मोदी कैबिनेट में बदलेंगे कई चेहरे?

नई भाजपा संगठनात्मक टीम के गठन बाद मोदी कैबिनेट में फेरबदल को लेकर सियासी चर्चाएं फिर तेज हो गई हैं। हालांकि सरकार की ओर से कैबिनेट विस्तार या फेरबदल को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर कयासबाजी जारी है। सवाल है कि भाजपा की नई संगठनात्मक टीम के बाद क्या मोदी सरकार में भी बदलाव का अगला दौर शुरू होगा? अगर फेरबदल होता है तो उसका असर केवल सरकार के कामकाज पर नहीं बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति पर भी दिखाई दे सकता है। सियासी जानकारों का मानना है कि संगठन में बदलाव के बाद सरकार में भी जिम्मेदारियों की समीक्षा सम्भव है। खासकर उन मंत्रियों के कामकाज का आकलन किया जा सकता है, जिनके पास एक से अधिक मंत्रालय हैं या जिनसे चुनावी राज्यों में अपेक्षित राजनीतिक परिणाम की उम्मीद की जा रही है। क्योंकि अगले साल 2027 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड , पंजाब, गुजरात और अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखते हुए मंत्रिमंडल में क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश भी हो सकती है। कुछ नए चेहरों को सरकार में जगह देकर संगठन में किए गए बदलावों के साथ तालमेल बैठाने की सम्भावना जताई जा रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह भी है कि अनुभवी नेताओं को संगठन की जिम्मेदारी देकर सरकार में अपेक्षाकृत युवा चेहरों को आगे लाया जा सकता है। वहीं कुछ मंत्रियों के विभाग बदले जा सकते हैं।

साथ आएंगे भाजपा और अकाली?

पंजाब की राजनीति में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच एक बार फिर नजदीकियों की चर्चा तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल की हालिया मुलाकात के बाद आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पुराने सहयोगियों के फिर साथ आने की अटकलें जोर पकड़ रही हैं। दोनों दलों का करीब दो दशक से ज्यादा पुराना गठबंधन 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर टूट गया था। इन कयासों को उस समय और बल मिला जब मोदी से मुलाकात के अगले दिन अकाली दल ने परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों का समर्थन किया। राजनीतिक हलकों में इसे महज संसदीय रुख में बदलाव के बजाय सम्भावित राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा गया। कांग्रेस ने भी आरोप लगाया कि अकाली दल भाजपा के साथ फिर गठबंधन की जमीन तैयार कर रहा है। हालांकि अकाली दल ने गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। दूसरी ओर भाजपा की ओर से इन अटकलों को खारिज किया जा रहा है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा है कि पंजाब में भाजपा का गठबंधन जनता के साथ है। पंजाब भाजपा की ओर से भी सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कही गई है लेकिन राजनीतिक गणित दोनों दलों को करीब आने के लिए मजबूर कर सकता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में अकेले उतरने के बाद अकाली दल का वोट शेयर घटकर 13.42 प्रतिशत रह गया और उसे सिर्फ एक सीट मिली तो भाजपा भी पंजाब में अपने संगठन और जनाधार को विस्तार देने की कोशिश कर रही है। दोनों के पास अलग-अलग ताकतें हैं, जिन्हें साथ लाकर चुनावी लाभ लेने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ा सवाल सीट बंटवारे और नेतृत्व का होगा। भाजपा अब पहले की तुलना में पंजाब में ज्यादा सीटों पर अपना दावा कर सकती है, जबकि अकाली दल अपने पारम्परिक प्रभाव वाले क्षेत्रों को छोड़ना नहीं चाहेगा। अगर भाजपा और अकाली दल फिर साथ आते हैं तो पंजाब की त्रिकोणीय राजनीति और दिलचस्प हो सकती है लेकिन मौजूदा सार्वजनिक बयानों को देखते हुए गठबंधन को अभी तय मान लेना जल्दबाजी होगी। इतना जरूर है कि मोदी-बादल मुलाकात ने पंजाब की सियासत में पुराने रिश्ते की वापसी का सवाल फिर जिंदा कर दिया है।

भारत रत्न की डिमांड, करेगी काम तमाम

भारत रत्न की मांग अब सिर्फ सम्मान का मुद्दा नहीं रह गई है। ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, अन्नाभाऊ साठे, तुकडोजी महाराज, कांशीराम और रामविलास पासवान के नाम सामने आने से इसके पीछे सामाजिक समीकरण, राजनीतिक विरासत और वोटबैंक की राजनीति के कयास लगाए जा रहे हैं। महाराष्ट्र में फुले दम्पति, अन्नाभाऊ साठे और तुकडोजी महाराज के नाम के जरिए सामाजिक न्याय और बहुजन राजनीति को साधने की कोशिश दिख रही है। वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार में कांशीराम और रामविलास पासवान की विरासत को लेकर राजनीतिक दावेदारी महत्वपूर्ण हो सकती है। राजनीतिक नफा-नुकसान की बात करें तो कांशीराम की विरासत पर दूसरे दलों की सक्रियता बसपा के लिए चुनौती बन सकती है। रामविलास पासवान को भारत रत्न देने की मांग चिराग पासवान के लिए अपने पिता की विरासत और दलित राजनीति पर पकड़ मजबूत करने का अवसर बन सकती है। महाराष्ट्र में फुले और अन्नाभाऊ साठे जैसे नामों के जरिए विपक्ष सामाजिक न्याय के मुद्दे को मजबूत कर सकता है, जबकि भाजपा के लिए इन मांगों को समर्थन देना नए सामाजिक समीकरण साधने का अवसर हो सकता है। यानी भारत रत्न की मांग जितनी सम्मान की राजनीति है, उतनी ही विरासत पर राजनीतिक अधिकार की लड़ाई भी बन सकती है। सवाल यह नहीं कि भारत रत्न किसे मिलेगा बल्कि यह है कि इन महापुरुषों की विरासत का राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा और किसके वोट बैंक में सेंध लगेगी?

यूपी में भाजपा का बड़ा प्लान क्या?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी अभी से राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा एजेंडा बनती जा रही है। इसी कड़ी में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की यूपी के करीब 20 सांसदों के साथ अलग-अलग मुलाकातों ने सियासी हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। सवाल  है कि आखिर भाजपा नेतृत्व को सांसदों से अलग-अलग बात करने की जरूरत क्यों महसूस हुई? आखिर यूपी को लेकर भाजपा का बड़ा प्लान क्या है?
राजनीतिक पंडित कहते हैं कि पार्टी 2027 की चुनावी रणनीति तैयार करने से पहले हर लोकसभा क्षेत्र की जमीनी तस्वीर अलग-अलग समझना चाहती है। खासकर कौन-सा सामाजिक वर्ग किस तरफ जा रहा है, किन इलाकों में संगठन कमजोर है और मौजूदा विधायकों तथा सम्भावित उम्मीदवारों को लेकर जनता और कार्यकर्ताओं की क्या राय है जैसे सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक समीकरण को साधने की भी है। उत्तर प्रदेश में दलित वोट को लेकर सभी प्रमुख दलों की सक्रियता बढ़ी हुई है। बसपा के कमजोर पड़ने से पैदा हुए राजनीतिक स्पेस पर भाजपा, सपा और कांग्रेस की नजर है जबकि चंद्रशेखर आजाद भी दलित राजनीति में अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में भाजपा की रणनीति केवल अपने पारम्परिक समर्थक वर्ग को मजबूत करने तक सीमित रहने के बजाय नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाने की हो सकती है। सांसदों से सम्भावित उम्मीदवारों और मौजूदा विधायकों के बारे में राय लेने की खबरें बताती हैं कि पार्टी इस बार टिकट वितरण में स्थानीय फीडबैक को ज्यादा महत्व देने पर विचार कर सकती है। यदि ऐसा हुआ तो कई मौजूदा विधायकों के टिकट पर भी शुरुआती स्तर से ही समीक्षा सम्भव है। इसके अलावा नितिन नवीन की यह कवायद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा के चुनावी मॉडल को और मजबूत करने की तैयारी के तौर पर भी देखी जा रही है। पार्टी पहले ही संगठन, वरिष्ठ नेताओं और एनडीए सहयोगियों के साथ रणनीतिक बैठकों का दौर चला चुकी है। भाजपा 2027 की लड़ाई को आखिरी समय की चुनावी कवायद नहीं बनाना चाहती। सांसदों से फीडबैक, जातीय गणित की पड़ताल और संगठन की कमजोर कड़ियों की पहचान संकेत दे रहे हैं कि पार्टी चुनावी तैयारी को कई महीने पहले से बूथ स्तर तक ले जाने की रणनीति बना रही है। अब देखना यह होगा कि इस फीडबैक का असर टिकट वितरण, संगठनात्मक बदलाव और सहयोगी दलों के साथ सीटों के समीकरण पर कितना पड़ता है।

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