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परेशानियों से घिरते जा रहे हैं नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली

नेपाल के प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली इन दिनों परेशानियों से जूझ रहे हैं। भारत के कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा जैसे इलाकों को नेपाल के नक्शे में शामिल किये जाने को लेकर उन पर इस बीच अपने देश के भीतर जबर्दस्त राजनीतिक दबाव रहा। पक्ष-विपक्ष ने एक स्वर में इसके लिए माहौल बनाया। इस दबाव से वे निकल ही नहीं पाए थे कि देश की जनता में चीन के बजाए भारत के साथ चलने की भावनाएं दिख रही हैं। इससे भी बड़ी परेशानी यह है कि कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर उनके खिलाफ असंतोष के स्वर तेज हो गए हैं।

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर ओली से इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि वे मनमाने तरीके से सरकार चला रहे हैं। यहां तक कि योग्य लोगों का हक मारकर अपने चहेतों को ऊंचे पदों पर बिठा रहे हैं। इस बारे में आगाह कराने पर भी उनका रवैया नहीं बदल रहा है। अप्रैल माह में हुई सचिवों की बैठक में भी उनके रवैये पर ऐतराज जताया गया था, लेकिन कुछ दिन बाद ही वे अपने ढर्रे पर सरकार चलाने लगे। कम्युनिष्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य हेमराज भंडारी ने नाराजगी जताई है कि वरिष्ठता क्रम में काफी नीचे होने के बावजूद ओली के निजी चिकित्सक डॉ दिब्या सिंह शाह को त्रिभुवन विश्वविद्यालय के चिकित्सा संस्थान का डीन नियुक्त किया गया। इससे पार्टी की भारी किरकिरी हुई है।

हेमराज भंडारी की तरह ही पार्टी की सांसद राम कुमारी झाकरी ने भी आक्रामक स्वर में नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा है कि ओली पार्टी की बैठकों से इसलिए बचते रहे हैं कि वे पार्टी नेताओं के सवालों का सामना नहीं कर सकते। उन्होंने यह तक शंका जाहिर की है कि 23 जून को स्थायी समिति की जो बैठक बुलाई गई है, जरूरी नहीं कि वह हो ही जाए। ऐसा इसलिए कि बैठक में नेता कोरोना वायरस को लेकर सरकार के खराब प्रदर्शन सहित कई अन्य मुद्दों पर प्रधानमंत्री ओली से सवाल पूछेंगे। इन सवालों से बचने के लिए बैठक रद्द हो सकती है।

ओली के लिए एक तरफ अपनी पार्टी के भीतर का संकट है तो दूसरी तरफ भारत-चीन के ताजा विवाद को लेकर नेपाल की जनता के बीच से भारत के पक्ष में जो भावनाएं प्रकट हुई हैं उन्हें भविष्य को लेकर नजरंदाज नहीं किया जा सकता। जनभावनाओं को देखते हुए कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल के नक्शे में शामिल करने के लिए उग्र तेवर दिखाते रहे नेताओं को भी अब सोचने को विवश होना पड़ रहा है। समझा जा रहा है कि वे खुलकर भारत के पक्ष में नरम रुख तो नहीं दिखा पा रहे हैं, लेकिन अन्य मुद्दों पर प्रधानमंत्री ओली को परेशान करते रहेंगे।

-दाताराम चमोली