सड़कों तक पहुंचेगा सदन का संघर्ष?
संसद का मॉनसून सत्र 13 अगस्त को हंगामे, नारेबाजी और सत्ता पक्ष-विपक्ष के तीखे टकराव के बीच समाप्त हो गया है। 25 दिनों में 19 बैठकें हुईं और दोनों सदनों में विपक्ष के लगातार विरोध के कारण कामकाज प्रभावित रहा। लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत रहने की बात सामने आई है। सरकार ने जहां विपक्ष पर चर्चा से भागने और सदन को बाधित करने का आरोप लगाया, वहीं विपक्ष ने दावा किया कि उसकी एकजुटता के कारण सरकार कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों को आगे नहीं बढ़ा सकी। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या संसद का यह टकराव अगले कुछ दिनों में सड़क की राजनीति में बदलने वाला है? संसद में मिली कथित बढ़त को क्या विपक्ष सड़क पर भुनाने की कोशिश करेगा? क्या सभी विपक्षी दल एक मंच पर रहेंगे? क्या विपक्ष केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया तक सीमित रहेगा या फिर बेरोजगारी, परीक्षा पेपर लीक, छात्र आंदोलनों, मतदाता सूची और कथित लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे मुद्दों को लेकर संयुक्त प्रदर्शन करेगा? ऐसे कई प्रश्न राजनीतिक गलियारों में उभर रहे हैं।
गौरतलब है कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल मानसून सत्र को पूरी तरह विफल मानने के बजाय इसे अपनी रणनीतिक सफलता के तौर पर पेश कर रहे हैं। विपक्ष का दावा है कि एकजुट विरोध के कारण सरकार को कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों को टालना पड़ा। इनमें परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव और एफसीआरए संशोधन जैसे मुद्दे भी शामिल हैं। मानसून सत्र के दौरान छात्र आंदोलनों और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल विपक्ष के प्रमुख हथियार बने। दिल्ली में छात्रों के विरोध- प्रदर्शन पर कार्रवाई को लेकर विपक्ष लगातार सरकार से जवाब मांगता रहा। झारखंड में भी भर्ती परीक्षाओं और कथित पेपर लीक को लेकर युवाओं का आंदोलन तेज हुआ और 10 अगस्त को प्रदर्शनकारियों तथा पुलिस के बीच टकराव की स्थिति बनी। ऐसे में विपक्ष के सामने एक ऐसा मुद्दा है जो सीधे युवाओं से जुड़ता है।
राजनीतिक तौर पर यह कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के लिए आकर्षक हो सकता है क्योंकि बेरोजगारी और प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं का मुद्दा देश के कई राज्यों में युवाओं को प्रभावित करता है। विपक्षी खेमे में इसे सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने की सफलता के तौर पर देखा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष को लगता है कि संसद के भीतर एकजुटता ने सरकार को रक्षात्मक स्थिति में पहुंचाया है तो सम्भव है कि वह इसी रणनीति को संसद के बाहर आजमाने पर विचार करे लेकिन विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती उसकी अपनी एकजुटता है। संसद सत्र के दौरान कई मुद्दों पर दल साथ दिखाई दिए। इंडिया ब्लाॅक के भीतर रणनीति को लेकर मतभेद भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। हाल में डीएमके की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि वह विपक्ष का हिस्सा है लेकिन इंडिया गठबंधन की बैठकों में उसकी सक्रिय भागीदारी को लेकर अलग स्थिति रही। इसलिए सड़क पर उतरने की स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, वाम दल और दूसरे विपक्षी दल एक साझा कार्यक्रम पर सहमत हो पाएंगे? यदि सभी दल एक मंच पर आते हैं तो कांग्रेस इसे विपक्षी एकता की बड़ी
राजनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश कर सकती है। यदि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग मुद्दों पर अलग रणनीति अपनाई गई तो विपक्षी एकजुटता पर फिर सवाल उठ सकते हैं।
राजनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश कर सकती है। यदि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग मुद्दों पर अलग रणनीति अपनाई गई तो विपक्षी एकजुटता पर फिर सवाल उठ सकते हैं।
खासकर कांग्रेस के लिए संसद के बाद की राजनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी को अपनी भूमिका केवल मुख्य विपक्षी दल के रूप में नहीं बल्कि विपक्षी गठबंधन के समन्वयक के रूप में भी साबित करना है। संसद में कांग्रेस ने आक्रामक रुख अपनाया और पार्टी नेतृत्व ने इसे सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर पेश किया। अब यदि सड़क पर आंदोलन होता है तो कांग्रेस को यह तय करना होगा कि आंदोलन का नेतृत्व पार्टी अपने हाथ में रखे या सहयोगी दलों को बराबर स्थान दे। दोनों रास्तों में राजनीतिक जोखिम हैं। अपने दम पर आंदोलन करने पर कांग्रेस को विपक्षी एकता के सवाल का सामना करना पड़ सकता है जबकि सभी दलों को बराबर जगह देने पर कांग्रेस की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और संदेश कमजोर पड़ने की आशंका रहेगी।
दूसरी तरफ भाजपा भी खाली मैदान छोड़ने के मूड में नहीं है। उसने मानसून सत्र के गतिरोध की जिम्मेदारी विपक्ष पर डालनी शुरू कर दी है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर चर्चा से बचने और सदन की कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगाया है। इसका अर्थ साफ है कि यदि विपक्षी गठबंधन सड़क पर उतरता है तो भाजपा भी उसे राजनीतिक रूप से जवाब देने की कोशिश करेगी। सत्ता पक्ष विपक्ष के आंदोलन को विकास और विधायी कामकाज रोकने की राजनीति के रूप में पेश कर सकता है। ऐसी स्थिति में संसद बनाम सड़क, सरकार बनाम विपक्ष और विकास बनाम विरोध जैसे राजनीतिक नैरेटिव आमने-सामने आ सकते हैं। अब सत्ता पक्ष की विपक्षी दलों की बैठकों और अनौपचारिक रणनीतिक बातचीत पर नजर रहेगी। यदि संसद के भीतर बनी एकजुटता को बनाए रखने का फैसला होता है तो किसी साझा मुद्दे पर संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस, देशव्यापी अभियान या प्रदर्शन की रूपरेखा सामने आ सकती है। फिलहाल इंडिया गठबंधन की ओर से देशव्यापी आंदोलन की कोई अंतिम घोषणा नहीं हुई है लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां इस सम्भावना को जरूर हवा दे रही हैं। संसद परिसर में सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों के बीच आमने-सामने विरोध-प्रदर्शन ने यह संकेत जरूर दिया कि दोनों खेमों के बीच दूरी और बढ़ी है।
