हनुमान को अपनी जाति से जोड़ने की राजनीति

नई दिल्ली। राज्यों के विधानसभा चुनावों के वक्त हनुमान को लेकर शुरू हुई राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है। हालत यह है कि राजनेताओं में उन्हें अपनी जाति या समुदाय से जोड़ने की होड़ सी लगी हुई है। हर राजनेता उन्हें जाति या समुदाय से जोड़ने लगा है। विधानसभा चुनावों के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि ‘बजरंगबली एक ऐसे लोक देवता हैं, जो स्वंय वनवासी हैं, निर्वासी हैं, दलित हैं, वंचित हैं। भारतीय समुदाय को उत्तर से लेकर दक्षिण तक पूरब से पश्चिम तक सबको जोड़ने का काम बजरंगबली करते हैं।’ तब उनकी इस बात को आदिवासियों और दलितों के वोट भुनाने की रणनीति के तौर पर देखा गया था। अब तो हालत यह है कि भाजपा के विधायक से लेकर मंत्री तक हनुमान को खुद से जोड़ने लगे हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री चौधरी लक्ष्मी नारायण का मानना है कि

‘हनुमान जी जाट थे, क्योंकि किसी को भी परेशानी या फिर मुश्किल में पड़ा देखकर जाट किसी को जाने बिना भी बचाने के लिए कूद पड़ता है।’

इससे पहले भारतीय जनता पार्टी के विधायक बुक्कल नवाब ने कहा कि हनुमान जी मुसलमान थे। उनका तर्क है कि मुसलमानों में रहमान, रमज़ान, फरमान, ज़ीशान, कुर्बान जैसे जितने भी नाम रखे जाते हैं, वे हनुमान जी के नाम पर ही रखे जाते हैं। बुक्कल के मुताबिक करीब 100 नाम ऐसे हैं, जो हनुमानजी पर ही आधारित हैं। हिंदू भाई हनुमान जी नाम रख लेंगे, लेकिन अरमान, रहमान, रमजान नहीं रख सकते।
खास बात यह है कि भाजपा के यूपी के विधायक और मंत्री हीं नहीं, बल्कि केंद्रीय मंत्री भी हनुमान को लेकर अपनी राय जाहिर करने में पीछे नहीं रहे हैं। केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह ने कहा कि ‘भगवान राम और हनुमान जी के युग में इस देश में कोई जाति व्यवस्था नहीं थी, कोई दलित, वंचित, शोषित नहीं था। हनुमान जी आर्य थे। इस बात को मैंने स्पष्ट किया है, उस समय आर्य जाति थी और हनुमान जी उसी आर्य जाति के महापुरुष थे।’

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