सवाल पूछती पीढ़ी, डरती सत्ता

सवाल पूछती पीढ़ी, डरती सत्ता

अल्मोड़ा जनपद की सल्ट विधानसभा के विधायक महेश जीना की राजनीति में उनके बयान और उनकी भाषा अक्सर चर्चा का विषय बने रहते हैं। किसी जनप्रतिनिधि का राजनीतिक रूप से आक्रामक होना अपने आप में कोई समस्या नहीं है। लोकतांत्रिक राजनीति में तीखे सवाल भी होते हैं, तीखी आलोचना भी होती है और राजनीतिक संघर्ष भी होता है लेकिन जब भाषा गाली-गलौज, अपमान और कथित धमकी तक पहुंचती दिखाई दे तो यह केवल किसी व्यक्ति के निजी स्वभाव का प्रश्न नहीं रह जाता। महेश जीना से जुड़े कथित ऑडियो और वीडियो पहले भी सामने आते रहे हैं जिनमें अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते वे सुनाई देते हैं। आखिर एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि की सार्वजनिक भाषा कैसी होनी चाहिए? स्मरण रहे विधायक विधानसभा में या किसी भी सार्वजनिक स्थान पर केवल अपने लिए नहीं बोलता। उसके शब्द उसके पद की गरिमा और उस राजनीतिक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसका वह हिस्सा है।

यही कारण है कि महेश जीना के ताजातरीन वायरल वीडियो को केवल एक विवादित बयान मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। इस वीडियो में वे अपने क्षेत्र के एक व्यक्ति से बेहद अमर्यादित भाषा में बात करते सुने जा सकते हैं। इसके बाद दिए एक साक्षात्कार में वे नेपाल के घटनाक्रम का जिक्र करते हुए कह रहे हैं कि ‘‘नेपाल में दंगा करके सत्ता बदली गई और भारत में भी कुछ लोग वैसा ही चाहते हैं।’’ इस कथन का सबसे गम्भीर पहलू नेपाल से ज्यादा भारत को लेकर है। सवाल यह नहीं है कि नेपाल में क्या हुआ। सवाल यह है कि भारत में एक जनप्रतिनिधि को अपनी ही नई पीढ़ी की बेचैनी में सबसे पहले दंगे की सम्भावना क्यों दिखाई देती है?

क्या हर आंदोलन सत्ता पलटने की साजिश है? क्या हर विरोध अराजकता है? क्या सरकार से सवाल करने वाला हर युवा किसी राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा है? क्या सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी व्यक्त करने वाली पीढ़ी लोकतंत्र के लिए खतरा है? क्या सत्ता के खिलाफ असहमति को देखकर सबसे पहले कानून- व्यवस्था का संकट दिखाई देना राजनीतिक दृष्टि का विस्तार है या सत्ता के अहंकार का? इन सवालों से बचा नहीं जा सकता।
नेपाल में सितम्बर 2025 में ‘जेन जी’ के नेतृत्व में हुआ आंदोलन हिंसक भी हुआ था। सरकारी इमारतों और राजनीतिक प्रतिष्ठानों पर हमले हुए, आगजनी हुई, लोगों की जान गई और देश गम्भीर राजनीतिक संकट में पहुंच गया। इसलिए हिंसा को किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता लेकिन नेपाल के घटनाक्रम को केवल ‘दंगा करके सत्ता बदल दी गई’ कह देना भी उतना ही अधूरा निष्कर्ष है। आंदोलन की तत्काल वजह सोशल मीडिया पर सरकारी प्रतिबंध का विरोध थी लेकिन इसके पीछे भ्रष्टाचार, राजनीतिक विशेषाधिकार, बेरोजगारी, अवसरों की कमी और शासन व्यवस्था के प्रति बढ़ता असंतोष लम्बे समय से जमा था। अंततः प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा।

किसी भी लोकतांत्रिक समाज में यह समझना जरूरी है कि हिंसा और असहमति दो अलग चीजें हैं। हिंसा अपराध हो सकती है लेकिन असहमति अपराध नहीं है। दंगा कानून-व्यवस्था का प्रश्न है लेकिन शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का अधिकार है। सत्ता परिवर्तन की इच्छा कोई अपराध नहीं है। हिंसक तरीके से सत्ता परिवर्तन की कोशिश और चुनाव के जरिए सरकार बदलने की लोकतांत्रिक इच्छा के बीच बहुत बड़ा अंतर है।

भारत में यह अंतर और भी महत्वपूर्ण है। भारत का संविधान नागरिक को सरकार की आलोचना करने से नहीं रोकता। नागरिक को अपनी राजनीतिक पसंद रखने का अधिकार है। उसे यह कहने का अधिकार है कि वह वर्तमान सरकार से खुश नहीं है। उसे यह कहने का अधिकार है कि अगली बार दूसरी सरकार होनी चाहिए। राजनीतिक दलों का अस्तित्व ही इस राजनीतिक सम्भावना पर टिका है कि सत्ता बदली जा सकती है।
अगर सत्ता बदलने की इच्छा ही अपराध होती तो लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं बचता। आज जो सत्ता में है, वह हमेशा सत्ता में नहीं रहेगा। आज जो विपक्ष में है, वह हमेशा विपक्ष में नहीं रहेगा।

लोकतंत्र का सबसे सुंदर और सबसे कठिन सत्य यही है कि सत्ता स्थायी नहीं होती। जनता स्थायी है। संविधान स्थायी है। लोकतांत्रिक संस्थाएं स्थायी हैं। सरकारें आती-जाती हैं लेकिन जब सत्ता में बैठे लोगों को अपनी आलोचना में सत्ता पलटने की साजिश दिखाई देने लगे तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ने लगता है। यही वह जगह है जहां महेश जीना का बयान एक व्यक्ति की टिप्पणी से आगे निकल जाता है।

गाली का जवाब गाली से देना राजनीतिक बहस को नीचे ले जाता है। धमकी का जवाब धमकी से देना लोकतंत्र को कमजोर करता है। असहमति का जवाब उसे ‘दंगा’ कहकर देना राजनीतिक संवाद के दरवाजे बंद करता है। जनप्रतिनिधि की भाषा इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है। विधायक जब किसी मंच से बोलता है तो उसके पीछे उसका पद खड़ा होता है। वह चाहे विधानसभा के भीतर बोले या किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में, उसके शब्दों को जनता सामान्य व्यक्ति के शब्दों की तरह नहीं सुनती। इसलिए जनप्रतिनिधि की भाषा में राजनीतिक संयम की अपेक्षा करना कोई आदर्शवादी मांग नहीं है। यह लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। राजनीति में संघर्ष होना चाहिए लेकिन संघर्ष की भाषा भी लोकतांत्रिक होनी चाहिए।

महेश जीना के कथित पुराने ऑडियो और वीडियो इसी संदर्भ में चर्चा के योग्य हैं। किसी रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता का अंतिम निर्णय जांच का विषय हो सकता है लेकिन यदि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि की पहचान बार-बार अपमानजनक या आक्रामक भाषा से बनने लगे तो राजनीतिक दलों को भी यह सोचना चाहिए कि जनप्रतिनिधियों से सार्वजनिक व्यवहार की कैसी अपेक्षा की जानी चाहिए। राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी केवल चुनाव जिताने की नहीं है। राजनीतिक संस्कृति बनाने की भी है। यदि कोई नेता लोकप्रिय है, चुनाव जीतता है और संगठन में प्रभावशाली है तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसके शब्दों की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र में जनादेश व्यक्ति को जनता के ऊपर खड़े होने का अधिकार नहीं देता बल्कि जनादेश उसके ऊपर अतिरिक्त जिम्मेदारी डालता है। यही सत्ता और जनादेश के बीच का फर्क है। जनादेश सत्ता देता है लेकिन मर्यादा भी मांगता है।

युवा हमेशा व्यवस्था के सबसे बेचैन हिस्से रहे हैं। इतिहास गवाह है कि दुनिया में बड़े राजनीतिक और सामाजिक बदलावों के पीछे युवाओं की भूमिका रही है लेकिन हर युवा आंदोलन लोकतांत्रिक नहीं होता और हर आंदोलन अहिंसक भी नहीं होता। इसलिए विवेकपूर्ण दृष्टि यही होगी कि हिंसा की निंदा की जाए लेकिन युवाओं की जायज शिकायतों को भी सुना जाए।

यदि कोई युवा सरकार से पूछता है कि रोजगार कहां है, परीक्षा व्यवस्था पारदर्शी क्यों नहीं है, शिक्षा इतनी महंगी क्यों है, स्वास्थ्य सुविधाएं क्यों कमजोर हैं या भ्रष्टाचार पर कार्रवाई क्यों नहीं होती तो उसका जवाब आंकड़ों और नीतियों के माध्यम से दिया जाना चाहिए। उसे यह बताना कि वह किसी दूसरे देश की नकल करके सत्ता बदलना चाहता है, उसके सवाल को खत्म नहीं करता बल्कि इससे एक और बड़ा सवाल पैदा होता है कि क्या सत्ता के पास उसके सवालों का जवाब नहीं है?

गाली-गलौज की राजनीति अंततः तर्क की राजनीति को कमजोर करती है। जिस समाज में राजनीतिक बहस में गाली सामान्य होने लगे, वहां धीरे-धीरे विचार पीछे और व्यक्तिगत दुश्मनी आगे आ जाती है। राजनीति मुद्दों से हटकर व्यक्तियों पर केंद्रित हो जाती है। जनता यह भूल जाती है कि सवाल क्या था और इस बात पर बहस शुरू हो जाती है कि किसने किसे क्या कहा। यह लोकतंत्र के लिए कोई उपलब्धि नहीं है।

उत्तराखण्ड जैसे राज्य में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। पहाड़ की राजनीति लम्बे समय से जनता और जनप्रतिनिधि के बीच निकट सम्बंध पर आधारित रही है। यहां विधायक और जनता के बीच दूरी महानगरों जैसी नहीं है। गांव का व्यक्ति अपने विधायक को सीधे मिल सकता है, अपनी समस्या बता सकता है और सवाल पूछ सकता है। ऐसे में जनप्रतिनिधि की भाषा में सम्मान और संवाद की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
सल्ट के मतदाताओं ने महेश जीना को अपना प्रतिनिधि चुना है। यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है लेकिन वही लोकतंत्र उन्हें यह अधिकार भी देता है कि वे अपने प्रतिनिधि से सवाल पूछें।

प्रतिनिधि का काम सवाल पूछने वालों को चुप कराना नहीं, उनके सवालों का जवाब देना है। जनता किसी विधायक की प्रजा नहीं होती। विधायक जनता का प्रतिनिधि होता है। यह छोटा-सा अंतर लोकतंत्र का सबसे बड़ा सत्य है। भारत में लोकतंत्र की ताकत यही है कि यहां सत्ता बदलने का रास्ता संविधान ने तय कर रखा है। चुनाव हैं। विपक्ष है।

न्यायपालिका है। मीडिया है। नागरिक समाज है। सड़क पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है। इसलिए सत्ता को हर राजनीतिक असहमति में नेपाल जैसा संकट तलाशने की जरूरत नहीं है बल्कि जरूरत है कि सत्ता अपनी भाषा पर भी उतना ही ध्यान दे जितना अपने विरोधियों की भाषा पर देती है क्योंकि लोकतंत्र में केवल यह महत्वपूर्ण नहीं कि सरकार क्या करती है। यह भी महत्वपूर्ण है कि सत्ता अपने नागरिकों से किस भाषा में बात करती है।

महेश जीना का बयान इसी सवाल को सामने लाता है। उनके पुराने कथित अभद्र भाषा वाले विवाद इस सवाल को और गम्भीर बना देते हैं। यदि जनप्रतिनिधि की भाषा लगातार आक्रामक होती जाती है तो अंततः नुकसान केवल उस नेता की छवि का नहीं होता। इससे पूरी राजनीतिक संस्कृति प्रभावित होती है। आज अगर गाली राजनीति की भाषा बनती है तो कल धमकी सामान्य लगेगी। उसके बाद असहमति को देश द्रोह कहा जाना आसान होगा और अंततः नागरिक के सवाल को ही व्यवस्था के खिलाफ अपराध मान लिया जाएगा। इसलिए सवाल महेश जीना से शुरू होकर महेश जीना पर खत्म नहीं होना चाहिए। सवाल इससे बहुत बड़ा है। सत्ता को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में जनता केवल तालियां बजाने के लिए नहीं होती। जनता सवाल करने के लिए भी होती है। युवा केवल चुनाव के समय पोस्टर लगाने और नारे लगाने के लिए नहीं हैं। वे अपनी जिंदगी, अपने भविष्य और अपने देश की दिशा पर सवाल करने के अधिकार के साथ पैदा हुए हैं। उन्हें जवाब चाहिए, उन्हें सम्मान चाहिए, उन्हें अवसर चाहिए और उन्हें यह भरोसा चाहिए कि सरकार से असहमति रखने के कारण उन्हें संदेह की नजर से नहीं देखा जाएगा क्योंकि लोकतंत्र में सरकार बदलने की इच्छा अपराध नहीं है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *