युवाओं की बेचैनी को राहुल ने बनाया हथियार

कोटा से देहरादून और अब प्रयागराज तक युवाओं से लगातार संवाद कर रहे राहुल गांधी क्या बेरोजगारी, पेपर लीक और शिक्षा के संकट को राजनीतिक ताकत में बदल पाएंगे? युवाओं के बीच उनकी बढ़ती जुगलबंदी ने भाजपा के लिए भी नई चुनौती खड़ी कर दी है

राहुल गांधी की प्रयागराज रैली को केवल कांग्रेस का एक और राजनीतिक कार्यक्रम मानना शायद इस घटनाक्रम को कम करके आंकना होगा। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में जिस वर्ग की बेचैनी लगातार बढ़ी है, वह युवा है, विशेषकर वह युवा जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है, वर्षों तक नौकरी की तलाश में लगा रहता है, फीस और कोचिंग का बोझ उठाता है और फिर कभी पेपर लीक, कभी परीक्षा रद्द होने, कभी भर्ती प्रक्रिया में देरी और कभी परिणामों की अनिश्चितता से अपने भविष्य को अटकता हुआ देखता है। राहुल गांधी ने इसी बेचैनी को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की है।

‘छात्रों की गूंज’ अभियान की शुरुआत कोटा से हुई थी। इसके बाद देहरादून और अब प्रयागराज में राहुल गांधी ने युवाओं के बीच जाकर उनसे सीधे संवाद किया। तीनों जगह मुद्दे लगभग एक जैसे रहे। पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी, महंगी शिक्षा, भर्ती में देरी और युवाओं के भविष्य की चिंता। प्रयागराज को इस अभियान के अगले बड़े पड़ाव के रूप में चुनना भी प्रतीकात्मक है क्योंकि यह शहर देश की प्रतियोगी परीक्षा संस्कृति और विश्वविद्यालयी राजनीति के इतिहास में विशेष स्थान रखता है।
रैली से पहले ही बढ़ा राजनीतिक तापमान
प्रयागराज पहुंचने से पहले ही इस कार्यक्रम ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया। कार्यक्रम की अनुमति को लेकर विवाद हुआ। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक दबाव से जोड़कर देखा जबकि राहुल गांधी के आलोचकों ने उनकी राजनीति पर सवाल उठाए। कार्यक्रम से पहले शहर में राहुल गांधी को निशाना बनाते हुए पोस्टर भी लगाए गए। यानी राहुल के मंच पर पहुंचने से पहले ही ‘छात्रों की गूंज’ एक राजनीतिक टकराव का विषय बन चुकी थी लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का असली महत्व किसी अनुमति या पोस्टर के विवाद से कहीं बड़ा है। सवाल राहुल गांधी का नहीं, उन युवाओं का है जो राजनीति से बाहर खड़े होकर अपने भविष्य को लेकर बेचैन हैं।
आज भारत की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में एक यह है कि जिस देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी को बताया जाता है, उसी युवा आबादी के एक बड़े हिस्से को शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार की अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाला युवा केवल परीक्षा नहीं देता। उसके पीछे एक परिवार की वर्षों की बचत होती है, माता-पिता की उम्मीद होती है और कई बार उसके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष होते हैं। इसलिए जब कोई परीक्षा रद्द होती है, पेपर लीक होता है या भर्ती वर्षों तक लटकती रहती है तो नुकसान केवल एक परीक्षा का नहीं होता। पूरा जीवन-चक्र प्रभावित होता है। राहुल गांधी इसी बिंदु को राजनीतिक भाषा देना चाहते हैं।
प्रयागराज की सभा में उनका जोर बेरोजगारी, महंगी शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं के सामने पैदा हो रही नई चुनौतियों पर रहा। उन्होंने रोजगार के संदर्भ में तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से पैदा होने वाली चुनौतियों को भी अपने भाषण का हिस्सा बनाया। यानी राहुल गांधी युवाओं की मौजूदा समस्या को केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं रखना चाहते बल्कि बदलती अर्थव्यवस्था और भविष्य के रोजगार से भी जोड़ रहे हैं।
असली सवाल, क्या बेचैनी वोट में बदलेगी?
यहां कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल भी है। क्या वह युवाओं के असंतोष को राजनीतिक शक्ति और फिर वोट में बदल सकती है? यही वह प्रश्न है जिसे इस रैली की भीड़ से कहीं ज्यादा गम्भीरता से देखा जाना चाहिए। किसी भी राजनीतिक आंदोलन की पहली सफलता भीड़ होती है लेकिन अंतिम सफलता तब होती है जब वह भीड़ किसी राजनीतिक विकल्प के साथ स्थायी रूप से जुड़ती है। राहुल गांधी के सामने चुनौती यही है।
कांग्रेस ने पहली बार नहीं देखा है कि छात्र और युवा किसी मुद्दे पर बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे हों। भारतीय राजनीति में छात्र आंदोलनों ने कई बार सत्ता के समीकरण बदले हैं लेकिन आज का युवा पहले के छात्र आंदोलनों से अलग है। उसके पास सोशल मीडिया है, डिजिटल नेटवर्क है, सूचना के अनेक स्रोत हैं और वह किसी एक राजनीतिक दल का स्थायी समर्थक बनने के बजाय मुद्दे के आधार पर अपनी राय बदल सकता है।
इसलिए राहुल गांधी यदि सचमुच युवाओं की राजनीति करना चाहते हैं तो उन्हें केवल सरकार पर हमला करने से आगे जाना होगा। उन्हें यह बताना होगा कि कांग्रेस सत्ता में आती है तो परीक्षा व्यवस्था कैसे बदलेगी? भर्ती कैलेंडर कैसे निश्चित होगा? पेपर लीक रोकने की जिम्मेदारी किसकी होगी? सरकारी नौकरियों की संख्या कैसे बढ़ेगी? निजी क्षेत्र में रोजगार कैसे पैदा होगा? शिक्षा को परिवारों की आर्थिक क्षमता से बाहर जाने से कैसे रोका जाएगा? यही वह जगह है जहां आंदोलन और राजनीतिक विकल्प के बीच फर्क पैदा होता है।
मोदी विरोध से आगे की राजनीति
राहुल गांधी की मौजूदा राजनीतिक भाषा में केवल मोदी विरोध नहीं है। वह आर्थिक असमानता, काॅरपोरेट शक्ति, संस्थाओं की स्वतंत्रता, चुनावी व्यवस्था और अब युवाओं के भविष्य को एक-दूसरे से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रयागराज की रैली में मंच की दृश्य भाषा भी इसी बदलाव की ओर संकेत करती दिखाई दी। वहां केवल शिक्षा और रोजगार की बात नहीं थी बल्कि सत्ता, पूंजी और संस्थाओं के सम्बंधों को भी निशाने पर लिया गया। यानी राहुल गांधी युवाओं के मुद्दे को व्यापक राजनीतिक नैरेटिव से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यह कांग्रेस के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बदलाव है।
कोटा से शुरू हुआ संवाद देहरादून तक पहुंचा और अब प्रयागराज में दिखाई दिया। इसका अर्थ यह है कि राहुल गांधी केवल एक शहर या एक चुनाव को ध्यान में रखकर युवाओं के बीच नहीं जा रहे हैं। वह एक ऐसे  राजनीतिक वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं जो आने वाले वर्षों में देश की राजनीति का सबसे प्रभावशाली मतदाता वर्ग हो सकता है।
भाजपा की बेचैनी का सवाल
यहीं से कहानी का दूसरा और शायद ज्यादा महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। राहुल गांधी जितनी तेजी से युवाओं के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं, उतनी ही तेजी से भाजपा की ओर से उनके अभियान पर प्रतिक्रियाएं भी आने लगी हैं। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सवाल उठाया कि राहुल गांधी को प्रयागराज जाने के बजाय झारखंड में आंदोलन कर रहे छात्रों के बीच जाना चाहिए था। भाजपा के उत्तर प्रदेश के नेताओं ने भी राहुल के अभियान को लेकर प्रतिक्रिया दी है। इन प्रतिक्रियाओं को सामान्य राजनीतिक बयान मानकर खारिज किया जा सकता है लेकिन लगातार तीन स्थानों पर युवाओं के साथ राहुल गांधी के संवाद और उसके जवाब में भाजपा की सक्रिय प्रतिक्रिया को एक साथ देखने पर तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।
भाजपा के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि युवाओं और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं का समर्थन लम्बे समय से उसकी राजनीतिक ताकत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। ऐसे में यदि विपक्ष का नेता उन्हीं युवाओं के बीच जाकर उनकी शिकायतें सुनने लगे, उनके साथ संवाद करे और उनके मुद्दों को संसद से लेकर सड़क तक उठाने लगे तो स्वाभाविक रूप से यह सत्ता पक्ष के लिए एक राजनीतिक चुनौती बन सकती है।
यही वजह है कि राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ को केवल एक कांग्रेस कार्यक्रम मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह देखना भी जरूरी होगा कि क्या भाजपा इस अभियान को केवल राजनीतिक आरोपों से जवाब देती है या युवाओं के वास्तविक सवालों का राजनीतिक और नीतिगत जवाब भी सामने रखती है।
कोटा से प्रयागराज तक एक नई रणनीति
कोटा, देहरादून और प्रयागराज को एक साथ देखें तो राहुल गांधी की रणनीति साफ दिखाई देती है। वह युवाओं को केवल चुनावी सभा में बुलाकर भाषण नहीं देना चाहते बल्कि उनके बीच बैठकर उनकी समस्याएं सुनने की कोशिश कर रहे हैं।
कोटा में परीक्षा और कोचिंग व्यवस्था का दबाव सामने था। देहरादून में भर्ती और पेपर लीक जैसे सवाल प्रमुख थे। प्रयागराज में प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ बेरोजगारी, शिक्षा की कीमत और भविष्य के रोजगार की चिंता भी जुड़ गई। यहां राहुल गांधी के लिए एक राजनीतिक अवसर है लेकिन यह अवसर तभी वास्तविक ताकत बनेगा जब वह इन सवालों को लेकर कोई ठोस वैकल्पिक नीति और लगातार चलने वाला आंदोलन खड़ा कर पाएं।
यदि ‘छात्रों की गूंज’ केवल रैलियों और भाषणों तक सीमित रही तो इसकी उम्र भी किसी सामान्य चुनावी अभियान जितनी ही होगी लेकिन यदि कांग्रेस पेपर लीक से लेकर भर्ती प्रक्रिया तक ठोस वैकल्पिक नीति तैयार करती है, छात्रों की शिकायतों का राष्ट्रीय स्तर पर दस्तावेज तैयार करती है, राज्यों में छात्र संगठनों को जोड़ती है और संसद से लेकर सड़क तक इन मुद्दों को लगातार उठाती है, तब यह अभियान एक अलग राजनीतिक रूप ले सकता है। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह संवाद कांग्रेस को चुनावी सफलता दिला देगा लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि राहुल गांधी ने युवाओं की बेचैनी को एक राजनीतिक सवाल में बदलने की कोशिश शुरू कर दी है और अगर यह कोशिश आगे बढ़ती है तो 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले यह कांग्रेस के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक हथियार बन सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *