नहीं बल्कि उनकी राजनीतिक स्थिति के आधार पर किया जाता है। यही कारण है कि कंगना के समर्थक उनकी हर बात का बचाव करते दिखाई देते हैं जबकि उनके विरोधी कई बार उनकी हर उपलब्धि को भी केवल राजनीति के चश्मे से देखते हैं। दोनों स्थितियां लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकतीं। शायद कंगना की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे जोखिम उठाती हैं। वे अपने विचारों को लोकप्रिय बनाने के लिए नहीं बल्कि अपनी शैली में रखने के लिए जानी जाती हैं लेकिन जोखिम उठाने और संयम खो देने के बीच बहुत महीन रेखा होती है। कई बार कंगना उस रेखा को पार कर जाती हैं। यही उनके व्यक्तित्व का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
आज उनके पास सफल फिल्मों की लम्बी सूची है, राष्ट्रीय पुरस्कार हैं, संसद की सदस्यता है और करोड़ों समर्थकों के साथ करोड़ों आलोचक भी हैं लेकिन इन सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने भारतीय सार्वजनिक जीवन में अपनी अलग पहचान बनाई है। वे भीड़ का हिस्सा नहीं बनीं। उन्होंने हमेशा भीड़ से अलग खड़े होने की कोशिश की। यही कारण है कि उनके बारे में चर्चा कभी खत्म नहीं होती।
कंगना का भविष्य क्या होगा, यह कहना कठिन है। राजनीति में वे कितनी लम्बी पारी खेलेंगी, फिल्मों में फिर किस ऊंचाई तक पहुंचेगी या सार्वजनिक जीवन में उनकी भूमिका किस दिशा में जाएगी, इसका उत्तर समय देगा लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि कंगना रनौत अपने समय की सबसे प्रभावशाली और सबसे विवादास्पद सार्वजनिक हस्तियों में से एक हैं। इस पूरे सफर का निष्कर्ष शायद केवल इतना है कि कंगना को किसी एक खांचे में रखकर नहीं समझा जा सकता। वे साहसी भी हैं और कई बार उतावली भी। वे प्रतिभाशाली भी हैं और कई बार अपने ही शब्दों से स्वयं को नुकसान भी पहुंचा देती हैं। वे स्थापित व्यवस्थाओं को चुनौती देने का साहस रखती हैं लेकिन कई बार उसी साहस को संयम की जरूरत भी होती है। शायद यही कंगना की सबसे बड़ी खूबी भी है और सबसे बड़ी त्रासदी भी।
कंगना रनौत की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। इतिहास उनका अंतिम मूल्यांकन बाद में करेगा। फिलहाल इतना तय है कि वे भारतीय सार्वजनिक जीवन की उन दुर्लभ शख्सियतों में हैं, जिनके बारे में बहस खत्म होने का नाम नहीं लेती। शायद किसी प्रभावशाली सार्वजनिक व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान भी यही होती है।

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